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HomeUnnati Sharma

दो रास्ते

परिचय

“दो रास्ते – विरासत और मेहनत के बीच”

एक ऐसी यात्रा की कहानी है

जो हर दिल को छूती है।


कुछ लोगों के जीवन में सब कुछ

जन्म से ही मिलता है—विरासत के रूप में।

कुछ लोग अपनी मेहनत, अपनी जज़्बात और अपने संघर्ष के दम पर

हर चीज़ हासिल करते हैं।


यह किताब

उन्हीं दो रास्तों के बीच की कहानी है।

यह संघर्ष, उम्मीद, टूटते सपनों और फिर उठ खड़े होने की कहानी है।

यह उन भावनाओं का संग्रह है

जो केवल महसूस की जाती हैं,

लेकिन शब्दों में ढालना कठिन होता है।


यह पुस्तक आपको

दिल से सोचने पर मजबूर करेगी,

आपके अंदर की हिम्मत को जगाएगी,

और आपको याद दिलाएगी

कि मंज़िल चाहे कितनी भी दूर क्यों न हो,

सच्ची मेहनत और धैर्य

हमेशा अपना रास्ता बनाते हैं।


दो रास्ते—विरासत और मेहनत के बीच।

एक किताब जो आपके दिल के हर भाव को समझती है

और आपके भीतर के संघर्ष को सम्मान देती है।

_________________________________________

लेखक

उन्नति शर्मा एक प्रेरणादायक लेखक हैं, जिनकी लेखनी

मनुष्य के संघर्ष, भावनाओं और आत्मविश्वास को शब्दों में ढालती है।

उन्होंने हमेशा यही माना है कि हर इंसान की कहानी अनमोल होती है,

और हर अनुभव हमें कुछ सिखाता है।


उनके लेखन का उद्देश्य केवल शब्द लिखना नहीं है,

बल्कि पाठक के दिल में उत्साह, हिम्मत और आत्म-प्रेरणा जगाना है।

उनकी कहानियाँ और विचार

मनुष्य को अपने सपनों के पीछे दौड़ने और

सपनों को हकीकत में बदलने की प्रेरणा देते हैं।


उन्नति शर्मा का मानना है कि जीवन में चाहे कितनी भी मुश्किलें आएँ,

धैर्य, मेहनत और सच्चाई

हमेशा रास्ता दिखाती हैं।


अन्य उपलब्धियाँ और अनुभव:


  • जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रेरणादायक लेख
  • युवा और विद्यार्थियों के लिए मार्गदर्शन
  • सामाजिक और साहित्यिक कार्यक्रमों में भागीदारी



उन्नति की यह पुस्तक

“दो रास्ते – विरासत और मेहनत के बीच”

उनके गहरे अनुभव और भावनाओं का सार प्रस्तुत करती है।

_________________________________________

अध्याय 1 जन्म से मिला हुआ रास्ता


कुछ ज़िंदगियाँ पहली साँस के साथ ही तयशुदा रास्ता पा लेती हैं। घर बड़ा होता है, दीवारें मज़बूत होती हैं, और भविष्य पहले से लिखा हुआ लगता है। नाम के आगे एक पहचान जुड़ी होती है, और पहचान के पीछे विरासत की ताक़त। वहाँ सपने बोझ नहीं होते, बल्कि विकल्प होते हैं। गलती करने की आज़ादी होती है, गिरने पर पकड़ने के लिए हाथ होते हैं, और रुक जाने पर भी आगे बढ़ाने के साधन मौजूद रहते हैं।


और फिर कुछ ज़िंदगियाँ होती हैं, जिनका रास्ता जन्म के साथ नहीं मिलता। उन्हें रास्ता बनाना पड़ता है।


यह अध्याय उन्हीं दो रास्तों के पहले मोड़ की कहानी है—उस जगह की, जहाँ कोई कुछ पाए बिना पैदा होता है, और कोई सब कुछ पाए हुए भी यह नहीं जानता कि उसे क्या मिला है।


एक बच्चा जब जन्म लेता है, तो वह मासूम होता है। उसे नहीं पता होता कि वह किस घर में आया है, किस आर्थिक स्थिति में, किस सामाजिक पहचान के साथ। लेकिन समय उसे सब कुछ सिखा देता है। बहुत धीरे, बहुत बेरहमी से।


कुछ बच्चों के लिए सुबह का मतलब होता है—साफ़ कपड़े, भरा हुआ टिफ़िन, स्कूल की बस, और माँ का “ध्यान रखना” कहकर मुस्कुराना। उनके लिए भविष्य एक बंद दरवाज़ा नहीं होता, बल्कि एक खुली खिड़की जैसा होता है। वे यह सोचकर बड़े होते हैं कि “मैं क्या बनना चाहता हूँ?”


लेकिन कुछ बच्चों के लिए सुबह का मतलब होता है—कल की बची हुई रोटी, माँ की थकी हुई आँखें, पिता की चुप्पी, और स्कूल जाने या काम पर जाने के बीच का मौन संघर्ष। उनके लिए सवाल यह नहीं होता कि “मैं क्या बनूँ?” बल्कि यह होता है कि “मैं टिक कैसे पाऊँ?”


विरासत सिर्फ़ ज़मीन-जायदाद नहीं होती। विरासत आत्मविश्वास भी होती है। वह भरोसा कि अगर मैं गिरूँगा तो कोई है जो मुझे संभाल लेगा। वह पहचान कि लोग मेरे नाम से पहले मेरे पिता, मेरे परिवार, मेरे खानदान को जानते हैं।


और मेहनत सिर्फ़ पसीना नहीं होती। मेहनत वह अकेलापन होती है, जिसमें कोई ताली नहीं बजाता। मेहनत वह दर्द होती है, जो भीतर ही भीतर सह लिया जाता है। मेहनत वह इंतज़ार होती है, जिसमें यह नहीं पता होता कि आख़िर में कुछ मिलेगा भी या नहीं।


जन्म से मिला हुआ रास्ता अक्सर चिकना होता है। उस पर चलने वाले को यह एहसास नहीं होता कि रास्ता कितना आसान है, क्योंकि उसने कभी कंकड़ भरी ज़मीन पर नंगे पाँव चलना नहीं सीखा। उसे लगता है कि सबके लिए रास्ते ऐसे ही होते हैं। वह यह मानकर चलता है कि मेहनत उसने भी की है, लेकिन उसे यह नहीं दिखता कि उसकी मेहनत के नीचे विरासत का गद्दा बिछा हुआ था।


और जो बिना रास्ते के पैदा होता है, वह हर कदम पर हिसाब करता है। हर गलती उसे महँगी पड़ती है। उसके पास सीखने के लिए दूसरा मौक़ा नहीं होता, क्योंकि पहला मौक़ा ही उसे तोड़ देने के लिए काफ़ी होता है।


यह फर्क बचपन में ही साफ़ दिखने लगता है।


किसी के लिए किताबें खिलौने होती हैं, और किसी के लिए किताबें सपने। किसी के लिए स्कूल एक पड़ाव होता है, और किसी के लिए स्कूल एक लड़ाई। किसी के लिए फीस एक औपचारिकता होती है, और किसी के लिए फीस एक असंभव दीवार।


विरासत वाला बच्चा जब रोता है, तो लोग कहते हैं—“बच्चा है, नादान है।”

मेहनत वाला बच्चा जब रोता है, तो लोग कहते हैं—“ज़िम्मेदारी सीखो।”


यही से रास्ते अलग होने लगते हैं।


एक रास्ता सुरक्षा से बना होता है, दूसरा डर से।

एक रास्ता विश्वास से भरा होता है, दूसरा सवालों से।


और सबसे दुखद बात यह है कि इन दोनों रास्तों पर चलने वाले अक्सर एक-दूसरे को समझ ही नहीं पाते।


जिसे सब कुछ मिला है, वह कहता है—“मेहनत करो, सब मिल जाएगा।”

जिसे कुछ नहीं मिला, वह चुप रहता है, क्योंकि वह जानता है कि मेहनत करने के बाद भी सब नहीं मिलता।


जन्म से मिला हुआ रास्ता इंसान को यह विश्वास देता है कि दुनिया न्यायपूर्ण है।

मेहनत से बना हुआ रास्ता इंसान को यह सिखाता है कि दुनिया मौके देती है, गारंटी नहीं।


यह अध्याय किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह उन सभी लोगों की शुरुआत है, जिन्होंने बिना किसी सहारे के चलना सीखा। यह उन आँखों की कहानी है, जिन्होंने दूसरों को आगे बढ़ते देखा और खुद को पीछे रोके रखा, क्योंकि घर की ज़रूरतें पहले थीं।


यह अध्याय उस पहले एहसास का है, जब इंसान समझता है कि उसकी ज़िंदगी आसान नहीं होने वाली। जब वह यह महसूस करता है कि उसके पास शिकायत करने का अधिकार भी सीमित है। जब वह यह जान लेता है कि उसे मज़बूत बनना पड़ेगा, चाहे वह तैयार हो या नहीं।


जन्म से मिला हुआ रास्ता इंसान को आराम सिखाता है।

बिना रास्ते के पैदा होना इंसान को सहनशील बनाता है।


और यहीं से कहानी शुरू होती है।


यह कहानी उन कदमों की है, जो डगमगाते हैं लेकिन रुकते नहीं।

यह कहानी उस मन की है, जो कई बार टूटता है, लेकिन चुपचाप खुद को समेट लेता है।


क्योंकि जिसने विरासत नहीं पाई, उसके पास एक ही विकल्प होता है—

खुद को बनाना।


और यही विकल्प आगे चलकर उसे उस मोड़ तक ले जाएगा, जहाँ दो रास्ते आमने-सामने खड़े होंगे—

एक विरासत का,

और एक मेहनत का।


यहीं अध्याय समाप्त नहीं होता,

यहीं असली यात्रा शुरू होती है।

_________________________________________________

अध्याय 2 खाली हाथ, भरी उम्मीदें


कुछ लोग जीवन की शुरुआत विरासत से करते हैं,

और कुछ लोग उम्मीद से।


उम्मीद—जो दिखाई नहीं देती, लेकिन साँसों से भी ज़्यादा ज़रूरी होती है।

उम्मीद—जो खाली हाथों में भी वज़न रखती है।


यह अध्याय उन्हीं लोगों का है, जिनके हाथों में कुछ नहीं था,

लेकिन दिल में बहुत कुछ था।


जब इंसान के पास देने के लिए कुछ नहीं होता,

तो वह खुद से वादा करता है—

कि एक दिन वह इतना ज़रूर कमा लेगा

कि किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े।


खाली हाथ होना सबसे पहले आत्मसम्मान को चोट पहुँचाता है।

पैसा न होना सिर्फ़ जेब की कमी नहीं है,

यह भरोसे की कमी है,

यह विकल्पों की कमी है,

यह आवाज़ की कमी है।


ऐसे लोग भीड़ में सबसे ज़्यादा होते हैं,

लेकिन सबसे कम दिखते हैं।


उनके सपने शोर नहीं करते,

वे चुपचाप पलते हैं।

डर के साथ,

संकोच के साथ,

और कई बार अपराध-बोध के साथ।


वे जानते हैं कि घर में ज़रूरतें हैं।

वे जानते हैं कि माँ ने अपने सपने पहले ही छोड़ दिए हैं।

वे जानते हैं कि पिता की थकान सिर्फ़ शरीर की नहीं,

आत्मा की भी है।


इसलिए उनके सपने भी ज़िम्मेदार हो जाते हैं।


वे ऊँचा उड़ने से पहले सोचते हैं—

“अगर मैं गिर गया तो घर का क्या होगा?”


जहाँ विरासत वाले सपने आज़ादी माँगते हैं,

वहीं मेहनत वाले सपने अनुमति माँगते हैं।


खाली हाथ इंसान को जल्दी बड़ा कर देते हैं।

उसे बचपन से ही समझा देते हैं

कि दुनिया भावनाओं से नहीं,

हिसाब से चलती है।


वह बच्चा जो दोस्तों के साथ हँसना चाहता था,

अक्सर चुप रहना सीख जाता है।

वह बच्चा जो खेलना चाहता था,

काम करना सीख जाता है।


और वह बच्चा जो सपने देखना चाहता था,

हकीकत से समझौता करना सीख जाता है।


लेकिन उम्मीद—

उम्मीद कहीं नहीं जाती।


उम्मीद तब भी रहती है,

जब जेब खाली हो।

उम्मीद तब भी रहती है,

जब हालात भारी हों।


वह उम्मीद कहती है—

“आज नहीं तो कल,

यह अँधेरा ख़त्म होगा।”


यही उम्मीद उस इंसान को हर सुबह उठाती है,

हर दिन फिर से कोशिश करने को मजबूर करती है।


वह जानता है कि उसके पास कोई सहारा नहीं है,

लेकिन उसे यह भी पता है

कि उसके पास हारने का विकल्प भी नहीं है।


खाली हाथ इंसान हर चीज़ को गहराई से महसूस करता है।

वह अपमान को भी महसूस करता है,

वह तानों को भी,

वह नज़रों की ठंडक को भी।


जब कोई कहता है—

“तुमसे नहीं होगा,”

तो वह बात दिल में उतर जाती है।


लेकिन वही दिल

धीरे-धीरे पत्थर बनना सीखता है।


वह मुस्कुराता है,

लेकिन भीतर टूटता है।

वह सह लेता है,

लेकिन भूलता नहीं।


और उसी याद से

वह अपनी ताक़त बनाता है।


खाली हाथ होना इंसान को दो रास्ते दिखाता है—

या तो वह खुद को छोटा मान ले,

या फिर खुद को बड़ा बना ले।


और जो दूसरा रास्ता चुनते हैं,

वे देर से पहुँचते हैं,

लेकिन गहराई से पहुँचते हैं।


उनकी उम्मीदें नाज़ुक नहीं होतीं,

वे तपकर मज़बूत हुई होती हैं।


यह अध्याय उस मन की कहानी है,

जो हर दिन खुद से लड़ता है

और हर रात खुद को समझाता है।


यह अध्याय उस इंसान का है,

जो जानता है कि उसके पास विरासत नहीं है,

लेकिन यह भी जानता है

कि उसके पास जज़्बा है।


और कभी-कभी

जज़्बा

विरासत से भी बड़ा होता है।


खाली हाथ,

लेकिन दिल में भरी उम्मीदें—

यहीं से वह यात्रा आगे बढ़ती है

जो आसान नहीं होती,

लेकिन सच्ची होती है।


यहीं से मेहनत

सिर्फ़ मजबूरी नहीं रहती,

बल्कि पहचान बनने लगती है।


और यही पहचान

आगे चलकर

उस इंसान को

अपने नाम से जाना जाने का हक़ देती है।

_________________________________________________

अध्याय 3 तुलनाओं का बोझ


इंसान तब तक अपने आप से लड़ता रहता है,

जब तक वह दूसरों से अपनी तुलना करना नहीं सीख लेता।

और जिस दिन तुलना शुरू होती है,

उसी दिन भीतर का सुकून सबसे पहले टूटता है।


यह अध्याय उसी टूटन की कहानी है।


तुलना कोई अचानक होने वाली चीज़ नहीं है।

यह धीरे-धीरे सिखाई जाती है—

घर में,

स्कूल में,

समाज में।


“देखो, वो तुमसे आगे है।”

“देखो, उसके पास कितना कुछ है।”

“देखो, उसने कितनी जल्दी कर लिया।”


इन वाक्यों में सलाह कम होती है,

और बोझ ज़्यादा।


जिसके पास विरासत होती है,

उसकी तुलना उसकी उम्र से की जाती है।

और जिसके पास सिर्फ़ मेहनत होती है,

उसकी तुलना नतीजों से।


यही सबसे बड़ा अन्याय है।


तुलना इंसान को यह महसूस कराती है

कि वह हमेशा पीछे है।

चाहे वह कितना भी चल ले,

कितना भी थक जाए।


मेहनत वाला इंसान जब किसी और की चमकती ज़िंदगी देखता है,

तो वह अपनी सादगी से शर्माने लगता है।

वह अपनी धीमी रफ़्तार से घबराने लगता है।

वह यह भूल जाता है

कि हर किसी की शुरुआत एक जैसी नहीं होती।


लेकिन दुनिया शुरुआत नहीं देखती,

दुनिया सिर्फ़ मंज़िल देखती है।


और यही वजह है

कि मेहनत करने वाला इंसान

अक्सर खुद को अधूरा मानने लगता है।


वह सोचता है—

“मैं इतना कर रहा हूँ, फिर भी क्यों कम लग रहा है?”

“मेरी मेहनत दिख क्यों नहीं रही?”

“मेरे हिस्से में देर ही क्यों है?”


तुलनाएँ दिल को सबसे ज़्यादा चोट तब पहुँचाती हैं,

जब वे अपनों से आती हैं।


जब माँ-बाप अनजाने में कह देते हैं—

“फलाँ का बेटा तो बहुत आगे निकल गया।”

“देखो, उसकी बेटी कहाँ पहुँच गई।”


वे यह नहीं समझते

कि यह तुलना

एक बच्चे के भीतर

कितना गहरा डर भर देती है।


डर इस बात का

कि कहीं वह कभी काफ़ी न हो पाए।


तुलना इंसान से उसकी पहचान छीन लेती है।

वह खुद को “मैं” नहीं,

“दूसरों से कम” समझने लगता है।


और जो इंसान खुद को कम मान ले,

उसके लिए दुनिया

और भी कठोर हो जाती है।


विरासत वाले इंसान को तुलना से फ़ायदा होता है।

वह जानता है

कि उसके पास संभालने के साधन हैं।

उसके पास गलती की गुंजाइश है।


लेकिन मेहनत वाले इंसान के लिए

हर तुलना

एक चेतावनी होती है—

कि उसके पास गलती की कोई जगह नहीं है।


वह एक-एक कदम

डर के साथ रखता है।

क्योंकि उसे पता है

कि एक चूक

उसे बहुत पीछे धकेल सकती है।


तुलना इंसान को अपने समय से भी लड़वाती है।

वह भूल जाता है

कि उसका सफ़र लंबा है,

कठिन है,

लेकिन उसका है।


वह दूसरों की घड़ी देखकर

अपने कदम तेज़ करने लगता है,

और इसी जल्दबाज़ी में

अक्सर खुद को खो देता है।


यह अध्याय उस थकान का है

जो शरीर में नहीं,

मन में बस जाती है।


वह थकान

जो मुस्कान के पीछे छुपी रहती है।

वह थकान

जो रातों को नींद नहीं आने देती।


क्योंकि तुलना

दिन में भी पीछा करती है

और रात में भी।


लेकिन इसी बोझ के नीचे

एक और भावना जन्म लेती है—

ख़ामोश दृढ़ता।


धीरे-धीरे

मेहनत वाला इंसान

यह समझने लगता है

कि तुलना से जीतना असंभव है।


क्योंकि वह दौड़

बराबरी की नहीं है।


और उसी समझ के साथ

वह एक दिन

दूसरों से नहीं,

खुद से मुकाबला करना शुरू करता है।


यह मोड़ आसान नहीं होता।

यह स्वीकार करना

कि “मेरी यात्रा अलग है”

बहुत हिम्मत माँगता है।


लेकिन यही स्वीकार

उसे पहली बार

हल्का महसूस कराता है।


तुलनाओं का बोझ

अब भी रहता है,

लेकिन वह उसे दबाता नहीं,

वह उसे सहना सीख जाता है।


और यही सहनशीलता

आगे चलकर

उसकी सबसे बड़ी ताक़त बनती है।


यह अध्याय

उस दर्द की कहानी है

जो दिखता नहीं,

लेकिन रोज़ महसूस होता है।


और उसी दर्द के भीतर

एक बीज छुपा होता है—

आत्मस्वीकृति का।


जिस दिन इंसान

खुद को स्वीकार कर लेता है,

उसी दिन

तुलनाएँ हारने लगती हैं।


और यहीं से

मेहनत की राह

और भी कठिन

लेकिन और भी सच्ची

हो जाती है।

_________________________________________


अध्याय 4 संघर्ष की पहली चोट


संघर्ष तब तक सिर्फ़ एक शब्द होता है,

जब तक वह पहली बार सीधे दिल पर वार न करे।

उससे पहले इंसान सोचता है—

“मैं संभाल लूँगा।”

“मैं कर लूँगा।”


लेकिन पहली चोट

सिखा देती है

कि सोच और हक़ीक़त के बीच

कितना फ़ासला होता है।


यह अध्याय उसी पहली चोट का है।


मेहनत करने वाला इंसान

संघर्ष के लिए तैयार रहता है,

लेकिन चोट के लिए कभी तैयार नहीं होता।

क्योंकि चोट

सिर्फ़ हालात से नहीं लगती,

वह उम्मीदों से लगती है।


जब पहली बार

पूरी ईमानदारी से की गई कोशिश

नज़रअंदाज़ कर दी जाती है,

तो भीतर कुछ टूटता है।


वह टूटन

तेज़ नहीं होती,

वह धीरे-धीरे फैलती है।


जैसे किसी ने

अंदर से भरोसे की एक परत

उखाड़ दी हो।


पहली चोट

अक्सर छोटी लगती है बाहर से।

एक रिजेक्शन।

एक ताना।

एक अवसर का छूट जाना।


लोग कहते हैं—

“कोई बात नहीं, आगे बढ़ो।”


लेकिन वे नहीं जानते

कि यह वही पल होता है

जब इंसान पहली बार

खुद पर शक करता है।


वह सोचता है—

“शायद मुझमें ही कमी है।”

“शायद मैं काफ़ी नहीं हूँ।”


विरासत वाले इंसान के लिए

यह चोट एक अनुभव होती है।

मेहनत वाले इंसान के लिए

यह एक चेतावनी होती है।


क्योंकि उसके पास

दूसरा सहारा नहीं होता।

उसके लिए हर उम्मीद

सब कुछ दाँव पर लगाकर देखी जाती है।


पहली चोट

इंसान को अकेला कर देती है।

वह भीड़ में खड़ा होकर भी

खुद को अलग महसूस करता है।


वह मुस्कुराता है,

लेकिन अब उसकी मुस्कान में

पहले जैसी मासूमियत नहीं रहती।


अब वहाँ सतर्कता होती है।

डर होता है।

और थोड़ा सा ग़ुस्सा भी।


यह ग़ुस्सा

दुनिया से नहीं,

खुद से होता है।


“मैं और बेहतर क्यों नहीं था?”

“मैंने पहले क्यों नहीं समझा?”


पहली चोट

समय से पहले

इंसान को समझदार बना देती है।


वह अब

हर अवसर को

आँखें खोलकर देखता है।

हर भरोसे को

तौलकर रखता है।


क्योंकि वह जान चुका होता है

कि गिरने पर

हर कोई हाथ नहीं बढ़ाता।


यह अध्याय

उस रात की कहानी है

जब इंसान

चुपचाप रोता है।


किसी से शिकायत नहीं करता,

किसी को दोष नहीं देता,

बस खुद से लड़ता रहता है।


और उसी लड़ाई में

वह कुछ खो देता है—

बिना सोचे भरोसा करना।


लेकिन वह कुछ पाता भी है—

सच को पहचानने की समझ।


पहली चोट

इंसान को तोड़ती नहीं,

वह उसे बदल देती है।


वह उसे सिखाती है

कि रास्ता लंबा है,

और थकान स्थायी हो सकती है।


लेकिन यही चोट

आगे चलकर

उसके भीतर

अजीब-सी मज़बूती भर देती है।


अब वह गिरता है,

तो संभलना जानता है।

अब वह हारता है,

तो रुकना नहीं सीखता।


संघर्ष की पहली चोट

किसी युद्ध का अंत नहीं होती।

वह युद्ध की शुरुआत होती है।


यह अध्याय

उस पहले घाव की कहानी है

जो दिखाई नहीं देता,

लेकिन हमेशा याद रहता है।


और यही घाव

आगे चलकर

उस इंसान को

बिना शोर किए

अडिग बना देता है।


क्योंकि जिसने

पहली चोट सह ली,

वह आगे आने वाले

हर दर्द के लिए

थोड़ा और तैयार हो जाता है।


यहीं से

संघर्ष

एक मजबूरी नहीं,

एक आदत बनने लगता है।


और यही आदत

आगे की कहानी को

आकार देती है।

_________________________________________________


अध्याय 5 जब आत्मसम्मान रो पड़ा


कुछ आँसू आँखों से नहीं गिरते।

वे भीतर ही भीतर बहते रहते हैं।

और वही आँसू

आत्मसम्मान को सबसे ज़्यादा भिगो देते हैं।


यह अध्याय

उन्हीं आँसुओं का है।


आत्मसम्मान बहुत नाज़ुक होता है।

यह शोर नहीं करता,

यह शिकायत नहीं करता,

बस चुपचाप सहता रहता है।


मेहनत करने वाला इंसान

जब बार-बार खुद को साबित करता है

और फिर भी अनदेखा रह जाता है,

तो उसके भीतर

कुछ बहुत गहराई से टूटता है।


वह टूटन

सीधे दिल में नहीं लगती,

वह पहचान पर लगती है।


पहली बार

जब किसी को यह एहसास होता है

कि उसकी मेहनत

उसकी इज़्ज़त नहीं बढ़ा रही,

बल्कि उसे और छोटा दिखा रही है—

वहीं आत्मसम्मान

रो पड़ता है।


यह रोना

आवाज़ नहीं करता।


यह तब होता है

जब इंसान

किसी के सामने

अपनी मजबूरी छुपाकर

मुस्कुराता है।


यह तब होता है

जब वह जानता है

कि वह सही है,

फिर भी चुप रहता है।


क्योंकि बोलने की क़ीमत

वह चुका नहीं सकता।


आत्मसम्मान तब रोता है

जब इंसान

अपने सपनों को

“हालात” कहकर टाल देता है।


जब वह कहता है—

“अभी नहीं।”

“बाद में देखेंगे।”

“घर की ज़िम्मेदारी है।”


हर बार

जब वह खुद को पीछे रखता है,

उसका आत्मसम्मान

थोड़ा और दब जाता है।


विरासत वाले इंसान के लिए

आत्मसम्मान

एक अधिकार होता है।

मेहनत वाले इंसान के लिए

आत्मसम्मान

एक संघर्ष होता है।


क्योंकि उसे बार-बार

यह साबित करना पड़ता है

कि वह भी बराबरी का हक़दार है।


और सबसे ज़्यादा दर्द

तब होता है

जब इंसान

अपमान को

समझौता कहकर

सह लेता है।


वह जानता है

कि यह ठीक नहीं है,

लेकिन वह यह भी जानता है

कि लड़ने की ताक़त

अभी नहीं है।


तो वह चुप रहता है।


और यह चुप्पी

सबसे भारी होती है।


यह अध्याय

उसी चुप्पी का है।


उस चुप्पी का

जो भीड़ में भी

अकेला कर देती है।


वह इंसान

हँसता है,

काम करता है,

ज़िम्मेदारियाँ निभाता है—

लेकिन भीतर

कुछ मरता चला जाता है।


आत्मसम्मान।


वह खुद से सवाल करता है—

“क्या मैं सच में इतना कम हूँ?”

“क्या मेरी मेहनत

इतनी भी क़ीमती नहीं?”


इन सवालों का

कोई जवाब नहीं मिलता।


और जब जवाब नहीं मिलता,

तो इंसान

खुद को दोष देना शुरू कर देता है।


यही सबसे ख़तरनाक मोड़ होता है।


क्योंकि दुनिया की बेरुख़ी

एक दिन झेली जा सकती है,

लेकिन खुद की नज़रों में

गिर जाना

बहुत महँगा पड़ता है।


लेकिन इसी अँधेरे में

एक छोटी-सी चिंगारी

भी जन्म लेती है।


वह चिंगारी कहती है—

“बस अब और नहीं।”


धीरे-धीरे

इंसान समझने लगता है

कि आत्मसम्मान

किसी की दया से नहीं मिलता।


उसे खुद खड़ा करना पड़ता है।


वह सीखता है

कि हर समझौता

ज़रूरी नहीं होता।

और हर चुप्पी

समझदारी नहीं होती।


यह सीख

दर्द के साथ आती है,

लेकिन सच्ची होती है।


आत्मसम्मान

एक दिन रोना बंद कर देता है।


वह मज़बूत नहीं होता,

लेकिन ज़िद्दी हो जाता है।


अब वह इंसान

खुद को कम नहीं मानता,

बस खुद को

अभी अधूरा मानता है।


और अधूरापन

अंत नहीं होता,

शुरुआत होता है।


यह अध्याय

उस पल की कहानी है

जब इंसान

टूटकर भी

खुद को पूरी तरह

छोड़ता नहीं।


जब वह तय करता है—

कि चाहे देर लगे,

चाहे रास्ता कठिन हो,

लेकिन वह

अपनी इज़्ज़त

खुद बनाएगा।


क्योंकि जिस दिन

आत्मसम्मान

रोना बंद कर देता है,

उसी दिन

मेहनत

सिर्फ़ बोझ नहीं रहती—

वह आत्मा की आवाज़

बन जाती है।


और यही आवाज़

आगे के अध्यायों में

उसे

और भी मज़बूती से

चलना सिखाएगी।

_________________________________________________

अध्याय 6 टूटते सपने, फिर भी चलते कदम


कुछ सपने शोर मचाकर टूटते हैं,

और कुछ ऐसे टूटते हैं

कि आवाज़ भी नहीं होती।

बस भीतर

एक ख़ामोश खालीपन

छूट जाता है।


यह अध्याय

उसी ख़ामोशी का है।


जब आत्मसम्मान रो चुका होता है,

तो सपने भी सहमने लगते हैं।

वे अब खुले आकाश में नहीं उड़ते,

वे ज़मीन के क़रीब रहने लगते हैं।


मेहनत करने वाला इंसान

सपने देखना छोड़ता नहीं है,

लेकिन उन्हें छुपा लेता है।


क्योंकि हर बार

जब उसने उन्हें ज़ोर से कहा,

किसी न किसी ने

उन्हें अव्यावहारिक बता दिया।


“यह तुम्हारे बस का नहीं।”

“ज़्यादा मत सोचो।”

“जो है, उसी में खुश रहो।”


धीरे-धीरे

ये वाक्य

सपनों पर भारी पड़ने लगते हैं।


और फिर एक दिन

सपना टूटता है।


नाटकीय ढंग से नहीं,

बल्कि ज़िम्मेदारियों के नीचे दबकर।


कभी पैसों की कमी से,

कभी समय की कमी से,

और कभी

खुद पर से भरोसा कम होने से।


टूटता सपना

सबसे पहले

इंसान की आँखों से चमक छीन लेता है।


वह काम तो करता है,

लेकिन अब उसमें

पहले जैसी उम्मीद नहीं होती।


वह चलता तो है,

लेकिन मंज़िल की तरफ़ नहीं,

बस मजबूरी की दिशा में।


यही सबसे कठिन समय होता है।


जब इंसान

जीना नहीं छोड़ता,

लेकिन जीने का उत्साह

पीछे छूट जाता है।


विरासत वाला इंसान

सपने टूटने पर

दूसरे सपने चुन सकता है।

मेहनत वाला इंसान

सपने टूटने पर

सिर्फ़ रास्ता बदलता है।


क्योंकि रुकना

उसके लिए विकल्प नहीं होता।


वह जानता है—

अगर वह रुक गया,

तो बहुत कुछ

पीछे छूट जाएगा।


इसलिए वह

टूटे सपनों के साथ ही

चलता रहता है।


हर कदम भारी होता है,

लेकिन रुकने से बेहतर।


यह अध्याय

उसी थकी हुई चाल का है।


उस चाल का

जिसमें उत्साह नहीं,

लेकिन ज़िम्मेदारी है।


उस चाल का

जिसमें उम्मीद नहीं,

लेकिन ज़िद है।


और यही ज़िद

उसे गिरने नहीं देती।


रातें अब

सोच में बीतती हैं।


“क्या मैं सही कर रहा हूँ?”

“क्या यही मेरी ज़िंदगी है?”

“क्या कभी हालात बदलेंगे?”


इन सवालों का

कोई जवाब नहीं मिलता।


लेकिन सुबह फिर आती है,

और इंसान फिर उठता है।


क्योंकि उसके लिए

उठना

एक आदत बन चुका है।


यह अध्याय

उस मजबूरी की कहानी नहीं है

जो इंसान को कमज़ोर बनाती है,

बल्कि उस मजबूरी की है

जो उसे लगातार चलने पर

मजबूर करती है।


धीरे-धीरे

टूटे सपनों की जगह

नए, छोटे सपने जन्म लेते हैं।


बड़े नहीं,

लेकिन सच्चे।


आज का दिन ठीक निकल जाए।

आज कोई ताना न मिले।

आज घर में

थोड़ी राहत आ जाए।


और इन्हीं छोटे सपनों के सहारे

वह आगे बढ़ता रहता है।


यह अध्याय

हिम्मत की नहीं,

सहनशीलता की कहानी है।


क्योंकि हर कोई

लड़ सकता है,

लेकिन हर कोई

सह नहीं सकता।


मेहनत वाला इंसान

सहन करना सीख जाता है।


वह टूटता है,

लेकिन बिखरता नहीं।


वह सपने खो देता है,

लेकिन दिशा नहीं।


और कहीं न कहीं

यही लगातार चलना

उसके भीतर

एक नई पहचान गढ़ रहा होता है।


पहचान

जो शोर नहीं करती,

लेकिन गहरी होती है।


यह अध्याय

उस इंसान का है

जो जानता है

कि रास्ता आसान नहीं होगा,

लेकिन फिर भी

चलना ही होगा।


क्योंकि जो लोग

टूटे सपनों के साथ भी

चलते रहते हैं,

एक दिन

वही लोग

अपने पैरों से

नए रास्ते बना देते हैं।


और वही रास्ते

आगे चलकर

उन सपनों को भी जगह देते हैं

जो कभी

टूट गए थे।

_________________________________________________


अध्याय 7 मेहनत की चुप्पी


मेहनत जब शोर नहीं करती,

तब वह सबसे गहरी होती है।

वह ताली नहीं माँगती,

वह पहचान की भीख नहीं माँगती—

वह बस

होती रहती है।


यह अध्याय

उसी चुप्पी का है।


जिस दिन इंसान

यह समझ लेता है

कि उसकी मेहनत को

हर बार सराहना नहीं मिलेगी,

उसी दिन

वह भीतर से बदलने लगता है।


अब वह

दिखावे के लिए नहीं करता,

अब वह

समझाने के लिए नहीं करता—

अब वह

ज़रूरत के लिए करता है।


मेहनत की यह अवस्था

सबसे अकेली होती है।


यहाँ न कोई

प्रेरणादायक शब्द होते हैं,

न कोई

उत्साह बढ़ाने वाली आवाज़।


यहाँ सिर्फ़

काम होता है,

और उसे करने वाला इंसान।


वह सुबह उठता है,

काम पर जाता है,

लौटता है—

और किसी से यह नहीं कहता

कि वह कितना थका हुआ है।


क्योंकि उसे पता है

कि उसकी थकान

किसी की समस्या नहीं है।


मेहनत की चुप्पी

सबसे ज़्यादा तब महसूस होती है

जब इंसान

दूसरों की सफलता का शोर सुनता है।


तालियाँ बजती हैं,

सम्मान दिए जाते हैं,

नाम पुकारे जाते हैं—


और वह

भीड़ में खड़ा होकर

खुद को

और भी चुप पाता है।


वह ईर्ष्या नहीं करता,

लेकिन एक सवाल

ज़रूर उठता है—


“मेरी मेहनत कब बोलेगी?”


लेकिन जवाब

तुरंत नहीं मिलता।


क्योंकि मेहनत

तुरंत नहीं बोलती।


वह समय लेती है।

वह सब्र माँगती है।


और सब्र

सबसे कठिन काम है।


विरासत वाला इंसान

इंतज़ार करना नहीं सीखता,

क्योंकि उसके लिए

चीज़ें समय पर आ जाती हैं।


मेहनत वाला इंसान

इंतज़ार में ही

खुद को गढ़ता है।


वह सीखता है

कि हर दिन

नतीजा ज़रूरी नहीं,

हर दिन

मज़बूत होना ज़रूरी है।


मेहनत की चुप्पी

इंसान को

अंदर से अनुशासित बनाती है।


वह अब

शिकायत कम करता है,

तैयारी ज़्यादा करता है।


वह दूसरों को

गलत साबित करने में नहीं,

खुद को बेहतर बनाने में

ऊर्जा लगाता है।


यह अध्याय

उस दौर की कहानी है

जब इंसान

अपनी कहानी

किसी को सुनाता नहीं,

बस जीता है।


उसकी आँखों में

थकान होती है,

लेकिन उनमें

भागने की इच्छा नहीं होती।


वह जानता है

कि उसका समय

शायद अभी नहीं आया,

लेकिन वह यह भी जानता है

कि समय

खाली नहीं जाता।


हर चुप दिन,

हर अनदेखी रात,

कहीं न कहीं

उसके भीतर

कुछ जोड़ रही होती है।


मेहनत की चुप्पी

धीरे-धीरे

इंसान को

मज़बूत नहीं,

स्थिर बनाती है।


अब वह

हर बात पर नहीं डगमगाता।

हर टिप्पणी पर नहीं टूटता।


वह जान चुका होता है

कि शोर से ज़्यादा

गहराई ज़रूरी है।


और गहराई

चुप्पी में ही आती है।


यह अध्याय

उस भरोसे का है

जो बिना सबूत के

खुद पर रखा जाता है।


वह भरोसा

जो कहता है—


“अगर आज कोई नहीं देख रहा,

तो भी मैं रुकूँगा नहीं।”


क्योंकि मेहनत

कभी बेकार नहीं जाती।

वह बस

दिखने में देर करती है।


और जो लोग

इस चुप्पी को

सहना सीख लेते हैं,

वही लोग

आगे चलकर

सबसे सशक्त आवाज़

बनते हैं।


लेकिन तब भी

वे शोर नहीं करते।


क्योंकि उन्होंने

मेहनत की चुप्पी में

जीना सीख लिया होता है।


और यही चुप्पी

उन्हें

अगले अध्याय के लिए

तैयार करती है—

जहाँ किस्मत भी

उनकी परीक्षा लेने वाली होती है।

_________________________________________________

अध्याय 8 जब किस्मत भी परीक्षा लेती है


इंसान तब तक संघर्ष को

मेहनत की कहानी मानता है,

जब तक किस्मत

बीच में दख़ल नहीं देती।


क्योंकि मेहनत से लड़ा जा सकता है,

लेकिन किस्मत से

सिर्फ़ सहा जा सकता है।


यह अध्याय

उसी सहने की कहानी है।


जब सब कुछ

धीरे-धीरे पटरी पर आता हुआ लगता है,

जब इंसान को लगता है

कि अब शायद उसकी चुप मेहनत

अपना रंग दिखाने वाली है—

तभी किस्मत

एक नया इम्तिहान रख देती है।


ऐसा इम्तिहान

जिसकी कोई तैयारी नहीं होती।


कभी बीमारी बनकर,

कभी परिवार की ज़िम्मेदारी बनकर,

कभी अचानक छूटे हुए अवसर बनकर।


और सबसे ज़्यादा दर्द

तब होता है

जब यह सब

बिना चेतावनी के होता है।


मेहनत वाला इंसान

थक चुका होता है,

लेकिन रुकने की स्थिति में नहीं होता।


और तभी

किस्मत उससे पूछती है—

“अब भी चल पाओगे?”


यह सवाल

ज़ोर से नहीं पूछा जाता,

यह हालात के रूप में सामने आता है।


रातें और लंबी हो जाती हैं।

दिन और भारी।


और इंसान

पहली बार सोचता है—

“क्या मेरी मेहनत काफ़ी नहीं थी?”


यह विचार

सबसे ख़तरनाक होता है।


क्योंकि यह

उम्मीद को हिला देता है।


विरासत वाला इंसान

किस्मत की चोट को

सहारे के साथ झेलता है।

मेहनत वाला इंसान

उसी चोट के साथ

फिर से खड़ा होता है।


क्योंकि उसके पास

और कोई रास्ता नहीं होता।


यह अध्याय

उसी पल का है

जब इंसान

खुद से भी थक जाता है।


वह सवाल करता है—

“मैं ही क्यों?”

“हर बार ही क्यों?”


इन सवालों के

कोई जवाब नहीं होते।


और शायद

इसीलिए

इन्हें सहना पड़ता है।


किस्मत की परीक्षा

इंसान की हिम्मत नहीं,

उसकी सहनशीलता देखती है।


क्या वह

कड़वा हो जाएगा,

या

शांत रहेगा?


क्या वह

सबको दोष देगा,

या

खुद को संभालेगा?


मेहनत वाला इंसान

यहाँ एक और चीज़ सीखता है—

कि हर नुकसान

असफलता नहीं होता।


कभी-कभी

नुकसान

सिर्फ़ विराम होता है।


एक ऐसा विराम

जो यह देखने के लिए होता है

कि इंसान

कितना टिक सकता है।


यह अध्याय

उस मन की कहानी है

जो टूटने की कगार पर

खड़ा होता है,

लेकिन फिर भी

पूरी तरह टूटता नहीं।


क्योंकि उसके भीतर

मेहनत की आदत

गहरी जड़ें जमा चुकी होती है।


वह गिरता है,

लेकिन अब गिरने से

डरता नहीं।


क्योंकि वह जान चुका होता है

कि उठना

उसकी नियति है।


किस्मत की परीक्षा

इंसान को

नम्र बना देती है।


वह अब

जीत का घमंड नहीं करता,

और हार से

भागता नहीं।


वह बस

चलता रहता है।


यह अध्याय

उस स्वीकार का है

कि ज़िंदगी

हमेशा न्यायपूर्ण नहीं होती।


लेकिन यह स्वीकार

हार नहीं है।


यह समझ है।


और यही समझ

इंसान को

और गहरा,

और स्थिर बना देती है।


जब किस्मत भी

परीक्षा लेती है,

तब मेहनत

और भी शांत हो जाती है।


लेकिन उसी शांति में

एक भरोसा पलता है—

कि जो सह गया,

वह आगे भी

चल पाएगा।


और यही भरोसा

उसे

अंतिम मोड़ों के लिए

तैयार करता है,

जहाँ मेहनत और पहचान

आमने-सामने खड़ी होंगी।

_________________________________________________

अध्याय 9 अपने नाम से पहचाने जाने का दिन


कुछ दिन

कैलेंडर पर नहीं लिखे होते,

लेकिन जीवन की रेखाओं में

हमेशा के लिए दर्ज हो जाते हैं।


यह अध्याय

उसी दिन का है।


वह दिन

जब इंसान पहली बार

किसी के नाम के पीछे नहीं,

अपने नाम से जाना जाता है।


यह पहचान

अचानक नहीं मिलती।

यह कोई पुरस्कार नहीं,

कोई मंच नहीं,

कोई तालियों का शोर नहीं होता।


यह पहचान

धीरे-धीरे बनती है—

अनगिनत चुप दिनों के बाद,

अनगिनत अनदेखी रातों के बाद।


मेहनत वाला इंसान

जब पीछे मुड़कर देखता है,

तो उसे खुद पर

थोड़ा आश्चर्य होता है।


“मैं यहाँ तक कैसे आ गया?”


क्योंकि वह कभी

यह सोचकर नहीं चला था

कि उसे पहचान मिलेगी।

वह सिर्फ़

ज़िम्मेदारी निभाने चला था।


और शायद

इसीलिए पहचान

उसे मिलती है।


यह अध्याय

उस आत्मविश्वास का है

जो शोर नहीं करता।


अब उसे

किसी से तुलना नहीं करनी पड़ती।

किसी को साबित नहीं करना पड़ता।


लोग उसके पास आते हैं,

सलाह पूछते हैं,

उसकी राय सुनते हैं।


और वह

चुपचाप सुनता है।


क्योंकि वह जानता है

कि यह सब

एक दिन में नहीं हुआ।


हर ठोकर,

हर अपमान,

हर टूटा सपना—

सबने

इस दिन की नींव रखी है।


अपने नाम से पहचाने जाने का दिन

इंसान को घमंडी नहीं बनाता,

वह उसे

और ज़िम्मेदार बना देता है।


अब उसके शब्दों का

वज़न होता है।

उसके फैसलों का

असर होता है।


और यही एहसास

सबसे भारी होता है।


वह समझता है

कि अब उसकी सफलता

सिर्फ़ उसकी नहीं है।


अब लोग

उससे उम्मीद रखते हैं।


विरासत वाला इंसान

पहचान को

अपना अधिकार मानता है।

मेहनत वाला इंसान

पहचान को

अपनी ज़िम्मेदारी मानता है।


क्योंकि वह जानता है

कि अगर वह गिरा,

तो बहुत से लोग

हतोत्साहित होंगे।


यह अध्याय

उस विनम्रता की कहानी है

जो संघर्ष से आती है।


वह अपने अतीत को

छुपाता नहीं।

वह अपनी जड़ों को

भूलता नहीं।


क्योंकि वही जड़ें

उसे

ज़मीन से जोड़े रखती हैं।


अपने नाम से पहचाने जाने का दिन

उसके लिए

सिर्फ़ गर्व का नहीं,

कृतज्ञता का दिन होता है।


वह उन चेहरों को याद करता है

जिन्होंने साथ दिया,

और उन चेहरों को भी

जिन्होंने साथ नहीं दिया।


क्योंकि दोनों ने

उसे बनाया है।


यह अध्याय

उस संतुलन का है

जहाँ आत्मसम्मान

और विनम्रता

साथ-साथ चलते हैं।


अब उसे

खुद को ऊँचा दिखाने की

ज़रूरत नहीं होती।


क्योंकि उसका नाम

खुद बोलता है।


लेकिन वह जानता है

कि यह मंज़िल नहीं है।


यह सिर्फ़

एक पड़ाव है।


क्योंकि मेहनत

यहाँ आकर

खत्म नहीं होती।


वह और शांत हो जाती है।


यह अध्याय

उस संतोष की कहानी है

जो शोर नहीं करता,

लेकिन भीतर

गहरा सुकून छोड़ जाता है।


अपने नाम से पहचाने जाने का दिन

आता है—

लेकिन सिर्फ़ उनके लिए

जो बिना पहचान के

लंबा सफ़र तय करते हैं।


और वही लोग

अंत में

इस सफ़र की कीमत

सबसे अच्छी तरह समझते हैं।

_________________________________________________

अध्याय 10 दो रास्तों का सच


ज़िंदगी में कई बार

हम रास्तों को अलग-अलग समझते हैं—

एक आसान,

एक कठिन।


लेकिन सफ़र के अंत में

समझ आता है

कि दोनों रास्ते

अपने-अपने सच लेकर चलते हैं।


यह अध्याय

उसी सच का है।


विरासत का रास्ता

बुरा नहीं होता।

वह सुविधा देता है,

सुरक्षा देता है,

गलती की गुंजाइश देता है।


लेकिन वह यह नहीं सिखाता

कि खाली हाथ कैसे जिया जाता है।

वह यह नहीं सिखाता

कि अस्वीकृति का स्वाद कैसा होता है।


मेहनत का रास्ता

कठोर होता है।

वह समय लेता है,

धैर्य माँगता है,

कभी-कभी

इंसान से बहुत कुछ छीन भी लेता है।


लेकिन वही रास्ता

इंसान को

खुद से मिलाता है।


यह अध्याय

उस समझ की कहानी है

जो देर से आती है,

लेकिन टिक जाती है।


मेहनत वाला इंसान

अब किसी से

ईर्ष्या नहीं करता।

वह तुलना नहीं करता।


क्योंकि वह जान चुका है

कि हर किसी का बोझ

अलग होता है।


वह विरासत को

नकारता नहीं,

और मेहनत को

पूजता भी नहीं।


वह दोनों को

सच की तरह देखता है।


क्योंकि उसने

दोनों के बीच

पूरा सफ़र तय किया है।


वह जानता है

कि विरासत ने

किसी को आगे बढ़ाया,

और मेहनत ने

किसी को टिकाया।


और टिकना

सबसे बड़ी जीत है।


यह अध्याय

उस संतुलन का है

जहाँ इंसान

न तो खुद को

पीड़ित मानता है,

न ही

श्रेष्ठ।


वह बस

आभार से भरा होता है।


आभार

हर उस दिन के लिए

जब वह हार नहीं माना।

हर उस पल के लिए

जब वह गिरकर भी

खड़ा हुआ।


दो रास्तों का सच

यह नहीं है

कि कौन बेहतर है।


सच यह है

कि कौन

खुद के लिए

सही है।


कुछ लोग

विरासत को संभालते हैं,

और कुछ लोग

विरासत बनाते हैं।


दोनों ही ज़रूरी हैं।


लेकिन जो लोग

विरासत बनाते हैं,

वे जानते हैं

कि इसकी कीमत क्या होती है।


यह अध्याय

उस आत्मशांति की कहानी है

जो तब आती है

जब इंसान

खुद से लड़ना बंद कर देता है।


वह अब

अपने अतीत से नाराज़ नहीं होता।

वह उसे

अपनी ताक़त मानता है।


वह अपने संघर्ष को

छुपाता नहीं,

और अपनी सफलता को

उछालता नहीं।


क्योंकि वह जान चुका है—

कि असली पहचान

नाम में नहीं,

स्वभाव में होती है।


यह अध्याय

एक अंत नहीं है।


यह एक स्वीकार है।


स्वीकार

कि ज़िंदगी

न तो पूरी तरह

न्यायपूर्ण है,

न ही

पूरी तरह निर्दयी।


यह बस

वास्तविक है।


और इस वास्तविकता में

जो सबसे ज़्यादा मायने रखता है,

वह यह है—


कि इंसान

किस रास्ते पर चला,

यह नहीं।


बल्कि यह कि

चलते हुए

वह कैसा बना।


और अगर वह

थोड़ा और

मानवीय बना,

थोड़ा और

संवेदनशील बना,

थोड़ा और

ईमानदार बना—


तो यही

दो रास्तों का

सबसे बड़ा सच है।


यहीं किताब समाप्त नहीं होती।

यहीं पाठक रुकता है—

और खुद से पूछता है:


मैं किस रास्ते पर हूँ?

_________________________________________________

उन्नति शर्मा, जयपुर राजस्थान

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𝐒𝐦𝐚𝐥𝐥 𝐏𝐚𝐠𝐞𝐬, 𝐁𝐢𝐠 𝐓𝐡𝐨𝐮𝐠𝐡𝐭𝐬.

𝑀𝒶𝓃𝒾 𝐸-𝐵𝑜𝑜𝓀 𝒾𝓈 𝒶𝓃 𝑜𝓃𝓁𝒾𝓃𝑒 𝓅𝓁𝒶𝓉𝒻𝑜𝓇𝓂 𝒻𝑜𝓇 𝓇𝑒𝒶𝒹𝒾𝓃𝑔 𝓈𝒽𝑜𝓇𝓉, 𝓂𝑒𝒶𝓃𝒾𝓃𝓰𝒻𝓊𝓁 𝒷𝑜𝑜𝓀𝓈 𝒾𝓃 𝓉𝑒𝓍𝓉 𝒻𝑜𝓇𝓂. 𝐼𝓉 𝓈𝒽𝒶𝓇𝑒𝓈 𝓈𝒾𝓂𝓅𝓁𝑒 𝓉𝒽𝑜𝓊𝑔𝒽𝓉𝓈, 𝓈𝓉𝑜𝓇𝒾𝑒𝓈, 𝒶𝓃𝒹 𝑒𝓂𝑜𝓉𝒾𝑜𝓃𝓈 𝓌𝓇𝒾𝓉𝓉𝑒𝓃 𝒷𝓎 𝑀𝒶𝓃𝒾𝓈𝒽 𝒞𝒽𝒶𝓊𝒹𝒽𝒶𝓇𝓎 𝒶𝓃𝒹 𝒾𝓃𝒹𝑒𝓅𝑒𝓃𝒹𝑒𝓃𝓉 𝓌𝓇𝒾𝓉𝑒𝓇𝓈. 𝑅𝑒𝒶𝒹 𝑜𝓃𝓁𝓎 𝒾𝒻 𝓎𝑜𝓊 𝒻𝑒𝑒𝓁 𝓁𝒾𝓀𝑒—𝓃𝑜 𝓅𝓇𝑒𝓈𝓈𝓊𝓇𝑒, 𝒿𝓊𝓈𝓉 𝓌𝑜𝓇𝒹𝓈.

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