
परिचय
हर घर की अपनी कहानियाँ होती हैं।
कुछ कहानियाँ सुनने में सामान्य लगती हैं, और कुछ…
वे आपको रूह काँपाने पर मजबूर कर देती हैं।
“खामोश दीवारें” उस मकान की कहानी है, जहाँ एक निर्दयी अपराध ने अपनी जड़ें जमाई थीं। यह कहानी है धर्मेंद्र सिंह नामक मकान मालिक और उसके किरायेदार रुपेश यादव की भयावह मुठभेड़ की।
एक साधारण विवाद—किराए के पैसे को लेकर—एक ऐसे अपराध में बदल गया, जिसने न केवल इंसानी जिंदगी को बदल दिया बल्कि मकान को भी अपनी भयानक पकड़ में ले लिया।
यह कहानी भोपाल, मध्य प्रदेश के विजय नगर कॉलोनी की है, जहाँ एक घर के भीतर घटित घटनाओं ने सामान्य जीवन को डरावनी वास्तविकता में बदल दिया।
घर के भीतर की दीवारें अब सिर्फ़ दीवारें नहीं रहीं; वे गवाह बन गईं, वे जीवित हो गईं, और उन्होंने अपराधियों को उनकी क़ीमत चुकाने के लिए इंतज़ार शुरू कर दिया।
इस किताब में आप पढ़ेंगे—
- किस तरह एक निर्दयी अपराध ने मकान की आत्मा को जागृत किया।
- किस तरह दीवारें, फर्श और खामोशी इंसानों पर हावी हो सकती हैं।
- और अंत में, कैसे न्याय अपने अजीब और डरावने तरीके से हासिल होता है।
तैयार हो जाइए उस डर से सामना करने के लिए,
जो सिर्फ़ सुनाई नहीं देता—
बल्कि महसूस किया जाता है।
खामोश दीवारें…
और अंदर छुपा भय।
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लेखक
विकास दुबे ने हमेशा से रहस्य और डरावनी कहानियों को अपनी लेखनी में जीवंत किया है।
उनकी कहानियाँ केवल डर पैदा नहीं करतीं—वे पाठकों को उस दुनिया में ले जाती हैं, जहाँ हर कोना, हर दीवार, और हर आवाज़ जीवित हो उठती है।
“खामोश दीवारें – विजय नगर कॉलोनी की एक सच्ची डरावनी कहानी” उनकी उन कृतियों में से एक है, जो वास्तविक घटनाओं और गहरी मानवीय भावनाओं को मिलाकर एक डरावना अनुभव बनाती है।
विकास दुबे का उद्देश्य है—पाठकों को केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि उन्हें उस डर और रहस्य की दुनिया का सामना कराना, जो हमारी ही रोज़मर्रा की ज़िंदगी के भीतर छिपा होता है।
वे अक्सर भोपाल और अन्य शहरों में रहस्यमय और भयावह घटनाओं पर शोध करते हैं, और अपनी लेखनी के माध्यम से उन अनुभवों को पाठकों तक पहुँचाते हैं।
विशेषता:
- डरावनी और रहस्यमय कहानियाँ
- वास्तविक घटनाओं पर आधारित रोमांचक कथाएँ
- पाठक को कहानी के अंदर ले जाने की अनोखी शैली
विकास दूबे की कहानियों में डर सिर्फ़ दृश्य नहीं है—
यह महसूस किया जाता है,
यह जीवित होता है,
और कभी-कभी, यह आपके अपने घर की दीवारों में भी गूँजता है।
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अध्याय 1
विजय नगर कॉलोनी का वो मकान
विजय नगर कॉलोनी दिन में किसी और जगह जैसी ही लगती थी—चौड़ी सड़कें, कतार में लगे पेड़, शाम ढलते ही जलने वाली पीली स्ट्रीट लाइटें और दूर से आती मंदिर की घंटियों की ध्वनि। लेकिन रात के साथ ही इस कॉलोनी का चेहरा बदल जाता था। जैसे ही अंधेरा गहराता, हवा में एक अजीब-सी ठंडक उतर आती, और उस ठंडक के साथ कोई अनकही बेचैनी भी। लोग इसे थकान या वहम कहकर टाल देते, पर जो देर रात तक जागता, वह जानता था कि यहाँ कुछ है—कुछ ऐसा जो दिखाई नहीं देता, पर महसूस ज़रूर होता है।
इसी कॉलोनी के आख़िरी मोड़ पर एक पुराना दो-मंज़िला मकान था। बाहर से देखने पर वह मकान किसी भी आम मकान जैसा ही लगता—हल्का पीला रंग, लोहे की बालकनी, नीचे छोटी-सी बरामदा और सामने एक सूखा-सा गुलमोहर का पेड़। पर इस साधारण दिखने वाले मकान के भीतर एक ऐसी खामोशी थी जो कानों को नहीं, सीधे आत्मा को सुनाई देती थी। जैसे दीवारें कुछ छुपा रही हों। जैसे फर्श के नीचे कोई रहस्य दबा हो। जैसे छत के कोनों में अंधेरा साँस लेता हो।
उस मकान का नाम कोई नहीं लेता था। लोग उसे बस “वो घर” कहकर टाल देते। बच्चे उस रास्ते से साइकिल दौड़ाते हुए तेज़ी से निकल जाते, और बड़े-बुज़ुर्ग शाम होते ही उस मोड़ से पहले ही मुड़ जाते। किसी ने कभी खुलकर नहीं कहा कि क्यों, लेकिन सबके भीतर एक ही डर था—उस घर से आती खामोशी।
कभी इस मकान में धर्मेंद्र सिंह रहा करता था। एक पढ़ा-लिखा, चालाक और अपने फायदे को सबसे ऊपर रखने वाला आदमी। उसकी आँखों में हमेशा एक अजीब चमक रहती थी—ऐसी चमक जिसमें भरोसे से ज़्यादा हिसाब-किताब झलकता था। उसने यह मकान अपनी मेहनत से नहीं, बल्कि चालाकियों से खड़ा किया था। किरायेदार बदलते रहते, लेकिन उसकी आदत नहीं बदली—हर कुछ महीनों में किराया बढ़ा देना, बहाने गढ़ना, और ज़रा-सी देर हुई तो ताने कसना।
पड़ोसी अक्सर कहते, “धर्मेंद्र जी का दिमाग़ बहुत तेज़ है,” लेकिन उस तेज़ दिमाग़ में इंसानियत की जगह नहीं थी। उसके लिए हर रिश्ता एक सौदा था। किरायेदार भी बस एक जरिया।
कुछ साल पहले उसी मकान में रूपेश यादव अपने परिवार के साथ रहने आया था। शांत स्वभाव का, कम बोलने वाला और अपने काम से काम रखने वाला आदमी। उसकी पत्नी लवली घर-गृहस्थी में डूबी रहती, और उसकी दो बेटियाँ—पूजा और प्राप्ति—घर के आँगन में हँसती-खेलती थीं। शुरू-शुरू में सब ठीक था। किराया तय हुआ, समय पर दिया जाने लगा। लेकिन जैसे ही कुछ महीने बीते, धर्मेंद्र सिंह का असली चेहरा सामने आने लगा।
किराया बढ़ा। फिर थोड़ा और। फिर और। हर बार कोई नया कारण—मरम्मत, टैक्स, बाज़ार की महँगाई। रूपेश विरोध करता, पर उसकी आवाज़ में वो धार नहीं थी जो धर्मेंद्र की ज़िद को काट सके। बात-बात पर तकरार होने लगी। दीवारें उनकी आवाज़ें सुनने लगीं। रात के सन्नाटे में बहस की गूँज, बंद दरवाज़ों के पीछे दबे गुस्से की सांसें।
वो मकान सब देख रहा था। सब सुन रहा था।
एक शाम, जब हवा कुछ ज़्यादा ही भारी थी, रूपेश और धर्मेंद्र के बीच बहस इतनी बढ़ी कि पूरा घर काँप उठा। शब्द ज़हर बन गए। नज़रें खंजर। उस रात कुछ टूटा—शायद भरोसा, शायद डर की आख़िरी दीवार। किसी ने नहीं देखा, लेकिन उस रात के बाद विजय नगर कॉलोनी की हवा बदल गई।
कहा जाता है कि कुछ दिनों बाद धर्मेंद्र सिंह अचानक गायब हो गया। न कोई सूचना, न कोई विदाई। रूपेश ने लोगों से कहा कि मकान मालिक अपने गाँव चले गए हैं। बात साधारण लगती, अगर उस घर से रात के वक़्त आती अजीब आवाज़ें न होतीं। कभी फर्श पर कुछ घसीटने की, कभी किसी के धीमे रोने की, कभी बालकनी के लोहे से टकराती हवा की—जो हवा नहीं लगती थी।
लोगों को शक हुआ, लेकिन शक की उम्र छोटी होती है, अगर सबूत न हों। पुलिस आई, पूछताछ हुई, लेकिन कुछ नहीं मिला। मकान फिर से शांत हो गया। बहुत ज़्यादा शांत।
रूपेश का परिवार उसी मकान में रहने लगा। बाहर से सब सामान्य दिखता—सुबह स्कूल जाती बच्चियाँ, शाम को जलता चूल्हा, टीवी की आवाज़। लेकिन रात के साथ ही घर का रंग बदल जाता। दीवारें ठंडी पड़ जातीं। कमरों में अजीब-सी गंध भर जाती—मिट्टी और सीलन की मिली-जुली गंध, जैसे कहीं कुछ दफ़न हो।
पहली बार पूजा ने देखा था। आधी रात को उठकर पानी पीने गई तो उसे लगा जैसे किसी ने उसका नाम लिया हो। धीमी, टूटी हुई आवाज़—इतनी पास, जैसे कोई कान के ठीक पीछे खड़ा हो। उसने मुड़कर देखा, लेकिन वहाँ कोई नहीं था। बस अंधेरा। और अंधेरे के बीच एक ठंडक, जो उसके पैरों से होते हुए रीढ़ तक चढ़ गई।
उस रात के बाद घर ने बच्चों से खेलना शुरू किया।
कभी दरवाज़े अपने आप बंद हो जाते। कभी आईने में किसी और का अक्स दिखता—एक धुँधला चेहरा, टूटी हुई आँखें, और होंठों पर जमी खामोशी। लवली ने इसे बच्चों का डर समझकर टाल दिया, लेकिन जब उसने खुद रसोई में खड़े-खड़े अपने पीछे किसी की परछाईं देखी, तो उसका दिल बैठ गया।
मकान बोल नहीं रहा था। वह इंतज़ार कर रहा था।
हर रात कुछ और पास आता गया। जैसे कोई कदम-दर-कदम घर के भीतर घूम रहा हो। जैसे दीवारों के भीतर से कोई देख रहा हो। रूपेश को भी अब नींद नहीं आती थी। उसे लगता, कोई उसे घूर रहा है। बालकनी की तरफ़ देखते ही उसकी धड़कन तेज़ हो जाती, जैसे वहाँ खड़ा अंधेरा उसे पहचानता हो।
उस मकान में खामोशी नहीं थी—वहाँ दबा हुआ शोर था। एक ऐसा शोर जो सुनाई नहीं देता, पर दिमाग़ को चीर देता है।
और उस शोर के बीच, विजय नगर कॉलोनी का वो मकान अपने अतीत को याद कर रहा था।
खून।
दफ़न सच।
और बदले की भूख।
यह सिर्फ़ शुरुआत थी।
अध्याय 2
मकान मालिक और किरायेदार के बीच की खामोशी
विजय नगर कॉलोनी का वह मकान दिन के उजाले में भी अजीब लगता था, लेकिन रात के अंधेरे में उसकी खामोशी और गहरी हो जाती। यह खामोशी साधारण नहीं थी—यह बोलती नहीं थी, पर सुनती सब कुछ थी। दीवारें, फर्श, छत—सब जैसे जीवित हों और हर सांस, हर कदम, हर दबे हुए डर को अपने भीतर समेटे हुए हों।
धर्मेंद्र सिंह और रूपेश यादव के बीच का रिश्ता शुरू से ही अजीब था। बाहर से देखने पर वह बस मकान मालिक और किरायेदार का सामान्य रिश्ता लगता, लेकिन भीतर ही भीतर उसमें तनाव की महीन दरारें थीं। धर्मेंद्र के शब्द मीठे होते, पर उसकी आँखें हमेशा कुछ और ही कहतीं—हिसाब, फायदा और नियंत्रण। रूपेश यह सब समझता था, लेकिन अपनी मजबूरी के कारण चुप रहता था। यही चुप्पी धीरे-धीरे एक भारी खामोशी में बदलने लगी।
शुरुआती दिनों में धर्मेंद्र अक्सर बिना बताए घर आ जाता। कभी पानी की टंकी देखने के बहाने, कभी बिजली के मीटर के नाम पर। वह हर कमरे को ऐसे देखता, जैसे कुछ तलाश रहा हो। उसकी निगाहें दीवारों पर ठहरतीं, फर्श को नापतीं और बालकनी में खड़े होकर नीचे झाँकतीं। रूपेश को यह सब असहज करता, लेकिन वह कुछ कह नहीं पाता।
लवली को भी यह अच्छा नहीं लगता था। उसे लगता था जैसे कोई उनके घर में घुसकर उनकी निजी ज़िंदगी को टटोल रहा हो। कई बार उसने रूपेश से कहा कि वे कोई और घर देख लें, लेकिन रूपेश हर बार एक ही जवाब देता—“थोड़ा सब्र कर लो, अभी कहीं और जाना मुश्किल है।”
धीरे-धीरे धर्मेंद्र का लहजा बदलने लगा। अब वह बात कम और आदेश ज़्यादा देने लगा था। किराए की बात आते ही उसकी आवाज़ में सख़्ती आ जाती। हर महीने वह किसी न किसी बहाने से पैसे बढ़ाने की कोशिश करता। कभी कहता, “घर की कीमत बढ़ गई है,” तो कभी बोलता, “आस-पास के मकानों का किराया देखो।” रूपेश विरोध करता, पर उसकी आवाज़ दब जाती। और जब आवाज़ दबती है, तो गुस्सा भीतर जमा होने लगता है।
उस घर की दीवारें यह सब सुन रही थीं। हर बहस, हर ताना, हर अपमान। जैसे-जैसे शब्द तीखे होते गए, दीवारों में दरारें बढ़ती चली गईं—दिखाई देने वाली नहीं, महसूस होने वाली।
रात के समय हालात और भी डरावने हो जाते। जब पूरा घर सो जाता, तब भी मकान जागता रहता। कभी-कभी ऐसा लगता जैसे किसी कमरे से धीमी फुसफुसाहट आ रही हो। रूपेश को लगता कि शायद वह सपना देख रहा है, लेकिन जब वही आवाज़ अगली रात भी सुनाई देती, तो उसका दिल तेज़ धड़कने लगता।
धर्मेंद्र और रूपेश के बीच अब सीधी बातचीत कम हो गई थी। ज़्यादातर बातें दरवाज़ों के पीछे, अधूरे वाक्यों में और घूरती नज़रों से होती थीं। दोनों के बीच एक ऐसी खामोशी खड़ी हो गई थी, जिसमें न समझौता था और न ही शांति। यह खामोशी किसी तूफ़ान से पहले की शांति जैसी थी—भारी, बेचैन और खतरनाक।
एक शाम धर्मेंद्र अचानक बिना घंटी बजाए घर में घुस आया। उसकी आँखें लाल थीं और चेहरे पर अजीब-सी कठोरता थी। उसने बिना बैठे ही किराए की बात छेड़ दी। रूपेश का धैर्य टूटने लगा। शब्द तेज़ हुए, आवाज़ें ऊँची हुईं। पूजा और प्राप्ति अपने कमरे में सिमट गईं। लवली का चेहरा पीला पड़ गया।
उस दिन पहली बार रूपेश की आँखों में नफ़रत साफ़ दिखाई दी। और धर्मेंद्र ने उसे देख लिया।
उस पल कमरे में एक अजीब-सी ठंडक फैल गई। जैसे हवा अचानक रुक गई हो। दीवारों पर टंगी घड़ी की टिक-टिक बहुत तेज़ लगने लगी। दोनों कुछ सेकंड तक एक-दूसरे को देखते रहे—बिना बोले। उस खामोशी में बहुत कुछ कहा जा चुका था।
धर्मेंद्र बिना कुछ बोले मुड़ा और चला गया। लेकिन जाते-जाते उसने जो नज़र डाली, वह किसी चेतावनी से कम नहीं थी।
उस रात रूपेश सो नहीं पाया। उसे लगता रहा जैसे कोई उसे देख रहा है। छत की ओर देखते हुए उसे लगा कि छाया हिल रही है। दीवारें जैसे पास आती जा रही हों। वह समझ नहीं पाया कि यह डर है या उसके भीतर पनपता गुस्सा।
वह मकान सब महसूस कर रहा था।
खामोशी गहरी हो चुकी थी।
और इस खामोशी में कुछ बहुत भयानक जन्म लेने वाला था।
यह खामोशी अब शब्दों से नहीं टूटने वाली थी।
अध्याय 3
किराए की बढ़ती रकम और बढ़ता ज़हर
विजय नगर कॉलोनी का वह मकान अब सिर्फ़ ईंट और सीमेंट का ढाँचा नहीं रहा था। वह एक ऐसा पात्र बन चुका था, जो हर दिन बदलते रिश्तों को चुपचाप देख रहा था। सुबह की रोशनी में भी उसकी दीवारें फीकी लगतीं, जैसे उनमें से रंग नहीं, उम्मीदें उतरती जा रही हों। और इन्हीं दीवारों के भीतर किराए की बढ़ती रकम के साथ-साथ एक और चीज़ बढ़ रही थी—ज़हर।
धर्मेंद्र सिंह के लिए किराया सिर्फ़ पैसा नहीं था; वह शक्ति थी। नियंत्रण का एक तरीका। हर महीने की पहली तारीख़ उसके लिए किसी त्योहार से कम नहीं होती थी। वह समय से पहले ही पहुँच जाता—कभी मुस्कान के साथ, कभी सख़्त चेहरे के साथ। उसकी आवाज़ में हमेशा एक ताना छुपा रहता, जैसे वह पहले से जानता हो कि सामने वाला असहाय है।
“इस महीने से किराया थोड़ा बढ़ाना पड़ेगा,” वह ऐसे कहता, जैसे यह कोई साधारण बात हो।
“क्यों?” रूपेश पूछता।
“घर की हालत देख रहे हो… महँगाई बढ़ गई है… आस-पास सब जगह ज़्यादा है।”
हर बार नए शब्द, नया बहाना। लेकिन बात एक ही—और पैसे दो।
रूपेश के भीतर कुछ टूटता जाता था। वह दिन-रात मेहनत करता, फिर भी घर चलाना मुश्किल हो रहा था। बच्चों की फीस, राशन, बिजली का बिल—और अब बढ़ता किराया। वह लवली से कुछ नहीं कहता था, लेकिन उसकी चुप्पी में थकान और गुस्सा साफ़ झलकता था।
लवली सब समझती थी। वह रात को जब बच्चों को सुलाती, तो अक्सर दीवारों को घूरते हुए सोचती—क्या यह घर कभी अपना हो सकता है? लेकिन जवाब हर बार उसी खामोशी में डूब जाता।
धर्मेंद्र को यह सब दिखता था। और शायद यही उसे और मज़ा देता था। वह जानता था कि सामने वाला कमज़ोर है। और कमज़ोरी उसे पसंद थी। कई बार वह जानबूझकर बच्चों के सामने किराए की बात छेड़ देता, जैसे उन्हें भी एहसास दिलाना चाहता हो कि यह घर उनका नहीं है।
एक दिन उसने हद पार कर दी।
शाम का वक़्त था। बाहर हल्की हवा चल रही थी, लेकिन घर के भीतर भारीपन था। धर्मेंद्र बिना सूचना के आया। उसने सीधे बैठक में बैठते हुए कहा, “अगले महीने से किराया दुगना।”
दुगना।
शब्द हवा में तैरता रहा। रूपेश को लगा जैसे किसी ने उसके सीने पर पत्थर रख दिया हो। उसने विरोध किया। आवाज़ काँपी, लेकिन शब्द साफ़ थे। “यह मुमकिन नहीं है।”
धर्मेंद्र हँसा। वह हँसी ठंडी थी—बिल्कुल उस मकान की दीवारों जैसी। “तो फिर घर खाली कर दो।”
उस पल कमरे में कुछ बदल गया। जैसे हवा अचानक गाढ़ी हो गई हो। पूजा और प्राप्ति अपने कमरे से झाँक रही थीं। लवली का चेहरा सख़्त हो गया। रूपेश की आँखों में पहली बार डर से ज़्यादा कुछ और था—गुस्सा, अपमान और नफ़रत का मिला-जुला रंग।
वह कुछ बोला नहीं। बस धर्मेंद्र को देखता रहा। और उस देखने में जो चुप्पी थी, वह किसी चीख से ज़्यादा तेज़ थी।
धर्मेंद्र उठकर चला गया। लेकिन उसके जाते ही घर की दीवारों में अजीब-सी सरसराहट हुई। जैसे किसी ने धीरे से साँस छोड़ी हो। जैसे मकान ने भी वह बात सुन ली हो।
उस रात रूपेश को नींद नहीं आई। वह बार-बार बालकनी की ओर गया। नीचे अंधेरा था—घना, गहरा, बिना तारे का। उसे लगा जैसे वह अंधेरा उसे बुला रहा हो। या शायद वह खुद अपने भीतर किसी अंधेरे को सुन रहा था।
किराए की बढ़ती रकम अब सिर्फ़ आर्थिक बोझ नहीं रही थी। वह एक मानसिक यातना बन चुकी थी। हर दिन, हर रात। रूपेश के भीतर जमा ज़हर अब शब्दों से बाहर निकलने को बेचैन था।
और विजय नगर कॉलोनी का वह मकान—
वह चुप था।
लेकिन उसकी खामोशी में एक मुस्कान छुपी थी।
अध्याय 4
एक रात, एक बालकनी और एक चीख
उस रात हवा में कुछ अलग था।
विजय नगर कॉलोनी की सड़कें जल्दी खाली हो गई थीं, जैसे लोगों ने अनजाने में ही अपने कदम पीछे खींच लिए हों। स्ट्रीट लाइटें जल तो रही थीं, लेकिन उनका उजाला ज़मीन तक ठीक से पहुँच नहीं पा रहा था। अंधेरा मोटा और भारी था—ऐसा अंधेरा जो रोशनी को निगल जाता है।
उस मकान की दूसरी मंज़िल पर रूपेश बालकनी में खड़ा था। नीचे देखते हुए। बहुत देर से। उसकी आँखें अंधेरे में कुछ ढूँढ रही थीं—या शायद कुछ से भाग रही थीं। उसके कानों में धर्मेंद्र की आवाज़ गूँज रही थी—“घर खाली कर दो।”
पीछे कमरे में लवली बच्चों को सुला चुकी थी। पूजा और प्राप्ति की साँसें नियमित थीं, मासूम और बेख़बर। रूपेश ने उन्हें देखा, फिर बालकनी की ओर लौट आया। उसके भीतर एक उथल-पुथल चल रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे उसका दिमाग़ किसी और के हाथ में हो।
उसी समय नीचे से कदमों की आवाज़ आई।
रूपेश चौंका। उसने झुककर देखा। धर्मेंद्र सिंह खड़ा था—अकेला। ऊपर की ओर देखता हुआ। उसके चेहरे पर वही पुरानी ठंडी मुस्कान थी। जैसे उसे पता हो कि आज की रात कुछ अलग है।
“नींद नहीं आ रही?” धर्मेंद्र ने ऊपर से आवाज़ लगाई।
रूपेश ने जवाब नहीं दिया।
धर्मेंद्र सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। हर कदम के साथ सीढ़ियाँ चरमराईं। वह आवाज़ पूरे घर में गूँजती चली गई। दीवारें जैसे सिमटने लगीं। हवा रुक गई।
दरवाज़ा खुला।
धर्मेंद्र बिना इजाज़त अंदर आ गया। उसकी आँखें घर के हर कोने को ऐसे देख रही थीं, जैसे आख़िरी बार नाप रहा हो। वह सीधे बालकनी की ओर बढ़ा, जहाँ रूपेश खड़ा था।
“मैंने कहा था न, या तो किराया दो या घर खाली करो,” उसने धीमी आवाज़ में कहा। आवाज़ में कोई गुस्सा नहीं था—सिर्फ़ यक़ीन था।
रूपेश मुड़ा। पहली बार उसने धर्मेंद्र की आँखों में आँखें डालकर देखा। उस पल उसके भीतर सालों से दबा हुआ हर अपमान, हर डर, हर मजबूरी एक साथ उभर आई।
“आपको इंसान समझा था,” रूपेश बोला। उसकी आवाज़ काँप रही थी, लेकिन वह रुका नहीं।
“इंसान?” धर्मेंद्र हँसा। “इंसान वही होता है जो हालात को कंट्रोल करे।”
बालकनी में हवा अचानक तेज़ हो गई। परदे फड़फड़ाने लगे। नीचे का अंधेरा और गहरा लगने लगा।
धर्मेंद्र एक कदम और आगे बढ़ा।
बस वही एक कदम।
अगले पल सब कुछ बहुत तेज़ी से हुआ—या शायद बहुत धीरे।
रूपेश के कानों में एक तेज़ आवाज़ गूँजी।
उसके हाथ अपने आप आगे बढ़े।
धर्मेंद्र का संतुलन बिगड़ा।
एक पल के लिए दोनों की आँखें मिलीं।
उस नज़र में हैरानी थी।
और फिर—डर।
धर्मेंद्र का शरीर पीछे की ओर झुका।
बालकनी की रेलिंग ठंडी थी।
और नीचे—अंधेरा।
एक चीख निकली।
चीख ऐसी थी जो पूरी कॉलोनी को जगा सकती थी, लेकिन उस रात वह चीख जैसे हवा में घुट गई। मकान ने उसे अपने भीतर खींच लिया। दीवारों ने उसे निगल लिया।
धर्मेंद्र नीचे गिरा।
बहुत नीचे।
कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा। फिर दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज़ आई। रूपेश बालकनी में जड़ होकर खड़ा रहा। उसके हाथ काँप रहे थे। साँस तेज़ थी। दिमाग़ सुन्न।
नीचे देखने की हिम्मत उसने देर तक नहीं की।
पीछे से लवली की आवाज़ आई—“कौन है?”
रूपेश जैसे किसी गहरे पानी से बाहर आया। उसने जल्दी से बालकनी का दरवाज़ा बंद किया। आवाज़ नहीं निकली। जैसे मकान खुद चाहता हो कि यह राज़ भीतर ही रहे।
“कुछ नहीं,” वह बोला। “हवा थी।”
लेकिन हवा इतनी तेज़ नहीं होती कि इंसान को निगल जाए।
उस रात विजय नगर कॉलोनी सो गई।
लेकिन वह मकान जागता रहा।
बालकनी खामोश थी।
नीचे अंधेरा था।
और उस अंधेरे में कुछ टूट चुका था—हमेशा के लिए।
अध्याय 5
अँधेरे में दफ़न सच
रात अपने सबसे गहरे रंग में उतर चुकी थी।
विजय नगर कॉलोनी के उस मकान में रोशनी बुझ चुकी थी, लेकिन भीतर एक बेचैन जागरण शुरू हो गया था। बालकनी का दरवाज़ा बंद था, पर बाहर का अंधेरा अब भी भीतर रिस रहा था—दीवारों की दरारों से, फर्श की ठंडक से, और रूपेश की धड़कनों के बीच की खाली जगह से।
नीचे से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी।
यह सबसे डरावनी बात थी।
रूपेश देर तक वहीं खड़ा रहा, जैसे उसका शरीर उसी जगह जड़ हो गया हो। उसके कान हर छोटी-सी आहट को पकड़ने की कोशिश कर रहे थे—कदमों की, कराह की, किसी के उठ खड़े होने की। लेकिन अंधेरा चुप था। बहुत ज़्यादा चुप।
लवली ने फिर पूछा, “कौन था?”
रूपेश ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वह सवाल नहीं था जो शब्दों में था—वहाँ डर था। ऐसा डर जो जवाब नहीं चाहता, सिर्फ़ सच्चाई से बचना चाहता है।
“कोई नहीं,” रूपेश ने कहा। आवाज़ उसकी अपनी नहीं लगी।
“नीचे कोई गिरा क्या?” लवली ने धीमे से पूछा।
रूपेश ने सिर हिला दिया। इनकार में। लेकिन उस हल्की-सी हरकत में उसका पूरा शरीर काँप गया। लवली समझ गई कि कुछ बहुत गलत हो चुका है। वह कुछ और पूछना चाहती थी, लेकिन बच्चों के कमरे से आती हल्की-सी करवट ने उसे रोक दिया।
उस रात किसी ने ठीक से साँस नहीं ली।
काफी देर बाद, जब कॉलोनी पूरी तरह सो चुकी थी, रूपेश ने चुपचाप दरवाज़ा खोला। उसके पैरों में चप्पल नहीं थी। नंगे पाँव सीढ़ियाँ उतरते हुए उसे हर सीढ़ी किसी जाल जैसी लग रही थी। जैसे कोई अदृश्य हाथ उसे पीछे खींच रहा हो।
नीचे पहुँचते ही उसे वह दिख गया।
अंधेरे में पड़ा एक शरीर।
अजीब-से कोण में मुड़ा हुआ।
हिलता नहीं।
साँस नहीं लेता।
धर्मेंद्र सिंह।
रूपेश की छाती में कुछ फट-सा गया। उसने इधर-उधर देखा—कोई नहीं था। सिर्फ़ वह मकान, वह अंधेरा और वह सच, जो अब दफ़न होना चाहता था।
वह वापस ऊपर गया। लवली दरवाज़े पर खड़ी थी। उसकी आँखें सवालों से भरी थीं। रूपेश ने कुछ नहीं कहा। बस इशारे से उसे अंदर आने को कहा।
“मर गया है?”
यह सवाल फुसफुसाहट में पूछा गया।
रूपेश ने सिर हिलाया।
बस इतना ही।
कुछ पल दोनों चुप रहे। उस चुप्पी में एक पूरा जीवन उलट गया। फिर लवली बोली—बहुत धीमे, लेकिन साफ़, “अगर यह बात बाहर गई… तो हमारे बच्चे—”
वाक्य पूरा नहीं हुआ। जरूरत नहीं थी।
उसी पल एक फैसला ले लिया गया।
डर से नहीं।
ज़रूरत से।
रात का बाकी हिस्सा जैसे किसी और ने जिया। दोनों ने मिलकर वह किया, जो उन्हें कभी नहीं करना चाहिए था। शरीर को उठाया गया। हर हरकत भारी थी—वज़न से नहीं, अपराध से। बाहर निकलते हुए उन्हें लगा जैसे दीवारें देख रही हैं। जैसे छत के कोने में कोई आँख खुली है।
मकान चुप था।
लेकिन वह सब देख रहा था।
रूपेश ने पहले से सोची हुई जगह चुनी थी—शहर के बाहर, एक सुनसान ज़मीन। वहाँ मिट्टी ढीली थी, और रात मददगार। गाड़ी चलती रही, और हर किलोमीटर के साथ डर बढ़ता गया। पीछे की सीट पर रखा सच खामोश था।
मिट्टी खोदी गई।
अंधेरे में।
बिना किसी गवाह के।
जब पहला फावड़ा ज़मीन में धँसा, तो हवा ठंडी हो गई। लवली को लगा जैसे किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा हो। उसने पीछे मुड़कर देखा—कोई नहीं था। बस दूर कहीं उल्लू की आवाज़।
लाश को दफ़न किया गया।
फिर दूसरी जगह—जैसे डर को बाँट देने से वह कम हो जाएगा।
मिट्टी समतल की गई।
निशान मिटाए गए।
हाथ काँपते रहे।
वापसी में दोनों एक शब्द नहीं बोले। शहर की रोशनियाँ पास आती गईं, लेकिन भीतर का अंधेरा और गहरा होता चला गया।
सुबह होते ही रूपेश ने लोगों से कहना शुरू कर दिया—“मकान मालिक गाँव चले गए हैं। अचानक जाना पड़ा।”
कुछ ने पूछा।
कुछ ने शक किया।
लेकिन किसी ने ज़ोर नहीं दिया।
विजय नगर कॉलोनी ने भी इस बात को मान लिया। जैसे वह सच जानकर भी उसे स्वीकार न करना चाहती हो।
लेकिन सच मिट्टी में दबकर खत्म नहीं होता।
वह इंतज़ार करता है।
और उस रात, जब धर्मेंद्र सिंह को दफ़न किया गया,
वह मर नहीं रहा था।
वह लौटने की तैयारी कर रहा था।
अध्याय 6
गाँव जाने की झूठी कहानी
सुबह की पहली रोशनी विजय नगर कॉलोनी पर उतरी, तो सब कुछ वैसा ही दिखा जैसा हर रोज़ दिखता था। दूधवाले की साइकिल की घंटी, अख़बार फेंकने की आवाज़, मंदिर से आती आरती—सब सामान्य। बस एक चीज़ बदल चुकी थी, और वह थी उस मकान की हवा। उसमें अब मिट्टी की गंध घुल चुकी थी। ताज़ी खोदी गई मिट्टी की। गीली, भारी, और सच से भरी हुई।
रूपेश पूरी रात सोया नहीं था। उसकी आँखें लाल थीं, चेहरा बुझा हुआ। लवली चुपचाप रसोई में काम कर रही थी, लेकिन उसके हाथ काँप रहे थे। पूजा और प्राप्ति को कुछ समझ नहीं आ रहा था, बस उन्हें इतना महसूस हो रहा था कि घर में कुछ ठीक नहीं है। बच्चों की हँसी उस दिन असहज लग रही थी—जैसे वह इस घर की नहीं, किसी और दुनिया की हो।
सुबह होते ही सवाल आने लगे।
पहला सवाल सामने वाले पड़ोसी ने पूछा—“आजकल मकान मालिक दिखाई नहीं दे रहे?”
रूपेश ने पहले से रटी हुई पंक्ति बोली, “गाँव चले गए हैं। अचानक तबीयत ख़राब हो गई थी।”
उसने खुद को यक़ीन दिलाने की कोशिश की। शब्द आसान थे, लेकिन मुँह से निकलते ही हवा में अटक जाते थे। पड़ोसी ने सिर हिलाया, लेकिन उसकी आँखें कुछ और कह रही थीं।
दोपहर तक यह बात फैल गई।
कोई बोला, “इतनी अचानक?”
कोई बोला, “उन्होंने बताया क्यों नहीं?”
कोई बस चुप रहा।
चुप्पी सबसे ख़तरनाक होती है।
रूपेश हर सवाल का एक ही जवाब देता रहा। कहानी वही थी, बस शब्द बदल जाते थे। कभी माँ की बीमारी, कभी ज़मीन का झगड़ा, कभी पारिवारिक मजबूरी। झूठ भी थक जाता है, लेकिन उस दिन झूठ को ज़िंदा रहना था।
मकान, जो अब तक सब सुनता रहा था, इस कहानी को भी सुन रहा था। और हर बार जब “गाँव” शब्द बोला जाता, दीवारों में एक हल्की-सी चरमराहट होती। जैसे किसी ने दाँत पीसे हों।
शाम ढली। हवा भारी हो गई। घर के भीतर अजीब-सी ठंडक फैलने लगी। लवली को लगा जैसे फर्श ठंडा नहीं, गीला है। उसने झुककर देखा—कुछ नहीं था। लेकिन उसकी नाक में वही गंध फिर से भर गई—मिट्टी की।
उस रात पूजा ने पहली बार सपना देखा।
उसने देखा कि कोई आदमी मिट्टी के नीचे से उसे बुला रहा है। उसका चेहरा साफ़ नहीं था, बस आँखें दिख रही थीं—खुली हुई, बिना पलक झपकाए। वह कुछ कह रहा था, लेकिन आवाज़ नहीं निकल रही थी। अचानक उसके हाथ मिट्टी से बाहर आए और उसकी कलाई पकड़ ली।
पूजा चीखकर उठी।
लवली दौड़कर आई। उसने बेटी को सीने से लगा लिया। पूजा काँप रही थी। “मम्मी, नीचे कोई है,” उसने रोते हुए कहा। “वो ज़मीन के नीचे है।”
रूपेश ने यह सुना। उसके सीने में एक ठंडी लहर दौड़ गई। उसने खुद को संभाला। “सपना था,” वह बोला। “डर मत।”
लेकिन वह जानता था—यह सिर्फ़ सपना नहीं था।
अगले दिन पुलिस की जीप कॉलोनी में दिखाई दी। किसी ने शिकायत की थी। साधारण पूछताछ। रूपेश ने वही कहानी दोहराई। गाँव। अचानक जाना। कोई संपर्क नहीं।
पुलिस ने घर देखा। कमरों में झाँका। बालकनी में खड़ी होकर नीचे देखा। एक पल के लिए रूपेश को लगा जैसे ज़मीन हिल रही हो। जैसे वह खुद ही सच उगल देगी।
लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
पुलिस चली गई।
झूठ जीत गया—अभी के लिए।
उस रात, जब सब सो गए, घर के भीतर एक नई आवाज़ गूँजी।
बहुत धीमी।
बहुत पास।
जैसे कोई फर्श के नीचे से नाख़ून रगड़ रहा हो।
रूपेश की आँखें खुल गईं। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। उसने कान लगाया। आवाज़ फिर आई। दीवार के भीतर से। या शायद उसके अपने सिर के भीतर से।
“मैं गाँव नहीं गया…”
शब्द साफ़ नहीं थे, लेकिन मतलब था।
रूपेश ने चादर ओढ़ ली। आँखें बंद कर लीं। लेकिन अंधेरा अब बाहर नहीं था। वह घर के भीतर था। दीवारों में था। साँसों में था।
विजय नगर कॉलोनी को एक झूठी कहानी दे दी गई थी।
लेकिन उस मकान को सच पता था।
और सच अब चुप नहीं रहने वाला था।
अध्याय 7
दीवारों में क़ैद आत्मा
उस मकान की दीवारें अब सिर्फ़ दीवारें नहीं रहीं।
वे सुनती थीं।
वे याद रखती थीं।
और अब—वे बोलने लगी थीं।
धर्मेंद्र सिंह के गायब होने के बाद से घर के भीतर एक अजीब-सा दबाव रहने लगा था, जैसे हवा भारी हो गई हो। साँस लेना आसान नहीं था। कमरों में कदम रखते ही ऐसा लगता, जैसे कोई अदृश्य ताक़त सामने खड़ी होकर रास्ता रोक रही हो। रूपेश इसे थकान कहकर टाल देता, लेकिन उसका शरीर जानता था—यह डर है।
रात के समय यह एहसास और तेज़ हो जाता।
दीवारों से हल्की-हल्की आवाज़ें आने लगीं। कभी खटखटाहट, कभी सरसराहट। ऐसा लगता जैसे कोई भीतर से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा हो। एक रात लवली ने साफ़ सुना—दीवार के उस पार से किसी के रोने की आवाज़। धीमी, टूटी हुई, जैसे गला मिट्टी से भरा हो।
उसने रूपेश को जगाया।
“सुनो… कोई रो रहा है।”
रूपेश ने कान लगाया। कुछ पल सन्नाटा रहा। फिर—एक हल्की-सी कराह। इतनी पास, जैसे दीवार और उनके बीच कोई फ़ासला ही न हो।
“तुम्हें भी सुनाई दिया?” लवली की आवाज़ काँप रही थी।
रूपेश ने जवाब नहीं दिया। जवाब देने की हिम्मत नहीं थी।
अगले दिन घर की दीवारों पर दरारें दिखाई देने लगीं। बहुत बारीक। जैसे किसी ने अंदर से नाख़ून से खरोंच दिया हो। पूजा ने उन दरारों पर उँगली रखी, तो उसे अजीब-सी ठंडक महसूस हुई—ऐसी ठंडक जो हाथ से दिल तक उतर गई।
“पापा, दीवार ठंडी है,” उसने कहा।
रूपेश ने देखा। सच में—वहाँ धूप नहीं पहुँचती थी, फिर भी इतनी ठंडक असामान्य थी। उसने दीवार पर हाथ रखा। कुछ सेकंड के लिए उसे लगा, जैसे दीवार धड़क रही हो।
उस रात घर के भीतर कुछ बदल गया।
आधी रात को अचानक एक ज़ोर की आवाज़ आई—जैसे किसी ने दीवार पर मुक्का मारा हो। पूजा और प्राप्ति चीखकर उठ बैठीं। लवली ने उन्हें कसकर पकड़ लिया। रूपेश उठकर कमरे से बाहर निकला।
बैठक की दीवार पर एक नई दरार थी। बड़ी। टेढ़ी-मेढ़ी। और उसके पास मिट्टी गिरी हुई थी—गीली, काली मिट्टी।
मिट्टी।
रूपेश की साँस अटक गई। यह वही मिट्टी थी। वह पहचान गया। यह कॉलोनी की मिट्टी नहीं थी।
दीवार के भीतर से आवाज़ आई—
बहुत धीमी,
बहुत भारी।
“रूपेश…”
उसका नाम।
उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। आवाज़ साफ़ नहीं थी, लेकिन पहचान में आ रही थी। वही लहजा। वही ठंडक।
“तुमने कहा था… गाँव…”
लवली पीछे खड़ी सब सुन रही थी। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। उसने मुँह पर हाथ रख लिया ताकि चीख न निकल जाए।
घर के भीतर तापमान अचानक गिर गया। साँस से भाप निकलने लगी। दीवार की दरारें फैलने लगीं—धीरे-धीरे, जैसे कोई अंदर से ज़ोर लगा रहा हो।
रूपेश पीछे हटा। उसका शरीर काँप रहा था। “यह नहीं हो सकता…” वह बुदबुदाया।
लेकिन वह हो रहा था।
मकान अब सिर्फ़ गवाह नहीं था।
वह क़ैदख़ाना बन चुका था।
उस आत्मा के लिए, जिसे दफ़न किया गया था,
लेकिन मिटाया नहीं गया था।
आवाज़ें अब हर कमरे से आने लगीं। कभी छत से, कभी फर्श से। आईने में अजीब परछाइयाँ दिखने लगीं—एक लंबा, टेढ़ा-सा साया, जिसकी आँखें खाली थीं। दरवाज़े अपने आप खुलते और बंद होते। खिड़कियों पर अंदर से उँगलियों के निशान उभर आते।
पूजा ने एक रात कहा, “वो अंकल दीवार के अंदर रहते हैं।”
किसी ने उससे यह नहीं पूछा कि उसने यह कैसे जाना।
वह आत्मा अब बाहर नहीं जाना चाहती थी।
वह वहीं रहना चाहती थी—
उसी घर में,
उन्हीं दीवारों के भीतर,
उन्हीं लोगों के साथ।
क्योंकि बदला बाहर नहीं लिया जाता।
बदला वहीं लिया जाता है,
जहाँ अपराध जन्म लेता है।
विजय नगर कॉलोनी का वह मकान अब ज़िंदा था।
और उसकी दीवारों में एक आत्मा क़ैद थी—
जो चुप नहीं रहने वाली थी।
अध्याय 8
घर में शुरू हुई अजीब घटनाएँ
अब वह मकान रात और दिन में अलग नहीं लगता था।
अंधेरा सूरज निकलने के बाद भी भीतर टिका रहता।
रोशनी दीवारों से टकराकर लौट आती, जैसे घर उसे स्वीकार ही न करता हो।
सुबह सबसे पहले लवली ने महसूस किया कि कुछ बहुत गलत है।
रसोई में रखा स्टील का गिलास अपने आप फर्श पर गिर पड़ा। कोई हवा नहीं थी। खिड़की बंद थी। फिर दूसरा गिलास हिला। तीसरा। जैसे किसी अदृश्य हाथ ने उन्हें धक्का दिया हो। लवली पीछे हट गई। उसकी साँसें तेज़ हो गईं।
“रूपेश…” उसने आवाज़ लगाई।
रूपेश आया। उसने गिलास उठाया। ठंडा था। असामान्य रूप से ठंडा। जैसे उसे किसी फ्रिज में रखा गया हो। उसने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसके चेहरे से रंग उतर चुका था।
यह सिर्फ़ शुरुआत थी।
दिन चढ़ते-चढ़ते घर में अजीब हरकतें होने लगीं। पंखे बिना बिजली के घूमने लगे। टीवी अपने आप चालू होकर सफ़ेद शोर दिखाने लगा। उस शोर के बीच कभी-कभी किसी की साँस सुनाई देती—भारी, टूटी हुई।
दीवारों पर छायाएँ चलने लगीं।
परछाइयाँ, जिनका कोई शरीर नहीं था।
पूजा ने दोपहर में दीवार पर किसी को चलते देखा। वह खुश होकर बोली, “मम्मी, वो अंकल फिर आ गए।”
लवली के हाथ से थाली छूट गई।
“कौन अंकल?”
“जो दीवार में रहते हैं,” पूजा ने सहजता से कहा।
उस दिन के बाद बच्चों ने अकेले कमरे में जाना बंद कर दिया। वे हर समय लवली से चिपके रहते। प्राप्ति रात में अचानक उठकर एक ही बात दोहराने लगी—“वो देख रहे हैं… वो देख रहे हैं…”
रातें अब सबसे ख़तरनाक हो गई थीं।
रात ठीक तीन बजे, हर रोज़, घर में हल्की-सी कंपन शुरू हो जाती। दीवारें काँपतीं। फर्श से ठक-ठक की आवाज़ आती, जैसे कोई नीचे से ऊपर की ओर आ रहा हो। बाथरूम का नल अपने आप खुल जाता। पानी बहता रहता—बिना रुके।
एक रात रूपेश ने साफ़ देखा।
वह आईने के सामने खड़ा था। चेहरा धो रहा था। जब उसने ऊपर देखा, तो आईने में उसका अक्स अकेला नहीं था। उसके पीछे कोई खड़ा था—झुका हुआ, गर्दन अजीब-से कोण में मुड़ी हुई।
आँखें खुली थीं।
लेकिन उनमें ज़िंदगी नहीं थी।
रूपेश ने पलटकर देखा—पीछे कुछ नहीं।
फिर आईना देखा—वह चेहरा मुस्कुरा रहा था।
आईना टूट गया।
काँच के टुकड़े फर्श पर बिखर गए। उन टुकड़ों में वही चेहरा दिख रहा था—बार-बार, हर कोण से। रूपेश घुटनों के बल बैठ गया। उसने मुँह से आवाज़ नहीं निकाली, लेकिन उसका शरीर रो रहा था।
घर अब खेल नहीं कर रहा था।
वह सज़ा दे रहा था।
एक शाम अचानक पूरे घर में मिट्टी फैल गई। रसोई में, बैठक में, बच्चों के कमरे में—जैसे किसी ने फावड़े से मिट्टी उछाल दी हो। मिट्टी गीली थी। और उसमें से बदबू आ रही थी।
लवली ने ज़मीन पर एक निशान देखा—हाथ का निशान। पाँच उँगलियाँ। बहुत गहरी। जैसे किसी ने भीतर से दीवार तोड़कर बाहर हाथ निकाला हो।
उसके कानों में एक आवाज़ गूँजी—
“अब मेरी बारी है।”
रूपेश ने उस रात पहली बार शराब पी। बहुत ज़्यादा। लेकिन नशा भी उस डर को दबा नहीं पाया। आँखें बंद करते ही वह बालकनी दिखती। रेलिंग। नीचे अंधेरा। और गिरता हुआ शरीर।
नींद अब दुश्मन बन चुकी थी।
घर की घड़ियाँ रुकने लगीं। समय अटक जाता। तीन बजकर सात मिनट—हर घड़ी में वही समय। जैसे उस पल के बाद कुछ आगे बढ़ना ही नहीं चाहता हो।
विजय नगर कॉलोनी के लोग अब साफ़ महसूस करने लगे थे। उस मकान से अजीब आवाज़ें आती थीं। रात में रोशनी अपने आप जलती-बुझती। कभी किसी के रोने की आवाज़, कभी हँसी—सूखी, ठंडी हँसी।
लोग अब उस घर के सामने रुकते नहीं थे।
और घर—
घर खुश था।
क्योंकि अब वह अकेला नहीं था।
उसके भीतर एक मेहमान था—
जो धीरे-धीरे पूरे घर पर अपना हक़ जमा रहा था।
और यह सब सिर्फ़ चेतावनी थी।
अध्याय 9
रात की फुसफुसाहटें और साये
अब रात सिर्फ़ अंधेरी नहीं होती थी—
वह सुनाई देने लगी थी।
विजय नगर कॉलोनी जब सो जाती, तब वह मकान जागता। खिड़कियाँ बिना हवा के हिलतीं, परदे ऐसे लहराते जैसे कोई उनके पीछे खड़ा हो। घर के भीतर कदमों की आवाज़ गूँजती—धीमी, घिसटती हुई—लेकिन जब कोई देखने जाता, तो फर्श खाली मिलता।
फिर फुसफुसाहटें शुरू हुईं।
पहले बहुत धीमी।
फिर साफ़।
और फिर—नाम लेकर।
“रूपेश…”
“लवली…”
“पूजा…”
“प्राप्ति…”
हर नाम अलग कमरे से आता। जैसे कोई घर के भीतर घूम रहा हो। जैसे वह जानता हो कि कौन कहाँ है।
लवली ने रात को बच्चों को सीने से लगाए रखा। उसकी आँखें खुली थीं, लेकिन वह देखने से डर रही थी। उसे लग रहा था कि अगर उसने आँखें खोलीं, तो कोई सामने खड़ा मिलेगा—बहुत पास।
रूपेश बैठक में बैठा था। टीवी बंद था, लेकिन स्क्रीन पर परछाइयाँ चल रही थीं। काली, टेढ़ी, टूटी हुई। वह उन्हें घूरता रहा। अचानक स्क्रीन पर एक चेहरा उभरा—धुँधला, मिट्टी से सना हुआ।
धर्मेंद्र सिंह।
टीवी अपने आप बंद हो गया।
उसी पल पीछे से साँस की आवाज़ आई—भारी, ठंडी। रूपेश ने मुड़ने की हिम्मत नहीं की। उसे पता था—जो भी है, बहुत पास है। इतना पास कि उसकी गर्दन पर ठंडक चिपक गई।
“तुमने मुझे नीचे क्यों छोड़ा?”
आवाज़ कान के भीतर गूँजी।
रूपेश चीखना चाहता था, लेकिन आवाज़ नहीं निकली। उसके मुँह से सिर्फ़ सूखी हवा निकली। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। वह कुर्सी से फिसलकर ज़मीन पर बैठ गया।
घर की लाइटें एक साथ बुझ गईं।
अंधेरे में साये चलने लगे। दीवारों पर लंबे-लंबे साये, जो इंसानों जैसे नहीं थे। उनके हाथ असामान्य रूप से लंबे थे। उँगलियाँ ज़मीन तक पहुँचती थीं। वे दीवारों से निकलकर फर्श पर फैलते गए।
पूजा ने अपनी आँखें खोलीं।
उसने देखा—उसके कमरे की दीवार पिघल रही है। ईंटें नहीं, जैसे मांस हो। और उस पिघलती दीवार से कोई बाहर आ रहा है। आधा शरीर बाहर, आधा भीतर। चेहरा मिट्टी से ढका हुआ।
“पापा ने मुझे नीचे सुला दिया,” वह साया फुसफुसाया।
“अब तुम्हारी बारी है।”
पूजा चीखी।
उसकी चीख घर के हर कोने में गूँज गई।
लवली दौड़ी। उसने कमरे में कदम रखा और ठिठक गई। दीवार पर काले हाथों के निशान थे। ताज़ा। गीले। जैसे अभी-अभी लगाए गए हों। पूजा का बिस्तर ठंडा था—अजीब तरह से ठंडा, जैसे उस पर कोई और बैठा हो।
उसी समय फर्श के नीचे से आवाज़ आई—
ठक… ठक… ठक…
जैसे कोई ऊपर चढ़ रहा हो।
रूपेश किसी तरह उठा। उसने दरवाज़ा खोला और बाहर भागने की कोशिश की। लेकिन मुख्य दरवाज़ा हिला तक नहीं। उसने ज़ोर लगाया। फिर और ज़ोर। दरवाज़ा जैसे दीवार बन गया हो।
पीछे से फुसफुसाहट आई—
“यह मेरा घर है।”
छत से धूल झरने लगी। बल्ब झूलने लगे। हर झटके के साथ फुसफुसाहट तेज़ होती गई। अब वह सिर्फ़ एक आवाज़ नहीं थी—वह कई आवाज़ें थीं। जैसे दीवारों में कई मुँह खुल गए हों।
“सच बताओ…”
“नीचे क्या है?”
“मुझे मिट्टी क्यों दी?”
रूपेश घुटनों के बल बैठ गया। उसने कान बंद कर लिए। लेकिन आवाज़ें उसके भीतर थीं। उसकी यादों में थीं। उस पल में थीं, जब हाथ आगे बढ़े थे।
अचानक सब शांत हो गया।
बहुत ज़्यादा शांत।
इतना कि कान बजने लगे।
और उस सन्नाटे में एक साया सामने आया। पूरा। साफ़। खड़ा हुआ। उसकी गर्दन टेढ़ी थी। आँखें गड्ढों जैसी। मुँह से मिट्टी झर रही थी।
धर्मेंद्र सिंह।
वह मुस्कुराया।
मुस्कान में दया नहीं थी।
“अभी नहीं,” उसने कहा।
“अभी तो रातें शुरू हुई हैं।”
और वह साया दीवार में समा गया।
घर फिर से खामोश हो गया।
लेकिन अब वह खामोशी पहले जैसी नहीं थी।
वह चेतावनी नहीं थी।
वह वादा था।
अध्याय 10
बच्चियों को दिखने लगा ‘कोई’
अब डर ने आकार ले लिया था।
वह आवाज़ नहीं रहा, साया नहीं रहा—वह दिखाई देने लगा था।
और सबसे पहले उसने बच्चों को चुना।
पूजा सुबह उठी तो उसने देखा कि उसके बिस्तर के पास कोई बैठा है। धूप खिड़की से आ रही थी, कमरा रोशन था, इसलिए वह चीखी नहीं। उसे लगा कोई मेहमान होगा। लेकिन जब उसने ठीक से देखा, तो उसकी साँस अटक गई।
वह आदमी ज़मीन पर बैठा था।
पीठ दीवार से टिकी हुई।
पैर असामान्य रूप से मुड़े हुए।
और शरीर से मिट्टी झर रही थी।
उसका चेहरा साफ़ नहीं दिख रहा था, लेकिन आँखें… आँखें खुली थीं। बिना पलक झपकाए।
“डरो मत,” उसने धीमे से कहा।
आवाज़ ज़मीन के नीचे से आती हुई लगी।
पूजा की आवाज़ नहीं निकली। उसका शरीर सुन्न हो गया। वह आँखें बंद करना चाहती थी, लेकिन कर नहीं पाई। वह आदमी उठा। खड़ा हुआ। उसका सिर छत से लगभग छूने लगा।
“मैं यहीं रहता हूँ,” उसने कहा।
“दीवारों में।”
अगले ही पल वह गायब हो गया।
जब लवली कमरे में आई, पूजा चुपचाप दीवार की तरफ़ देख रही थी। उसकी आँखें खाली थीं। “मम्मी,” उसने बहुत सामान्य आवाज़ में कहा, “वो अंकल सुबह-सुबह आते हैं।”
लवली को लगा जैसे उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई हो।
प्राप्ति के साथ यह और भी डरावना था।
वह बोलती कम थी, लेकिन अब वह किसी से बात करने लगी थी—अकेले में। वह कोने में बैठकर किसी अदृश्य चीज़ से फुसफुसाती। कभी हँसती। कभी सिर हिलाती। जैसे सामने कोई बैठा हो।
“किससे बात कर रही हो?” लवली ने पूछा।
प्राप्ति ने दीवार की ओर इशारा किया।
“अंकल से। वो कहते हैं, ज़्यादा शोर मत करो।”
रूपेश ने यह सुना। उसके चेहरे पर पसीना आ गया। उसने बच्चों को डाँटने की कोशिश की, लेकिन आवाज़ खोखली थी। उसे खुद पर यक़ीन नहीं रहा था।
अब बच्चों को सिर्फ़ दिखाई ही नहीं देता था—वह उनके साथ चलता था।
पूजा ने स्कूल से लौटकर बताया कि किसी ने उसका बैग खींचा। उसने पलटकर देखा—कोई नहीं। लेकिन बैग पर मिट्टी के निशान थे। गीले। ताज़ा।
रात को प्राप्ति ने कहा, “आज अंकल नीचे नहीं सोए। आज वो यहीं सोएँगे।”
उस रात बच्चों का कमरा सबसे ठंडा था। साँस से भाप निकल रही थी। लवली ने कंबल ओढ़ाया, लेकिन ठंड कम नहीं हुई। दीवार के पास से लगातार धीमी साँसों की आवाज़ आ रही थी।
रूपेश ने हिम्मत करके बच्चों के कमरे की दीवार पर हाथ रखा।
दीवार धड़क रही थी।
जैसे उसके भीतर दिल हो।
अचानक दीवार पर उँगलियों के निशान उभर आए। अंदर से बाहर की ओर। एक-एक करके। पाँच उँगलियाँ। फिर हथेली। फिर आधा चेहरा—धुँधला, टेढ़ा।
पूजा चीखी नहीं।
वह बस बोली, “अंकल, ऐसे नहीं निकलते।”
चेहरा रुक गया।
कुछ सेकंड तक सब थमा रहा। फिर वह निशान धीरे-धीरे गायब हो गया। दीवार फिर से सामान्य हो गई, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
लेकिन कमरे में मिट्टी रह गई थी।
रूपेश पीछे हट गया। उसके मुँह से बस इतना निकला—“यह मुझे सज़ा दे रहा है।”
लवली रोने लगी। बच्चों को सीने से लगा लिया। लेकिन वह जानती थी—अब बात सिर्फ़ डर की नहीं रही।
बच्चियाँ उसे देख पा रही थीं।
बात कर पा रही थीं।
समझ पा रही थीं।
और जो दिखाई देने लगता है,
वह जाने के लिए नहीं आता।
वह रहने आता है।
विजय नगर कॉलोनी के उस मकान में अब चार नहीं,
पाँच लोग रहते थे।
और पाँचवाँ—
सबसे ज़्यादा जागता था।
अध्याय 11
सपनों में भी पीछा
रातें अब सबसे ख़तरनाक हो चुकी थीं।
सपने भी सुरक्षित नहीं रहे।
पूजा और प्राप्ति अब नींद में भी अकेले नहीं थीं। उनका कमरा रात को अपने आप बदल जाता। बिस्तर हिलता, पर्दे फड़फड़ाते, और दीवारों से हल्की सरसराहट आती। जैसे कोई उन पर नजर रख रहा हो।
एक रात, रूपेश ने देखा कि उसकी बेटियाँ सोते समय डर से काँप रही हैं। उनके छोटे हाथ बिस्तर के किनारे पकड़ गए थे, जैसे कुछ पकड़ने की कोशिश कर रही हों। रूपेश ने उनकी आँखें खोलने की कोशिश की—पूजा ने फुसफुसाकर कहा,
“पापा… अंकल आ गए हैं।”
रूपेश ने घबरा कर पूछा, “कौन अंकल?”
“जो नीचे गिरे थे… दीवार में रहते हैं। अब सपनों में भी आते हैं।” पूजा की आवाज़ में भय नहीं, बल्कि सचाई की ठंडक थी।
रातभर बच्चों के सपनों में वही चेहरा आता रहा।
सपने ऐसे थे जैसे मकान खुद उनके ऊपर खड़ा हो। कभी कमरे की छत बढ़ जाती, कभी दीवारें भीतर खिंचती। वह अंकल—धर्मेंद्र—सपनों में घूमता।
कभी उनके पास बैठता।
कभी खड़ा होकर उनके हाथ पकड़ता।
प्राप्ति ने एक बार अपने हाथों से हवा में कुछ पकड़ लिया।
“वो पकड़ रहे हैं… मुझे छोड़ो मत,” उसने फुसफुसाया।
रूपेश ने महसूस किया कि यह अब सिर्फ़ खेल नहीं है।
यह सच है।
घर में जो हुआ, वह बच्चों के सपनों तक पहुँच गया।
उस रात रूपेश खुद भी सपना देखने लगा।
वह बालकनी में खड़ा था। नीचे अंधेरा फैला हुआ था। वह देख रहा था—लेकिन उस अंधेरे में कोई था। धर्मेंद्र का शरीर, जो दफ़न किया गया था, अब धीरे-धीरे मिट्टी से बाहर निकल रहा था। उसका चेहरा आधा मिट्टी में, आधा साफ़। आँखें खुली थीं।
“तुमने मुझे मिट्टी में दबा दिया,” आवाज़ गूँजी।
“लेकिन मैं गया नहीं।”
रूपेश ने हिम्मत करके पलटने की कोशिश की।
पर उसका शरीर जड़ हो गया था।
सपने और हकीकत अब अलग नहीं रहे।
पूजा ने भी वही देखा।
प्राप्ति ने भी वही महसूस किया।
लवली ने बच्चों के चुप रहने के बावजूद रोना शुरू कर दिया।
सपनों में भी घर जाग रहा था।
दीवारें खिसक रही थीं। फर्श हिल रहा था।
और हर कदम पर वही आवाज़:
“अब मेरी बारी है।”
रात खत्म नहीं हुई।
सपने खत्म नहीं हुए।
और सुबह आने पर भी घर में वही ठंडी हवा थी, वही मिट्टी की गंध, वही अजीब-सी सरसराहट।
अब रूपेश समझ चुका था—
धर्मेंद्र की आत्मा सिर्फ़ मर कर नहीं गई।
वह घर के भीतर, बच्चों के सपनों में, हर दीवार में, हर सांस में रही।
और यह सिर्फ़ शुरुआत थी।
अध्याय 12
दीवारों के भीतर का इंतज़ार
अब घर रात और दिन में अलग नहीं रह गया था।
रूपेश, लवली, पूजा और प्राप्ति—सभी पर एक भारी सन्नाटा छा गया था।
घर की दीवारें अब सिर्फ़ संरचना नहीं रहीं। वे जीवित लग रही थीं। हर दरार, हर कोने में कुछ छिपा था। और वह कुछ अब और इंतज़ार नहीं कर रहा था।
एक शाम, रूपेश ने देखा कि बैठक की दीवार धीरे-धीरे फड़क रही है।
धीमे-धीमे, जैसे कोई भीतर से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा हो।
फर्श पर हल्की-हल्की मिट्टी गिर रही थी।
रूपेश ने हाथ लगाया—दीवार ठंडी थी। लेकिन भीतर कुछ हलचल थी।
लवली ने देखा कि बच्चों का कमरा भी बदल गया था।
दीवारें जैसे साँस ले रही थीं।
छत से हल्की-हल्की आवाज़ें आती थीं।
पूजा और प्राप्ति अब अकेले कमरे में नहीं सो रही थीं।
उनकी आँखें रात भर खुली रहतीं।
वे दीवारों को घूरतीं।
कभी अपनी माँ की ओर देखतीं।
कभी दीवार के भीतर।
रूपेश ने हिम्मत करके कहा,
“यह सब खत्म करना होगा… हमें समझना होगा कि वह कौन है।”
लेकिन घर जवाब नहीं दे रहा था।
सिर्फ़ दरारें बढ़ती जा रही थीं।
कभी खटखटाहट, कभी फर्श की हल्की धड़कन—जैसे कोई अंदर से कह रहा हो,
“अब तुम्हारा समय नहीं आया।”
उस रात, रूपेश ने पहली बार महसूस किया कि दीवारें सिर्फ़ देखने वाली नहीं थीं।
वे इंतज़ार कर रही थीं।
उस इंतज़ार में धैर्य नहीं, केवल गुस्सा और बदला था।
रात करीब तीन बजे, पूजा ने धीरे से कहा,
“मम्मी… अंकल आ गए।”
लवली ने पलटकर देखा। कमरे में कोई नहीं था।
लेकिन दीवार पर उँगलियों के निशान उभर गए। गीले। ताज़ा।
और उन निशानों से धीरे-धीरे मिट्टी झरने लगी।
प्राप्ति रोते हुए बोली,
“वह इंतज़ार कर रहे हैं… हमसे।”
रूपेश ने पहली बार अपनी हार महसूस की।
इस घर में वह अकेला नहीं था।
धर्मेंद्र की आत्मा अब बच्चों के साथ जुड़ चुकी थी।
दीवारों के भीतर, मिट्टी के नीचे, वह हमेशा इंतज़ार कर रहा था।
रात भर सब सोए नहीं।
हर धड़कन, हर फुसफुसाहट, हर हल्की आहट—उन्हें याद दिलाती रही कि यह मकान उनका नहीं है।
यह अब धर्मेंद्र का घर था।
और वह इंतज़ार कर रहा था।
सपनों में भी, दीवारों में भी।
हर कोने में, हर सांस में।
और इंतज़ार की घड़ी शुरू हो चुकी थी।
अध्याय 13
मिट्टी से बाहर आती आवाज़ें
अब घर और भी डरावना हो चुका था।
रूपेश और लवली जानते थे कि बच्चों की आँखों में जो देख रहे थे, वह केवल कल्पना नहीं थी।
पूजा और प्राप्ति अब अक्सर दीवारों की ओर बात करती थीं। कभी हँसी, कभी रोना।
कभी वे अपने कमरे में अकेले बैठकर मिट्टी की ओर हाथ बढ़ा देती थीं—और वहां कुछ था।
एक रात, रूपेश ने खुद देखा।
बैठक की दीवार के पास एक धुंधला-सा आकार बन रहा था।
धीरे-धीरे वह आकार स्पष्ट होता गया—एक आदमी।
आधी-ढकी हुई आँखें। गहरी, खाली, बिना पलक के।
चेहरा आधा मिट्टी में, आधा साफ़।
“रूपेश…” आवाज़ घर भर में गूँजी।
इतनी धीमी, इतनी ठंडी, कि कानों में बजी और दिल में उतर गई।
“तुमने मुझे दबा दिया… अब मेरी बारी है।”
रूपेश ने पीछे हटकर देखा।
दीवारों से मिट्टी गिर रही थी।
फर्श पर निशान बन रहे थे।
उँगलियाँ दीवार से बाहर निकल रही थीं।
और उन उँगलियों के बीच आवाज़ें—सैकड़ों आवाज़ें—एक साथ फुसफुसा रही थीं।
पूजा ने रोते हुए कहा,
“मम्मी… अंकल बोल रहे हैं।”
प्राप्ति ने अपने हाथों से हवा पकड़ने की कोशिश की।
“वे बाहर आ रहे हैं,” वह बोली।
रूपेश ने महसूस किया कि अब यह केवल साया नहीं है।
यह आत्मा सीमाओं से बाहर आ रही थी।
मिट्टी, दीवारें, फर्श—सब उसके भीतर थे।
हर आवाज़, हर सरसराहट, हर हल्की धड़कन—उसे बुला रही थी।
अचानक घर में हल्की-हल्की हिलन शुरू हुआ।
दीवारें कांपने लगीं।
फर्श से आवाज़ें उठीं।
कांच की छोटी-छोटी चीज़ें खुद-ब-खुद गिरने लगीं।
और टीवी की स्क्रीन पर धुंधली परछाई दिखाई दी—मिट्टी से भरी।
रूपेश ने चिल्लाया,
“लवली! बच्चों को पकड़ो!”
लेकिन आवाज़ें उनके कानों में गूँजती रहीं।
“तुम्हारा समय आया है… तुमसे अब नहीं बचा जाएगा।”
पूजा और प्राप्ति दीवार की ओर देख रही थीं।
उनकी आँखों में डर नहीं, बल्कि पहचान थी।
वह चेहरा, वह आवाज़—वे उसे जान चुकी थीं।
और अब वह उनके पास आने वाला था।
लवली ने दोनों को कसकर अपनी बाहों में पकड़ लिया।
लेकिन रूपेश जान गया—
अब केवल पकड़ना ही पर्याप्त नहीं था।
धर्मेंद्र की आत्मा मिट्टी से बाहर आ चुकी थी।
दीवारें, फर्श, हवा—सब उसके हाथ में थे।
और वह इंतज़ार नहीं कर रहा था।
वह कार्रवाई कर रहा था।
विजय नगर कॉलोनी का वह मकान अब केवल घर नहीं था।
यह जेल नहीं रही।
यह अँधेरा बन चुका था।
जहाँ जो भी अंदर था, उसे बचना नामुमकिन था।
अध्याय 14
अंधेरे में घूरती आँखें
अब घर सिर्फ़ डर का ठिकाना नहीं रहा था—
यह जीवित हो गया था।
रूपेश और लवली ने महसूस किया कि बच्चों के कमरे में जो हो रहा था, वह उनके काबू में नहीं था। पूजा और प्राप्ति लगातार दीवार की ओर बात करती थीं, मुस्कुराती या रोती—और कभी-कभी अचानक चुप हो जातीं।
एक रात, रूपेश ने देखा कि कमरे की छत हल्की-हल्की झूल रही थी।
फर्श से मिट्टी गिर रही थी।
और दीवारों पर—उनके सामने—छोटे-छोटे निशान उभर रहे थे।
धीरे-धीरे निशान हाथ की शक्ल ले रहे थे।
फिर उँगलियों की लकीरें।
और अचानक—चेहरा।
धर्मेंद्र सिंह का चेहरा।
अधूरा, गीला, मिट्टी से सना।
आँखें खोलकर घूर रही थीं।
पूजा और प्राप्ति उसके सामने खड़ी थीं।
वे हँस नहीं रही थीं, रो भी नहीं रही थीं।
बस घूर रही थीं।
रूपेश ने हाथ बढ़ाया, बच्चों को खींचने की कोशिश की।
लेकिन वे जड़ हो गई थीं।
वे देख रही थीं।
उनके सामने जो कुछ हो रहा था, उसे न देखना असंभव था।
धर्मेंद्र की आत्मा धीरे-धीरे कमरे में फैल रही थी।
उसकी हल्की-सी आवाज़ फुसफुसा रही थी—
“अब मेरी दुनिया है।
तुमने जो किया, उसका हिसाब अब चुकाना होगा।
मैं इंतज़ार नहीं कर रहा… मैं आ रहा हूँ।”
लवली ने बच्चों को अपनी गोद में कसकर पकड़ लिया।
लेकिन दीवारों की आवाज़ें उनके कानों में गूँज रही थीं।
फर्श हिल रहा था।
फोटो फ्रेम अपने आप गिर रहे थे।
पंखे बिना बिजली के घूम रहे थे।
और दीवारों से हल्की-हल्की धूल गिर रही थी—मिट्टी, गीली मिट्टी।
रूपेश ने महसूस किया कि अब यह सिर्फ़ घर की दीवारें नहीं हैं।
यह आत्मा हर जगह है।
हर कमरे में।
हर कोने में।
हर सांस में।
पूजा ने धीरे से कहा,
“पापा… वो देख रहे हैं।
और मुझे छोड़ने वाले नहीं हैं।”
रूपेश ने खुद पर हिम्मत जुटाई।
“लवली, हमें बाहर जाना होगा।
इन्हें कोई रास्ता नहीं देना चाहिए।”
लेकिन जब उन्होंने दरवाज़ा खोला, तो देखा—
मुख्य दरवाज़ा हिल रहा था।
जैसे कोई भीतर से धक्का दे रहा हो।
और दीवारों की दरारों से—आँखें खुल रही थीं।
अधूरी, डरावनी आँखें।
जो घूर रही थीं।
अब रूपेश समझ गया—
धर्मेंद्र सिंह की आत्मा सिर्फ़ सजा देने नहीं आई थी।
वह वहाँ लंबे समय से इंतज़ार कर रहा था।
और अब—वह पूरा घर अपना बना चुका था।
रात लंबी थी।
अंधेरा गहरा था।
और घर की हर चीज़—फर्श, दीवारें, छत, हवा—उस आत्मा के नियंत्रण में थी।
पूजा और प्राप्ति अब केवल देखने वाली नहीं थीं।
वे उसका हिस्सा बन रही थीं।
और रूपेश, लवली—दोनों जानते थे—
बचना अब लगभग असंभव था।
अध्याय 15
अंतिम सज़ा
अब मकान पूरी तरह जीवित हो चुका था।
वह घर नहीं, एक भयानक जेल बन चुका था।
रूपेश, लवली, पूजा और प्राप्ति—सभी उसके कब्ज़े में थे।
दीवारें, फर्श, फर्नीचर—सब कर्म के गवाह बन चुके थे।
रात ठीक तीन बजे शुरू हुई।
सभी कमरे ठंडक से भर गए।
मिट्टी गीली हो रही थी, और दीवारों से हल्की-हल्की सरसराहट आ रही थी।
पूजा और प्राप्ति अपने बिस्तर पर बैठी थीं, आँखें खुली।
वे कुछ देख रही थीं—कुछ ऐसा जो अन्य कोई नहीं देख सकता।
रूपेश ने आख़िरी बार बच्चों को पकड़कर मुँह पर हाथ रखा।
“अब भागना मुश्किल है,” उसने फुसफुसाया।
लवली ने सिर हिलाया।
सब जानते थे—अब केवल आत्मा का फैसला शेष था।
फर्श से ठक-ठक की आवाज़ें तेज़ होने लगीं।
दीवारें फड़क रही थीं।
और अचानक—मिट्टी से आधा मानव शरीर बाहर आया।
चेहरा आधा मिट्टी में, आधा साफ़। आँखें खुली।
धर्मेंद्र सिंह।
उसने रूपेश की ओर देखा।
“तुमने जो किया… अब उसका बदला चुकाओ,” आवाज़ ने घर भर में गूँज उठी।
रूपेश और लवली ने बच्चों को कसकर पकड़ लिया।
लेकिन दीवारें झूमने लगीं।
फर्श ऊपर-नीचे होने लगा।
और मिट्टी के भीतर से आवाज़ें—कई आवाज़ें, चीख़, फुसफुसाहटें—एक साथ गूँजने लगीं।
पूजा ने रोते हुए कहा,
“पापा… वो आ रहे हैं।”
प्राप्ति ने भी फुसफुसाया,
“मम्मी… हमें छोड़ो मत।”
और फिर अचानक—सब कुछ ठहर गया।
अंधेरा गहरा।
सन्नाटा।
धीरे-धीरे, दीवारों से धूल और मिट्टी गिरने लगी।
फर्श से आवाज़ें उठीं।
एक-एक करके—रूपेश, लवली, पूजा और प्राप्ति—चारों पर मिट्टी गिरने लगी।
धीरे-धीरे, पूरी तरह से।
जैसे मिट्टी में समा जाए।
उनके चीख़ें, रोना—सब मिट्टी में दब गया।
घर का अंदरूनी हिस्सा अब खाली नहीं था।
वह आत्मा पूरे घर में फैल गई।
और जिसने भी देखा, वह जान गया—
विजय नगर कॉलोनी का वह मकान अब पूरी तरह धर्मेंद्र सिंह का हो चुका था।
अगली सुबह पड़ोसी देख सकते थे—मकान की खिड़कियाँ बंद, फर्श पर मिट्टी के हल्के निशान।
किसी ने कुछ महसूस किया, पर कुछ भी पता नहीं चला।
सब कुछ सामान्य दिखाई दे रहा था।
लेकिन दीवारें अब खामोश नहीं थीं।
उनके भीतर हमेशा वही साया था।
सुनता, देखता, इंतज़ार करता।
और जो भी उस मकान में कदम रखता—
वह जानता—
“खामोश दीवारें” केवल दीवारें नहीं हैं।
वे गवाह हैं।
वे सज़ा देने वाले हैं।
और उनकी आत्मा अब पूरी कॉलोनी में गूंज रही है।
इस तरह—रूपेश, लवली, पूजा और प्राप्ति—सभी का अंजाम वही हुआ,
जो धर्मेंद्र सिंह ने सोचा था।
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विकास दूबे, भोपाल मध्य प्रदेश