
परिचय
यह किताब किसी युद्ध की कहानी नहीं है, यह उस जीवन की कथा है जो युद्ध और शांति के बीच लगातार साँस लेता है। यह उन लोगों की दास्तान है जिनके लिए ताली और प्रशंसा कभी लक्ष्य नहीं रहीं, जिनके लिए कर्तव्य ही पहचान रहा है। वर्दी यहाँ कपड़ा नहीं, एक प्रतिज्ञा है—जिसे ओढ़ने के बाद जीवन का हर निर्णय देश के नाम हो जाता है।
जब शहर रोशनी में डूबे होते हैं, तब ये लोग अँधेरे की जिम्मेदारी उठाते हैं। जब घरों में त्योहार मनते हैं, तब इनके हिस्से पहरा आता है। यह त्याग किसी मजबूरी से नहीं, बल्कि चुने हुए रास्ते से आता है। यही चुनाव इस किताब की आत्मा है—जहाँ देश पहले होता है और घर इंतज़ार करता है।
यह पुस्तक सैनिक को नायक बनाकर नहीं, इंसान बनाकर देखती है। यहाँ माँ की चिंता है, पत्नी का मौन इंतज़ार है, बच्चों की अधूरी हँसी है। यहाँ डर भी है, थकान भी है, और कभी-कभी टूटन भी। पर इन सबके ऊपर एक शांत संकल्प है—पीछे हटने का नहीं, निभाने का।
इन पन्नों में आपको शोर नहीं मिलेगा। यहाँ कोई अतिशयोक्ति नहीं है। जो है, वही है—खामोश, सधा हुआ, सच्चा। यह उन रातों का सच है जब सवाल मन में उठते हैं, और जवाब सुबह की ड्यूटी में मिल जाते हैं। यह उन फैसलों की कहानी है जो पल भर में लिए जाते हैं, पर जीवन भर साथ रहते हैं।
यह किताब शहादत का महिमामंडन नहीं करती, वह उसे समझने की कोशिश करती है। लौटना सौभाग्य है, अमर होना बलिदान—दोनों का सम्मान बराबर है। और इसी संतुलन में एक सैनिक खड़ा रहता है, हर दिन, हर हाल में।
यदि इन पन्नों को पढ़ते हुए आपको किसी अपने की याद आए, किसी अनकहे त्याग का अहसास हो, या किसी मौन सलाम का मन बने—तो यही इस किताब की सफलता है। क्योंकि यह किताब धन्यवाद नहीं माँगती, बस समझ चाहती है।
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अध्याय 1: वर्दी की पहली क़सम
उस दिन सुबह कुछ अलग थी। सूरज वही था, हवा वही, आँगन की मिट्टी भी वही—लेकिन मन के भीतर कुछ टूट भी रहा था और कुछ बन भी रहा था। घर के कोने में टंगी वह नई वर्दी सिर्फ़ कपड़ों का एक सेट नहीं थी; वह एक वादा थी, एक बोझ, और एक ऐसा सपना जिसे पहनते ही आदमी अपने आप से थोड़ा दूर और देश के थोड़ा और पास हो जाता है। माँ ने चुपचाप उस वर्दी पर हाथ फेरा, जैसे किसी बच्चे के माथे पर आख़िरी बार हाथ रखा जाता है। पिता ने कुछ नहीं कहा—उनकी खामोशी में वर्षों की सीख और संकल्प था। और वह—जो वर्दी पहन रहा था—अपने भीतर पहली बार यह समझ रहा था कि अब जीवन “अपना” कम और “हमारा” ज़्यादा होने वाला है।
वर्दी पहनते ही आईने में दिखता चेहरा वही था, पर आँखों में एक नई कठोरता उतर आई थी। यह कठोरता पत्थर की नहीं, ज़िम्मेदारी की थी। उसे याद आया कि कैसे बचपन में वह गली के कोने पर खड़ा होकर परेड देखता था, सीने में अजीब सी गर्मी उठती थी, और मन ही मन तय करता था—एक दिन मैं भी। उस दिन का सपना आज कंधों पर सितारों की जगह पट्टियाँ बनकर टिक गया था। किसी ने ताली नहीं बजाई, किसी ने शाबाशी नहीं दी। बस भीतर कहीं एक आवाज़ उठी—अब पीछे लौटना नहीं।
क़सम के शब्द सरल थे, पर उनका अर्थ असाधारण। देश की रक्षा, संविधान की मर्यादा, आदेश का पालन, और अपने प्राणों से पहले कर्तव्य। शब्द खत्म हुए, पर जीवन का नया अध्याय शुरू हो गया। उसी पल समझ आ गया कि यह क़सम समय की नहीं होती—यह हर साँस के साथ दोहराई जाती है। युद्ध के मैदान में, बर्फ़ीली चौकी पर, रेगिस्तान की लपटों में, और घर से दूर किसी अनजान रात में—हर जगह।
ट्रेन की सीटी गूँजी। प्लेटफ़ॉर्म पर भीड़ थी, पर उसके लिए दुनिया सिमटकर कुछ चेहरों में रह गई थी। माँ की आँखें भर आईं, फिर भी उन्होंने मुस्कराकर कहा—“सीधा खड़ा रहना।” पिता ने हाथ मिलाया—मज़बूत, बिना काँपे। पत्नी ने कुछ नहीं कहा; उसके मौन में हजारों शब्द थे। बच्चे ने सलाम ठोंका—नासमझी में, पर गर्व के साथ। वह पल इतना भारी था कि दिल चाहे तो वहीं बैठ जाए, पर वर्दी ने पीठ सीधी रखी। ट्रेन चली, और घर पीछे छूटता चला गया।
शुरुआती दिन प्रशिक्षण के थे—जहाँ शरीर को तोड़ा जाता है ताकि मन गढ़ा जा सके। दौड़, ड्रिल, हथियार, नियम—सब कुछ सख़्त। रात को बिस्तर पर गिरते ही नींद नहीं आती; माँ की आवाज़, घर की रसोई की खुशबू, त्योहारों की हँसी—सब एक साथ उमड़ते। लेकिन सुबह की सीटी इन सबको पीछे छोड़ देती। यहाँ रोना निजी था, पर कर्तव्य सार्वजनिक। यहाँ दोस्ती जल्दी होती थी, क्योंकि डर साझा होता था। यहाँ हर चेहरा अपना लगता था, क्योंकि सब एक ही क़सम से बँधे थे।
पहली बार हथियार हाथ में आया तो उसकी ठंडक ने उँगलियों से होकर दिल तक रास्ता बना लिया। यह रक्षा का साधन था, पर इसके साथ ज़िम्मेदारी का भार भी था। सिखाया गया—उँगली ट्रिगर पर नहीं, दिमाग़ निर्णय पर। सिखाया गया—ताक़त का अर्थ हिंसा नहीं, संयम है। सिखाया गया—जीत शोर से नहीं, अनुशासन से मिलती है। और सबसे ज़रूरी—सिखाया गया कि हर आदेश के पीछे किसी का भरोसा होता है।
रातें लंबी होती थीं। सितारे साफ़ दिखते थे, और खामोशी बोलती थी। कोई अपने गाँव की बात करता, कोई अपने बच्चे की पहली हँसी का किस्सा सुनाता, कोई प्रेम पत्र जेब में छुपाकर रखता। सबके भीतर एक घर था, जिसे वे साथ लेकर चलते थे। पर सुबह होते ही सब अपने-अपने घरों को जेब में रख लेते—क्योंकि सामने देश होता।
पहली पोस्टिंग दूर थी। रास्ते बदलते गए—मैदान, जंगल, पहाड़। हर जगह वर्दी का रंग वही, पर चुनौती नई। कभी बारिश में भीगते हुए चौकी बदलनी पड़ती, कभी बर्फ़ में पैर धँसते। कभी दिन गिनते, कभी रातें। त्योहार आए, गए—ड्यूटी चलती रही। मोबाइल पर घर की तस्वीरें देखी जातीं, आवाज़ सुनकर मन भर आता, फिर कॉल कट जाती। उस कटने की आवाज़ में एक चुभन होती—पर वही चुभन याद दिलाती कि क़सम निभाई जा रही है।
पहली बार गोलियों की आवाज़ सुनी तो दिल धक से रह गया। किताबों में पढ़ा था, प्रशिक्षण में सिखाया गया था, पर असल आवाज़ कुछ और ही होती है। हवा भी काँपती है, ज़मीन भी। उस पल डर आया—स्वाभाविक। पर उसी पल प्रशिक्षण जागा, साथी की आवाज़ कान में पड़ी, और कदम अपने आप चल पड़े। डर पीछे रह गया। बाद में जब सब शांत हुआ, तो समझ आया—बहादुरी डर के न होने का नाम नहीं, डर के बावजूद आगे बढ़ने का नाम है।
कभी-कभी मन सवाल करता—क्या कीमत बहुत ज़्यादा नहीं? घर से दूरियाँ, रिश्तों की चुप्पियाँ, त्योहारों की तस्वीरें, बच्चों की बढ़ती उम्र। जवाब हमेशा साफ़ नहीं मिलता। पर जब सुबह झंडा फहरता है, और धूप उसकी लकीरों में रंग भरती है, तब कहीं भीतर सुकून उतरता है। यह सुकून बताता है कि कोई कहीं सुरक्षित सो रहा है—और यही काफ़ी है।
एक दिन ख़त आया—माँ ने लिखा था कि फसल अच्छी हुई है। पिता ने लिखा था कि तबीयत ठीक है। पत्नी ने बस इतना लिखा—“ख़याल रखना।” उस छोटे से वाक्य में पूरा घर था। उस दिन चौकी पर खड़े-खड़े आँखें नम हो गईं। किसी ने देखा नहीं, और यही यहाँ की परंपरा है—आँसू भी ड्यूटी के बाद बहते हैं।
समय के साथ वर्दी शरीर का हिस्सा बन जाती है। उसकी सिलवटें दिन की कहानी कहती हैं, उसकी जेबें रातों के राज़। एक सैनिक सीखता है कि अकेलापन कैसे दोस्त बनता है, और अनुशासन कैसे आज़ादी देता है। वह सीखता है कि हर आदेश के पीछे किसी माँ की नींद है, किसी बच्चे का भविष्य है। वह सीखता है कि शाबाशी ज़रूरी नहीं—कर्तव्य ही पुरस्कार है।
पहली छुट्टी मिली तो घर जाना किसी सपने जैसा लगा। स्टेशन वही, गली वही—पर भीतर कुछ बदल चुका था। माँ ने गले लगाया तो लगा जैसे वर्षों की दूरी एक पल में पिघल गई। पिता ने आँखों से बात की। पत्नी ने मुस्कराकर कहा—“तुम थक गए हो।” वह थकान अच्छी लगी—क्योंकि वह अर्थ से भरी थी। लेकिन छुट्टी जल्दी खत्म हो जाती है। वापसी की ट्रेन में वही सीटी, वही प्लेटफ़ॉर्म—बस दिल थोड़ा और मजबूत।
लौटकर फिर वही क्रम। कभी सरहद की ठंडी रातें, कभी ऑपरेशन की गर्म साँसें। साथी गिरते हैं—नाम, चेहरे, हँसी—सब याद रह जाते हैं। उनकी यादें वर्दी में सिली रहती हैं। हर विदाई एक सबक छोड़ जाती है—जीवन उधार है, कर्तव्य स्थायी। और हर सुबह नई ताक़त देती है—क्योंकि जो पीछे छूटते हैं, वे भरोसा करके छोड़ते हैं।
वर्दी की पहली क़सम समय के साथ बोझ नहीं बनती; वह रीढ़ बन जाती है। वह बताती है कि कब झुकना है—देश के सामने कभी नहीं; कब झुकना है—आदेश के सामने हमेशा। वह बताती है कि शोर से दूर रहकर भी इतिहास लिखा जाता है। वह बताती है कि सच्ची बहादुरी मंच पर नहीं, सीमा पर होती है।
और जब रात के सन्नाटे में दूर कहीं कुत्ते भौंकते हैं, हवा में अजीब सी सरसराहट होती है, तब वह सैनिक बंदूक थामे खड़ा रहता है। उसे पता है—शायद कोई उसका नाम न जाने, शायद कोई उसकी कहानी न पढ़े। पर उसे यह भी पता है कि सुबह होगी। और उस सुबह में, किसी घर में चूल्हा जलेगा, किसी बच्चे की हँसी गूँजेगी, किसी माँ की आँखों में सुकून होगा। उसी सुकून में उसकी क़सम पूरी होती है।
वर्दी की पहली क़सम यहीं खत्म नहीं होती—यहीं से शुरू होती है। हर कदम, हर साँस, हर निर्णय में। क्योंकि यहाँ देश पहले होता है, और घर इंतज़ार करता है।
अध्याय 2: घर से विदा
घर से विदा कभी एक दिन में नहीं होती। वह धीरे-धीरे होती है—पहले मन से, फिर आदतों से, और अंत में देह से। उस सुबह भी ऐसा ही था। सामान बहुत कम था, पर वजन बहुत। एक छोटा सा बैग, कुछ कपड़े, ज़रूरी काग़ज़ात, और जेब में रखी तस्वीरें—माँ, पिता, पत्नी, और वह घर जो अब हर दिन यादों में थोड़ा और बसने वाला था। दीवारों पर टँगी घड़ी टिक-टिक कर रही थी, जैसे समय भी जल्दी में हो। पर घर के लोग—सब थमे हुए थे।
माँ रसोई में थी। चूल्हे पर रखी चाय उबल चुकी थी, पर कप में डालने से पहले ही वह दो बार आँचल से आँखें पोंछ चुकी थी। वह जानती थी—यह विदा साधारण नहीं है। यह वही विदा है जो हर माँ देती है, पर हर बार दिल नया टूटता है। उसने बेटे के माथे पर हाथ रखा—किसी मंत्र की तरह—और बस इतना कहा, “ठंड लगे तो कपड़े पहन लेना।” इस छोटे से वाक्य में सारी प्रार्थनाएँ थीं।
पिता बरामदे में खड़े थे। अख़बार हाथ में था, पर पढ़ नहीं रहे थे। उन्होंने बेटे को देखा—सीधी पीठ, सधी चाल—और एक पल को गर्व आँखों में चमका। फिर वह चमक भीतर उतर गई। उन्होंने पास आकर कंधे पर हाथ रखा। कोई लंबा भाषण नहीं, कोई सीख नहीं। बस एक वाक्य—“नाम रोशन करना।” यह नाम सिर्फ़ परिवार का नहीं था; यह उस भरोसे का नाम था, जो पीढ़ियों से सिखाया गया था।
पत्नी कमरे में थी। उसने सामान ठीक से बाँध दिया था, जैसे बाँधते-बाँधते अपने मन को भी कस रही हो। वह जानती थी—आँसू बहाए तो रोकना मुश्किल होगा। उसने मुस्कराकर पूछा, “सब रख लिया?” यह सवाल नहीं था, यह खुद को संभालने का तरीका था। उसने सलाम किया—आँखों में नमी, होंठों पर स्थिरता। उस सलाम में प्रेम भी था, त्याग भी, और वह अनकहा डर भी जिसे शब्दों में बदलने की इजाज़त नहीं थी।
बच्चा पास ही खड़ा था। उसे पूरी समझ नहीं थी—बस इतना जानता था कि पापा फिर चले जाएँगे। उसने छोटा सा हाथ उठाकर सलाम किया, फिर दौड़कर गले लगा। उस गले में एक वादा था—लौट आना। और उस वादे का बोझ सीने पर टिक गया।
दरवाज़ा खुला। वही चौखट, जिस पर हर सुबह पैर रखकर बाहर निकला जाता था—आज भारी लग रही थी। जूते पहनते समय लगा जैसे पैर ज़मीन से चिपक गए हों। मन ने कहा—रुको। वर्दी ने कहा—चलो। और हमेशा की तरह वर्दी जीत गई। बाहर निकलते ही पड़ोसियों की नज़रें मिलीं—कुछ गर्व से भरी, कुछ चिंता से। किसी ने कहा, “देश का नाम रोशन करना।” किसी ने कहा, “ख़याल रखना।” सबने विदा दी—पर कोई नहीं जानता था कि यह विदा कितनी लंबी होगी।
गली के मोड़ तक जाते-जाते दिल ने कई बार पीछे मुड़कर देखा। घर छोटा होता जा रहा था, पर मन में बड़ा। हर ईंट, हर खिड़की, हर पेड़—सब यादों की तरह साथ चलने लगे। स्टेशन तक का रास्ता जाना-पहचाना था, पर आज हर मोड़ नया लग रहा था। जैसे यह रास्ता भी जानता हो कि किसी को हमेशा के लिए थोड़ा-सा बदलकर भेज रहा है।
स्टेशन पर भीड़ थी—लोग, आवाज़ें, घोषणाएँ। पर उस भीड़ में एक छोटा सा घेरा था—परिवार का। ट्रेन आने से पहले समय ठहर सा गया। माँ ने डिब्बे के दरवाज़े पर खड़े होकर माथा छुआ। पिता ने आख़िरी बार हाथ मिलाया। पत्नी ने आँखों से कहा—मज़बूत रहना। बच्चा चुप था—शायद वह समझ गया था कि रोने से विदा आसान नहीं होती।
ट्रेन चली। प्लेटफ़ॉर्म पीछे छूटता गया। हाथ हिलते रहे—जब तक आँखें देख पाईं। फिर खिड़की से बाहर सिर्फ़ पटरियाँ दिखीं—सीधी, लंबी, अनंत। उसी अनंत में एक नया अकेलापन उतर आया। यह अकेलापन डरावना नहीं था—बस भारी था। उसने बैग खोला, तस्वीरें निकालीं, और एक-एक चेहरे को देर तक देखा। हर चेहरे ने एक जिम्मेदारी जोड़ दी।
यूनिट में पहुँचते ही माहौल बदल गया। यहाँ विदा की नमी नहीं थी—यहाँ तैयारी की सख़्ती थी। आदेश मिले, नाम पुकारे गए, माना गया कि सब तैयार हैं। कोई नहीं पूछता—घर कैसा है? क्योंकि यहाँ सबके घर पीछे हैं। यहाँ दोस्ती जल्दी होती है—क्योंकि सब एक जैसी दूरियों से आए होते हैं। यहाँ हँसी भी साझा होती है, और चुप्पी भी।
पहली रात बैरक में नींद नहीं आई। छत की ओर देखते हुए लगा—यह छत भी अलग है। हवा में घर की खुशबू नहीं थी। मोबाइल निकाला—सिग्नल कमज़ोर था। घर फोन लगाया—आवाज़ टूटी-फूटी आई। माँ ने पूछा—“पहुंच गए?” जवाब दिया—“हाँ।” बस यही कहना था। उससे ज़्यादा कहा तो आवाज़ भर आएगी। कॉल कट गई। उस कटने की आवाज़ देर तक गूँजती रही।
दिन शुरू हुए। ट्रेनिंग, गश्त, तैयारी। समय तेज़ चलने लगा। पर रातें वही रहतीं—लंबी। कभी किसी के घर से मिठाई आती, तो सब बाँट लेते। कोई कहता—आज बच्चे का जन्मदिन है। कोई कहता—आज शादी की सालगिरह। सब मुस्कराते—और फिर ड्यूटी पर चले जाते। यहाँ उत्सव भी समय देखकर मनाए जाते हैं।
एक दिन पोस्टिंग का आदेश आया। जगह का नाम सुना—दूर, कठिन। किसी ने ताली नहीं बजाई। किसी ने अफ़सोस नहीं जताया। बस बैग पैक हुआ। एक साथी ने कंधे पर हाथ रखा—“चलेंगे साथ।” यही यहाँ का अपनापन है—साथ चलना, चाहे मंज़िल कैसी भी हो।
रास्ते में पहाड़ आए। बर्फ़ दिखी। ठंड हड्डियों तक उतर गई। उस ठंड में घर की गर्मी और याद आई। माँ का हाथ, पिता की खामोशी, पत्नी की मुस्कान—सब एक साथ। पर उसी ठंड में एक सख़्ती भी आई—जीने की। सीखा गया—कम में काम चलाना, चुप में ताक़त ढूँढना।
पहली चौकी पर पहुँचते ही समझ आया—यह घर से विदा का अगला पड़ाव है। यहाँ हर चीज़ नियम से चलती है। हर आवाज़ का मतलब होता है। हर कदम मापा जाता है। यहाँ डर को दिखाया नहीं जाता—उसे काम में बदल दिया जाता है। यहाँ हर रात एक सवाल छोड़ जाती है—सुबह होगी? और हर सुबह एक जवाब देती है—हाँ, अभी।
कभी-कभी सपने आते—घर के। आँगन, तुलसी, चूल्हा, हँसी। नींद खुलती—और सामने बंदूक, बंकर, सन्नाटा। मन कुछ पल के लिए डगमगाता—फिर संभल जाता। यही अभ्यास है—खुद को संभालना। यही विदा का असली अर्थ है—घर को दिल में रखना, पर कदम आगे बढ़ाना।
एक दिन पत्र आया। माँ ने लिखा—“तुम्हारा कमरा वैसा ही है।” उस वाक्य ने दिल को चुभोया और सहलाया—दोनों। पिता ने लिखा—“फिक्र मत करना।” पत्नी ने लिखा—“हम इंतज़ार करेंगे।” इंतज़ार—यह शब्द भारी है। इसे उठाना सीखना पड़ता है।
यह अध्याय विदा का है—पर खत्म होने का नहीं। क्योंकि सैनिक की विदा हर दिन होती है—हर सुबह जब वह चौकी पर निकलता है, हर रात जब वह आँखें बंद करता है। और हर बार वह लौटता है—अपने कर्तव्य में थोड़ा और गहरा।
घर से विदा देकर जो जाता है, वह घर को पीछे नहीं छोड़ता—वह घर को अपने भीतर बाँध लेता है। वही घर उसे ठंड में गर्म रखता है, अँधेरे में रास्ता दिखाता है, और डर के सामने खड़ा रखता है। क्योंकि जब देश पहले होता है, तब घर इंतज़ार करता है—और वही इंतज़ार सबसे बड़ी ताक़त बन जाता है।
अध्याय 3: त्योहार बिना उजाले
त्योहार तारीख़ से नहीं आते, एहसास से आते हैं। लेकिन सीमा पर तैनात एक सैनिक के लिए तारीख़ ही सब कुछ होती है—ड्यूटी रोस्टर, गश्त का समय, चौकी की जिम्मेदारी। कैलेंडर पर लाल गोले में घिरी वह तारीख़—दीवाली, ईद, होली—यहाँ सिर्फ़ एक दिन होती है, किसी और दिन से ज़्यादा अलग नहीं। फर्क़ बस इतना होता है कि उस दिन घर की याद ज़्यादा तेज़ हो जाती है।
सुबह वही होती है—सीटी, हथियार, तैयारियाँ। बाहर अँधेरा हो या धूप, त्योहार का शोर यहाँ नहीं पहुँचता। न घरों की सजावट, न मिठाइयों की खुशबू। सिर्फ़ बर्फ़ की सफ़ेदी, या रेत की तपिश, या जंगल की नमी। रेडियो पर कहीं दूर से कोई गीत सुनाई देता है—तुरंत बंद कर दिया जाता है। ड्यूटी पहले।
घर में इस वक्त क्या हो रहा होगा—यह सवाल हर मन में उठता है। माँ शायद रसोई में होगी, हाथों में मेहंदी नहीं, काम की जल्दी। पत्नी बच्चों को तैयार कर रही होगी—नई पोशाकें, नई उम्मीदें। बच्चे पटाखों के नाम पर शोर मचा रहे होंगे। और यहाँ—एक सन्नाटा, जिसे तोड़ने की इजाज़त नहीं। सन्नाटा भी अनुशासन में रहता है।
ईद की सुबह अलग होती है। दूर कहीं अज़ान की आवाज़ आती है—हवा के साथ टूटती-बिखरती। जवान नमाज़ की जगह ड्यूटी पर खड़ा होता है। दिल में दुआ चलती रहती है—बिना हाथ उठाए। किसी को गले लगाने की चाह मन में रह जाती है। यहाँ गले लगना भी समय माँगता है, और समय की सबसे ज़्यादा कमी होती है।
दीवाली की रात सबसे भारी होती है। आसमान में दूर कहीं रोशनी चमकती है—किसी गाँव की। यहाँ रोशनी जलाना मना है। अँधेरा ही सुरक्षा है। हाथ में बंदूक, आँखें चौकस। किसी पटाखे की आवाज़ दूर से आती है—यहाँ वही आवाज़ खतरे की तरह लगती है। दिल एक पल को ठिठकता है, फिर खुद को समझाता है—यहाँ हर आवाज़ का मतलब बदल जाता है।
उस रात बैरक में कोई दिया नहीं जलता। कोई रंगोली नहीं बनती। बस एक-दूसरे को देखा जाता है—चुपचाप। कोई कह देता है, “दीवाली मुबारक।” कोई मुस्करा देता है। यही उत्सव है। किसी ने घर से आई मिठाई बचाकर रखी होती है—सब में थोड़ा-थोड़ा बाँट दी जाती है। स्वाद वही होता है, पर मिठास अलग—क्योंकि उसमें इंतज़ार घुला होता है।
मोबाइल पर मैसेज आते हैं—नेटवर्क जब-तब। तस्वीरें—घर सजा हुआ, बच्चे हँसते हुए, माँ दीप जलाते हुए। दिल करता है देर तक देखता रहे। पर कॉल जल्दी खत्म करनी पड़ती है। “सब ठीक है?”—“हाँ।” दो शब्दों में पूरी ज़िंदगी सिमट जाती है। कॉल कटते ही वही खालीपन। त्योहार बिना उजाले का यही अर्थ है—रोशनी कहीं और होती है।
कुछ जवानों के लिए यह पहला त्योहार होता है घर से दूर। उनके चेहरे पढ़े जा सकते हैं—अजीब सी उदासी, जिसे वे छुपाने की कोशिश करते हैं। सीनियर चुपचाप पास आकर बैठता है—कोई लंबी बात नहीं, बस साथ। यहाँ दिलासा भी सादा होता है। कोई कहता है—“आदत हो जाएगी।” पर सब जानते हैं—आदत नहीं होती, बस सहना आ जाता है।
कभी-कभी उसी दिन ऑपरेशन का आदेश आ जाता है। त्योहार का दिन भी आदेश से बँधा होता है। उस वक्त मन के कोने में कोई शिकायत नहीं उठती। शिकायतें विलास हैं—यहाँ जगह नहीं। हेलमेट पहना जाता है, हथियार संभाले जाते हैं। किसी ने चुपचाप कलाई पर धागा बाँधा होता है—माँ ने भेजा था। किसी ने जेब में ताबीज़ रखा होता है। विश्वास—हर किसी का अलग, पर जरूरत एक।
रात लंबी होती है। ठंड ज़्यादा लगती है। उँगलियाँ सुन्न होती हैं। दिमाग़ तेज़ चलता है। हर झाड़ी, हर परछाईं—सवाल बन जाती है। उस बीच अचानक घर की हँसी याद आती है। यह याद कमजोरी नहीं बनती—यह ताक़त बनती है। यह याद बताती है—क्यों खड़ा हूँ।
सुबह होती है। सूरज निकलता है—त्योहार के बिना। रेडियो पर हालात की रिपोर्ट दी जाती है। सब सामान्य है—यही सबसे बड़ी खुशख़बरी। कोई साथी कह देता है—“हो गया त्योहार।” कोई हँस देता है। हँसी थोड़ी कड़वी होती है, पर सच्ची।
कुछ दिन बाद घर से खत आता है। माँ लिखती है—“दीया जलाया था, तुम्हारे नाम का।” पत्नी लिखती है—“बच्चों ने पटाखे कम चलाए।” इन वाक्यों में जो उजाला है, वह यहाँ तक पहुँचता है—धीरे, पर स्थायी। यह उजाला आँखों में नहीं, रीढ़ में उतरता है।
त्योहार बिना उजाले सिर्फ़ एक रात नहीं होते—वे एक अभ्यास हैं। अपने मन को सिखाने का अभ्यास कि खुशियाँ टालनी पड़ सकती हैं, पर जिम्मेदारी नहीं। यह सिखाता है कि निजी सुख कभी-कभी सार्वजनिक सुरक्षा के सामने छोटे पड़ जाते हैं। और यह भी सिखाता है कि असली रोशनी बाहर नहीं—भीतर होती है।
कभी-कभी लौटकर घर जाना होता है—कई महीनों बाद। तब दीवाली फिर आती है, ईद फिर आती है। दीये जलते हैं, गले लगते हैं। लोग कहते हैं—“अब तो मना लो।” वह मुस्कराता है, मनाता है। पर भीतर कहीं एक कोना हमेशा चौकी पर रह जाता है—अँधेरे में खड़ा, चौकस।
क्योंकि जिसने त्योहार बिना उजाले बिताए हों, वह रोशनी की कीमत जानता है। उसे पता है—यह रोशनी किसी की मेहनत से नहीं, किसी के त्याग से जलती है। और जब अगली बार कैलेंडर पर लाल गोला दिखता है, तो वह तैयार रहता है—बिना शिकायत, बिना शोर।
त्योहार आते रहेंगे, जाते रहेंगे। उजाले भी मिलेंगे। पर उस रात का सन्नाटा, उस अँधेरे की चौकसी—वह हमेशा साथ रहती है। यही सैनिक का उत्सव है—जब सब सुरक्षित हों। यही उसकी खुशी है—जब देश सो सके।
अध्याय 4: ड्यूटी ही ज़िंदगी
यहाँ जीवन घड़ी से नहीं चलता—यह ड्यूटी से चलता है। समय की परिभाषा बदल जाती है। सुबह, दोपहर, शाम—सब आदेश के अधीन हो जाते हैं। जब कहा जाए, तब उठना है; जब कहा जाए, तब चलना है; और जब कहा जाए, तब रुकना है। थकान निजी होती है, पर ड्यूटी सार्वजनिक। यहाँ कोई यह नहीं पूछता कि मन कैसा है—यहाँ बस यह देखा जाता है कि मोर्चा कैसा है।
पहली बार समझ में आता है कि ड्यूटी कोई काम नहीं—यह एक अवस्था है। इसे पहनना नहीं पड़ता, यह भीतर उतर जाती है। हथियार हाथ में हो या कंधे पर, आँखें हमेशा सतर्क रहती हैं। खाना खाते हुए भी कान आवाज़ों को पकड़ते हैं। नींद में भी शरीर तैयार रहता है—एक पुकार पर उठ खड़े होने के लिए। ड्यूटी कभी छुट्टी नहीं लेती।
दिन की शुरुआत आदेश से होती है। नक़्शे फैलते हैं, बिंदु तय होते हैं, संभावनाएँ गिनी जाती हैं। हर शब्द मापा हुआ। हर हिदायत का वजन होता है। यहाँ “शायद” की जगह नहीं—यहाँ “स्पष्ट” चलता है। और इस स्पष्टता में ही जीवन सुरक्षित रहता है। कोई सवाल नहीं, कोई बहस नहीं—क्योंकि बहस समय खाती है, और समय यहाँ सबसे महँगा है।
गश्त पर निकलते समय कदम अपने नहीं रहते—वे प्रशिक्षण के होते हैं। आँखें रास्ता नहीं देखतीं—संकेत पढ़ती हैं। हवा की दिशा, पत्तों की हलचल, दूर की आहट—सब कुछ बोलता है। इस बोलती हुई खामोशी में मन भी तेज़ हो जाता है। डर आता है, पर डर काम में ढल जाता है। यही फर्क़ है—ड्यूटी डर को अनुशासन देती है।
कभी बारिश में भीगना पड़ता है—घंटों। कपड़े भारी हो जाते हैं, जूते पानी से भर जाते हैं। शरीर ठंडा पड़ता है, पर कदम नहीं रुकते। कभी बर्फ़ में खड़ा रहना पड़ता है—जहाँ साँस भी चुभती है। उँगलियाँ सुन्न हो जाती हैं, पर पकड़ ढीली नहीं पड़ती। कभी धूप में रेगिस्तान तपता है—पसीना आँखों में उतरता है। वहाँ पानी गिनकर पीना पड़ता है। हर हाल में ड्यूटी चलती रहती है।
यहाँ जीवन छोटे-छोटे नियमों में सिमट जाता है। हथियार साफ़ रखना, जूतों की हालत देखना, साथी की पीठ पर नज़र रखना। ये नियम साधारण लगते हैं, पर इन्हीं से असाधारण दिन सुरक्षित रहते हैं। एक छोटी सी लापरवाही—और कहानी बदल सकती है। इसलिए यहाँ सावधानी आदत नहीं—संस्कार बन जाती है।
रात की ड्यूटी अलग होती है। अँधेरा घना होता है, और सोचें तेज़। हर परछाईं सवाल बन जाती है। आँखें थकती हैं, पर झपक नहीं सकतीं। रेडियो की हल्की आवाज़—जैसे जीवन की पतली रेखा। कभी-कभी दिल चाहता है बैठ जाए, पर शरीर खड़ा रहता है। क्योंकि कहीं दूर, किसी घर में, कोई चैन से सो रहा होता है। उस नींद का पहरा यही रात है।
ड्यूटी के बीच कभी खबर आती है—घर से। बीमारी, परेशानी, कोई छोटा-सा दुख। मन हिल जाता है। हाथ में हथियार और दिल में घर—दोनों को साथ लेकर चलना पड़ता है। यहाँ कोई कहता नहीं कि मज़बूत बनो—यहाँ मज़बूत होना सीख लिया जाता है। आँसू आँखों में रुक जाते हैं, और कदम आगे बढ़ते हैं। यही कीमत है।
साथियों के बीच जीवन सरल होता है। बातें कम, समझ ज़्यादा। एक नज़र, एक इशारा—काफ़ी होता है। कोई थक जाए तो दूसरा आगे आ जाता है। कोई चुप हो जाए तो दूसरा साथ बैठ जाता है। यहाँ दोस्ती वक़्त नहीं लेती—खतरा जोड़ देता है। और यह जोड़ स्थायी होता है।
कभी ऑपरेशन का आदेश आता है। तैयारी शुरू होती है—बिना शोर। चेहरे गंभीर, मन स्थिर। कोई नारा नहीं, कोई दिखावा नहीं। बस काम। हेलमेट कसता है, पट्टा खिंचता है, हथियार जाँच होता है। हर किसी को अपनी जगह पता होती है। इस सटीकता में ही भरोसा है। और इसी भरोसे में जीवन।
ऑपरेशन के बाद जब सब सामान्य होता है, तब सुकून उतरता है। कोई तालियाँ नहीं बजतीं। कोई मंच नहीं होता। बस एक-दूसरे की ओर देखा जाता है—और सिर हिलाया जाता है। यही सराहना है। यही जीत है। क्योंकि यहाँ जीत का मतलब शोर नहीं—शांति है।
ड्यूटी धीरे-धीरे पहचान बन जाती है। नाम से पहले पद आता है, पद से पहले जिम्मेदारी। जीवन की प्राथमिकताएँ साफ़ हो जाती हैं। क्या ज़रूरी है, क्या इंतज़ार कर सकता है—यह फर्क़ साफ़ दिखने लगता है। इच्छाएँ सीमित हो जाती हैं, संकल्प गहरे। और इसी गहराई में मन शांत होता है।
कभी छुट्टी मिलती है। घर जाते हैं। कुछ दिन सामान्य जीवन जीते हैं। पर भीतर कहीं एक अलार्म लगा रहता है। आवाज़ तेज़ लगे तो चौंक जाते हैं। अँधेरे में आँखें खुद-ब-खुद ढूँढती हैं। यह बीमारी नहीं—यह अभ्यास है। ड्यूटी शरीर छोड़ देती है, मन नहीं।
लौटकर फिर वही क्रम। वही रास्ते, वही चौकियाँ। कुछ चेहरे बदल जाते हैं, कुछ यादें जुड़ जाती हैं। कोई साथी नहीं लौटता—नाम रह जाता है, हँसी रह जाती है। उस दिन ड्यूटी और भारी हो जाती है। पर उसी दिन ड्यूटी और पवित्र भी। क्योंकि किसी की अधूरी कहानी को पूरा करने का बोझ कंधों पर आ जाता है।
यहाँ जीवन और मृत्यु के बीच की रेखा पतली है। पर इसी पतली रेखा पर चलना सिखाया जाता है। संतुलन, धैर्य, और अनुशासन—ये तीन शब्द यहाँ साँस बन जाते हैं। कोई बड़ा दर्शन नहीं, कोई लंबे भाषण नहीं। बस हर दिन का काम—ठीक से।
ड्यूटी ही ज़िंदगी है—क्योंकि यहाँ ज़िंदगी को बचाने का यही तरीका है। यहाँ हर सुबह एक वादा है—आज भी। और हर रात एक हिसाब—सब सुरक्षित? अगर जवाब हाँ है, तो दिन सफल है। यही मापदंड है।
जब कभी मन पूछता है—कब तक? जवाब साफ़ होता है—जब तक ज़रूरत है। और ज़रूरत तब तक है, जब तक खतरा है। इस साफ़ जवाब में एक अजीब सुकून है। क्योंकि जहाँ उद्देश्य स्पष्ट हो, वहाँ थकान भी अर्थ पा लेती है।
ड्यूटी किसी एक दिन का नाम नहीं—यह निरंतरता है। यह वह धागा है जो जीवन को जोड़ता है—घर से, देश से, और उस विश्वास से कि सही जगह खड़े हैं। और जब सब थम जाता है, तब भी ड्यूटी चलती रहती है—मन में, आदत में, पहचान में।
यही जीवन है। यही चुनाव है। और इसी चुनाव में वह खड़ा रहता है—बिना शोर, बिना शिकायत—क्योंकि यहाँ ड्यूटी ही ज़िंदगी है।
अध्याय 5: ख़ामोश डर
डर यहाँ कभी आवाज़ नहीं करता। वह चिल्लाता नहीं, रोता नहीं, किसी को बुलाता नहीं। वह बस मौजूद रहता है—साँसों के बीच, दिल की धड़कनों के साथ। सीमा पर तैनात एक सैनिक डर को पहचानता है, उससे लड़ता नहीं। क्योंकि लड़ाई डर से नहीं, हालात से होती है। डर अगर बोलने लगे, तो हाथ काँप सकते हैं। इसलिए यहाँ डर को ख़ामोशी में रखा जाता है।
पहली बार जब एहसास होता है कि जान सच में खतरे में है, तब शरीर एक पल को जम जाता है। प्रशिक्षण उस पल को खींचकर काम में बदल देता है। दिमाग़ आदेश दोहराता है, आँखें स्थिर होती हैं, और पैर आगे बढ़ते हैं। बाद में समझ आता है—डर था, पर वह रास्ता नहीं रोक पाया। यही जीत है।
रात के गश्त में डर सबसे पास आता है। अँधेरा सिर्फ़ रोशनी की कमी नहीं—यह कल्पनाओं की जगह है। हर पत्ता हिलता है, हर परछाईं लंबी लगती है। दूर कहीं कोई आवाज़ आती है—जानवर या इंसान, फर्क़ करना ज़रूरी होता है। दिल तेज़ धड़कता है, पर साँस नियंत्रित रहती है। यही अभ्यास है—डर को साँस में बाँध लेना।
कभी-कभी डर किसी आवाज़ से नहीं आता—ख़बर से आता है। “आज इनपुट है।” यह वाक्य भारी होता है। इसका मतलब होता है—आज सावधानी दुगनी। चेहरों पर गंभीरता उतर आती है। कोई मज़ाक नहीं, कोई बेकार बात नहीं। हर किसी को पता होता है—आज गलती की कोई जगह नहीं।
डर का एक चेहरा घर भी है। ऑपरेशन से पहले मन में घर उभर आता है—माँ का चेहरा, पिता की खामोशी, पत्नी की आँखें, बच्चे की हँसी। यह डर अलग होता है—खुद के लिए नहीं, उनके लिए। सवाल उठता है—अगर कुछ हो गया तो? इसी सवाल का जवाब ही तो खड़ा रखता है—कुछ नहीं होने देना है।
कभी साथी गिरते हैं। उस पल डर की परत मोटी हो जाती है। खून, आवाज़ें, आदेश—सब एक साथ। हाथ काम करते रहते हैं, मन पीछे रह जाता है। बाद में, जब सब थमता है, तब डर बाहर आता है—थरथराहट बनकर। कोई कुछ नहीं कहता। बस बैठकर साँसें गिनी जाती हैं। यह भी ड्यूटी का हिस्सा है।
डर को यहाँ बाँटा नहीं जाता—पर वह साझा होता है। हर चेहरे में उसकी झलक होती है। कोई अपनी जेब में ताबीज़ रखता है, कोई धागा बाँधता है, कोई चुपचाप प्रार्थना करता है। विश्वास के तरीके अलग हैं, पर मकसद एक—मन को स्थिर रखना।
सबसे मुश्किल वह डर होता है, जिसका कोई रूप नहीं। जब सब शांत हो, पर कुछ ठीक न लगे। वह बेचैनी बनकर भीतर घूमता है। ऐसे में प्रशिक्षण काम आता है—रूटीन। हथियार साफ़ करना, जूते देखना, रेडियो जाँच। छोटे काम मन को बड़े डर से बचा लेते हैं।
कभी-कभी डर शर्म की तरह आता है—कमज़ोर पड़ जाने का डर। यहाँ कमज़ोरी दिखाना आसान नहीं। पर सीख मिलती है—कमज़ोरी मान लेना भी ताक़त है। साथी चुपचाप पास बैठ जाता है। कोई सवाल नहीं। बस मौजूदगी। यही सहारा है।
डर और साहस यहाँ विरोधी नहीं—साथी हैं। डर बिना साहस अंधा है, और साहस बिना डर लापरवाह। इस संतुलन को सीखना पड़ता है। जो डर को नकार देता है, वह खतरे को न्योता देता है। जो डर में डूब जाता है, वह कदम रोक देता है। बीच का रास्ता ही सुरक्षित है।
कभी घर से फोन आता है—“सब ठीक है न?” जवाब दिया जाता है—“हाँ।” यह “हाँ” कई बार डर को दबाकर बोला जाता है। सच यह है कि डर हमेशा रहता है। फर्क़ बस इतना है—वह काम में बाधा नहीं बनता।
रात के आख़िरी पहर में, जब पहरा बदलता है, तब आसमान थोड़ा हल्का लगता है। यह हल्कापन डर के जाने का नहीं—उसके काबू में आने का संकेत होता है। सुबह होने की उम्मीद मन को थाम लेती है।
समय के साथ डर परिचित हो जाता है। वह अचानक नहीं चौंकाता। वह संकेत देता है। और संकेत पढ़ना सिखा दिया जाता है। यही अनुभव है—जो नए को सीनियर बनाता है।
डर को ख़ामोश रखना कोई भावनाहीन होना नहीं है। इसका मतलब है—भावनाओं को जगह देकर भी निर्णय को साफ़ रखना। यही कठिन है। यही जरूरी है।
जब कभी पूछा जाए—क्या डर नहीं लगता? जवाब सरल होता है—लगता है। पर यही डर बताता है कि ज़िंदगी की क़ीमत समझते हैं। और जो ज़िंदगी की क़ीमत समझता है, वही उसे बचाने की पूरी कोशिश करता है।
ख़ामोश डर हर कदम पर साथ चलता है। वह सिखाता है—ध्यान रखना, साथी देखना, आदेश मानना। वह बताता है—आज भी सतर्क रहो। और जब दिन सुरक्षित बीत जाता है, तब वही डर भीतर कहीं बैठकर कहता है—आज अच्छा काम हुआ।
यही डर यहाँ दुश्मन नहीं—रहबर है। और इसकी ख़ामोशी ही इसकी सबसे बड़ी ताक़त है।
अध्याय 6: सरहद की रातें
सरहद की रातें दिन से अलग होती हैं। यहाँ अँधेरा सिर्फ़ रोशनी का अभाव नहीं—यह परीक्षा है। सूरज ढलते ही समय धीमा हो जाता है, और हर सेकंड अपनी कीमत माँगता है। हवा में एक अजीब सी ठंडक उतरती है—कभी बर्फ़ की, कभी रेत की, कभी जंगल की नमी की। और उसी ठंडक में चौकसी गर्म रखनी पड़ती है।
रात की ड्यूटी शुरू होते ही दुनिया सिमट जाती है। आवाज़ें कम, इशारे ज़्यादा। हर कदम सोच-समझकर। जूतों की आहट भी नियंत्रित। रेडियो की फुसफुसाहट—जैसे जीवन की नब्ज़। कहीं दूर कोई जानवर हिलता है, कहीं पत्ते सरसराते हैं। हर सरसराहट सवाल बन जाती है—और हर सवाल का जवाब तैयार रखना पड़ता है।
आकाश साफ़ हो तो तारे बहुत पास लगते हैं। इतने पास कि हाथ बढ़ाओ तो छू लो। उन तारों के नीचे खड़ा जवान सोचता है—यही तारे घर के ऊपर भी चमक रहे होंगे। वही आकाश, अलग ज़मीन। यही दूरी रातों को भारी बनाती है। पर यही दूरी वजह भी बनती है—क्योंकि अगर यहाँ कोई खड़ा न हो, तो वहाँ कोई सो न पाए।
सरहद की रातों में बातचीत कम होती है। शब्द बचाए जाते हैं। कभी-कभी एक नज़र ही काफ़ी होती है—सब ठीक है। साथी पास खड़ा हो तो दिल मजबूत रहता है। दो लोग मिलकर एक-दूसरे की थकान उठा लेते हैं। कोई कहता नहीं—“मैं डर रहा हूँ।” पर सब समझते हैं—और वही समझ काम आती है।
कभी मौसम अचानक बदल जाता है। कोहरा घिर आता है—इतना घना कि हाथ सामने दिखे नहीं। उस कोहरे में कदम और धीमे हो जाते हैं। आँखें ज़्यादा सुनने लगती हैं, कान ज़्यादा देखने। हर साँस गिनकर। कभी बर्फ़ गिरने लगती है—आवाज़ों को निगलती हुई। उस सफ़ेदी में रास्ता पहचानना चुनौती बन जाता है। पर अभ्यास रास्ता दिखा देता है।
रात के बीचोंबीच अलर्ट मिलता है। दिल एक पल को तेज़ धड़कता है—फिर स्थिर। आदेश मिलते हैं—संक्षिप्त, साफ़। सब अपनी जगह जानते हैं। कोई हड़बड़ी नहीं, कोई शोर नहीं। यही रातों की असली भाषा है—शांति में गति।
इन रातों में यादें अचानक उभर आती हैं। माँ की लोरी, पिता की सीख, पत्नी की मुस्कान, बच्चे की हँसी। ये यादें आँखें नम नहीं करतीं—रीढ़ सीधी करती हैं। यह याद दिलाती हैं कि किसके लिए खड़े हैं। डर तब भी रहता है, पर उसका वजन बँट जाता है।
कभी-कभी कुछ नहीं होता—पूरी रात शांति। यही सबसे कठिन होता है। शांति में सतर्क रहना आसान नहीं। शरीर थकता है, पलकें भारी होती हैं। पर मन को बाँधकर रखना पड़ता है। यहाँ छोटी सी चूक भी बड़ी हो सकती है। इसलिए रूटीन काम आते हैं—हथियार जाँच, क्षेत्र स्कैन, साथी की स्थिति देखना। छोटे काम बड़ी रातें पार करा देते हैं।
कभी-कभी रात लंबी नहीं—बहुत लंबी लगती है। समय जैसे रुक गया हो। ठंड हड्डियों में उतर जाती है। उँगलियाँ सुन्न। तब साथी चुपचाप पास आकर खड़ा हो जाता है—बस मौजूदगी। यह मौजूदगी आग की तरह गर्म होती है।
सुबह की पहली हल्की रोशनी राहत बनकर आती है। अँधेरा धीरे-धीरे पीछे हटता है। पक्षियों की आवाज़ लौटती है। पहरा बदलता है। उस पल मन में एक छोटा सा गर्व उतरता है—एक और रात सुरक्षित। कोई तालियाँ नहीं, कोई शोर नहीं। बस एक सिर हिलाना—काम पूरा।
सरहद की रातें सिखाती हैं कि बहादुरी शोर में नहीं, धैर्य में होती है। यहाँ जीत का मतलब आगे बढ़ना नहीं—डटे रहना है। यहाँ कहानी नहीं बनती—इतिहास बचता है।
इन रातों में जवान खुद को पहचानता है। अपनी सीमाएँ, अपनी ताक़त। वह सीखता है कि अकेले नहीं—साथ मिलकर खड़ा रहना ही सुरक्षा है। वह सीखता है कि डर का सामना रोशनी में नहीं, अँधेरे में होता है।
और जब कभी कोई पूछता है—सबसे कठिन क्या है? जवाब यही होता है—सरहद की रातें। क्योंकि यहाँ हर रात एक वादा होती है—आज भी। और हर सुबह एक गवाही—कि वादा निभाया गया।
सरहद की रातें खत्म होती हैं, पर भीतर बस जाती हैं। वे हर उजाले को अर्थ देती हैं। और यही अर्थ जवान को फिर अगली रात के लिए तैयार करता है—ख़ामोशी में, चौकसी में, अडिग।
अध्याय 7: माँ की दुआ, पत्नी का इंतज़ार
सैनिक अकेला कभी नहीं होता। भले ही वह सरहद पर खड़ा हो, बर्फ़ और अँधेरे के बीच, पर उसके साथ दो अदृश्य ताक़तें हमेशा रहती हैं—माँ की दुआ और पत्नी का इंतज़ार। ये न दिखती हैं, न शोर करती हैं, पर हर मुश्किल घड़ी में सबसे पहले महसूस होती हैं।
माँ की दुआ शब्दों में नहीं बँधती। वह सुबह की पहली सांस के साथ निकलती है और रात की आख़िरी सोच तक चलती है। माँ मंदिर जाए या न जाए, नमाज़ पढ़े या न पढ़े—उसकी प्रार्थना लगातार होती है। वह बेटे के नाम पर दिया जलाती है, चुपचाप माथा टेकती है, और फिर रोज़मर्रा के काम में लग जाती है। किसी से कहती नहीं कि दिल डर से भरा है, बस भगवान से कह देती है—“उसे सही सलामत रखना।”
सरहद पर खड़ा जवान कई बार नहीं जानता कि माँ ने उस दिन क्या मांगा, पर उसे यह ज़रूर पता होता है कि कोई है जो हर पल उसके लिए सोच रहा है। किसी मुश्किल ऑपरेशन से लौटते वक्त जब अचानक दिल शांत हो जाता है, वह समझ जाता है—माँ ने उस पल हाथ जोड़ लिए होंगे।
माँ का प्यार आवाज़ नहीं माँगता। वह खत में भी संक्षिप्त होता है—“ख़याल रखना”, “ठंड से बचना”, “समय पर खाना।” इन साधारण वाक्यों में असाधारण ताक़त होती है। वह खत कई बार पढ़ा जाता है, मोड़ा जाता है, जेब में रखा जाता है—और ज़रूरत पड़ने पर निकाल लिया जाता है।
पत्नी का इंतज़ार अलग होता है। वह दिखाई देता है—हर खाली कुर्सी में, हर अधूरी बातचीत में, हर देर से आने वाली कॉल में। वह इंतज़ार करती है—बिना शिकायत, बिना शोर। घर की ज़िम्मेदारियाँ संभालती है, बच्चों के सवालों के जवाब देती है, और समाज की नज़रों का सामना करती है। वह मुस्कराती है, ताकि बच्चे डरें नहीं। वह मजबूत बनती है, ताकि घर बिखरे नहीं।
फोन पर बात कम होती है। नेटवर्क खराब, समय सीमित। फिर भी वह हर बार पूछती है—“तुम ठीक हो?” और जवाब आता है—“हाँ।” इस “हाँ” के पीछे कई अधूरी बातें होती हैं। वह समझ जाती है। यही समझ उसका इंतज़ार आसान नहीं, पर सार्थक बना देती है।
कई रातें वह जागकर काटती है। टीवी पर खबरें चलती हैं—सीमा, मुठभेड़, तनाव। हर ब्रेकिंग न्यूज़ दिल धक-धक कराती है। वह चैनल बदल देती है, पर मन नहीं बदल पाता। फिर बच्चों की ओर देखती है—और खुद को संभाल लेती है। यही उसकी लड़ाई है—घर के भीतर की।
सरहद पर जवान जब थक जाता है, तब पत्नी का चेहरा याद आता है—मुस्कराता हुआ। वह मुस्कान उसे याद दिलाती है कि कोई है जो लौटने का रास्ता बनाकर बैठा है। यह इंतज़ार बोझ नहीं—डोर बन जाता है।
माँ और पत्नी की भूमिकाएँ अलग हैं, पर लक्ष्य एक। माँ बेटे को भगवान के हवाले करती है, पत्नी पति को समय के हवाले। दोनों भरोसा करती हैं—बिना शर्त। दोनों जानती हैं कि उनका डर जवान तक नहीं पहुँचना चाहिए।
कभी घर से खबर आती है—माँ बीमार है, या बच्चा परेशान है। जवान का दिल टूटता है, पर वह वहीं खड़ा रहता है जहाँ उसे होना चाहिए। उस पल माँ की दुआ और पत्नी का इंतज़ार और मजबूत हो जाते हैं—मानो वे कह रहे हों, “तुम अपना काम करो, हम संभाल लेंगे।”
छुट्टी पर घर लौटना एक उत्सव जैसा होता है। माँ की आँखें भर आती हैं, पर होंठ मुस्कराते हैं। पत्नी देर तक देखती रहती है—जैसे यक़ीन करना चाहती हो कि वह सच में सामने है। पर यह मिलन भी समयबद्ध होता है। विदा फिर से तय होती है। माँ फिर दुआ बाँध देती है, पत्नी फिर इंतज़ार सीख लेती है।
सैनिक जब विदा लेता है, तब वह अकेला नहीं जाता। माँ की दुआ उसके माथे पर रहती है, पत्नी का इंतज़ार उसकी पीठ पर हाथ रख देता है। ये दोनों मिलकर उसे आगे बढ़ाते हैं।
यह अध्याय किसी युद्ध का नहीं, किसी हथियार का नहीं। यह उन लोगों का है, जिनका नाम कहीं नहीं लिखा जाता, पर जिनकी वजह से सैनिक खड़ा रहता है। अगर वर्दी जवान को पहचान देती है, तो माँ की दुआ और पत्नी का इंतज़ार उसे इंसान बनाए रखते हैं।
और जब कभी जवान सुरक्षित लौटता है, तो समझ आता है—सरहद पर सिर्फ़ बंदूक नहीं लड़ती। घर में बैठी दुआ और इंतज़ार भी बराबरी से जंग लड़ते हैं।
अध्याय 8: बाज़ों की पलटन
वे खुद को हीरो नहीं कहते। उनके लिए “पलटन” शब्द ही काफी है। बाज़ों की पलटन—तेज़, सतर्क, और ऊँची उड़ान के लिए बनी हुई। यहाँ हर चेहरा अलग है, पर चाल एक जैसी। कोई पहाड़ों से आया है, कोई मैदानों से, कोई रेगिस्तान से। भाषाएँ अलग, आदतें अलग—पर वर्दी पहनते ही सब एक हो जाते हैं।
पलटन में कोई अकेला नहीं चलता। यहाँ कदम मिलाकर चलना सिखाया जाता है—शाब्दिक भी और भावनात्मक भी। अगर एक फिसले, तो दूसरा थाम ले। अगर एक थके, तो दूसरा आगे बढ़े। यही पलटन की आत्मा है—साथ। यह साथ सिर्फ़ लड़ाई में नहीं, रोज़मर्रा में भी होता है। खाना बाँटना, ड्यूटी बाँटना, खामोशी बाँटना।
सीनियर- जूनियर का रिश्ता सख़्त दिखता है, पर भीतर गहरा होता है। सीनियर डाँटता है, पर पीछे खड़ा रहता है। जूनियर सीखता है, पर सवाल मन में रखता है। गलती यहाँ सज़ा नहीं—सबक बनती है। क्योंकि सब जानते हैं—एक की गलती सब पर भारी पड़ सकती है।
पलटन की ट्रेनिंग अलग होती है। यहाँ हर अभ्यास का मतलब होता है। दौड़ सिर्फ़ दौड़ नहीं—सहनशीलता है। ड्रिल सिर्फ़ कदम नहीं—तालमेल है। फायरिंग सिर्फ़ निशाना नहीं—नियंत्रण है। और सबसे ज़रूरी—विश्वास। यह विश्वास किताबों से नहीं आता—समय से आता है, पसीने से आता है।
ऑपरेशन के वक्त पलटन एक शरीर बन जाती है। आँखें अलग-अलग देखती हैं, पर दिमाग़ एक निर्णय लेता है। आदेश ऊपर से आता है, पर जिम्मेदारी सबकी होती है। कोई पीछे नहीं रहता—न आगे निकलता है। यही संतुलन पलटन को सुरक्षित रखता है।
कभी-कभी पलटन हँसती भी है। मुश्किल हालात में छोटी-सी मज़ाक राहत बन जाती है। कोई पुराने किस्से सुनाता है, कोई गाँव की बातें। यह हँसी हल्की नहीं—ज़रूरी होती है। यह याद दिलाती है कि वे इंसान हैं, मशीन नहीं।
जब कोई साथी घायल होता है, पलटन की साँस थम जाती है। हर कोई अपनी सीमा भूलकर आगे आता है। खून बहता है, पर हाथ स्थिर रहते हैं। उस वक्त पलटन की पहचान सामने आती है—बिना शोर, बिना डर। और जब सब ठीक होता है, तब कोई जीत का दावा नहीं करता। बस राहत होती है।
कभी पलटन किसी को खो देती है। उस दिन शब्द कम पड़ जाते हैं। खाली बिस्तर चुपचाप बोलता है। कोई आँसू नहीं दिखाता, पर सब भारी होते हैं। अगली सुबह वही रूटीन—थोड़ा और सख़्त, थोड़ा और पवित्र। क्योंकि अब किसी और की ज़िम्मेदारी भी उठानी है।
पलटन में सम्मान शोर से नहीं मिलता। वह समय के साथ मिलता है। वह तब मिलता है जब तुम साथी की पीठ देखे बिना भरोसा कर सको। वह तब मिलता है जब संकट में तुम्हारा नाम नहीं—तुम्हारा काम बोले।
बाज़ों की पलटन उड़ती है, पर ज़मीन से जुड़ी रहती है। उन्हें पता है—ऊँचाई का मतलब घमंड नहीं। गिरना हमेशा संभव है। इसलिए वे अपनी जड़ें मज़बूत रखते हैं—अनुशासन में, प्रशिक्षण में, और एक-दूसरे में।
यह पलटन सिर्फ़ सैनिकों का समूह नहीं—यह परिवार है। यहाँ माँ की दुआ और पत्नी का इंतज़ार साझा होता है। यहाँ घर की कहानियाँ सुनाई जाती हैं। यहाँ हर जीत सबकी होती है, हर नुकसान सबका।
जब कोई नया जवान पलटन में आता है, तो उसे बाज़ बनना सिखाया जाता है—तेज़ नज़र, मज़बूत पंजे, ऊँची उड़ान। पर साथ ही यह भी—झुंड में उड़ना। क्योंकि अकेला बाज़ ऊँचा उड़ सकता है, पर सुरक्षित नहीं।
बाज़ों की पलटन हर दिन उड़ान भरती है—कभी आसमान में, कभी ज़मीन पर। और हर उड़ान के पीछे एक ही मकसद होता है—साथ लौटना। यही उनकी ताक़त है। यही उनकी पहचान है।
अध्याय 9: लौटना या अमर होना
यह सवाल यहाँ कोई नहीं पूछता, फिर भी हर कदम के साथ चलता है—लौटना या अमर होना। शब्द भारी हैं, पर अर्थ साफ़। लौटना घर की तरफ़ जाता है, अमर होना देश की यादों में। दोनों के बीच एक पतली-सी रेखा है, जिस पर रोज़ चला जाता है—चुपचाप।
ऑपरेशन से पहले रात अलग होती है। तैयारी पूरी होती है, पर मन अधूरा रहता है। कोई चिट्ठी लिखता है—बिना तारीख़ के। कोई तस्वीर जेब में रखता है—सीने के पास। कोई मन ही मन दुआ करता है—बिना शब्दों के। सब जानते हैं—सुबह कैसी होगी, यह कोई नहीं जानता। और इसी अनिश्चितता में अनुशासन सबसे ज़्यादा ज़रूरी हो जाता है।
आदेश आते हैं—संक्षिप्त, स्पष्ट। चेहरे सख़्त नहीं—स्थिर होते हैं। कोई नारा नहीं, कोई भाषण नहीं। हेलमेट कसते हैं, पट्टे खिंचते हैं, हथियार जाँचे जाते हैं। हाथों की हरकतें अभ्यास से चलती हैं। दिल की धड़कन तेज़ है, पर साँस काबू में। यही वह संतुलन है—जहाँ डर काम में बदलता है।
कदम बढ़ते हैं। रास्ता जाना-पहचाना भी हो सकता है, और बिल्कुल नया भी। हर मोड़ एक संभावना है। हर सन्नाटा एक संकेत। आँखें देखती हैं, कान सुनते हैं, दिमाग़ निर्णय लेता है। यहाँ किसी एक की बहादुरी काफी नहीं—यह सामूहिक साहस है। कोई आगे है, कोई कवर में। कोई देख रहा है, कोई सुन रहा है। एक चूक—और कहानी बदल सकती है।
गोलियों की आवाज़ आती है—हवा चीरती हुई। समय सिकुड़ जाता है। सेकंड घंटों जैसे लगते हैं। शरीर अपने आप काम करता है—नीचे झुकना, आगे बढ़ना, कवर लेना। नाम पुकारे जाते हैं—छोटे, तेज़। कोई गिरता है—तुरंत प्रतिक्रिया। यहाँ भावनाएँ बाद के लिए रखी जाती हैं। पहले काम।
उस बीच मन कहीं और भी होता है—एक झलक में। माँ का चेहरा, पत्नी की आँखें, बच्चे की हँसी। यह झलक कमजोरी नहीं—ईंधन है। यह बताती है—जीना है, लौटना है। और अगर लौटना न हो, तो कुछ ऐसा कर जाना है कि लौटने की कमी खले नहीं।
कभी ऑपरेशन सफल होता है—सब सुरक्षित। राहत उतरती है—धीरे, गहरी। कोई जीत का जश्न नहीं। बस एक-दूसरे को देखा जाता है—आँखों में थकान, भीतर सुकून। लौटने का मतलब सिर्फ़ वापस पहुँचना नहीं—वापस वैसे ही पहुँचना है, जैसे निकले थे।
कभी कीमत चुकानी पड़ती है। कोई साथी नहीं लौटता। उस पल समय रुक जाता है। आवाज़ें धीमी पड़ जाती हैं। खालीपन अचानक भारी हो जाता है। नाम लिया जाता है—सम्मान के साथ। झंडा मोड़ा जाता है—संयम के साथ। आँखें नम होती हैं—ख़ामोशी के साथ। यहाँ रोना भी अनुशासन में होता है।
अमर होना किताबों का शब्द नहीं—यहाँ वह एक चेहरा होता है, एक हँसी, एक आदत। उसकी जगह कोई नहीं लेता। उसकी कहानी पलटन में रह जाती है—हर गश्त में, हर चौकी पर। उसका नाम बोलकर आदेश दिए जाते हैं—जैसे वह अभी भी सुन रहा हो। यही अमरता है—काम में जिंदा रहना।
जो लौटते हैं, वे बदलकर लौटते हैं। उनकी आँखों में कुछ स्थायी उतर जाता है—एक गंभीरता, एक सादगी। वे शोर से दूर हो जाते हैं। उन्हें पता है—जीवन उधार है, और यह उधार जिम्मेदारी के साथ चुकाना है। वे हँसते हैं, पर हल्का। वे बोलते हैं, पर कम। क्योंकि उन्होंने देखा है—दोनों छोर।
घर पहुँचकर भी यह सवाल पीछा नहीं छोड़ता। रात में अचानक नींद खुल जाती है। आवाज़ें तेज़ लगती हैं। अँधेरा परिचित लगता है। पर सुबह होती है—और जीवन आगे बढ़ता है। बच्चे स्कूल जाते हैं, माँ चाय बनाती है, पत्नी मुस्कराती है। लौटना धीरे-धीरे समझ में आता है—यह भी एक जंग है।
और जो अमर हुए, वे लौटते नहीं—पर जाते भी नहीं। वे हर सलाम में, हर परेड में, हर सन्नाटे में मौजूद रहते हैं। वे याद दिलाते हैं—लौटना सौभाग्य है, अमर होना बलिदान। दोनों सम्मान के योग्य हैं।
यह अध्याय किसी निर्णय का नहीं—स्वीकार का है। यहाँ कोई वादा नहीं किया जाता—यहाँ क़सम निभाई जाती है। हर बार जब कदम आगे बढ़ते हैं, सवाल साथ चलता है—लौटना या अमर होना। और हर बार जवाब एक ही होता है—कर्तव्य।
क्योंकि यहाँ लौटना भी देश के लिए है, और अमर होना भी। और इसी सच में वह आगे बढ़ता है—स्थिर, शांत, तैयार।
अध्याय 10: वर्दी के उस पार
वर्दी उतारी जा सकती है, पर उसका असर नहीं। यह शरीर से उतरती है, आत्मा से नहीं। यह अध्याय वहीं से शुरू होता है जहाँ ज़्यादातर कहानियाँ ख़त्म हो जाती हैं—सेवा के बाद, सलाम के बाद, परेड के बाद। यहाँ शोर कम है, पर सच्चाई ज़्यादा गहरी।
जब कोई जवान घर लौटता है—पूरी सेवा के बाद—तो लोग कहते हैं, “अब आराम करो।” पर उसे पता होता है, आराम कोई जगह नहीं—एक आदत है, जो उसे आती नहीं। सुबह वही समय, वही अनुशासन। हाथ अपने आप सलीके से उठते हैं। आवाज़ में वही ठहराव। भीड़ में भी वह अकेला खड़ा दिखता है—सीधा, शांत।
वर्दी के उस पार पहचान बदलती है, पर जिम्मेदारी नहीं। अब वह सीमा पर नहीं—समाज के बीच खड़ा है। अब हथियार नहीं—उसके शब्द काम करते हैं। अब आदेश नहीं—उसका उदाहरण चलता है। वह सिखाता नहीं—बस जीता है, और लोग सीख लेते हैं।
कुछ लोग उसे समझते हैं, कुछ नहीं। कोई पूछता है—“डर नहीं लगा?” कोई कहता है—“इतना क्या था?” वह मुस्कराता है। क्योंकि कुछ सवालों के जवाब शब्दों में नहीं होते। वे रातों में होते हैं, सन्नाटों में होते हैं, उन चेहरों में होते हैं जो लौटे नहीं।
घर में रहते हुए भी वह पहरे पर रहता है। खिड़की की आवाज़ पर चौंकना, दरवाज़े की कुंडी देखना—ये आदतें नहीं जातीं। पत्नी समझती है—चुपचाप। माँ समझती है—दुआ में। बच्चे समझते हैं—सलाम में। यही उसका सुकून है।
कभी-कभी वह शीशे में खुद को देखता है। बालों में सफ़ेदी, आँखों में गहराई। वह पूछता नहीं—“क्या मिला?” वह जानता है—“जो दिया, वही मिला।” सम्मान कोई तमगा नहीं—एक जीवन शैली है। और वह इसे ओढ़े चलता है—बिना दिखावे के।
वर्दी के उस पार वह उन सबके लिए खड़ा होता है, जो आज भी वर्दी में हैं। वह चुपचाप किसी शहीद के घर जाता है। कोई भाषण नहीं—बस मौजूदगी। वह जानता है—दुख़ को शब्द नहीं चाहिए, कंधा चाहिए।
और जब कोई बच्चा उससे पूछता है—“मैं भी सैनिक बन सकता हूँ?” उसकी आँखें चमकती हैं। वह डर नहीं दिखाता, सिर्फ़ सच बताता है—“यह आसान नहीं है, पर अगर देश पहले आता है, तो रास्ता खुद बन जाता है।”
यह अध्याय किसी अंत का नहीं—एक निरंतरता का है। वर्दी के उस पार भी क़सम चलती है। फर्क़ बस इतना है—अब सीमा नक़्शे पर नहीं, दिलों में है।
और यही इस किताब का सत्य है—
वर्दी पहनना एक समय का काम है,
पर वर्दी होना—पूरी ज़िंदगी।
यहीं कहानी रुकती नहीं—यहीं से समाज शुरू होता है।