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रिश्तेदार ख़बरदार


परिचय

आज के समाज में रिश्तेदारों की फ़िक्र एक आम और स्वाभाविक बात बन चुकी है।

लेकिन क्या यह फ़िक्र सच में दूसरों की भलाई के लिए होती है, या सिर्फ़ उनकी अपनी फ़ुर्सत और जिज्ञासा का परिणाम है?

किताब “रिश्तेदार ख़बरदार” इसी सवाल का जवाब खोजती है।


हर परिवार में कुछ रिश्तेदार होते हैं, जिनकी निगाह हमेशा दूसरों की ज़िंदगी पर रहती है।

वे हर छोटे-बड़े कदम की जानकारी रखते हैं और अक्सर बिना मांगे सलाह देने लगते हैं।

कभी यह सलाह मदद बनती है, तो कभी दबाव और उलझन।


इस किताब में हमने रिश्तेदारों की इन हरकतों को दस अलग-अलग दृष्टिकोणों से समझाया है।

कैसे उनका सवाल, उनकी चिंता, उनका “देखा था मैंने…” और उनका “हम तो भले के लिए कहते हैं” हमारे जीवन पर असर डालता है।

कैसे यह फ़िक्र कभी समझने का जरिया होती है, और कभी असहजता और दबाव का कारण।


“रिश्तेदार ख़बरदार” सिर्फ़ आलोचना नहीं है।

यह जागरूकता है, एक आईना है, और हर उस व्यक्ति के लिए एक संदेश है जो दूसरों की ज़िंदगी पर ध्यान देने के पहले अपनी ज़िंदगी पर ध्यान दे।


इस पुस्तक के पन्नों में आपको हँसी, व्यंग्य और वास्तविक जीवन की कहानियाँ मिलेंगी,

जो रिश्तेदारों की फ़िक्र की आदत को समझने और उससे संतुलित तरीके से निपटने में मदद करेंगी।


आइए, इस यात्रा की शुरुआत करें और जानें कि रिश्तेदारों की फ़िक्र, फ़ुर्सत या नियंत्रण — आखिर है क्या?

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लेखक का परिचय

श्रुति तौमर एक ऐसी लेखिका हैं, जो समाज की सूक्ष्म वास्तविकताओं और इंसानी व्यवहारों को बड़े ही सहज और स्पष्ट अंदाज़ में सामने लाती हैं।

उनकी लेखनी में व्यंग्य, वास्तविकता और जीवन के अनुभवों का अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता है।


श्रुति जी ने समाज में रिश्तेदारों की हरकतों और उनकी फ़िक्र के विभिन्न पहलुओं को करीब से देखा और महसूस किया।

इसी अनुभव ने उन्हें प्रेरित किया कि वह इसे शब्दों में उतारें और एक ऐसी किताब प्रस्तुत करें, जो हर पाठक को सोचने पर मजबूर करे।


वे मानते हैं कि दूसरों की ज़िंदगी में दख़ल देने से पहले अपनी ज़िंदगी पर ध्यान देना ज़रूरी है।

उनकी किताबें सिर्फ़ मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि पाठक को आत्मनिरीक्षण और समझ की ओर भी प्रेरित करती हैं।


श्रुति तोमर का उद्देश्य है कि उनके लेखन के माध्यम से समाज में संवाद और समझ की संस्कृति बढ़े,

और लोग दूसरों की ज़िंदगी पर नजर रखने के बजाय, अपने रिश्तों और अपने अनुभवों को महत्व दें।

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अध्याय 1 फ़िक्र या फ़ुर्सत?

रिश्तेदारों की फ़िक्र बड़ी अजीब चीज़ होती है। यह न तो अचानक आती है और न ही बिना वजह जाती है। यह ठीक उसी समय प्रकट होती है जब किसी के पास अपनी ज़िंदगी में करने को कुछ ख़ास नहीं होता, या जब किसी और की ज़िंदगी ज़रा अलग ढंग से चल रही होती है। तब यह फ़िक्र सवाल बनकर आती है, सलाह बनकर बैठ जाती है और कभी-कभी जाँच-पड़ताल का रूप भी ले लेती है।


अक्सर यह फ़िक्र बहुत मासूम लहजे में शुरू होती है। “बस पूछ ही तो रहे हैं”, “भले के लिए कह रहे हैं”, “हमें कौन सा कुछ मिलना है” — ऐसे वाक्य इस फ़िक्र को सामाजिक स्वीकृति दिला देते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सच में फ़िक्र होती है, या सिर्फ़ फ़ुर्सत का नतीजा?


हर परिवार में एक-दो ऐसे रिश्तेदार ज़रूर होते हैं जिनकी नज़र अपने घर से ज़्यादा दूसरों के घर पर रहती है। उन्हें यह जानना ज़रूरी होता है कि कौन सुबह कितने बजे उठता है, किसका बच्चा कहाँ पढ़ रहा है, कौन नौकरी बदलने वाला है, कौन शादी के लायक हो गया है और कौन अब भी “सेट” नहीं हुआ। यह जानकारी उन्हें किसी फ़ाइल में नहीं मिलती, फिर भी उनके पास हर अपडेट तैयार रहता है।


यह फ़िक्र कभी सीधे नहीं आती। यह घूम-फिरकर आती है। पहले हालचाल पूछा जाता है, फिर बच्चों की पढ़ाई, फिर काम-धंधा, और फिर धीरे से एक वाक्य फेंका जाता है — “वैसे आजकल आपका बेटा ज़्यादा बाहर घूमता रहता है।”

यह वाक्य सवाल नहीं होता, बयान भी नहीं होता, और सलाह तो बिल्कुल नहीं लगता। लेकिन इसका असर तीनों का होता है।


रिश्तेदारों की इस फ़िक्र में सबसे दिलचस्प बात यह होती है कि यह कभी अपने लिए नहीं होती। कोई रिश्तेदार यह नहीं कहता कि “शायद मुझे अपनी ज़िंदगी पर ध्यान देना चाहिए।” उनकी सारी चिंता दूसरों के बच्चों, दूसरों के फैसलों और दूसरों की आदतों को लेकर होती है।

अगर कोई लड़का अपने तरीके से जी रहा है, तो फ़िक्र शुरू।

अगर कोई लड़की अपने सपनों के पीछे जा रही है, तो फ़िक्र और गहरी।

अगर कोई परिवार समाज के तय रास्ते से थोड़ा सा भी हटकर चलता दिख जाए, तो रिश्तेदारों की फ़िक्र बाक़ायदा मीटिंग मोड में चली जाती है।


यह फ़िक्र अक्सर तुलना से जन्म लेती है। “हमारे ज़माने में तो ऐसा नहीं होता था”, “फलाने का बेटा तो देखो”, “उसकी बेटी तो कितनी संस्कारी है।”

तुलना करते समय यह भूल जाना आम बात है कि ज़माना बदल चुका है, परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं और हर इंसान की ज़िंदगी अलग होती है। लेकिन रिश्तेदारों की फ़िक्र को इन तथ्यों से कोई लेना-देना नहीं होता।


असल में यह फ़िक्र नियंत्रण की इच्छा से जुड़ी होती है। जब कोई अपनी ज़िंदगी पर पूरा नियंत्रण महसूस नहीं कर पाता, तब वह दूसरों की ज़िंदगी पर राय देने लगता है। यह राय धीरे-धीरे फ़िक्र का रूप ले लेती है ताकि उसे सही ठहराया जा सके।

क्योंकि अगर कहा जाए — “मुझे आपकी ज़िंदगी में दख़ल देना है” — तो बात बिगड़ जाएगी।

लेकिन अगर कहा जाए — “हमें तो आपकी बहुत फ़िक्र है” — तो बात सभ्य लगने लगती है।


रिश्तेदारों की फ़िक्र अक्सर बिना ज़िम्मेदारी के आती है। सलाह दे दी, बात कह दी, चिंता जता दी — अब परिणाम चाहे जो हो, उससे उनका कोई लेना-देना नहीं।

अगर सलाह मान ली और नुकसान हुआ, तो कोई ज़िम्मेदारी नहीं।

अगर सलाह न मानी और कुछ अच्छा हो गया, तो चुप्पी।

और अगर सलाह न मानी और कुछ गड़बड़ हो गया, तो वही रिश्तेदार सबसे पहले कहेंगे — “देखा, हमने पहले ही कहा था।”


यह फ़िक्र ज़्यादातर एकतरफ़ा होती है। रिश्तेदार सवाल पूछते हैं, लेकिन जवाब सुनने के लिए नहीं। जवाब सिर्फ़ औपचारिकता होते हैं। असली उद्देश्य होता है अपनी राय रखना।

“आपका बेटा क्या करता है?”

अगर जवाब संतोषजनक नहीं हुआ, तो अगला वाक्य तैयार रहता है।

“आजकल बच्चे भटक जाते हैं।”

यहाँ भटकना एक सामान्य शब्द नहीं, बल्कि आरोप होता है।


इस फ़िक्र का सबसे बड़ा असर घर के भीतर पड़ता है। माता-पिता जो पहले अपने बच्चों पर भरोसा करते थे, वही भरोसा धीरे-धीरे डगमगाने लगता है। रिश्तेदारों के वाक्य घर की दीवारों में गूंजने लगते हैं।

“लोग क्या कहेंगे?”

“सब देख रहे हैं।”

“हमारी बदनामी हो जाएगी।”

और इस तरह एक स्वतंत्र इंसान की ज़िंदगी समाज की निगरानी में आ जाती है।


रिश्तेदारों की फ़िक्र अक्सर डर पैदा करती है। यह डर भविष्य का होता है, समाज का होता है, इज़्ज़त का होता है।

लेकिन यह फ़िक्र कभी हिम्मत नहीं देती।

यह कभी यह नहीं कहती — “अगर कुछ गलत हो भी जाए, तो हम साथ हैं।”

यह सिर्फ़ यह कहती है — “गलत मत करना।”


फ़िक्र और फ़ुर्सत के बीच की रेखा बहुत पतली होती है। जिनके पास अपनी ज़िंदगी में उद्देश्य होता है, वे दूसरों की ज़िंदगी में कम झांकते हैं। और जिनके पास समय बहुत होता है, वे उसे दूसरों के फैसलों पर टिप्पणी करने में खर्च करते हैं।

रिश्तेदारों की फ़िक्र अक्सर इसी खाली समय की उपज होती है।


सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह फ़िक्र पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती है। जो कभी इस फ़िक्र से परेशान हुआ होता है, वही समय के साथ खुद वैसा ही रिश्तेदार बन जाता है।

कभी वह कहता था — “लोग बेवजह बोलते हैं।”

और फिर वही कहता है — “हम तो अनुभव से कह रहे हैं।”


इस अध्याय का उद्देश्य रिश्तेदारों को दुश्मन ठहराना नहीं है, बल्कि उस सोच को पहचानना है जो फ़िक्र के नाम पर दख़ल देती है। हर सवाल बुरा नहीं होता, हर चिंता गलत नहीं होती। लेकिन जब फ़िक्र सुनने से ज़्यादा बोलने लगे, समझने से ज़्यादा जज करने लगे, और मदद से ज़्यादा दबाव बनने लगे — तब यह फ़िक्र नहीं रहती।


असली फ़िक्र वह होती है जो आज़ादी के साथ आती है, शर्तों के साथ नहीं।

जो सहारा बनती है, पहरा नहीं।

और जो इंसान को अपनी ज़िंदगी जीने का हक़ देती है, छीनती नहीं।


यहीं से यह किताब आगे बढ़ती है — उस फ़िक्र को समझने की कोशिश करती हुई, जो अक्सर फ़ुर्सत का ही दूसरा नाम होती है।

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अध्याय 2 आपका बेटा क्या करता है?


यह सवाल साधारण नहीं होता। सुनने में भले ही यह एक सामान्य जिज्ञासा लगे, लेकिन इसके भीतर कई परतें छिपी होती हैं। यह सवाल अक्सर हालचाल पूछने के बाद आता है, ठीक उस मोड़ पर जहाँ बातचीत को सभ्य बनाए रखते हुए किसी की निजी ज़िंदगी में प्रवेश करना आसान हो जाता है।

“सब ठीक?” के बाद अचानक पूछा गया यह सवाल दरअसल जानकारी नहीं, बल्कि मूल्यांकन की शुरुआत होता है।


“आपका बेटा क्या करता है?”

यह पूछते समय आवाज़ में उत्सुकता कम और जांच-पड़ताल ज़्यादा होती है। सवाल पूछने वाला अक्सर जवाब सुनने के लिए नहीं, बल्कि उसे तौलने के लिए तैयार रहता है। जवाब अगर समाज के तय मानकों के अनुसार हुआ, तो सिर हिलाकर संतोष जता दिया जाएगा। अगर ज़रा भी अलग हुआ, तो वही जवाब अगले कई वाक्यों की वजह बन जाएगा।


इस सवाल का दायरा बहुत बड़ा है। यह सिर्फ़ पेशे के बारे में नहीं होता। इसके साथ-साथ यह सवाल आदमी की हैसियत, उसकी सोच, उसके भविष्य और उसके माता-पिता की परवरिश पर भी टिप्पणी करता है।

अगर जवाब हुआ — “नौकरी करता है”, तो अगला सवाल तय है — “कहाँ?”

अगर कहा — “अपना काम करता है”, तो शक — “चलता भी है या नहीं?”

और अगर जवाब थोड़ा असामान्य हुआ — जैसे कला, लेखन, संगीत, फ्रीलांस या कुछ नया — तो चिंता अपने पूरे रूप में सामने आ जाती है।


यह सवाल अक्सर तुलना के हथियार के साथ आता है। जवाब सुनते ही किसी तीसरे व्यक्ति का उदाहरण तैयार रहता है।

“अच्छा… हमारे फलाने का बेटा तो सरकारी नौकरी में है।”

यह वाक्य बातचीत को एक मुकाबले में बदल देता है, जहाँ एक ज़िंदगी को दूसरी ज़िंदगी से तौला जाता है, बिना यह समझे कि हर इंसान का रास्ता अलग होता है।


इस सवाल के पीछे एक गहरी असुरक्षा भी छिपी होती है। रिश्तेदार अपने बच्चों की उपलब्धियों को दूसरों के बच्चों से तुलना करके ही सुरक्षित महसूस करते हैं। अगर सामने वाला बच्चा “सेट” नहीं दिखा, तो उन्हें थोड़ी राहत मिलती है। और अगर वह आगे बढ़ता दिखा, तो वही सवाल चिंता बन जाता है।

यह फ़िक्र कम, प्रतिस्पर्धा ज़्यादा होती है।


सबसे अजीब बात यह है कि यह सवाल कभी उस बच्चे से नहीं पूछा जाता, जिसकी बात हो रही होती है। वह हमेशा उसके माता-पिता से पूछा जाता है, मानो वह बच्चा अब भी निर्णय लेने के योग्य नहीं है। मानो उसकी पहचान उसकी अपनी नहीं, बल्कि उसके घर वालों के जवाब से तय होगी।


माता-पिता के लिए यह सवाल कई बार बोझ बन जाता है। उन्हें लगता है कि उन्हें अपने बच्चे का बचाव करना पड़ रहा है। वे जवाब देते हैं, समझाते हैं, सफ़ाई देते हैं।

“अभी सीख रहा है।”

“धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।”

“आजकल ज़माना बदल गया है।”

ये सारे वाक्य दरअसल रिश्तेदारों के नहीं, समाज के डर को संबोधित करते हैं।


यह सवाल बच्चे की मेहनत को एक लाइन में समेट देता है। सालों की पढ़ाई, असफलताएँ, प्रयोग, संघर्ष — सब कुछ एक जवाब में सिमट जाता है।

अगर जवाब प्रभावशाली नहीं हुआ, तो मेहनत की कोई कीमत नहीं रहती।


लड़कियों के मामले में यही सवाल और भी अलग रूप ले लेता है।

“आपकी बेटी क्या करती है?”

यह सवाल अक्सर उसके काम से ज़्यादा उसकी शादी से जुड़ा होता है। अगर वह पढ़ रही है या काम कर रही है, तो अगला सवाल होता है — “शादी का क्या सोचा है?”

मानो उसका काम सिर्फ़ समय काटने के लिए हो।


इस सवाल का सबसे ख़तरनाक असर यह होता है कि धीरे-धीरे परिवार भी उसी भाषा में सोचना शुरू कर देता है। माता-पिता बच्चों से वही सवाल पूछने लगते हैं, जो उन्होंने रिश्तेदारों से सुना होता है।

“लोग पूछते रहते हैं।”

“हमें क्या जवाब दें?”

और इस तरह बच्चे की ज़िंदगी उसके सपनों से नहीं, सवालों से चलने लगती है।


यह सवाल कभी यह नहीं पूछता कि बच्चा खुश है या नहीं।

यह कभी यह नहीं जानना चाहता कि वह जो कर रहा है, उसमें उसे संतोष है या नहीं।

खुशी, संतुलन और मानसिक शांति इस सवाल के दायरे से बाहर होते हैं।


असल में “आपका बेटा क्या करता है?” एक सामाजिक पासवर्ड बन चुका है। अगर जवाब सही रहा, तो आप स्वीकार कर लिए जाते हैं। अगर नहीं, तो आपको समझाने की ज़रूरत समझी जाती है।

यह सवाल कम, एक परीक्षा ज़्यादा है — और दुर्भाग्य से यह परीक्षा बार-बार ली जाती है।


इस अध्याय का उद्देश्य इस सवाल को गलत ठहराना नहीं, बल्कि इसके पीछे छिपी मानसिकता को समझना है। सवाल पूछना गलत नहीं है, लेकिन सवाल का मक़सद बहुत कुछ कह देता है।

अगर सवाल समझने के लिए है, तो वह सम्मान देता है।

और अगर सवाल जज करने के लिए है, तो वह बोझ बन जाता है।


हर इंसान अपने समय, अपनी परिस्थितियों और अपनी समझ के अनुसार आगे बढ़ता है। किसी की ज़िंदगी को एक सवाल में बाँध देना न तो फ़िक्र है, न ही भलाई।

यह सिर्फ़ वह आदत है, जिसे समाज ने सामान्य मान लिया है।


और शायद अब समय है कि इस सवाल पर भी वही सवाल वापस पूछा जाए —

“आप क्यों जानना चाहते हैं?”

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अध्याय 3 समझाने का शौक़


कुछ लोगों को समझाने का बड़ा शौक़ होता है। यह शौक़ न तो माँगा जाता है और न ही ज़रूरत देखकर दिया जाता है। यह अपने आप सक्रिय हो जाता है, जैसे ही किसी की ज़िंदगी उनके तय किए हुए रास्ते से ज़रा भी अलग दिखाई दे।

रिश्तेदारों के लिए समझाना एक आदत नहीं, बल्कि अधिकार जैसा होता है।


“हम तो समझा ही रहे हैं।”

यह वाक्य अक्सर किसी आलोचना की शुरुआत होता है, न कि किसी मदद की। समझाने के नाम पर जो बातें कही जाती हैं, वे ज़्यादातर आदेश जैसी होती हैं। उनमें संवाद कम और घोषणा ज़्यादा होती है। सामने वाले की परिस्थिति, उसकी सोच या उसकी मजबूरी को समझने की कोशिश शायद ही कभी की जाती है।


समझाने का शौक़ अक्सर अनुभव के नाम पर आता है।

“हमने बहुत दुनिया देखी है।”

“हम ज़माने को जानते हैं।”

इन वाक्यों के साथ एक अनकहा दावा जुड़ा होता है कि सामने वाला अनुभवहीन है, भटका हुआ है और उसे दिशा दिखाने की ज़रूरत है। यह मान लिया जाता है कि उम्र अपने आप बुद्धिमत्ता ले आती है, जबकि सच्चाई यह है कि अनुभव बिना समझ के सिर्फ़ आदत बन जाता है।


रिश्तेदारों का समझाना हमेशा भविष्य की आशंकाओं से भरा होता है।

“आज मज़े कर लो, बाद में पछताओगे।”

“अभी नहीं समझोगे, समय आने पर पता चलेगा।”

इन वाक्यों में डर छिपा होता है, उम्मीद नहीं। यह समझाना इंसान को मजबूत नहीं बनाता, बल्कि उसे सहमा देता है।


सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह समझाना कभी पूरा नहीं होता। एक सलाह मान ली जाए, तो दूसरी तैयार रहती है। एक रास्ता अपनाया जाए, तो दूसरा बेहतर बताया जाता है।

समझाने वालों को कभी संतोष नहीं होता, क्योंकि उनका उद्देश्य समाधान नहीं, नियंत्रण होता है।


यह शौक़ विशेष रूप से तब तेज़ हो जाता है जब सामने वाला चुप रहता है। चुप्पी को सहमति समझ लिया जाता है।

“देखो, कुछ बोला नहीं, मान गया।”

लेकिन अक्सर यह चुप्पी थकान से आती है, बहस से बचने के लिए आती है। सामने वाला बोलता नहीं क्योंकि उसे पता है कि बोलने से कुछ बदलेगा नहीं।


समझाने का शौक़ रिश्तों में दूरी पैदा करता है। जो बात स्नेह से कही जा सकती थी, वह उपदेश बन जाती है। और उपदेश सुनने वाला धीरे-धीरे बात करना कम कर देता है।

वह अपनी योजनाएँ, अपने सपने, अपनी असफलताएँ साझा करना बंद कर देता है, क्योंकि हर बातचीत के अंत में उसे “समझाया” जाना तय होता है।


माता-पिता कई बार इस शौक़ के बीच फँस जाते हैं। वे रिश्तेदारों की बात सुनते हैं, बच्चों को समझाते हैं, और फिर बच्चों की नाराज़गी झेलते हैं।

“सब तुम्हारे भले के लिए कह रहे हैं।”

यह वाक्य अक्सर रिश्तेदारों की बात को वैध ठहराने के लिए बोला जाता है, लेकिन बच्चों के मन में यह दूरी और बढ़ा देता है।


समझाने वाले यह नहीं देखते कि सामने वाला पहले से कितना सोच चुका है। वे यह नहीं मानते कि कोई इंसान बिना सोचे-समझे निर्णय नहीं लेता।

हर फैसला उन्हें जल्दबाज़ी लगता है, हर जोखिम उन्हें मूर्खता।


समझाने का शौक़ कई बार इंसान के आत्मविश्वास को तोड़ देता है। बार-बार यह सुनना कि “तुम गलत कर रहे हो” धीरे-धीरे मन में घर कर लेता है। इंसान खुद पर शक करने लगता है, अपने फैसलों से डरने लगता है।

और यही इस शौक़ की सबसे बड़ी कीमत होती है।


असली समझाना वह होता है जिसमें सुनना शामिल हो। जिसमें सवाल हों, जवाब नहीं। जिसमें विकल्प दिखाए जाएँ, आदेश नहीं।

लेकिन रिश्तेदारों का समझाना अक्सर एकतरफ़ा होता है। वे बोलते हैं, सामने वाला सुनता है — या सुनने का नाटक करता है।


इस अध्याय का उद्देश्य यह दिखाना है कि हर सलाह ज़रूरी नहीं होती, और हर चुप्पी स्वीकृति नहीं होती। समझाना तब ही सार्थक होता है जब सामने वाला उसे चाहता हो।

वरना वह समझाना नहीं, थोपना बन जाता है।


और शायद सबसे ज़रूरी बात यह है कि हर इंसान को अपनी गलतियाँ खुद करने का अधिकार होता है। वही गलतियाँ उसे वह सिखाती हैं, जो कोई समझाने वाला कभी नहीं सिखा सकता।

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अध्याय 5 लड़का–लड़की और लोकल जजमेंट

समाज में कुछ फैसले ऐसे होते हैं जिन पर राय देना लोग अपना जन्मसिद्ध अधिकार मान लेते हैं। लड़का और लड़की जब साथ दिख जाएँ, या अलग-अलग भी अपने तरीके से जीते दिख जाएँ, तो लोकल जजमेंट तुरंत सक्रिय हो जाता है।

यह जजमेंट न कानून से चलता है, न तर्क से — यह सिर्फ़ नज़र से चलता है।


लड़के के लिए आज़ादी अक्सर सामान्य मानी जाती है।

“लड़का है, घूमेगा ही।”

लेकिन वही काम लड़की करे, तो सवाल उठते हैं।

“ज़रूरत क्या थी?”

“इतनी देर बाहर क्यों?”

यह अंतर किसी नियम में नहीं लिखा, लेकिन समाज की सोच में गहराई से बैठा होता है।


लड़का–लड़की का साथ होना अपने आप में समस्या नहीं होता। समस्या यह होती है कि लोग उसे किस नज़र से देखते हैं।

दो लोगों को बात करते देख लिया, तो अर्थ निकाला जाता है।

हँसते देख लिया, तो कहानी बनाई जाती है।

और अगर साथ घूमते देख लिया, तो फैसला सुना दिया जाता है।


लोकल जजमेंट हमेशा संदर्भ से बाहर होता है। कोई यह जानने की कोशिश नहीं करता कि वे दोनों कौन हैं, क्यों साथ हैं, किस उद्देश्य से मिले हैं।

यह मान लिया जाता है कि अगर समाज की परिभाषा में फिट नहीं बैठते, तो कुछ न कुछ “गलत” ज़रूर है।


इस जजमेंट का बोझ सबसे ज़्यादा लड़कियों पर पड़ता है। उनके कपड़े, उनकी हँसी, उनका बाहर जाना — सब कुछ समीक्षा के दायरे में होता है।

लड़कों की गलतियाँ व्यक्तिगत मानी जाती हैं,

लड़कियों की गलतियाँ पारिवारिक।


रिश्तेदार इस लोकल जजमेंट को घर तक पहुँचाने का काम करते हैं।

“हम तो बस बता रहे हैं।”

यह बताना अक्सर डर बनकर घर में बस जाता है। माता-पिता चिंतित होते हैं, सवाल पूछते हैं, सीमाएँ खींची जाती हैं।

और लड़की से उसकी सहजता छिन जाती है।


लड़कों के लिए भी यह जजमेंट आसान नहीं होता। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे “मर्यादा में रहें”, लेकिन मर्यादा की परिभाषा कोई साफ़ नहीं बताता।

हर नज़र, हर टिप्पणी उन्हें भी सतर्क रहने को मजबूर कर देती है।


यह लोकल जजमेंट धीरे-धीरे आत्म-सेंसरशिप सिखाता है। लोग अपने व्यवहार को समाज के डर से बदलने लगते हैं।

वे वो नहीं करते जो सही लगता है, बल्कि वो करते हैं जो सुरक्षित लगता है।


समस्या यह नहीं है कि समाज राय देता है। समस्या यह है कि यह राय बिना ज़िम्मेदारी के दी जाती है।

कोई यह नहीं सोचता कि उसके जजमेंट का असर किसी की ज़िंदगी पर क्या पड़ेगा।


इस अध्याय का उद्देश्य यह दिखाना है कि लड़का–लड़की का साथ होना कोई अपराध नहीं, बल्कि सामान्य मानवीय व्यवहार है।

जजमेंट तब शुरू होता है जब हम दूसरों की ज़िंदगी को अपने डर और सोच के तराजू पर तौलने लगते हैं।


क्योंकि समाज वही स्वस्थ होता है,

जहाँ भरोसा ज़्यादा हो,

और बेवजह का शक कम।

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अध्याय 6 घर से ज़्यादा बाहर क्यों?


यह सवाल अक्सर जिज्ञासा की तरह पूछा जाता है, लेकिन इसके भीतर शिकायत छिपी होती है।

“आजकल घर में कम ही दिखता है।”

“हर समय बाहर ही रहता है।”

इन वाक्यों के साथ एक अनकहा आरोप जुड़ा होता है — जैसे घर से बाहर होना अपने आप में कोई गलती हो।


रिश्तेदारों और समाज की नज़र में घर एक सुरक्षित दायरा होता है। जो उससे बाहर निकलता है, वह संदिग्ध माना जाने लगता है। बाहर जाने का मतलब भटकना, बिगड़ना या गलत रास्ते पर जाना मान लिया जाता है।

यह सोच उस दौर की देन है जब विकल्प कम थे और दुनिया छोटी थी।


आज बाहर जाना सिर्फ़ घूमना नहीं है। बाहर जाना सीखना है, तलाश करना है, खुद को पहचानना है।

लेकिन यह बात समझने से पहले ही सवाल खड़ा कर दिया जाता है —

“घर में सब कुछ है, फिर बाहर क्यों?”


इस सवाल के पीछे नियंत्रण की भावना होती है। जब कोई घर से ज़्यादा बाहर रहता है, तो उस पर नज़र रखना मुश्किल हो जाता है। और जहाँ नज़र कम होती है, वहाँ बेचैनी बढ़ जाती है।

रिश्तेदारों की बेचैनी इसी से जन्म लेती है।


यह सवाल अक्सर युवाओं से जुड़ता है।

“उम्र ही ऐसी है।”

यह कहकर एक तरफ़ तो व्यवहार को गलत ठहराया जाता है, और दूसरी तरफ़ जिम्मेदारी से बच लिया जाता है।

युवाओं को समझाने के नाम पर डराया जाता है, लेकिन समझाया नहीं जाता।


घर से बाहर रहना कई बार मजबूरी भी होता है। काम, पढ़ाई, सपने — सब घर की चारदीवारी में पूरे नहीं होते।

लेकिन रिश्तेदार इन कारणों में दिलचस्पी नहीं रखते। उन्हें सिर्फ़ इतना दिखता है कि व्यक्ति घर में कम है।


इस सवाल का असर परिवार के भीतर भी पड़ता है। माता-पिता बच्चों से पूछताछ करने लगते हैं।

“कहाँ जा रहे हो?”

“इतनी देर क्यों लग गई?”

ये सवाल सुरक्षा से ज़्यादा सामाजिक दबाव से पैदा होते हैं।


धीरे-धीरे घर एक सुरक्षित जगह कम और निगरानी केंद्र ज़्यादा बन जाता है। व्यक्ति घर आते हुए भी असहज महसूस करने लगता है, क्योंकि उसे पता है कि सवाल इंतज़ार कर रहे होंगे।


घर से ज़्यादा बाहर रहने को चरित्र से जोड़ दिया जाता है।

लड़कों के लिए यह आवारापन कहलाता है,

लड़कियों के लिए यह बदचलनी का शक।

और इस तरह एक सामान्य व्यवहार नैतिक मुद्दा बना दिया जाता है।


इस अध्याय का उद्देश्य यह समझाना है कि घर और बाहर के बीच संतुलन ज़रूरी है, लेकिन सवाल उठाने से ज़्यादा भरोसा ज़रूरी है।

बाहर जाना अगर गलत नहीं, तो उसे गलत साबित करने की कोशिश भी नहीं होनी चाहिए।


क्योंकि इंसान घर में रहकर सुरक्षित हो सकता है,

लेकिन बाहर जाकर ही बड़ा होता है।

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अध्याय 7 हम तो भले के लिए कहते हैं


यह वाक्य अक्सर किसी कटु टिप्पणी के बाद आता है। जैसे ही बात चुभती है, जैसे ही सामने वाला असहज होता है, तुरंत सफ़ाई दी जाती है —

“हम तो भले के लिए कहते हैं।”

यह वाक्य आलोचना को नैतिक जामा पहना देता है और बोलने वाले को सही साबित कर देता है।


“भला” यहाँ उद्देश्य नहीं, ढाल बन जाता है। इसके पीछे छिपकर बहुत कुछ कहा जा सकता है — ताना, शक, तुलना, आदेश। और जब सामने वाला विरोध करे, तो उसे नासमझ ठहरा दिया जाता है।

“आजकल के बच्चे बात-बात पर बुरा मान जाते हैं।”


इस वाक्य की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह असर की ज़िम्मेदारी से मुक्त कर देता है। जो कहा गया, उसका असर क्या हुआ — यह महत्वहीन हो जाता है।

अगर बात से चोट पहुँची, तो दोष सुनने वाले का माना जाता है, कहने वाले का नहीं।


“भले के लिए” कही गई बातें अक्सर डर से भरी होती हैं।

“लोग क्या कहेंगे?”

“बाद में पछताओगे।”

ये वाक्य किसी को मजबूत नहीं बनाते, बल्कि उसे सीमित करते हैं।


रिश्तेदार जब यह वाक्य कहते हैं, तो वे खुद को ऊपर की नैतिक स्थिति में रख लेते हैं। वे सही हैं, अनुभवी हैं, और सामने वाला गलती पर है — यह धारणा अपने आप बन जाती है।

संवाद की जगह उपदेश आ जाता है।


इस वाक्य का इस्तेमाल खासतौर पर तब होता है जब सामने वाला अपनी राह पर चल रहा हो।

अगर कोई तयशुदा रास्ते से हटे, तो तुरंत “भले” की याद आ जाती है।

लेकिन अगर वही रास्ता सफल हो जाए, तो “भले” का ज़िक्र गायब हो जाता है।


“हम तो भले के लिए कहते हैं” अक्सर सुनने वाले को चुप करा देता है। क्योंकि भले का विरोध करना सामाजिक रूप से गलत माना जाता है।

जो असहमत हो, वह कृतघ्न कहलाता है।


इसका असर रिश्तों पर पड़ता है। बात कहने वाला खुद को नेक समझता है, और सामने वाला दूरी बना लेता है।

धीरे-धीरे संवाद खत्म हो जाता है, और सिर्फ़ औपचारिकता बचती है।


इस अध्याय का उद्देश्य यह बताना है कि भला वह होता है जो सामने वाले की परिस्थिति, इच्छा और स्वतंत्रता का सम्मान करे।

भला वह नहीं होता जो डर, शर्म और दबाव से निकले।


क्योंकि सच्ची भलाई वह है जो हाथ पकड़कर साथ चले,

ना कि ऊँगली उठाकर रास्ता बताए।

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अध्याय 8 ख़ामोश घर, बोलते रिश्तेदार

हर घर की अपनी एक ख़ामोशी होती है। यह ख़ामोशी कभी समझ से पैदा होती है, कभी भरोसे से, और कभी थकान से। लेकिन जब घर ख़ामोश होते हैं, तब रिश्तेदार बोलने लगते हैं। जैसे उन्हें लगता हो कि जहाँ भीतर शब्द कम हैं, वहाँ बाहर से आवाज़ भरना उनकी ज़िम्मेदारी है।


घर के लोग कई बार इसलिए चुप रहते हैं क्योंकि वे एक-दूसरे को जानते हैं। उन्हें हर बात शब्दों में कहने की ज़रूरत नहीं होती। वे हालात समझते हैं, समय की क़द्र करते हैं और इंतज़ार करना जानते हैं।

लेकिन रिश्तेदारों को यह ख़ामोशी अक्सर खलती है। उन्हें लगता है कि अगर कुछ कहा नहीं जा रहा, तो कुछ छिपाया जा रहा है।


रिश्तेदारों की बातचीत अक्सर अनुमान से शुरू होती है।

“घर में आजकल ज़्यादा सन्नाटा रहता है।”

“पहले जैसा माहौल नहीं रहा।”

इन वाक्यों में जानकारी कम और अटकलें ज़्यादा होती हैं। और यही अटकलें धीरे-धीरे कहानी बन जाती हैं।


ख़ामोश घर रिश्तेदारों के लिए खाली जगह की तरह होते हैं, जहाँ वे अपनी बात भर सकते हैं। उन्हें लगता है कि अगर घर वाले खुद कुछ नहीं कह रहे, तो बाहर वालों को बोलने का मौका मिल गया है।

और यही मौका वे बिना झिझक इस्तेमाल करते हैं।


इस बोलने में संवेदनशीलता कम और अधिकार का भाव ज़्यादा होता है। रिश्तेदार घर की निजी बातों पर राय देते हैं, जैसे वे उस घर का हिस्सा नहीं, बल्कि उसके निर्णायक हों।

“हम तो बस सुलझाना चाहते हैं।”

लेकिन सुलझाने की कोशिश में उलझन बढ़ जाती है।


कई बार घर के लोग चुप इसलिए रहते हैं क्योंकि वे अपने मुद्दों को सार्वजनिक नहीं बनाना चाहते। हर बात सबको बताना ज़रूरी नहीं होती।

लेकिन रिश्तेदार इस सीमारेखा को नहीं पहचानते। उन्हें लगता है कि रिश्तेदारी उन्हें हर दरवाज़ा खोलने का हक़ देती है।


इसका असर घर के भीतर महसूस होता है। जो चुप्पी सुकून देती थी, वह दबाव बन जाती है। घर वाले खुद को सफ़ाई देने की स्थिति में पाते हैं, बिना यह समझे कि उन्होंने गलती क्या की।


ख़ामोशी को कमजोरी समझ लिया जाता है।

जो कम बोलता है, वह कमज़ोर मान लिया जाता है।

जो जवाब नहीं देता, उसे दोषी समझ लिया जाता है।

और यही सोच रिश्तों को खोखला कर देती है।


इस अध्याय का उद्देश्य यह बताना है कि हर ख़ामोशी समस्या नहीं होती। कई बार ख़ामोशी समझदारी होती है, परिपक्वता होती है।

और हर बोलना समाधान नहीं होता।


क्योंकि कुछ रिश्ते शब्दों से नहीं,

सम्मान से चलते हैं।

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अध्याय 9 सीमाएँ भी कोई चीज़ होती हैं


हमारे समाज में रिश्तों को जितना महत्व दिया जाता है, उतना ही कम महत्व सीमाओं को दिया जाता है। ऐसा माना जाता है कि जहाँ रिश्ता है, वहाँ दख़ल स्वाभाविक है।

लेकिन सच यह है कि बिना सीमाओं के रिश्ते बोझ बन जाते हैं।


रिश्तेदार अक्सर यह मान लेते हैं कि उन्हें सब कुछ जानने और कहने का अधिकार है।

कौन क्या कर रहा है, क्यों कर रहा है, कैसे कर रहा है —

ये सवाल निजी नहीं माने जाते।

और अगर कोई इन सवालों से असहज हो, तो उसे “घमंडी” या “अलग-थलग रहने वाला” कह दिया जाता है।


सीमाएँ खींचना हमारे समाज में बदतमीज़ी समझी जाती है।

“हम अपने ही हैं।”

यह वाक्य अक्सर हर हद पार करने की इजाज़त बन जाता है।

लेकिन अपने होने का मतलब यह नहीं कि किसी की निजता मिटा दी जाए।


सीमाएँ वहाँ ज़रूरी हो जाती हैं जहाँ फ़िक्र दख़ल में बदलने लगे।

जहाँ सवाल समर्थन नहीं, जाँच बन जाए।

और जहाँ सलाह मदद नहीं, दबाव बन जाए।


सबसे मुश्किल काम होता है सीमाएँ तय करना। क्योंकि इसमें टकराव का डर होता है।

लोग चुप रहना आसान समझते हैं, बजाय इसके कि वे स्पष्ट रूप से कहें —

“यह मेरी निजी बात है।”

“इस पर मैं बात नहीं करना चाहता।”


रिश्तेदारों को सीमाएँ तब खटकती हैं जब वे उन्हें मानने के आदी नहीं होते।

उन्हें लगता है कि उन्हें रोका जा रहा है, जबकि असल में सिर्फ़ एक दायरा तय किया जा रहा होता है।


सीमाएँ रिश्तों को तोड़ती नहीं हैं, बल्कि उन्हें सुरक्षित बनाती हैं।

जहाँ सीमाएँ होती हैं, वहाँ सम्मान पनपता है।

और जहाँ सम्मान होता है, वहाँ संवाद संभव होता है।


इस अध्याय का उद्देश्य यह समझाना है कि सीमाएँ खींचना स्वार्थ नहीं है।

यह आत्म-सम्मान है।

यह कहना कि “यह मेरा क्षेत्र है” — रिश्ते से इंकार नहीं, बल्कि उसे संतुलन देना है।


क्योंकि हर रिश्ता तब ही स्वस्थ रहता है,

जब उसमें पास आने के साथ-साथ

रुकने की जगह भी हो।

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अध्याय 10 अपनी ज़िंदगी पहले देखिए

दूसरों की ज़िंदगी पर नज़र रखना आसान होता है। उसमें जोखिम कम होता है, मेहनत कम होती है और आत्ममंथन की ज़रूरत नहीं पड़ती। शायद इसी कारण समाज में बहुत से लोग अपनी ज़िंदगी से ज़्यादा दूसरों की ज़िंदगी में रुचि रखते हैं।

लेकिन यही आदत रिश्तों को बोझिल और इंसान को असंतुष्ट बना देती है।


रिश्तेदारों की सबसे बड़ी विडंबना यही होती है कि वे सुधार हमेशा बाहर ढूँढते हैं।

किसका बच्चा क्या कर रहा है,

किसकी बेटी कैसे रह रही है,

कौन सही रास्ते पर नहीं है —

इन सब पर नज़र रहती है।

लेकिन अपने भीतर झाँकने का समय शायद ही कभी निकलता है।


दूसरों पर टिप्पणी करना कई बार अपने खालीपन को ढँकने का तरीका बन जाता है। जब अपनी ज़िंदगी में उद्देश्य कम हो, तो दूसरों की ज़िंदगी पर राय देना व्यस्तता का भ्रम देता है।

लेकिन यह भ्रम लंबे समय तक नहीं टिकता।


जो इंसान अपनी ज़िंदगी में संतुष्ट होता है, वह दूसरों की राह में कम हस्तक्षेप करता है। उसे न तो तुलना की ज़रूरत होती है, न नियंत्रण की।

वह जानता है कि हर किसी का संघर्ष अलग है, और हर किसी की मंज़िल भी।


“अपनी ज़िंदगी पहले देखिए” कहना अपमान नहीं, आमंत्रण है।

आमंत्रण आत्मचिंतन का।

यह सोचने का कि हम जो कह रहे हैं, उसका उद्देश्य क्या है।

क्या वह मदद है, या सिर्फ़ आदत?


यह अध्याय दोष लगाने के लिए नहीं, जागरूक करने के लिए है।

यह याद दिलाने के लिए कि किसी की ज़िंदगी पर टिप्पणी करने से पहले यह सोचना ज़रूरी है —

अगर कोई वही बात हमें कहे, तो हमें कैसा लगेगा?


अपनी ज़िंदगी पर ध्यान देना रिश्तों को कमजोर नहीं करता।

बल्कि उन्हें ईमानदार बनाता है।

जहाँ हर कोई अपनी ज़िम्मेदारी उठाता है, वहाँ दूसरों की ज़िंदगी में दख़ल अपने आप कम हो जाता है।


इस किताब का यह अंतिम संदेश है कि

दूसरों की ज़िंदगी सुधारने से पहले

अपनी ज़िंदगी समझना ज़्यादा ज़रूरी है।


क्योंकि जब इंसान खुद से संतुष्ट होता है,

तब उसे दूसरों की ज़िंदगी पर

नज़र रखने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

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श्रुति तोमर, लुधियाना पंजाब

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