परिचय
“जंगल की परछाईं” एक ऐसी डरावनी और रोमांचक कहानी है, जो आपको सीधे जंगल की गहराई में ले जाती है। यह कहानी पांच दोस्तों के असली और अदृश्य खतरों के बीच जीवित रहने के संघर्ष को बयाँ करती है।
इस कहानी में फ़ार्महाउस, रात की बरसात, और जंगल की रहस्यमयी ताक़तें मिलकर पाठक को ऐसा अनुभव देती हैं, मानो आप खुद ही उस जंगल में फँस गए हों। यह केवल डर की कहानी नहीं, बल्कि साहस, मित्रता और जीवन की नाज़ुक क़ीमत की कहानी भी है।
यह किताब आपको लगातार रोमांचित रखेगी, हर पन्ना सस्पेंस और थ्रिल से भरा हुआ है, और अंत तक आपको अपने सीट से हिलने नहीं देगी।
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लेखक
यह कहानी विवेक अवस्थी द्वारा रची गई है, जिनकी लेखनी डर और रोमांच को असली और जीवंत अनुभव में बदल देती है। लेखक ने कहानी के हर पात्र, जंगल की रहस्यमयी दुनिया और फ़ार्महाउस के डरावने माहौल को इतनी सजीवता से पेश किया है कि पाठक हर पल खुद को उस कहानी का हिस्सा महसूस करता है।
उनकी लेखनी में न केवल रोमांच और डर है, बल्कि इंसान की भावनाओं, साहस और अस्तित्व की नाज़ुकता को भी गहराई से उभारा गया है।
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अध्याय 1: घूमने की शुरुआत
बरसात का मौसम बिहार में हमेशा से ही बेचैनी लेकर आता है। आसमान में काले बादल ऐसे घिरे रहते हैं मानो सूरज को निगल जाना चाहते हों। उसी शाम पटना के एक पुराने मोहल्ले में पाँच दोस्त एक साथ बैठे थे। कमरे में हँसी, चाय की भाप और बारिश की महक मिली हुई थी। बाहर सड़क पर पानी बह रहा था और बिजली बार-बार चमक रही थी, जैसे अंधेरे को चीरकर कुछ दिखाना चाहती हो।
हिमांशु खिड़की के पास खड़ा होकर बाहर देख रहा था। उसे सफ़र का शौक़ था, खासकर उन जगहों का जहाँ आम लोग जाने से कतराते हैं। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “यार, इस बारिश में कहीं निकल चलें। ज़िंदगी रोज़-रोज़ ऐसी मौक़ा नहीं देती।”
अनुराग ने मोबाइल से नज़र उठाई। वह हमेशा हर चीज़ को तर्क की नज़र से देखता था। “बारिश में? और वो भी रात को? पागल हो गया है क्या?”
महेश हँस पड़ा। उसके चेहरे पर हमेशा बेफ़िक्री रहती थी। “अरे डरपोक, मज़ा तो तभी है। बस यूँ समझ कि ये एक एडवेंचर है।”
योगेश ने चाय का आख़िरी घूँट लिया और धीरे से बोला, “लेकिन रास्ता सही होना चाहिए। जंगल-वंगल नहीं।”
कुणाल अब तक चुप था। उसकी आँखों में अजीब-सी चमक थी। “जंगल ही तो असली मज़ा है,” उसने कहा, “शोर-शराबे से दूर, अंधेरा, सन्नाटा… जहाँ आदमी खुद से मिलता है।”
कमरे में एक पल के लिए ख़ामोशी छा गई। बाहर बिजली कड़की और खिड़की के शीशे काँप उठे। किसी अनकहे डर ने सबके दिल को छू लिया, लेकिन वही डर उन्हें खींच भी रहा था।
कुछ ही देर में फ़ैसला हो गया। पाँचों दोस्त कार से निकलेंगे। मंज़िल तय नहीं थी, बस सड़क जहाँ ले जाए। रात गहराती जा रही थी, लेकिन उनके भीतर उत्साह बढ़ता जा रहा था। जैकेट पहनी गईं, बैग में कुछ ज़रूरी सामान डाला गया और कार की चाबी घूम गई।
जैसे ही कार सड़क पर आई, बारिश और तेज़ हो गई। वाइपर की आवाज़ लगातार चल रही थी—छप-छप, छप-छप। सड़क पर पानी जमा था और स्ट्रीट लाइट्स धुँधली दिख रही थीं। शहर पीछे छूटता जा रहा था और रास्ता सुनसान होता जा रहा था।
हिमांशु ड्राइव कर रहा था। रेडियो पर पुराना गाना बज रहा था, लेकिन बारिश की आवाज़ में वो भी दब जाता था। अनुराग रास्ता देख रहा था, महेश और योगेश पीछे की सीट पर मज़ाक कर रहे थे, और कुणाल खिड़की से बाहर अंधेरे को घूर रहा था।
“देखो, ये रास्ता तो शहर से काफ़ी दूर निकल गया,” अनुराग ने कहा।
हिमांशु ने कंधे उचका दिए। “कोई बात नहीं, आगे से घूम लेंगे।”
लेकिन आगे सड़क और भी सँकरी हो गई। दोनों तरफ़ ऊँचे-ऊँचे पेड़ खड़े थे, जिनकी डालियाँ हवा में हिलकर अजीब परछाइयाँ बना रही थीं। बारिश की बूंदें पत्तों से टकराकर ऐसे गिर रही थीं मानो कोई धीरे-धीरे ताली बजा रहा हो।
महेश ने मज़ाक में कहा, “यार, ये जगह तो किसी हॉरर फ़िल्म जैसी लग रही है।”
योगेश हँसने की कोशिश करते हुए बोला, “बस अभी कोई चुड़ैल मत निकल आना।”
कुणाल ने बिना देखे कहा, “जंगल में सब कुछ होता है। बस हम देखते नहीं।”
उसकी आवाज़ में अजीब गंभीरता थी। पीछे बैठे दोनों दोस्त चुप हो गए। कार आगे बढ़ती रही, लेकिन अचानक एक ज़ोरदार झटका लगा और इंजन की आवाज़ लड़खड़ा गई। हिमांशु ने ब्रेक लगाया। कार कुछ मीटर घिसटती हुई रुक गई।
“क्या हुआ?” अनुराग ने घबराकर पूछा।
हिमांशु ने चाबी घुमाई, लेकिन इंजन ने साथ नहीं दिया। बाहर बारिश और तेज़ हो गई थी। चारों तरफ़ सिर्फ़ पेड़, अंधेरा और बारिश।
योगेश ने खिड़की से झाँका। “यहाँ तो कोई बस्ती भी नहीं दिख रही।”
कुणाल ने धीरे से कहा, “लगता है हम जंगल में फँस गए हैं।”
उसके शब्द हवा में घुलते ही किसी अनदेखे साये ने जैसे सबको घेर लिया। दूर कहीं बिजली चमकी और उसकी रोशनी में कुछ पल के लिए पेड़ों के बीच एक पुरानी-सी इमारत की झलक दिखी।
“वो देखो,” महेश ने उँगली से इशारा किया, “शायद कोई फ़ार्महाउस है।”
उम्मीद की एक हल्की-सी किरण सबके भीतर जगी। बारिश में भीगते हुए वे कार से उतरे। मिट्टी की गंध तेज़ थी और हर क़दम पर कीचड़ छपक रहा था। जैसे-जैसे वे उस इमारत के पास पहुँचे, हवा ठंडी और भारी होती गई।
फ़ार्महाउस पुराना था, दीवारों पर काई जमी थी और खिड़कियाँ अँधेरे में डूबी थीं। तभी जंगल के भीतर कहीं एक पीली रोशनी हिलती दिखाई दी। पहले तो लगा जैसे कोई जुगनू हो, लेकिन वो रोशनी धीरे-धीरे पास आती जा रही थी।
और तभी उन्होंने उसे देखा।
एक बूढ़ी अम्मा, झुकी हुई, हाथ में एक पुराना लैंप लिए, बारिश में भीगी हुई। उसका चेहरा आधे अंधेरे में छिपा था, लेकिन आँखें साफ़ दिख रही थीं—बिलकुल स्थिर, जैसे सीधे उनकी आत्मा को देख रही हों।
उस पल किसी ने कुछ नहीं कहा। सिर्फ़ बारिश गिरती रही… और जंगल ने जैसे अपनी साँस रोक ली।
यहीं से उनकी ज़िंदगी का असली सफ़र शुरू हुआ—एक ऐसा सफ़र, जिससे लौटना किसी के नसीब में नहीं था।
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अध्याय 2: अनजान जंगल का रास्ता
बूढ़ी अम्मा को देखते ही पाँचों दोस्तों के शरीर में जैसे जान ही अटक गई। बारिश उसके चारों ओर गिर रही थी, लेकिन लैंप की लौ अजीब तरह से स्थिर थी, न हिल रही थी, न बुझ रही थी। वह धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ रही थी। हर क़दम के साथ उसके पैरों से कीचड़ की हल्की-सी आवाज़ आती, जैसे ज़मीन भी उसके बोझ को सहन नहीं कर पा रही हो।
“नमस्ते अम्मा…” हिमांशु ने हिम्मत जुटाकर कहा।
अम्मा रुकी। उसने सिर थोड़ा ऊपर उठाया। उसका चेहरा पूरी तरह दिखाई नहीं दिया, लेकिन उसकी आँखें—वे आँखें—असहज रूप से चमक रही थीं। कुछ पल तक वह बस उन्हें देखती रही, फिर बेहद भारी आवाज़ में बोली, “रात में जंगल अच्छा नहीं होता बेटा।”
उसकी आवाज़ में न डर था, न अपनापन। बस एक अजीब-सी चेतावनी।
अनुराग ने जल्दी से कहा, “हमारी कार ख़राब हो गई है। क्या पास में कोई मदद मिल सकती है?”
अम्मा ने लैंप घुमाकर जंगल की ओर देखा। घने पेड़ों के बीच अंधेरा और गहरा लग रहा था। “मदद…” उसने शब्द को जैसे चबाया, “मदद तो मिलेगी, पर कीमत देकर।”
महेश ने घबराहट छुपाते हुए हँसने की कोशिश की। “अम्मा, अभी बस छत मिल जाए, बारिश बहुत तेज़ है।”
अम्मा ने फ़ार्महाउस की ओर इशारा किया। “वहीं रहो। सुबह रास्ता दिखेगा।”
इतना कहकर वह मुड़ी और उसी दिशा में चलने लगी जहाँ से आई थी। लैंप की रोशनी धीरे-धीरे अंधेरे में घुलती चली गई, जैसे कभी थी ही नहीं।
कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला। बारिश, हवा और पेड़ों की सरसराहट—बस यही आवाज़ें थीं।
“यार, ये अम्मा… कुछ ठीक नहीं लगी,” योगेश ने धीमे से कहा।
कुणाल अब भी उसी दिशा को देख रहा था। “जंगल में रहने वाले लोग ऐसे ही होते हैं,” उसने कहा, लेकिन उसकी आवाज़ में खुद भरोसा नहीं था।
वे फ़ार्महाउस के अंदर चले गए। अंदर की हवा बासी थी, जैसे सालों से किसी ने खिड़कियाँ नहीं खोली हों। दीवारों पर अजीब-सी नमी थी और फर्श पर मिट्टी जमी हुई थी। एक कोने में पुरानी लकड़ी की सीढ़ियाँ ऊपर जाती दिखीं।
तभी ऊपर से किसी के चलने की आवाज़ आई।
सब चौंक गए।
“यहाँ और कौन है?” अनुराग ने पूछा।
जवाब में सीढ़ियों से एक औरत नीचे उतरी। वह सफ़ेद साड़ी पहने थी, जो ज़रूरत से ज़्यादा उजली लग रही थी। उसके बाल खुले हुए थे और चेहरे पर एक ठंडी मुस्कान थी। उसकी आँखें बिना पलक झपकाए सबको देख रही थीं।
“मैं बहू हूँ,” उसने कहा, “अम्मा की।”
उसकी आवाज़ में अजीब-सी खनक थी, जैसे काँच आपस में टकरा रहे हों।
हिमांशु ने सिर हिलाया। “हम बस सुबह तक यहाँ रुकना चाहते हैं।”
वह औरत मुस्कुराई। “जंगल में सुबह सबके लिए नहीं आती।”
उस वाक्य ने कमरे की हवा और भारी कर दी। महेश ने मज़ाक में बात पलटने की कोशिश की, “अरे भाभी, आप डराने में माहिर हो।”
वह हँसी। उसकी हँसी में कोई गर्माहट नहीं थी। “डर तो यहाँ खुद चलकर आता है।”
रात और गहरी होती गई। बाहर बारिश अब भी थमने का नाम नहीं ले रही थी। पाँचों दोस्त एक कमरे में बैठे थे, लेकिन किसी को नींद नहीं आ रही थी। हर थोड़ी देर में लगता जैसे बाहर कोई चल रहा हो, या खिड़की के पास कोई खड़ा है।
हिमांशु ने उठकर दरवाज़ा खोला। बाहर सिर्फ़ अंधेरा था। तभी दूर जंगल के भीतर वही पीली रोशनी फिर से दिखी—लैंप।
“वो अम्मा…” उसने फुसफुसाकर कहा।
लैंप की रोशनी धीरे-धीरे पेड़ों के बीच घूम रही थी, जैसे कोई जानबूझकर चक्कर काट रहा हो। कभी वह दिखती, कभी गायब हो जाती।
कुणाल ने कहा, “वो हमें देख रही है।”
“नहीं यार,” अनुराग बोला, “तू ज़्यादा सोच रहा है।”
लेकिन तभी किसी ने उनके नाम पुकारा।
“हिमांशु…”
आवाज़ बहुत दूर से आई थी, लेकिन साफ़ थी। सबके रोंगटे खड़े हो गए।
“अनुराग…”
फिर एक-एक करके सभी के नाम।
यह आवाज़ किसी औरत की थी—बूढ़ी, खुरदुरी, और बेहद धीमी।
महेश उठ खड़ा हुआ। “मैं बाहर देखता हूँ।”
योगेश ने उसका हाथ पकड़ लिया। “मत जा।”
लेकिन महेश खुद को छुड़ाकर बाहर निकल गया। बारिश में उसकी परछाईं कुछ ही सेकंड में अंधेरे में घुल गई।
कुछ पल बीते। फिर एक तेज़ चीख़।
इतनी तेज़ कि जंगल भी सन्न रह गया।
हिमांशु बाहर दौड़ा, लेकिन वहाँ सिर्फ़ कीचड़, बारिश और टूटे पत्ते थे। महेश कहीं नहीं था। बस ज़मीन पर कुछ घसीटने के निशान थे, जो सीधे जंगल की ओर जाते थे।
पीछे से बहू की आवाज़ आई, “जंगल ने उसे चुन लिया।”
उसकी मुस्कान अब और चौड़ी थी।
चारों दोस्तों की साँसें तेज़ हो चुकी थीं। डर अब मज़ाक नहीं रहा था। यह सिर्फ़ शुरुआत थी—और जंगल ने अपना पहला शिकार कर लिया था।
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अध्याय 3: बारिश में पहला ख़ून
महेश के ग़ायब होते ही समय जैसे थम गया। बारिश अब भी लगातार गिर रही थी, लेकिन किसी को उसकी आवाज़ सुनाई नहीं दे रही थी। हिमांशु की नज़र ज़मीन पर पड़े उन घसीटने के निशानों पर जमी थी, जो कीचड़ में साफ़ दिख रहे थे और जंगल के भीतर जाकर गुम हो रहे थे। वे निशान किसी इंसान के नहीं लगते थे—बहुत गहरे, बहुत बेढंगे, जैसे किसी ने शरीर को ज़मीन पर रगड़ते हुए खींचा हो।
“ये… ये मज़ाक नहीं है,” अनुराग की आवाज़ काँप रही थी।
योगेश ने चारों तरफ़ देखा। पेड़ों के बीच अंधेरा इतना घना था कि लगता था जैसे वो हिल रहा हो। “महेश ज़िंदा नहीं हो सकता… कोई इंसान ऐसे निशान नहीं छोड़ता।”
पीछे खड़ी सफ़ेद साड़ी वाली बहू ने धीरे से कहा, “जंगल भूखा था।”
चारों एक साथ उसकी ओर मुड़े। उसकी आँखों में अब कोई इंसानी भाव नहीं था। चेहरे पर वही ठंडी मुस्कान, लेकिन होंठों के किनारों पर कुछ गीला-सा चमक रहा था, जो बारिश का पानी नहीं था।
हिमांशु ने ग़ुस्से और डर के बीच चिल्लाकर कहा, “तुम लोग कौन हो? महेश कहाँ है?”
बहू ने सिर टेढ़ा किया। “जो यहाँ आता है, वही यहीं का हो जाता है।”
अचानक फ़ार्महाउस के अंदर से ज़ोर से दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई। एक पल के लिए सब सन्न रह गए। ऊपर से लकड़ी की सीढ़ियों पर किसी के चलने की धीमी-धीमी आवाज़ आने लगी—खर्र… खर्र…
“अम्मा…” कुणाल के मुँह से अपने-आप निकल गया।
और तभी बारिश के शोर को चीरती हुई वही आवाज़ आई—
“आ जाओ बेटा… भीग जाओगे…”
वह आवाज़ एक साथ हर दिशा से आ रही थी।
हिमांशु ने अनुराग और योगेश को पकड़कर फ़ार्महाउस के अंदर धकेल दिया और दरवाज़ा बंद कर दिया। अंदर अंधेरा था। सिर्फ़ खिड़की के पास से बिजली चमकने पर पलभर के लिए कमरा दिख जाता था—टूटी कुर्सियाँ, दीवारों पर काले धब्बे और छत से लटकती जाले।
“हमें यहाँ से निकलना होगा,” अनुराग ने कहा, “अभी।”
कुणाल चुपचाप खड़ा था। उसकी आँखें कोने में टिक गईं। “वो देखो…”
कोने में ज़मीन पर कुछ पड़ा था। हिमांशु ने मोबाइल की टॉर्च जलाई। रोशनी पड़ते ही तीनों की साँस अटक गई।
वहाँ महेश की जैकेट पड़ी थी—फटी हुई, कीचड़ और खून से सनी हुई। पास ही ज़मीन पर गहरे खरोंच के निशान थे, जैसे किसी ने नाखूनों से पत्थर को चीरने की कोशिश की हो।
योगेश की आँखों से आँसू निकल आए। “वो… वो मर गया है…”
उसी पल ऊपर से ज़ोरदार धमक की आवाज़ आई, जैसे कोई भारी चीज़ फर्श पर गिराई गई हो। धूल झड़ने लगी। छत के लकड़ी के तख़्त चरमराने लगे।
“भागो!” हिमांशु चिल्लाया।
चारों दूसरे कमरे की ओर दौड़े। लेकिन जैसे ही उन्होंने दरवाज़ा खोला, सामने का नज़ारा और भी डरावना था। बरामदे में पानी भरा था और उसी पानी में नंगे पाँव कोई खड़ा था।
बूढ़ी अम्मा।
उसका चेहरा अब साफ़ दिख रहा था—झुर्रियों के बीच धँसी आँखें, मुँह आधा खुला और दाँत अस्वाभाविक रूप से लंबे। हाथ में वही लैंप था, लेकिन अब उसकी रोशनी पीली नहीं, लाल लग रही थी।
“एक चला गया…” अम्मा ने कहा, “अब बारी किसकी है?”
उसने लैंप ज़मीन पर पटका। उसी पल लैंप बुझ गया और पूरा फ़ार्महाउस अंधेरे में डूब गया।
अंधेरे में चीख़ गूँजी।
यह चीख़ महेश की नहीं थी।
यह अभी ज़िंदा इंसान की थी।
बारिश और जंगल ने मिलकर उस आवाज़ को निगल लिया—और रात ने अपना अगला खेल शुरू कर दिया।
अध्याय 4: जंगल के बीच फ़ार्महाउस
अंधेरा इतना गाढ़ा था कि साँस लेना मुश्किल लग रहा था। लैंप के बुझते ही जैसे पूरा फ़ार्महाउस किसी जीवित चीज़ में बदल गया हो—दीवारें सिमट रही थीं, छत झुकती महसूस हो रही थी, और हवा में सड़ांध की बदबू भर गई थी। बाहर बारिश अब भी गिर रही थी, लेकिन अंदर हर बूंद किसी क़दम की तरह सुनाई दे रही थी।
हिमांशु ने मोबाइल की टॉर्च जलाने की कोशिश की। स्क्रीन चमकी, फिर अपने-आप बंद हो गई। अनुराग का फ़ोन भी काम नहीं कर रहा था। जैसे किसी ने जानबूझकर सब कुछ छीन लिया हो।
“ये जगह… ये जगह हमें जाने नहीं देगी,” योगेश बुदबुदाया।
अंधेरे में किसी के नाखून दीवार पर रगड़ने की आवाज़ आई—किर्र… किर्र…
चारों के दिल एक साथ धड़क उठे।
“कौन है?” हिमांशु चिल्लाया।
जवाब में ऊपर से हँसी आई—सूखी, टूटी हुई, बूढ़ी हँसी। फिर वही भारी आवाज़, “घर में शोर नहीं करते, बेटा।”
सीढ़ियों पर किसी के उतरने की आवाज़ आई। हर क़दम के साथ लकड़ी चरमराती, जैसे दर्द से कराह रही हो। सफ़ेद साड़ी वाली बहू अंधेरे से बाहर निकली। इस बार उसकी साड़ी पर बारिश नहीं थी, लेकिन उस पर गहरे काले धब्बे थे, जो हिलते हुए लग रहे थे।
“कमरे बदलते रहो,” उसने कहा, “घर पसंद करता है जब मेहमान भटकते हैं।”
अनुराग का ग़ुस्सा फूट पड़ा। “बकवास बंद करो! हमें बाहर जाना है!”
बहू मुस्कुराई। उसकी गर्दन एक अजीब कोण पर मुड़ गई। “बाहर?” उसने धीरे से कहा, “बाहर तो जंगल है… और जंगल को तुम पहले ही दे दिए गए हो।”
अचानक ज़ोर की हवा चली और खिड़कियाँ अपने-आप बंद हो गईं। बाहर का अंधेरा शीशों से चिपक गया, जैसे अंदर घुसने की कोशिश कर रहा हो। योगेश ने पीछे हटते हुए एक कमरे का दरवाज़ा खोला और भीतर घुस गया। बाकी तीन भी उसके पीछे भागे।
कमरा छोटा था। बीच में एक पुराना पलंग, जिसकी चादर गीली और दाग़दार थी। दीवार पर टँगी एक तस्वीर पर हिमांशु की नज़र अटक गई। तस्वीर में वही फ़ार्महाउस था—लेकिन उसके सामने पाँच नहीं, चार लोग खड़े थे। उनके चेहरे धुँधले थे, लेकिन कपड़े बिल्कुल वही थे जो उन्होंने पहन रखे थे।
“ये… ये हम हैं,” अनुराग की आवाज़ काँप गई।
कुणाल ने तस्वीर को ध्यान से देखा। “नहीं,” उसने कहा, “ये वो हैं… जो हम बनने वाले हैं।”
तभी पलंग के नीचे से किसी के साँस लेने की आवाज़ आई—भारी, टूटी हुई। योगेश पीछे हटते हुए पलंग से टकरा गया। उसी पल पलंग के नीचे से एक हाथ बाहर निकला—लंबी उँगलियाँ, काले नाखून, और चमड़ी सड़ी हुई।
योगेश चीखा और भागने की कोशिश की, लेकिन हाथ ने उसके टखने को पकड़ लिया। हिमांशु और अनुराग ने उसे खींचने की कोशिश की, लेकिन वह हाथ असाधारण रूप से मज़बूत था।
“छोड़ो उसे,” अंधेरे से अम्मा की आवाज़ आई, “वो घर का हो गया है।”
एक झटके में योगेश पलंग के नीचे खिंच गया। उसकी चीख़ कमरे की दीवारों से टकराई और अचानक ख़ामोश हो गई। पलंग के नीचे से खून की पतली धार बाहर निकली और फर्श पर फैलने लगी।
हिमांशु और अनुराग जड़ होकर खड़े रह गए। कुणाल की आँखें सूखी थीं, लेकिन उसका चेहरा स्याह पड़ चुका था।
“अब तीन,” बहू ने कहा, जो दरवाज़े पर खड़ी थी। उसकी मुस्कान अब इंसानी नहीं रही थी।
उसी पल फ़ार्महाउस के अंदर कहीं घंटी बजने की आवाज़ आई—टं… टं…
जैसे किसी ने अगले शिकार की घोषणा कर दी हो।
और जंगल, बारिश के बीच, चुपचाप मुस्कुरा रहा था।
योगेश की चीख़ ख़ामोशी में बदल चुकी थी, लेकिन उसकी गूँज अब भी फ़ार्महाउस की दीवारों में अटकी हुई लग रही थी। फर्श पर फैला खून धीरे-धीरे बारिश के पानी में मिलकर काला पड़ रहा था। हिमांशु और अनुराग पत्थर की तरह खड़े थे—न बोल पा रहे थे, न हिल पा रहे थे। कुणाल की नज़र अब भी पलंग के नीचे जमी थी, जैसे वहाँ से कुछ और निकलने वाला हो।
“यहाँ से निकलो,” कुणाल ने फुसफुसाकर कहा, “अभी।”
तीनों दबे क़दमों से कमरे से बाहर निकले। बरामदा पहले से ज़्यादा लंबा लग रहा था, जैसे हर क़दम के साथ फ़ार्महाउस फैलता जा रहा हो। दूर कहीं बूढ़ी अम्मा के लैंप की रोशनी फिर दिखी—पीली, काँपती हुई, लेकिन अजीब तरह से बुलाती हुई।
“उधर मत जाओ,” अनुराग ने कहा।
लेकिन रोशनी जैसे उनके सामने रास्ता बनाती चली गई। दीवारों पर परछाइयाँ चलने लगीं—कभी किसी औरत की, कभी किसी झुके हुए बूढ़े की, और कभी ऐसे आकार जिनका कोई नाम नहीं था।
सीढ़ियों के नीचे पहुँचते ही अम्मा सामने आ खड़ी हुई। इस बार उसका चेहरा पूरी तरह दिखाई दे रहा था। उसकी आँखें अब खाली गड्ढों जैसी थीं, जिनमें लैंप की रोशनी तैर रही थी। होंठ हिलते हुए बोले, “घर को खून चाहिए था… मिल रहा है।”
हिमांशु ने काँपती आवाज़ में पूछा, “क्यों? हमने क्या बिगाड़ा है?”
अम्मा हँसी। उसकी हँसी में बारिश भी डर गई। “तुम लोग रास्ता भूल गए थे,” उसने कहा, “और जो जंगल में रास्ता भूलता है, वो रास्ता बन जाता है।”
उसने लैंप ज़मीन पर रखा। रोशनी दीवार पर पड़ी और वहाँ कुछ उभरने लगा—पुरानी आकृतियाँ, चेहरे, नाम। अनुराग ने ध्यान से देखा तो उसका दिल बैठ गया। दीवार पर खून से लिखा था—महेश, योगेश… और खाली जगहें, जैसे आगे के नामों का इंतज़ार हो।
“ये सब पहले भी हुआ है,” कुणाल बुदबुदाया, “ये जगह लोगों को खाती है।”
अचानक ऊपर से सफ़ेद साड़ी वाली बहू दिखाई दी। इस बार उसका चेहरा आधा सड़ा हुआ था, और आँखों से काला पानी टपक रहा था। उसने धीरे से कहा, “अब बारी बाँटनी होगी।”
बरामदे की फ़र्श अचानक धँस गई। हिमांशु किसी तरह किनारे पकड़कर बच गया, लेकिन अनुराग का पैर फिसल गया। उसने हिमांशु का हाथ पकड़ने की कोशिश की, मगर बहू ने उसके बाल पकड़ लिए।
“छोड़ दो उसे!” हिमांशु चिल्लाया।
बहू मुस्कुराई और अनुराग को अंधेरे गड्ढे में धकेल दिया। उसकी चीख़ नीचे जाती हुई धीरे-धीरे टूट गई, जैसे किसी ने हवा को काट दिया हो। गड्ढे से कुछ सेकंड बाद भारी साँसों और हड्डियों के टूटने की आवाज़ आई… फिर ख़ामोशी।
अब सिर्फ़ दो बचे थे—हिमांशु और कुणाल।
अम्मा ने लैंप उठाया और उनके पास आई। “रात अभी बाक़ी है,” उसने कहा, “और जंगल अधूरा खाना नहीं छोड़ता।”
लैंप की रोशनी में फ़ार्महाउस की दीवारें लाल होने लगीं, जैसे घर ज़िंदा हो और धड़क रहा हो। बाहर बारिश थमने लगी थी, लेकिन अंदर मौत की आहट और तेज़ हो गई थी।
यहाँ से बचना अब सपना नहीं, नामुमकिन लगता था—और जंगल अपने अगले शिकार की साँसें गिन रहा था।
अनुराग के गिरते ही फ़ार्महाउस के भीतर कुछ बदल गया। दीवारों की धड़कन तेज़ हो गई, जैसे किसी का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा हो। हवा भारी थी, साँस लेने पर सीने में चुभन होती थी। हिमांशु और कुणाल एक-दूसरे को देख रहे थे—दोनों की आँखों में वही सवाल था: अब कौन?
लैंप की रोशनी अचानक बुझी और फिर अपने-आप जल उठी। इस बार रोशनी सफ़ेद थी—बर्फ़ जैसी ठंडी। उसी रोशनी में बहू की परछाईं दीवार पर फैली। उसकी परछाईं उसकी देह से अलग हिल रही थी, जैसे उसे अपना अलग जीवन मिल गया हो।
“वो… वो दीवार पर क्यों—” हिमांशु का वाक्य अधूरा रह गया।
परछाईं दीवार से उतरकर फ़र्श पर फैलने लगी। सफ़ेद साड़ी की सरसराहट पास आती गई। बहू सामने खड़ी थी, लेकिन उसकी आँखें अब चेहरे पर नहीं थीं—वे परछाईं के भीतर थीं।
“घर ने तय कर लिया है,” बहू बोली, “एक रहेगा… एक जाएगा।”
कुणाल ने पीछे हटते हुए दरवाज़ा खोला। बाहर बरामदा नहीं, जंगल दिखा—घना, बहुत पास, जैसे फ़ार्महाउस उसके भीतर धँस गया हो। बारिश फिर शुरू हो चुकी थी। हर बूंद सुई की तरह चुभ रही थी।
अचानक फ़र्श पर सफ़ेद साड़ी फैल गई—जैसे ज़िंदा कपड़ा। उसने हिमांशु के पैरों को जकड़ लिया। हिमांशु गिर पड़ा। उसने खुद को छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन कपड़ा कसता गया, ठंडा और गीला।
“भाग!” हिमांशु चिल्लाया।
कुणाल झिझका। उसकी आँखों में डर और अपराध एक साथ उभरे। उसी पल दीवार से परछाईं उछली और कुणाल के पीछे जा लगी। उसकी गर्दन पर ठंडी उँगलियाँ पड़ीं।
“मत देखो पीछे,” बहू की आवाज़ गूँजी।
कुणाल ने आँखें बंद कर लीं और पूरी ताक़त से आगे दौड़ा। उसके पीछे सफ़ेद साड़ी की हँसी फैलती गई। वह जंगल में घुस गया—काँटों ने उसकी त्वचा चीरी, शाखाओं ने चेहरा खरोंचा, लेकिन वह रुका नहीं।
पीछे फ़ार्महाउस से एक तेज़ चीख़ उठी—हिमांशु की। चीख़ एक झटके में टूट गई, जैसे किसी ने हवा काट दी हो। जंगल एक पल के लिए सन्न हुआ, फिर पत्तों की सरसराहट में सब दब गया।
कुणाल गिर पड़ा। कीचड़ में उसका चेहरा धँस गया। उसने साँसें गिनी—एक… दो… तीन…
पीछे कोई नहीं था।
लेकिन तभी उसकी कलाई पर ठंडक महसूस हुई। सफ़ेद साड़ी का एक सिरा उसकी कलाई से लिपटा हुआ था। वह झटके से उठा। साड़ी पीछे की ओर खिंच गई—जंगल के भीतर।
“खेल ख़त्म नहीं हुआ,” अम्मा की आवाज़ हवा में तैर गई, “बस मोड़ बदला है।”
कुणाल हाँफता हुआ खड़ा रहा। बारिश उसके आँसुओं को छुपा रही थी। अब वह अकेला था—और जंगल को यह बात पसंद आई थी।
जंगल अब पहले जैसा नहीं था। पेड़ पास आ गए थे, या शायद कुणाल छोटा हो गया था। हर दिशा एक जैसी लग रही थी—अंधेरा, कीचड़ और सड़ांध। बारिश की बूंदें अब पानी नहीं, जैसे किसी ठंडी उँगली की तरह उसकी गर्दन पर गिर रही थीं। वह भाग रहा था, लेकिन ज़मीन उसके पैरों को पकड़ रही थी।
उसके कानों में अब भी हिमांशु की टूटी हुई चीख़ गूँज रही थी। उसने कान ढँक लिए, लेकिन आवाज़ भीतर से आ रही थी।
“कुणाल…”
वह ठिठक गया।
यह आवाज़ सामने से नहीं आई थी।
यह उसके ठीक पीछे से आई थी।
वह धीरे-धीरे मुड़ा। वहाँ कोई नहीं था। सिर्फ़ पेड़, लटकती बेलें और अंधेरा। लेकिन अगली ही पल उसके कंधे पर किसी का हाथ पड़ा—हड्डी जैसा ठंडा।
“भागने से क्या मिलेगा?” अम्मा की फुसफुसाहट कान के पास गिरी।
कुणाल चीख़ता हुआ आगे दौड़ा। उसकी साँसें टूट रही थीं। फेफड़े जल रहे थे। तभी वह एक खुले से हिस्से में पहुँचा—जंगल के बीच एक छोटा-सा मैदान। बीचों-बीच वही पुराना कुआँ था, पत्थरों से बना, मुँह खुला हुआ।
कुएँ के पास सफ़ेद साड़ी वाली बहू खड़ी थी।
बारिश उसके आर-पार गिर रही थी, लेकिन वह भीगी नहीं थी। उसका चेहरा अब पूरी तरह सड़ा हुआ था। होंठ फटे हुए, दाँत बाहर निकले हुए। उसकी आँखें ग़ायब थीं—उनकी जगह काला गड्ढा था।
“यहाँ हर कोई कुछ छोड़कर जाता है,” उसने कहा, “तुम क्या छोड़ोगे?”
कुणाल पीछे हटा। उसका पैर फिसला और वह कुएँ के किनारे गिर पड़ा। नीचे से ठंडी हवा आई—और उसके साथ फुसफुसाहटें। सैकड़ों आवाज़ें। अलग-अलग उम्र, अलग-अलग दर्द।
उसने नीचे झाँका।
अंधेरे में चेहरे थे।
महेश।
योगेश।
अनुराग।
हिमांशु।
सब ऊपर देख रहे थे। सब मुस्कुरा रहे थे।
“आ जा,” वे एक साथ बोले।
कुणाल ने आँखें बंद कर लीं। “नहीं… नहीं…”
अचानक किसी ने उसे पीछे से धक्का दिया। वह आगे गिरा, लेकिन आख़िरी पल में उसने एक जड़ पकड़ ली। उसकी उँगलियाँ फट गईं, खून बहने लगा। नीचे से हाथ ऊपर आने लगे—काले, सड़े हुए हाथ।
तभी दूर कहीं मुर्गे की आवाज़ आई।
बहुत धीमी… लेकिन असली।
सफ़ेद साड़ी वाली बहू पीछे हट गई। उसके चेहरे पर पहली बार गुस्सा दिखा। “सुबह…” वह फुफकार उठी।
अम्मा की आवाज़ गूँजी, “अभी नहीं।”
हाथ वापस नीचे चले गए। कुणाल ज़मीन पर गिर पड़ा, बेहोश होने की कगार पर। बारिश थमने लगी थी। अंधेरे में हल्की-सी रोशनी फैल रही थी—सुबह की नहीं, बस रात का टूटना।
जंगल ने उसे छोड़ा नहीं था।
बस अगली चाल की तैयारी कर रहा था।
कुणाल की आँखें धीरे-धीरे खुलीं। सिर भारी था, जैसे किसी ने भीतर पत्थर भर दिए हों। चारों ओर अजीब-सी ख़ामोशी थी। न बारिश की आवाज़, न हवा की सरसराहट। जंगल पहली बार शांत लग रहा था—बहुत ज़्यादा शांत।
आसमान हल्का-हल्का नीला हो चुका था। सुबह हो रही थी।
वह हड़बड़ाकर उठ बैठा। शरीर पर जगह-जगह खरोंचें थीं, कपड़े कीचड़ और खून से सने हुए थे। लेकिन वह ज़िंदा था।
“मैं बच गया…” उसके मुँह से अनायास निकल पड़ा।
जंगल अब डरावना कम और थका हुआ ज़्यादा लग रहा था। पेड़ वैसे ही खड़े थे, जैसे रात को थे, लेकिन उनकी परछाइयाँ अब इंसान जैसी नहीं लग रही थीं। कुणाल लड़खड़ाते क़दमों से आगे बढ़ा। हर क़दम के साथ उसे लगता था कोई पीछे है, लेकिन जब मुड़कर देखता—कुछ नहीं।
थोड़ी दूर चलते ही उसे सड़क दिखी।
पक्की सड़क।
उसकी आँखों में आँसू आ गए। वह लगभग दौड़ता हुआ आगे बढ़ा। और तभी—
कार।
वही उनकी कार, सड़क के किनारे खड़ी थी। दरवाज़े बंद थे, शीशों पर रात की नमी जमी हुई थी, लेकिन कार सही-सलामत थी। ऐसा लग रहा था जैसे रात में कुछ हुआ ही नहीं।
“ये सपना था… सब सपना था,” वह बुदबुदाया।
उसने काँपते हाथों से ड्राइवर साइड का दरवाज़ा खोला। सीट पर बैठते ही उसे अंदर एक अजीब ठंडक महसूस हुई, जैसे कार रात भर धूप में नहीं, किसी कब्र में खड़ी रही हो। उसने चाबी निकाली और इंजन स्टार्ट करने की कोशिश की।
पहली बार में कार स्टार्ट नहीं हुई।
उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई।
दूसरी बार चाबी घुमाई। इंजन खाँसकर चल पड़ा। रेडियो अपने-आप ऑन हो गया। उसमें हल्की-सी खरखराहट थी और फिर एक टूटी-फूटी आवाज़ उभरी—
“घर से कोई खाली नहीं जाता…”
कुणाल ने झटके से रेडियो बंद कर दिया। साँसें तेज़ हो गईं। उसने शीशे से बाहर देखा। सड़क सीधी थी। आगे खुला रास्ता था। कोई जंगल नहीं, कोई फ़ार्महाउस नहीं।
राहत का एहसास हुआ।
तभी उसे लगा—
कार के भीतर कोई और भी है।
पीछे की सीट से बहुत हल्की-सी साँस लेने की आवाज़ आ रही थी।
उसने रियर-व्यू मिरर में देखा।
पीछली सीट खाली थी।
“बस वहम है,” उसने खुद को समझाया। उसने गियर डाला और कार आगे बढ़ा दी। जैसे ही कार चली, पीछे की सीट से किसी के बैठने का हल्का दबाव महसूस हुआ—जैसे स्प्रिंग्स नीचे धँस गए हों।
कुणाल का गला सूख गया।
धीरे… बहुत धीरे… उसने गर्दन मोड़ी।
और उसी पल उसकी आँखें फैल गईं।
सफ़ेद साड़ी का एक सिरा पीछे की सीट पर पड़ा था—गीला, मिट्टी से सना हुआ।
कार के भीतर ठंड अचानक बढ़ गई। हवा में वही सड़ांध थी।
और कहीं पास से बूढ़ी हँसी उभरी।
“रास्ता मिल गया बेटा…”
“अब मंज़िल भी मिलेगी।”
कुणाल ने चीख़ना चाहा, लेकिन आवाज़ गले में अटक गई।
सुबह की रोशनी अचानक बहुत बेकार लगने लगी।
कुणाल की साँसें तेज़ और टूटती हुई थीं। कार की गति बढ़ी, लेकिन दिल की धड़कन उससे भी तेज़ थी। सड़क आगे खुली और सुनसान थी। पत्तों की सरसराहट अब भी उसके कानों में गूँज रही थी, लेकिन बाहर जंगल का डर शायद कुछ कम हुआ था।
लेकिन कार के भीतर… वही डर अब ज़्यादा था।
पीछे की सीट पर सफ़ेद साड़ी की परछाईं स्थिर नहीं थी। वह हल्की-हल्की हिल रही थी, जैसे कोई जकड़ा हुआ छाया। कुणाल ने अपने हाथ पीछे घुमाकर उसे धक्का देने की कोशिश की, लेकिन उसके हाथ केवल हवा में ठोकर खा रहे थे।
“क्यों… क्यों अभी तक नहीं छोड़ रही?” कुणाल ने खुद से कहा, उसकी आवाज़ कांप रही थी।
तभी सामने से तेज़ हवाओं की आवाज़ आई। कार झटका खाई, गियर फिसला और कुणाल ने साइड ब्रेक लगाते हुए कार को किनारे रोक दिया। बाहर देखा—सड़क खाली थी, सूरज हल्का-हल्का निकल रहा था, लेकिन हर तरफ़ अभी भी धुंध और नमी का साया था।
वह पल में समझ गया—ये कोई सपना नहीं था। वो सब सच था। हिमांशु, अनुराग, महेश, योगेश—सब… खत्म हो चुके थे।
कुणाल ने अपनी आँखें बंद की। उसने सोचा कि अगर वह भागा भी, तो भी पीछे वही अम्मा और बहू खड़ी होंगी।
तभी पीछे की सीट से हल्की-सी हँसी गूँजी।
“तुम अकेले बचे हो…” बहू की आवाज़ इतनी ठंडी थी कि कुणाल का गला सूख गया।
वह जल्दी से कार से बाहर कूदने की कोशिश करने लगा। पर जैसे ही दरवाज़ा खोला, बारिश और कीचड़ ने उसके पैरों को पकड़ लिया। वह फिसल पड़ा। हवा में एक तेज़ ठंडक, उसके पूरे शरीर में फैल गई।
सफ़ेद साड़ी वाली परछाईं उसके ऊपर झपटी। कुणाल ने आख़िरी बार चीख़ने की कोशिश की।
उसकी आँखों के सामने अंधेरा और लाल रोशनी का मिश्रण फैल गया।
फिर सब ख़ामोश हो गया।
जंगल के बीच, फ़ार्महाउस अब शांत था। बारिश थम गई थी, लेकिन ज़मीन पर जो निशान बचे थे, वे बता रहे थे—यह जगह कोई गलती नहीं छोड़ती।
और जंगल, अम्मा और उसकी बहू की हँसी अब दूर तक गूँज रही थी।
कुणाल का नाम अब केवल हवाओं में ही रह गया था।
कुणाल की आँखें धुंधली हो चुकी थीं। शरीर थक चुका था, लेकिन दिमाग़ पूरी तरह काम कर रहा था। जंगल की अंधेरी रात, फ़ार्महाउस की मौत और दोस्तों की चीख़—सब उसके सामने लगातार घूम रहे थे। उसने तय किया कि अब या तो वह बच जाएगा, या वहीं ख़त्म हो जाएगा।
कार में बैठते ही उसने गियर डाला और धीरे-धीरे सड़क पर बढ़ा। शरीर कांप रहा था, लेकिन दिमाग़ पूरी तरह सतर्क था। उसने लगातार पीछे की सीट की ओर झाँका, पर कोई नहीं दिखा। “बस अब निकल गया… मैं जिंदा हूँ,” उसने खुद को समझाया।
लेकिन तभी, जैसे ही उसने पीछे मुड़कर देखा, उसके दिल की धड़कन एकदम रुक गई।
पीछली सीट पर वही बूढ़ी अम्मा बैठी थी। हाथ में लैंप नहीं था, लेकिन उसकी आँखें लाल, सड़ी हुई, और हड्डियों जैसी उजली झिल्ली में झूल रही थीं। सफ़ेद साड़ी की परछाईं उसके चारों ओर फैल रही थी।
“मुझे ढूँढ रहे थे, कुणाल…” अम्मा की आवाज़ फुसफुसाई।
कुणाल चीख़ने की कोशिश कर रहा था, लेकिन आवाज़ गले में अटक गई। उसने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की—लेकिन कार लॉक थी। हाथ पसीने से भीगे थे, पैर कांप रहे थे।
अम्मा ने झुककर उसके कंधे को छुआ। ठंड इतनी तेज़ थी कि कुणाल की हड्डियाँ भी जम गईं।
“अब… कोई भाग नहीं सकता,” उसने धीरे से कहा।
कार अचानक खुद-ब-खुद धीमी हो गई। इंजन की आवाज़ घबरा गई, रेडियो में फिर वही टूटी आवाज़ गूँजी—“रास्ता कोई नहीं छोड़ता।”
कुणाल की आँखों के सामने वही जंगल, वही फ़ार्महाउस, वही बारिश, और उसके दोस्त—सब एक साथ उभर आए। उनके चेहरे मुस्कुरा रहे थे, लेकिन आँखों में कोई ज़िंदगी नहीं थी।
अम्मा ने एक कदम आगे बढ़ाया और कुणाल की गर्दन की ओर झुकी। सफ़ेद साड़ी उसके शरीर के चारों ओर फैल गई।
कुणाल ने आख़िरी बार अपने हाथ फैलाए—कहीं कोई मदद नहीं। जंगल ने अपना शिकार पूरा कर लिया था।
और फिर, रात ने अपने परछाई का आख़िरी हमला किया।
सड़क पर कार अब धीरे-धीरे खड़ी रही, भीतर केवल अंधेरा और एक ठंडी, मृत मुस्कान।
कहानी यहीं खत्म हो गई।
जंगल, फ़ार्महाउस, अम्मा और उसकी बहू—सब अभी भी वहाँ थे।
और अब कोई भी इस जंगल से सुरक्षित नहीं निकल सकता।
