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Author- MANISH CHAUDHARY
Editor - KULDEEP, ANJALI
Proofreader - Dr Supriya & Dr Lata
परिचय
कानून की किताबें, न्याय की तराजू और काले कोट पहने वकीलों की फौज—यह सब उस व्यवस्था की नुमाइंदगी करते हैं जिसके सहारे समाज में न्याय की उम्मीद जिंदा रहती है। लेकिन क्या हर बार अदालत के फैसले ही असली इंसाफ होते हैं? क्या कानून की परिधि में रहकर हर उस शख्स को सजा मिल जाती है जिसके हाथों में बेकसूरों का खून लगा होता है?
“Courtroom 302” सिर्फ एक अदालती कमरे की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी मनोवैज्ञानिक और सस्पेंस से भरपूर क्राइम-थ्रिलर है जो व्यवस्था, सियासत, और इंसानी जज्बातों की सबसे गहरी परतों को टटोलती है।
इस कहानी की शुरुआत मथुरा की उन तंग गलियों और पुराने पुलिस थानों से होती है, जहाँ इंस्पेक्टर मनीष अपने उसूलों के साथ सच की तलाश में जुटा है। S-17 प्रोजेक्ट की जमीन पर लगी वह रहस्यमयी आग, जिसमें कई सपने और जिंदगियां जलकर खाक हो गईं, इस दास्तान का केंद्र बिंदु है। जब विकास मल्होत्रा जैसे मोहरे और अमित वर्मा जैसे किरदार इस खेल में उतरते हैं, तो मामला केवल एक कत्ल का नहीं रहता, बल्कि यह एक दशक पुराने उस हिसाब का बन जाता है जो दबा हुआ था।
कहानी का असली मोड़ तब आता है जब एक तेज-तर्रार वकील, अर्जुन मेहरा, अदालत के कटघरे में कदम रखता है। उसके सीने में दबी आग और आँखों में अपने पिता की मौत का बदला लेने की जो जिद है, वह कानून, पुलिस और मथुरा के सबसे ताकतवर राजनेता ब्रिजमोहन शास्त्री के पूरे साम्राज्य को हिलाकर रख देती है।
यह उपन्यास पाठकों को सोचने पर मजबूर करता है कि जब सिस्टम और कानून अपराधियों को बचाने लगें, तब एक इंसान अपने अपनों के आंसुओं का बदला लेने के लिए किस हद तक जा सकता है।
आइए, कदम रखें उस दहलीज के भीतर, जहाँ न्याय और बदले की इस जंग में हर एक पन्ना एक नया राज खोलता है—Courtroom 302।
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अध्याय 1: अधूरा सच
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सुबह की पहली किरण जब मथुरा की तंग गलियों और पक्के घाटों को छूती थी, तो शहर एक अजीब सी सुस्ती से बाहर निकलता था। यमुना का शांत जल, दूर मंदिरों से गूँजती घंटियों की आवाज़, और सर्द हवाओं का झोंका—सब कुछ सामान्य लगता था। लेकिन इंस्पेक्टर मनीष के लिए यह सामान्यता अब एक छलावा बन चुकी थी।
पुलिस स्टेशन के अपने छोटे से केबिन में बैठे मनीष की आंखें लाल थीं। रात भर आंखों में एक पल भी नींद नहीं आई थी। टेबल पर चाय का कप रखा था, जो अब पूरी तरह ठंडा हो चुका था। उसके सामने खुली थी—‘Courtroom 302’ की वह फाइल, जिसे बंद हुए अभी कुछ ही दिन बीते थे।
विकास मल्होत्रा को उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के बाद शहर में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया था। हर किसी को लगा था कि केस सुलझ गया है। राकेश मल्होत्रा की हत्या कातिल विकास ने की थी, गवाह रामू काका की हत्या का राज भी खुल चुका था, और अदालत ने अपना फैसला सुना दिया था। कागजों के हिसाब से केस फाइलों के बक्से में हमेशा के लिए बंद होने को तैयार था।
लेकिन मनीष का अंतःकरण कह रहा था कि यह अंत नहीं है। यह सिर्फ एक पर्दा है, जिसके पीछे असली नाटक अभी भी चल रहा है।
“सर…” दरवाजे पर हल्की सी दस्तक के साथ सब-इंस्पेक्टर अजय अंदर आया। उसके हाथ में कुछ नई फाइलें थीं। “सिटी थाने से कुछ पुराने रिकॉर्ड्स मंगवाए थे, जो S-17 प्रोजेक्ट से जुड़े हैं। जैसा आपने कहा था, हर एक पन्ने की दोबारा छंटनी कर रहे हैं।”
मनीष ने अपनी थकी हुई पलकें उठाईं और अजय को देखा। “सिर्फ छंटनी नहीं, अजय। हमें हर उस कड़ी को टटोलना है जो इस कहानी के बैकग्राउंड में छुपी हुई है। विकास ने जुर्म कुबूल कर लिया, अदालत ने सजा सुना दी, रामू काका का मुंह हमेशा के लिए बंद हो गया, और अमित वर्मा अचानक गायब होकर फिर प्रकट हो गया—तुम्हें नहीं लगता कि यह सब कुछ बहुत आसानी से हो गया?”
अजय ने फाइलें मेज पर रखते हुए कहा, “सर, कानून सबूत देखता है। और हमारे पास विकास के खिलाफ पुख्ता सबूत थे। कोर्ट ने भी मान लिया कि जमीन और संपत्ति के लालच में विकास ने अपने भाई राकेश को मारा।”
मनीष अपनी कुर्सी से उठा और खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया। बाहर पुलिस स्टेशन के प्रांगण में सुबह की धूप फैल रही थी। उसने गहरी सांस ली और कहा, “यही तो गच्चा है, अजय। विकास लालची था, इसमें कोई दो राय नहीं है। वह अपने भाई की संपत्ति हड़पना चाहता था, यह भी सच है। लेकिन क्या एक सीधा-साधा दिखने वाला इंसान, जो पुलिस के डर से कांपता था, इतनी सफाई से दो-दो हत्याएं कर सकता है? और सबसे बड़ी बात—वह कागज़… जिस पर लिखा था ‘Courtroom 302 में मिलते हैं’।”
मनीष ने मुड़कर अजय की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। “विकास की लिखावट और उस कागज़ की लिखावट का मिलान आज तक मैच नहीं हुआ था। हमने उसे नजरअंदाज कर दिया क्योंकि हमें लगा कि वह सिर्फ एक धमकी है। लेकिन वह धमकी नहीं, एक स्क्रिप्ट थी।”
“स्क्रिप्ट?” अजय ने हैरान होकर पूछा।
“हाँ, स्क्रिप्ट!” मनीष की आवाज़ सख्त हो गई। “और उस स्क्रिप्ट का लेखक कोई और है। विकास सिर्फ उस नाटक का एक ऐसा किरदार था जिसे बलि का बकरा बनाया गया।”
अजय कुछ पल के लिए शांत रहा। उसने मनीष के चेहरे के भावों को पढ़ा और धीरे से पूछा, “तो आपका इशारा किसकी तरफ है? क्या आपको अभी भी अर्जुन मेहरा पर शक है?”
अर्जुन मेहरा का नाम आते ही कमरे का तापमान जैसे बदल गया। वही वकील, जिसने शांत मुस्कान के साथ कोर्ट में आकर पूरे केस का रुख मोड़ दिया था। वही इंसान जिसने अंत में यह खुलासा किया था कि S-17 प्रोजेक्ट की जमीन पर जो आग लगी थी, उसमें उसके पिता की मौत हुई थी और राकेश, अमित व विकास उसके गुनहगार थे।
मनीष ने अपनी मेज पर रखी उस छोटी सी चिट्ठी को उठाया, जो अर्जुन ने जाते-जाते उसे दी थी— “Game Never Ends.”
“शक की बात नहीं है, अजय,” मनीष ने गंभीर स्वर में कहा, “अर्जुन ने अदालत में जो कहा, वह आधा सच था। उसके पिता की मौत उस आग में हुई थी, यह सच है। लेकिन उसने अपने इस निजी बदले को कानून के शिकंजे में इस तरह पिरोया कि पुलिस और अदालत, दोनों उसके हाथों की कठपुतली बन गईं। उसने किसी को मारा नहीं, उसने बस सबको एक ऐसे रास्ते पर धकेल दिया जहाँ वे खुद-ब-खुद एक-दूसरे को तबाह कर लें।”
“लेकिन सर, अगर उसने ऐसा किया भी है, तो हमारे पास उसके खिलाफ कानूनी रूप से क्या है?” अजय ने व्यावहारिक सवाल उठाया। “कोर्ट ने फैसला सुना दिया है। अगर हम बिना किसी ठोस सबूत के अर्जुन मेहरा के खिलाफ दोबारा जांच शुरू करेंगे, तो उच्च अधिकारियों से लेकर मीडिया तक हम पर सवाल खड़े कर देंगे। लोग कहेंगे कि पुलिस अपनी नाकामी छुपाने के लिए एक सम्मानित वकील को परेशान कर रही है।”
मनीष कुछ देर तक खामोश रहा। उसने अपनी मेज पर रखी फाइलों को देखा। वह जानता था कि अजय गलत नहीं कह रहा था। कानून सबूत मांगता है, भावनाएं या अंतःप्रेरणा नहीं। लेकिन मनीष का जमीर उसे चैन से बैठने नहीं दे रहा था।
“कानून सबूत मांगता है, अजय। तो हम सबूत ढूंढेंगे,” मनीष ने दृढ़ता से कहा। “विकास से दोबारा मिलूंगा। जेल जाने के बाद से वह एक शब्द नहीं बोला है। उसे डर है। लेकिन जब किसी इंसान का डर उसकी उम्मीद से बड़ा हो जाता है, तो वह बोलना शुरू कर देता है।”
दोपहर ढलते-ढलते मनीष जिला कारागार (जिला जेल) के गेट पर था। मथुरा की इस पुरानी जेल की ऊंची दीवारें और लोहे के भारी दरवाजे हमेशा से एक अलग ही खौफ पैदा करते थे। मनीष अपनी खाकी वर्दी में जब अंदर दाखिल हुआ, तो जेल के अधिकारियों ने उसका स्वागत किया। कुछ ही देर में उसे उस विशेष जेल के पास ले जाया गया जहाँ विकास मल्होत्रा को रखा गया था।
जेल की सलाखों के पीछे विकास जमीन पर बैठा था। उसके बाल बिखरे हुए थे, आँखों के नीचे गहरे काले घेरे थे, और शरीर पर जेल की कैदी वाली पोशाक थी। कुछ दिन पहले तक जो इंसान महंगे सूट पहनकर कोर्ट के बाहर अकड़ता था, आज वह किसी लावारिस की तरह कोने में सिमटा हुआ था।
मनीष ने लोहे की सलाखों के पास आकर धीरे से कहा, “विकास।”
आवाज़ सुनकर विकास ने चौंककर सिर उठाया। जब उसने सामने इंस्पेक्टर मनीष को खड़ा देखा, तो उसके चेहरे की हवाइयाँ उड़ गईं। वह तेजी से पीछे हटा, जैसे किसी भूत को देख लिया हो।
“आप… आप यहाँ क्यों आए हैं?” विकास की आवाज़ कांप रही थी। “फैसला हो चुका है। मुझे उम्रकैद मिल चुकी है। अब और क्या चाहिए आपको?”
मनीष ने कोई गुस्सा नहीं दिखाया। वह बहुत शांत और संयमित स्वर में सलाखों के पास एक छोटी सी लोहे की बेंच पर बैठ गया।
“फैसला कागजों पर हुआ है, विकास, जमीर पर नहीं,” मनीष ने उसकी आँखों में झांकते हुए कहा। “तू जानता है और मैं भी जानता हूँ कि तूने अपने भाई राकेश का खून नहीं किया था।”
विकास का दिल जोरों से धड़कने लगा। उसने इधर-उधर देखा, जैसे कोई उसकी बात सुन रहा हो। उसके होंठ थरथराए, “नहीं… मैंने सब कबूल किया है। जज साहब के सामने मैंने कहा था कि मैंने मारा है।”
“क्यूंकि तुझे सिखाया गया था कि यही तेरे बचने का इकलौता रास्ता है,” मनीष ने बात काटते हुए कहा। “तुझे कहा गया था कि अगर तू जुर्म कबूल कर लेगा, तो तुझे कम सजा मिलेगी या किसी गुप्त रास्ते से निकाल लिया जाएगा। लेकिन तुझे बेवकूफ बनाया गया, विकास। अर्जुन मेहरा ने तुझे मोहरा बनाया। उसने अपने पिता की मौत का बदला लेने के लिए तेरी और तेरे भाई की दुश्मनी का इस्तेमाल किया।”
विकास के चेहरे का रंग फीका पड़ गया। उसने अपना सिर दोनों हाथों में थाम लिया और धीमी सुबकियों के साथ बोला, “आप कुछ नहीं जानते… वह बहुत खतरनाक आदमी है। अगर मैं कुछ बोलूंगा, तो मैं जिंदा नहीं बचूँगा। जेल के अंदर भी उसकी पहुँच है।”
मनीष तुरंत अपनी जगह से उठा और सलाखों के बिलकुल करीब आ गया। उसने विकास के कंधे को कसकर पकड़ लिया।
“मुझसे डरने की जरूरत नहीं है, विकास। जेल के अंदर तू सुरक्षित है, बशर्ते तू मुझे सच बता दे। उस रात वाकई क्या हुआ था? जब तू राकेश के कमरे में गया था, तो वहाँ कौन था?”
विकास की आँखें आंसुओं से भर गईं। उसका शरीर कांप रहा था। उसने फंसी हुई आवाज़ में कहा, “उस रात… जब मैं अपने कमरे से निकला था क्योंकि मुझे राकेश से पैसों के विवाद पर बात करनी थी… तब… तब जब मैं उसके कमरे के पास पहुँचा, तो दरवाजा खुला हुआ था।”
“फिर?” मनीष की सांसें तेज हो गईं।
“मैंने अंदर झांका… राकेश जमीन पर खून से लथपथ पड़ा था। उसकी साँसों की डोर टूट चुकी थी। मैं डर गया… मैं चीखना चाहता था, लेकिन तभी… तभी पीछे से किसी ने मेरे मुंह भींच दिया।” विकास की आवाज़ और धीमी हो गई, मानो वह उस भयानक रात को दोबारा जी रहा हो।
“किसने?” मनीष ने लगभग डांटते हुए पूछा।
“मुझे चेहरा साफ नहीं दिखा… कमरे में अंधेरा था… सिर्फ खिड़की से आती हल्की रोशनी थी। उस आदमी ने मेरे हाथ पकड़कर उस खून से सने चाकू पर जबरदस्ती रखवा दिए। उसने मेरे कान में कहा था—‘अगर जिंदा रहना चाहता है, तो चुपचाप पुलिस के सामने वही बोलियो जो मैं कहूँ। वरना अगला नंबर तेरा होगा।’”
मनीष का माथा ठनक गया। “और वह आदमी कौन था? क्या वह अर्जुन मेहरा था?”
विकास ने सिर हिलाया, “चेहरा तो मैंने नहीं देखा… लेकिन… लेकिन उसकी कलाई पर एक खास तरह का कड़ा बंधा हुआ था। एक भारी चांदी का कड़ा, जिस पर कुछ डिजाइन बनी थी।”
मनीष के दिमाग में बिजली कौंध गई। चांदी का कड़ा… भारी डिजाइन… यह हुलिया उसके दिमाग में किसी और की तरफ इशारा कर रहा था या खुद अर्जुन की तरफ?
“क्या वह अर्जुन था?” मनीष ने जोर देकर पूछा।
“नहीं… वह अर्जुन नहीं था,” विकास ने रोते हुए कहा। “अर्जुन मेहरा तो बाद में आया था… जब पुलिस आ चुकी थी। वह आदमी कोई और था… कोई ऐसा, जो बहुत लंबा और ताकतवर था… जिसकी परछाईं मैंने बाद में उस सीसीटीवी फुटेज में भी देखी थी!”
यह एक बहुत बड़ा सुराग था। मनीष को समझ आ गया कि केस में एक और किरदार ऐसा था जिसे अभी तक किसी ने नहीं देखा था—एक ‘दूसरा आदमी’, जो पर्दे के पीछे रहकर इस पूरे खेल को चला रहा था।
जेल से बाहर निकलते ही मनीष ने सीधे अपने दफ्तर का रुख नहीं किया। उसने अपनी गाड़ी का रुख शहर के उस पुराने पॉश इलाके की तरफ मोड़ा, जहाँ अर्जुन मेहरा का ऑफिस और आवास था।
धुंधलका गहराने लगा था। सर्दियों की शाम में मथुरा की सड़कों पर कोहरा छाने लगा था। मनीष की जिप्सी जब अर्जुन मेहरा के आलीशान बंगले के बाहर रुकी, तो वहाँ का सन्नाटा कुछ अजीब सा लग रहा था। बंगले के बाहर कोई गार्ड नजर नहीं आ रहा था, और मुख्य गेट पर एक ताला लटका हुआ था।
मनीष ने गाड़ी से उतरकर गेट के पास जाकर देखा। ताले पर धूल जमी थी, जिससे साफ पता चलता था कि यह पिछले दो-तीन दिनों से बंद है।
“अरे साहब, इन्हें ढूंढ रहे हो क्या?” पास ही पान की एक दुकान चलाने वाले बूढ़े ने अपनी दुकान से बाहर झांकते हुए कहा।
मनीष तेजी से उस बूढ़े के पास गया और अपना आईकार्ड दिखाते हुए पूछा, “बाबा, यहाँ जो वकील साहब रहते थे—अर्जुन मेहरा—वे कहाँ गए? पिछले दो दिनों से ताला क्यों लगा है?”
बूढ़े ने पान थूकते हुए कहा, “साहब, वे तो कल सुबह ही अपनी बड़ी सी गाड़ी में सारा सामान समेटकर कहीं बाहर चले गए। जाते वक्त कह रहे थे कि अब वे इस शहर में कभी वापस नहीं आएंगे। उन्होंने तो अपने दफ्तर के स्टाफ को भी एडवांस सैलरी देकर छुट्टी दे दी थी।”
मनीष का दिल एक पल के लिए बैठ गया।
वह भागकर अर्जुन के बंगले की दीवार के पास गया और फलांग कर अंदर कूद गया। बगीचे में सन्नाटा था। उसने बंगले के मुख्य दरवाजे के पास जाकर देखा—दरवाजा अंदर से बंद था, लेकिन एक खिड़की का शीशा हल्का सा चटका हुआ था।
मनीष ने अपनी जेब से एक छोटी सी लोहे की रॉड निकाली और सावधानी से खिड़की का कुंडा खोलकर अंदर दाखिल हुआ।
अंदर का नजारा चौंकाने वाला था।
आलीशान ड्राइंग रूम पूरी तरह खाली था। दीवारें सूखी थीं जहाँ से तस्वीरें उतार ली गई थीं। फर्नीचर पर चादरें पड़ी थीं। ऐसा लग रहा था कि यह घर महीनों से नहीं, बल्कि सालों से खाली हो। लेकिन एक बात अजीब थी—हवा में कॉफी की हल्की सी खुशबू आ रही थी, और सेंटर टेबल पर एक कप में अभी भी आधी कॉफी भरी हुई थी, जो हल्की गर्म थी।
मतलब, यहाँ कोई कुछ मिनट पहले ही मौजूद था।
मनीष ने अपनी सर्विस रिवॉल्वर निकाली और सतर्क कदमों से आगे बढ़ने लगा। घर के हर कमरे की तलाशी लेते हुए वह जब अर्जुन के स्टडी रूम में पहुँचा, तो वहाँ की दीवार पर टंगी एक बड़ी सी पेंटिंग के पास उसकी नजर रुक गई।
वह पेंटिंग S-17 प्रोजेक्ट की किसी पुरानी जमीन की थी।
मनीष ने उस पेंटिंग को थोड़ा सा हटाया, तो पीछे दीवार में एक छोटा सा तिजोरी नुमा बॉक्स बना हुआ था, जो खुला हुआ था। उसके अंदर एक पेन ड्राइव और एक लिफाफा रखा था।
मनीष ने दस्ताने पहने, पेन ड्राइव और लिफाफे को उठाया। लिफाफे पर उसके ही नाम से कुछ लिखा था— “For Inspector Manish Chaudhary.”
उसने दिल की धड़कनों को थामते हुए लिफाफा खोला और उसके अंदर का पत्र पढ़ा। लाल स्याही से बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था:
“प्रिय इंस्पेक्टर मनीष,
अगर आप यह पत्र पढ़ रहे हैं, तो इसका मतलब है कि आपकी जिद ने आपको यहाँ तक खींच ही लिया। आप एक अच्छे पुलिसवाले हैं, मनीष बाबू। आप सच की तलाश करना चाहते हैं, लेकिन आप यह भूल जाते हैं कि हर सच के कई पहलू होते हैं।
विकास मोहरा था, राकेश पापी था, और रामू काका अपनी किस्मत के मारे थे। लेकिन इस खेल का अंत अभी नहीं हुआ है। S-17 प्रोजेक्ट की असली फाइल अब डिजिटल रूप में इस पेन ड्राइव में है। उस आग में सिर्फ तीन लोग नहीं मरे थे, बल्कि चार लोग थे। चौथे इंसान का नाम क्या था? यह आपको इस पेन ड्राइव में मिल जाएगा। खेल अभी बाकी है, इंस्पेक्टर। मिलते हैं किसी नए मोड़ पर…”
पत्र पढ़ते ही मनीष की रीढ़ में एक सिहरन दौड़ गई।
चौथा इंसान?
S-17 प्रोजेक्ट की आग में तीन लोगों के मरने की बात सामने आई थी—जैसा कि रिकॉर्ड्स में दर्ज था। लेकिन अगर चौथा इंसान भी था, तो वह कौन था? और क्या वह जिंदा है या उसी आग में उसकी भी बलि दी गई थी?
मनीष ने तेजी से पेन ड्राइव अपनी जेब में रखी और बंगले से बाहर निकल आया। उसके माथै पर पसीना आ गया था, भले ही ठंड का मौसम था। उसे समझ आ गया था कि अर्जुन मेhra भागा नहीं है, बल्कि उसने जानबूझकर मनीष के लिए यह सुराग छोड़ा है। वह चाहता था कि मनीष इस गहराई तक उतरे।
रात के दस बज चुके थे। पुलिस स्टेशन का माहौल शांत था। मनीष अपने केबिन में अकेला बैठा था। उसने अपना पर्सनल लैपटॉप निकाला और उस पेन ड्राइव को उसमें प्लग इन किया।
ड्राइव में सिर्फ एक ही वीडियो फाइल थी। फाइल का नाम था— “The Truth of S-17.”
मनीष ने गहरी सांस ली और वीडियो प्ले कर दिया।
स्क्रीन पर अंधेरा था। कुछ सेकंड बाद एक पुराना, घबराया हुआ वीडियो चलना शुरू हुआ। यह किसी हैंडिकॉम कैमरे से शूट किया गया था। वीडियो में एक पुरानी फैक्ट्री का परिसर दिख रहा था—वही S-17 प्रोजेक्ट वाली जमीन। रात का वक्त था। चारों तरफ मशीनें थीं।
वीडियो में तीन लोग आपस में बहस कर रहे थे। एक तरफ राकेश मल्होत्रा था, दूसरी तरफ अमित वर्मा था, और तीसरा इंसान कौन था, उसका चेहरा साफ नहीं दिख रहा था क्योंकि उसने जैकेट का हुड पहना हुआ था।
वे तीनों किसी बात को लेकर आपस में झगड़ रहे थे।
तभी वीडियो में एक चौथी आवाज़ गूंजी—एक युवा लड़के की रोती हुई आवाज़।
“पापा! इन्हें मत छोड़िए! इन्होंने सब कुछ छीन लिया है हमारा!”
स्क्रीन पर एक चौदह-पंद्रह साल का लड़का दिखाई दिया, जिसके हाथ बंधे हुए थे और उसे एक खंभे से बांधा गया था। वह लड़का कोई और नहीं, बल्कि खुद अर्जुन मेहरा था—अपने बचपन के दिनों में!
मनीष की आँखें फटी की फटी रह गईं।
वीडियो में आगे दिखा कि राकेश मल्होत्रा ने गुस्से में आकर कहा, “अगर यह लड़का और इसका बाप जिंदा रहे, तो यह प्रोजेक्ट हमारे हाथ से निकल जाएगा। आग लगा दो इस गोदाम में! किसी को पता नहीं चलना चाहिए कि यहाँ कोई था।”
और इसके बाद… स्क्रीन पर चीख-पुकार मच गई। आग की लपटें उठने लगीं। कैमरे का एंगल हिल गया और जमीन पर गिर गया। वीडियो में दिख रहा था कि कैसे अर्जुन के पिता ने अपनी जान पर खेलकर उस छोटे से अर्जुन को एक खिड़की से बाहर धकेल दिया था, और खुद उस आग की भट्टी में समा गए थे।
वीडियो यहीं खत्म हो गया।
मनीष का खून खौल उठा। उसके हाथ कांपने लगे।
वह अब समझ चुका था कि अर्जुन मेहरा के दिल में यह नफरत क्यों थी। वह कोई आम क्रिमिनल या शातिर वकील नहीं था, बल्कि वह उस बच्चे का बड़ा हुआ रूप था, जिसके सामने उसके पिता को जिंदा जला दिया गया था। उसने कानूनी सिस्टम को हथियारों की तरह इस्तेमाल करके उन सभी लोगों को तबाह कर दिया जिन्होंने उसके परिवार को उजाड़ा था।
लेकिन… एक सवाल अभी भी बाकी था।
अगर अर्जुन ने यह सब बदला लेने के लिए किया, तो क्या इस खेल में कोई और भी शामिल था? वह ‘दूसरा आदमी’ कौन था जिसकी कलाई पर चांदी का कड़ा बंधा हुआ था और जिसका जिक्र विकास ने किया था?
तभी मनीष के फोन की घंटी बजी।
स्क्रीन पर अज्ञात नंबर फ्लैश हो रहा था।
मनीष ने तुरंत फोन उठाया और सख्त आवाज़ में कहा, “कौन है?”
फोन के दूसरी तरफ से एक ठंडी, सिहरन भरी हँसी गूंजी। वह आवाज़ अर्जुन मेहरा की नहीं थी। वह कोई और था।
“इंस्पेक्टर मनीष… वीडियो कैसा लगा? सच डरावना होता है ना?” उस शख्स ने कहा।
“तू कौन है? सामने आ!” मनीष चिल्लाया।
“मैं वहीं हूँ, इंस्पेक्टर साहब… जहाँ से इस खेल की शुरुआत हुई थी। अगर अपने उस छोटे से थाने से जिंदा बाहर निकलना चाहते हो, और सच का पूरा पर्दाफाश देखना चाहते हो, तो कल सुबह ठीक पाँच बजे… उसी पुरानी S-17 फैक्ट्री के खंडहर में अकेले आ जाना। वरना… अगला नंबर तुम्हारा होगा।”
फोन कट गया।
पूँ-पूँ की आवाज़ के साथ लाइन डेड हो गई।
मनीष ने फोन को मेज पर पटका। उसकी आँखों में डर नहीं, बल्कि एक अजीब सी जिद्द थी। उसने अपनी सर्विस रिवॉल्वर निकाली, उसकी मैगजीन चेक की, उसे लोड किया और अपनी कमर में खोंस लिया।
“खेल खत्म नहीं हुआ है…” मनीष ने खुद से कहा, और अपने केबिन की लाइट बुझाकर बाहर निकल गया।
बाहर मथुरा की ठंडी रात में कोहरा और घना हो चुका था, और उस कोहरे के पार एक ऐसा सच इंतजार कर रहा था जो सब कुछ बदल देने वाला था।
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अध्याय 2: खाकी और परछाई
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सर्दियों की उस रात का कोहरा मथुरा की सड़कों पर इस तरह पसर चुका था जैसे किसी ने सफेद चादर तान दी हो। घड़ी की सुई सुबह के चार बजा रही थी। हवा में गलन इतनी थी कि सांस लेते ही मुंह से धुंआ निकल रहा था। ऐसे वक्त में जहां पूरा शहर गहरी नींद में डूबा हुआ था, इंस्पेक्टर मनीष की गाड़ी की हेडलाइट्स अंधेरे को चीरती हुई शहर के बाहरी इलाके की तरफ बढ़ रही थीं।
जिप्सी का स्टीयरिंग थामे मनीष के हाथ कसकर भींचे हुए थे। उसके कानों में उस अज्ञात शख्स की वह धमकी बार-बार गूंज रही थी— "अगर अपने उस छोटे से थाने से जिंदा बाहर निकलना चाहते हो, तो कल सुबह ठीक पाँच बजे… उसी पुरानी S-17 फैक्ट्री के खंडहर में अकेले आ जाना।"
मनीष ने अपनी सर्विस रिवॉल्वर पर एक बार हाथ फेरकर यह सुनिश्चित कर लिया कि वह ठीक जगह पर है। वह जानता था कि यह बुलावा एक खतरनाक जाल हो सकता है। यह भी मुमकिन था कि वह फैक्ट्री मौत का कुआँ साबित हो, जहाँ कोई उसका इंतजार कर रहा हो। लेकिन मनीष चौधरी नाम का इंस्पेक्टर अपनी जान बचाने के लिए पीछे हटने वालों में से नहीं था। उसके जमीर में एक पुलिसवाले का कर्तव्य और एक इंसान की जिज्ञासा दोनों कुलाचे मार रहे थे।
दस मिनट बाद, जिप्सी एक वीरान और सुनसान इलाके में आकर रुकी।
सामने खड़ी थी—S-17 प्रोजेक्ट की वह पुरानी, जर्जर फैक्ट्री। दस साल पहले लगी उस रहस्यमयी आग ने इस इमारत को मलबे और कालिख में बदल दिया था। लोहे के बड़े-बड़े गार्टर मुड़े हुए थे, दीवारें आधी-अधूरी और काली पड़ चुकी थीं, और चारों तरफ झाड़ियों का साम्राज्य था। यहाँ परिंदा भी पर नहीं मारता था।
मनीष ने गाड़ी का दरवाजा खोला और बाहर पैर रखा। उसके जूतों के नीचे टूटी हुई ईंटें और कांच के टुकड़े चटकने की आवाज करने लगे। उसने अपनी टॉर्च ऑन की और उसकी पीली रोशनी को आगे के अंधेरे में घुमाया।
“कोई है?” मनीष की भारी और सख्त आवाज सन्नाटे को चीरते हुए गूंज उठी।
कोई जवाब नहीं आया। सिवाय ठंडी हवा के सनसनाहट के, वहाँ चारों तरफ मौत जैसी खामोशी छाई हुई थी।
मनीष ने सतर्क कदमों से आगे बढ़ना शुरू किया। उसने अपनी टॉर्च की रोशनी को फैक्ट्री के मुख्य हॉल की तरफ डाला। जहाँ कभी करोड़ों का कारोबार और मशीनों की गड़गड़ाहट गूंजती थी, आज वहाँ खामोश खंडहर और चमगादड़ों का डेरा था। फर्श पर जगह-जगह कालिख जमी हुई थी।
तभी—करीब सौ मीटर दूर, अंदरूनी हिस्से से किसी के जूतों के कदमों की आवाज सुनाई दी। खटाक… खटाक…
मनीष तुरंत एक टूटे हुए कंक्रीट के खंभे के पीछे छिप गया। उसने अपनी रिवॉल्वर को तान लिया और अपनी सांसों को रोक लिया ताकि कोई आवाज न हो।
“मुझे पता है तुम आ चुके हो, इंस्पेक्टर मनीष…” एक भारी और ठंडी आवाज उस अंधेरे हॉल में गूंजी। वह आवाज किसी इंसान की नहीं, बल्कि किसी गहरे कुएं से आती हुई प्रतीत हो रही थी। “इतनी ठंड में अकेले आना तुम्हारी बहादुरी है या बेवकूफी, यह तो वक्त बताएगा।”
मनीष ने खंभे की आड़ से बाहर झांकने की कोशिश की। टॉर्च की रोशनी में उसने देखा कि हॉल के बीचों-बीच एक साया खड़ा था। उसने लंबी काली ओवरकोट पहन रखा था, और सिर पर हुड था जिससे उसका आधा चेहरा ढंका हुआ था।
मनीष ने अपनी आवाज को कड़क बनाते हुए कहा, “सामने आओ! छिपकर बात करने से डर छिपता नहीं है। तुम कौन हो और इस खेल के पीछे तुम्हारा क्या मकसद है?”
वह साया हल्का सा मुस्कुराया। उसकी हंसी उस सन्नाटे में अजीब सी डरावनी लग रही थी। वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा। जैसे ही वह रोशनी के दायरे में आया, मनीष की आंखें फटी की फटी रह गईं।
वह शख्स कोई और नहीं, बल्कि… अमित वर्मा था!
वही अमित वर्मा, जिसे कुछ दिन पहले पुलिस ने संदिग्ध माना था, फिर जो अदालत में गवाह बनकर आया था, और जो पिछले कुछ दिनों से शहर से गायब चल रहा था।
मनीष ने अपनी रिवॉल्वर को और कसकर पकड़ा और आगे बढ़ते हुए कहा, “अमित! तुम? तुम इस सब के पीछे हो? विकास को मोहरा बनाना, रामू काका को रास्ते से हटाना, और अब यह नाटक… यह सब तुमने किया है?”
अमित ने अपनी हुड हटाई। उसके चेहरे पर कोई घबराहट नहीं थी, बल्कि एक अजीब सा सुकून था—जैसे कोई बहुत बड़ा बोझ उसके सिर से उतर गया हो। उसने अपने दोनों हाथ हवा में उठाए और व्यंग्य भरी मुस्कान के साथ कहा, “नाटक? वाह, इंस्पेक्टर साहब! इसे नाटक कहते हैं? यह तो वह हिसाब है जो दस साल से इस शहर के बाहुबली और अमीर लोग दबाए बैठे थे।”
“हिसाब?” मनीष ने गुस्से से पूछा, “खून बहाकर और बेकसूरों को फंसाकर कैसा हिसाब? राकेश मारा गया, रामू काका की गर्दन मरोड़ दी गई, और विकास जेल की सलाखों के पीछे सड़ रहा है। क्या यही तुम्हारा न्याय है?”
अमित जोर से हँस पड़ा। उसकी हँसी उस खंडहर की दीवारों से टकराकर गूँज उठी। “न्याय? इंस्पेक्टर, तुम पुलिस वाले कानून की किताब की रट लगाते हो। कानून उन लोगों के लिए बनता है जिनकी जेबें गर्म होती हैं। जब दस साल पहले इसी फैक्ट्री में राकेश मल्होत्रा और उसके साथियों ने हमारे सपनों को, हमारे अपनों को जिंदा जला दिया था, तब तुम्हारा यह कानून कहाँ था? तब क्या तुम्हें गरीबों के चीखने की आवाज सुनाई नहीं दी थी?”
मनीष का दिमाग तेजी से काम करने लगा। उसने अमित की तरफ देखते हुए कहा, “तो इसका मतलब अर्जुन मेहरा अकेला नहीं था… तुम दोनों इस खेल में साथ हो?”
“साथ?” अमित ने एक कदम आगे बढ़ाया। “अर्जुन और मेरा खून एक ही आग से खौला है, इंस्पेक्टर। बस फर्क इतना था कि अर्जुन पर्दे के आगे वकील बनकर खेल खेल रहा था, और मैं पर्दे के पीछे रहकर मोहरों को हिला रहा था।”
“तो फिर विकास को क्यों फंसाया? विकास तो तुम्हारा पार्टनर था!” मनीष ने सवाल किया।
“पार्टनर?” अमित के चेहरे पर नफरत के भाव उभर आए। “विकास और राकेश दोनों एक ही थाली के चट्टे-बट्टे थे। विकास अपनी कंजूसी और लालच में अपने ही भाई से नफरत करता था। मैंने तो बस उसकी नफरत को थोड़ा सा हवा दी, और बाकी का काम उसके अपने ही लालच ने कर दिया। मैंने तो सिर्फ चाकू पर उसके फिंगरप्रिंट्स लगाए थे, बाकी का जाल तो उसने खुद अपने इर्द-गिर्द बुन लिया था।”
“और रामू काका?” मनीष की आवाज में अब गुस्सा उबल रहा था। “वह बूढ़ा आदमी क्या गुनाह किया था? उसने तो सिर्फ एक रात चीख सुनी थी! उसे क्यों मारा?”
अमित का चेहरा अचानक गंभीर हो गया। उसकी आँखों में एक अजीब सा अंधकार तैर गया। “रामू काका ने उस रात सिर्फ चीख नहीं सुनी थी, इंस्पेक्टर… उसने मुझे उस कमरे से निकलते हुए देख लिया था। अगर वह जिंदा रहता, तो मेरा नाम सबसे पहले सामने आता। और मैं अभी जेल नहीं जाना चाहता था… मेरा मकसद अभी अधूरा था।”
“अधूरा मकसद?” मनीष ने सतर्क होते हुए पूछा। “यानी अभी इस खेल में और भी खून होना बाकी है?”
अमित ने अपनी जेब में हाथ डाला। मनीष को लगा कि वह कोई हथियार निकाल रहा है, इसलिए उसने तुरंत चेतावनी दी, “एक इंच भी हिले तो गोली मार दूंगा, अमित! हाथ बाहर निकालो!”
लेकिन अमित ने घबराने के बजाय अपनी जेब से एक छोटा सा कैसेट और एक डायरी निकाली और उन्हें जमीन पर फेंक दिया।
“गोली मारना चाहो तो मार लो, इंस्पेक्टर साहब,” अमित ने ठंडे स्वर में कहा। “वैसे भी मेरी जिंदगी का मकसद पूरा हो चुका है। राकेश मर चुका है, विकास जेल में है, और इस डायरी में S-17 प्रोजेक्ट के उन तमाम काले कारनामों और भ्रष्ट नेताओं के नाम दर्ज हैं जिन्होंने उस आग को लगवाने में राकेश की मदद की थी। यह सब कुछ मैंने तुम्हारे लिए यहाँ छोड़ा है।”
मनीष हैरान था। “तुम यह सब मुझे क्यों दे रहे हो? तुम खुद क्यों सरेंडर कर रहे हो?”
अमित ने आसमान की तरफ देखा जहाँ कोहरे के बीच सुबह की हल्की सी लाली फूटने लगी थी। “सरेंडर? मैं सरेंडर नहीं कर रहा, इंस्पेक्टर। मैं तो बस उस अंजाम तक पहुँच रहा हूँ जो दस साल पहले तय हो चुका था।”
इससे पहले कि मनीष कुछ समझ पाता, अमित ने अपनी जेब से कुछ निकाला और उसे अपने मुंह में रख लिया। उसके जबड़े तेजी से हिले, और एक तीखी गंध हवा में फैल गई।
“अमित! यह क्या किया तुमने?!” मनीष चीखते हुए उसकी तरफ दौड़ा।
लेकिन बहुत देर हो चुकी थी। अमित की आँखें फैल गईं, उसके मुँह से झाग निकलने लगा, और वह लड़खड़ाकर उसी कालिख से सने फर्श पर धड़ाम से गिर पड़ा। मनीष ने उसके पास बैठकर उसकी नब्ज टटोली—वह ठंडी पड़ चुकी थी। अमित ने पोटैशियम साइनाइड खाकर मौके पर ही दम तोड़ दिया था।
खंडहर में एक बार फिर भयानक सन्नाटा छा गया।
मनीष उस लाश के पास खड़ा होकर सांसें ले रहा था। उसके माथे से पसीने की बूंदें टपक रही थीं। खेल का एक और मुख्य किरदार खामोश हो चुका था।
सूरज पूरी तरह निकल चुका था, लेकिन मथुरा शहर पर छाई धुंध और कोहरा कम होने का नाम नहीं ले रहा था।
पुलिस स्टेशन के अपने केबिन में लौटे मनीष की आँखें लाल थीं। उसके हाथ में वह डायरी और पुराना कैसेट था जो अमित ने मरने से पहले छोड़ा था। उसके साथ सब-इंस्पेक्टर अजय भी खड़ा था, जिसके चेहरे पर खौफ और हैरानी के भाव साफ झलक रहे थे।
“सर… अमित ने… अमित ने खुदकुशी कर ली?” अजय की आवाज कांप रही थी। “मतलब पूरा केस अब बंद हो जाएगा? गवाह भी गया, आरोपी भी गया?”
मनीष ने अपनी मेज पर मुक्का मारा, जिससे चाय का कप खनक उठा। “बंद नहीं हुआ है, अजय! यह तो असली शुरुआत है। अमित ने मरते वक्त मुझे जो डायरी दी है, वह इस शहर के कई बड़े दिग्गजों के गले की फांस बनने वाली है।”
मनीष ने अपनी मेज पर रखी उस डायरी को खोला। पन्ने पीले पड़ चुके थे, लेकिन उस पर लिखी गई हर एक लाइन किसी बम से कम नहीं थी। डायरी में मथुरा के कई जाने-माने उद्योगपति, दो बड़े राजनेता, और एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का नाम दर्ज था—जिन्होंने S-17 प्रोजेक्ट की उस जमीन पर कब्जा करने के लिए राकेश मल्होत्रा के साथ मिलकर उस भयानक आग की साजिश रची थी।
“इसका मतलब,” अजय ने हैरान होकर कहा, “राकेश सिर्फ एक मोहरा था? या वह इन सबका सरगना था?”
“राकेश उस syndicate का सिर्फ एक प्यादा था जो जमीन हड़पना चाहता था,” मनीष ने गंभीर स्वर में कहा। “और इस डायरी के हिसाब से, उस सिंडिकेट का सबसे बड़ा चेहरा कोई और है… एक ऐसा शख्स जो आज भी पर्दे के पीछे बैठकर शहर की राजनीति और कानून को चला रहा है।”
“कौन है वह शख्स, सर?” अजय ने सांस रोककर पूछा।
मनीष ने डायरी के आखिरी पन्ने को पलटा। उस पर एक नाम लिखा था— ‘ब्रिजमोहन शास्त्री’।
इस नाम को पढ़ते ही मनीष के पैरों तले जमीन खिसक गई। ब्रिजमोहन शास्त्री—वही शख्स जो शहर का सबसे बड़ा विधायक और पूर्व गृह मंत्री था, जिसके बंगले पर पुलिस के बड़े-बड़े अधिकारी माथा टेकते थे, और जिसके नाम से पूरा प्रशासनिक तंत्र कांपता था।
“ब्रिजमोहन शास्त्री…” मनीष के मुंह से धीमी आवाज में निकला। “तो यह खेल सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि सत्ता और खून की सियासत का था।”
“लेकिन सर, अगर यह सच है, तो हमारे पास क्या सबूत है?” अजय ने घबराते हुए कहा। “ब्रिजमोहन शास्त्री के खिलाफ हाथ डालना आग से खेलने जैसा है। बिना पुख्ता सबूत के हम उसका बाल भी बांका नहीं कर सकते, और ऊपर से राजनीतिक दबाव अलग से आएगा।”
मनीष अपनी कुर्सी से खड़ा हुआ। उसकी आँखों में अब कोई उलझन नहीं थी, बल्कि एक चट्टान जैसी दृढ़ता थी। उसने अपनी खाकी वर्दी की कॉलर को ठीक किया और अपनी सर्विस रिवॉल्वर को वापस कमर में खोंस लिया।
“सबूत इस डायरी में भी है, अजय… और उस पेन ड्राइव में भी जो अर्जुन ने मुझे दी थी,” मनीष ने कड़े स्वर में कहा। “लेकिन सबसे बड़ा सबूत यह है कि अब सच हमारे सामने आ चुका है। चाहे किती भी बड़ी राजनीतिक ताकत क्यों न हो, खाकी का इकबाल अभी मरा नहीं है।”
“सर, आप क्या करने वाले हैं?” अजय ने पूछा।
“मैं जा रहा हूँ… उस शख्स के पास जो इस पूरे खेल का असली मास्टरमाइंड है,” मनीष ने दरवाजे की तरफ कदम बढ़ाते हुए कहा। “अर्जुन मेहरा ने अपने पिता की मौत का बदला लेने के लिए इस सिस्टम को हिला दिया था। अब मेरी बारी है… इस सिस्टम से न्याय छीनने की।”
दोपहर का वक्त था। मथुरा के वीआईपी इलाके में स्थित ब्रिजमोहन शास्त्री का आलीशान कोठीनुमा बंगला किसी किले से कम नहीं था। बंगले के बाहर सुरक्षा गार्डों का कड़ा पहरा था, और कई लग्जरी गाड़ियाँ खड़ी थीं।
मनीष की जिप्सी जब सीधे उस बंगले के मुख्य गेट पर जाकर रुकी, तो वहां मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने तुरंत बंदूकें तान लीं।
“रुकिए! आगे जाना मना है! यह विधायक ब्रिजमोहन शास्त्री का निवास है!” एक गार्ड ने चिल्लाते हुए कहा।
मनीष ने जिप्सी का दरवाजा खोला और नीचे उतरा। उसने अपनी खाकी वर्दी के बटनों को ठीक किया, चेहरे पर एक सख्त और निर्भीक भाव लिए वह सीधे गेट की तरफ बढ़ा। उसने अपना पुलिस आईडी कार्ड गार्ड के चेहरे के सामने कर दिया।
“इंस्पेक्टर मनीष चौधरी,” मनीष की आवाज में लोहे जैसी कड़क थी। “मुझे विधायक ब्रिजमोहन शास्त्री से तुरंत मिलना है। रास्ता छोड़ो।”
गार्ड ने आईडी कार्ड देखा और घबरा गया। उसने तुरंत अंदर फोन घुमाया। कुछ ही पलों में गेट का बड़ा सा लोहे का दरवाजा खुल गया।
मनीष बिना किसी हिचकिचाहट के अंदर दाखिल हुआ। संगमरमर के फर्श वाले उस विशाल ड्राइंग रूम में जब वह पहुँचा, तो उसने देखा कि सफेद खादी के कुर्ते-पजामे में सजे ब्रिजमोहन शास्त्री एक बड़े से सोफे पर बैठे थे, और उनके सामने एक मेज पर चाय की प्याली रखी थी। उनके चेहरे पर वही पुरानी, राजनीतिक और मक्कार मुस्कान थी।
“आइए, आइए इंस्पेक्टर मनीष!” ब्रिजमोहन शास्त्री ने अपनी जगह से उठे बिना हाथ जोड़कर कहा, जैसे वे किसी पुराने दोस्त का स्वागत कर रहे हों। “मैंने अखबारों में तुम्हारी बहादुरी के चर्चे बहुत सुने हैं। बैठिए, चाय लेंगे या कॉफी?”
मनीष ने उनकी तरफ देखा, लेकिन सोफे पर बैठने के बजाय वह उनके बिल्कुल सामने आकर खड़ा हो गया। उसने अपनी जैकेट की जेब से वह पुरानी डायरी निकाली और सीधे ब्रिजमोहन शास्त्री की चाय की मेज पर पटक दी।
डायरी के गिरते ही ब्रिजमोहन की वह मुस्कान पल भर के लिए फीकी पड़ गई। उन्होंने अपनी नजरें उस डायरी पर डालीं, फिर धीरे से ऊपर उठाकर मनीष को देखा।
“यह क्या है, इंस्पेक्टर साहब?” शास्त्री ने शांत स्वर में पूछा, हालांकि उनकी आवाज में हल्की सी कनकनी थी।
“यह उस आग का दस्तावेज है, शास्त्री जी… जो दस साल पहले S-17 प्रोजेक्ट की जमीन पर जलाई गई थी,” मनीष ने अपनी आँखों को उनकी आँखों में गड़ाते हुए कहा। “राकेश मोहरा था, अमित प्यादा था, और विकास बेवकूफ था… लेकिन इस खेल का असली राजा आप हैं।”
कमरे का तापमान अचानक जैसे शून्य पर पहुँच गया। आसपास खड़े सुरक्षा गार्डों ने अपनी बंदूकों के हथियारों पर हाथ रख लिया।
ब्रिजमोहन शास्त्री ने धीरे से चाय की प्याली उठाई, एक घूंट पिया, और फिर बड़े इत्मीनान से उसे वापस रख दिया। उन्होंने अपनी सफेद मूंछों पर हाथ फेरा और ठंडी हंसी हँसे।
“इंस्पेक्टर मनीष…” शास्त्री ने बहुत नपे-तुले शब्दों में कहा, “तुम्हारी उम्र अभी बहुत कम है। तुम सिर्फ वर्दी के नशे में तैर रहे हो। यह सियासत है बेटा… यहाँ आग कोई और लगाता है, और हाथ किसी और के जलते हैं। जो डायरी तुमने मेज पर रखी है ना, यह कानून की नजर में एक कबाड़ का कागज है। कोर्ट इसे सबूत नहीं मानेगा।”
“कानून सबूत मांगेगा या नहीं, यह अदालत तय करेगी, शास्त्री जी,” मनीष ने अपनी आवाज को और सख्त करते हुए कहा। “लेकिन यह सच है कि आपके हाथों पर उन बेकसूरों का खून लगा है। और उस खून का हिसाब अब थाने में नहीं, सीधे कटघरे में होगा।”
शास्त्री अपनी जगह से खड़े हो गए। उनकी लंबाई और उनका रसूख उस कमरे में भारी पड़ने लगा था। उन्होंने मनीष के बिल्कुल करीब आकर उसके कंधे पर हाथ रखा और फुसफुसाते हुए कहा, “तुम मुझे गिरफ्तार नहीं कर पाओगे, मनीष बाबू। क्योंकि थोड़ी देर में कमिश्नर का फोन तुम्हारे थाने की घंटी बजा रहा होगा… और तुम्हारा ट्रांसफर इस शहर से इतनी दूर हो चुका होगा जहाँ से तुम कभी वापस लौटकर नहीं आ पाओगे।”
मनीष ने बिना एक पल गंवाए, अपना हाथ आगे बढ़ाया और ब्रिजमोहन शास्त्री की कलाई को कसकर दबोचते हुए अपनी कमर से हथकड़ी निकाल ली।
“ट्रांसफर बाद में देख लेना, शास्त्री जी…” मनीष की आवाज में गजब का खौफ और दृढ़ता थी। “फिलहाल… गिरफ़्तारी का वक्त हो गया है।”
छन से हथकड़ी की धातु की आवाज उस आलीशान कमरे में गूँज उठी। ब्रिजमोहन शास्त्री के चेहरे का रंग उड़ गया, और उनके मुँह से चीख निकल पड़ी— “यह तुम्हारी सबसे बड़ी भूल है, इंस्पेक्टर! तुम नहीं जानते तुम किससे पंगा ले रहे हो!”
“मैं जानता हूँ,” मनीष ने हथकड़ी को कसते हुए कहा, “मैं खाकी से पंगा ले रहा हूँ जब वह बिक जाए, और सच से पंगा ले रहा हूँ जब वह छिप जाए… पर आज सच जीतेगा।”
कोहरे से ढकी मथुरा की उस दोपहर में, एक भ्रष्ट राजनेता के हाथों में हथकड़ी पड़ चुकी थी। लेकिन मनीष जानता था कि यह सिर्फ एक लड़ाई की जीत थी। असली युद्ध—यानी Courtroom 302 का दूसरा अध्याय—तो अब शुरू होने वाला था, जहाँ कानून, राजनीति और बदले की आग आमने-सामने खड़ी होने वाली थी।
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अध्याय 3: कटघरे का चक्रव्यूह
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मथुरा की जिला अदालत का परिसर हमेशा की तरह खचाखच भरा हुआ था। कचहरी की पुरानी दीवारों, वकीलों के काले कोटों की फड़फड़ाहट, मुंसियों की दौड़-भाग और मुवक्किलों की उम्मीद भरी आंखों के बीच आज एक अजीब सा तनाव हवा में तैर रहा था। बात ही कुछ ऐसी थी। शहर के सबसे शक्तिशाली और रसूखदार राजनेता—पूर्व गृह मंत्री ब्रिजमोहन शास्त्री—की गिरफ्तारी ने पूरे उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में भूचाल ला दिया था।
जो शख्स कभी पुलिस कमिश्नर से लेकर अदालतों के फैसलों तक को अपनी उंगलियों पर नचाता था, आज वह उसी सिस्टम की गिरफ्त में था।
ठीक सुबह दस बजे, अदालत के मुख्य द्वार पर पुलिस की वैन आकर रुकी। भारी पुलिस बल के बीच जब ब्रिजमोहन शास्त्री को उतारा गया, तो उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। उनके सफेद खादी के कुर्ते पर एक भी सिलवट नहीं थी, और उनकी चाल में वही पुराना राजनीतिक अहंकार झलक रहा था। उनके चारों तरफ वकीलों की फौज थी, जो मीडिया के कैमरों से उन्हें बचाते हुए अंदर ले जा रही थी।
उसी भीड़ के ठीक पीछे, इंस्पेक्टर मनीष अपनी खाकी वर्दी में शान से सिर उठाकर चल रहा था। उसकी आँखों में एक अजीब सा सुकून और जीत की चमक थी। उसने एक भ्रष्ट राजनेता को हथकड़ियों में जकड़कर अदालत के दरवाजे तक पहुंचा दिया था। उसे लगा था कि अब सच की जीत पक्की है, और ‘Courtroom 302’ में न्याय का सूरज पूरी चमक के साथ उगेगा।
लेकिन मनीष यह नहीं जानता था कि राजनीति और कानून की इस शतरंज की बिसात पर, प्यादे सिर्फ मोहरे बदलते हैं, खिलाड़ी वही रहते हैं।
Courtroom 302 के अंदर खामोशी पसरी हुई थी। यह वही कमरा था जहाँ कुछ दिन पहले विकास मल्होत्रा को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। आज इस कमरे का माहौल और भी ज्यादा गंभीर था। जज साहब अपनी कुर्सी पर विराजमान हो चुके थे। वकीलों की बहस शुरू होने से पहले ही कमरे में एक भारी सन्नाटा छाया हुआ था।
कठघरे में खड़े ब्रिजमोहन शास्त्री ने एक गहरी सांस ली और अपने महंगे चमड़े के जूतों पर नजर डाली। उनके चेहरे पर वह मक्कार मुस्कान फिर से लौट आई थी।
“सरकारी वकील साहब,” जज साहब ने अपनी गंभीर आवाज में कहा, “अभियोजन पक्ष यह स्पष्ट करे कि इतने साल पुराने मामले में अचानक इस तरह की गिरफ्तारी का आधार क्या है? और आपके पास आरोपी के खिलाफ क्या ठोस सबूत हैं?”
सरकारी वकील साहब थोड़े असहज दिखे। उन्होंने अपनी फाइल खोली और हकलाते हुए बोले, “म्यूलॉर्ड, हमारे पास एक डायरी है जो अमित वर्मा नाम के एक शख्स के पास से मिली थी, और साथ ही S-17 प्रोजेक्ट की एक पेन ड्राइव है। इसमें आरोपी ब्रिजमोहन शास्त्री और अन्य लोगों के नाम उस आगजनी की साजिश में शामिल होने के पुख्ता संकेत मिलते हैं…”
“इत्यादि, इत्यादि! सिर्फ कयास और कबाड़ के कागजात!”
एक तीखी, कड़क और जानी-पहचानी आवाज ने सरकारी वकील की बात बीच में ही काट दी।
Courtroom 302 के दरवाजे खुले, और काले कोट में लिपटा एक शख्स बहुत ही शालीनता से अंदर दाखिल हुआ। उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी, और उसके कदम सधे हुए थे।
इंस्पेक्टर मनीष ने जैसे ही उस शख्स को देखा, उसका खून खौल उठा।
वह अर्जुन मेहरा था!
वही अर्जुन मेहरा, जो कुछ दिन पहले शहर छोड़कर जाने का नाटक कर रहा था, जो अमित वर्मा और विकास को अपने इशारों पर नचा रहा था, और जो अब इस खेल का सबसे बड़ा मास्टरमाइंड बनकर सामने खड़ा था।
जज साहब ने चौंककर पूछा, “आप कौन हैं? और अनुमति के बिना अदालत की कार्यवाही में इस तरह दखल क्यों दे रहे हैं?”
अर्जुन मेहरा ने अपनी टाई ठीक की, जज की तरफ झुककर सम्मानपूर्वक सिर झुकाया, और फिर अपनी आवाज में गजब का ठहराव लाते हुए कहा, “म्यूलॉर्ड, मैं अर्जुन मेहरा हूँ—एडवोकेट। और आज इस अदालत में, मैं किसी और का नहीं, बल्कि खुद न्याय का प्रतिनिधित्व करने आया हूँ। और सबसे बड़ी बात यह है कि इस मामले में जो डायरी और पेन ड्राइव पेश की गई है, वह कानून की नजर में पूरी तरह से अवैध और नाकाफी है।”
यह सुनकर सरकारी वकील के साथ-साथ इंस्पेक्टर मनीष के भी होश उड़ गए। मनीष अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ और गुस्से से लगभग चीखते हुए बोला, “झूठ बोल रहा है यह! वह डायरी और पेन ड्राइव इस बात का सबूत है कि शास्त्री ने उस आगजनी की साजिश रची थी जिसमें बेकसूरों की जान गई थी!”
“ऑर्डर! ऑर्डर!” जज साहब ने अपनी हथौड़ी मेज पर जोर से मारी। “इंस्पेक्टर मनीष, यह कोई पुलिस स्टेशन नहीं है, अदालत है! आप अपनी जगह पर बैठिए। कोर्ट की अवमानना के लिए आपको बाहर भी निकाला जा सकता है।”
मनीष मुट्ठियाँ भींचकर अपनी बेंच पर बैठ गया, लेकिन उसकी आँखें अर्जुन मेहरा पर टिकी थीं। अर्जुन ने एक ठंडी नजर मनीष पर डाली, उसके बाद जज की तरफ मुड़कर बड़े ही सधे हुए शब्दों में अपनी दलील रखनी शुरू की।
“म्यूलॉर्ड,” अर्जुन ने अदालत में घूमते हुए कहा, “सरकारी पक्ष जिस डायरी और पेन ड्राइव को सबूत बता रहा है, उसकी प्रामाणिकता (Authenticity) क्या है? कानून कहता है कि कोई भी दस्तावेज जो किसी मृत व्यक्ति (अमित वर्मा, जिसने खुदकुशी कर ली) के पास से मिला हो और जिसकी फोरेंसिक जांच अभी तक पूरी तरह से वेरिफाई न हुई हो, उसे सीधा सबूत नहीं माना जा सकता। और जहाँ तक पेन ड्राइव का सवाल है, वह एक अज्ञात स्रोत से आई है। डिजिटल एविडेंस एक्ट के तहत बिना किसी सर्टिफाइड सर्टिफिकेट के ऐसी पेन ड्राइव कचरे के डिब्बे में डालने लायक होती है, अदालत में पेश करने लायक नहीं।”
न्यायाधीश ने गंभीर मुद्रा में अपनी फाइल देखी और फिर सरकारी वकील से पूछा, “क्या अभियोजन पक्ष के पास इस बात का कोई चश्मदीद गवाह या फोरेंसिक रिपोर्ट है जो यह साबित कर सके कि ब्रिजमोहन शास्त्री उस रात S-17 प्रोजेक्ट पर मौजूद थे या उन्होंने कोई लिखित आदेश दिया था?”
सरकारी वकील के पास कोई जवाब नहीं था। वह पसीना पोंछते हुए खामोश खड़ा रहा।
अर्जुन मेहरा ने मुस्कुराते हुए अंतिम प्रहार किया, “म्यूलॉर्ड, पुलिस ने अपनी वाहवाही लूटने और मीडिया की सुर्खियों में बने रहने के लिए एक सम्मानित राजनेता को बिना किसी पुख्ता और कानूनी रूप से वैध सबूत के गिरफ्तार कर लिया है। यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन है। इसलिए, मैं इस अदालत से मांग करता हूँ कि ब्रिजमोहन शास्त्री को तत्काल प्रभाव से इस झूठे और मनगढ़ंत मामले से बरी किया जाए!”
Courtroom 302 में एक सन्नाटा छा गया।
जज साहब ने कुछ पलों के लिए फाइल को देखा, फिर ब्रिजमोहन शास्त्री की तरफ नजर डाली, और अंत में कड़े स्वर में फैसला सुनाया— “चूंकि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ कोई ठोस और कानूनी रूप से स्वीकार्य सबूत पेश करने में असमर्थ रहा है, और प्रस्तुत किए गए दस्तावेज फोरेंसिक जांच के दायरे में अस्पष्ट हैं, इसलिए अदालत ब्रिजमोहन शास्त्री को इस मामले से बरी करती है। पुलिस को कड़ी चेतावनी दी जाती है कि वे इस तरह की आधारहीन कार्रवाई से बचें।”
“केस डिसमिस्ड!”
हथौड़ी की एक और गूँज के साथ Courtroom 302 का पासा पूरी तरह पलट चुका था।
ब्रिजमोहन शास्त्री के चेहरे पर विजय की एक भयानक मुस्कान तैर गई। उनके वकील और समर्थक उन्हें बधाई देने लगे। शास्त्री ने उठते हुए एक बार तिरछी नजरों से इंस्पेक्टर मनीष की तरफ देखा, जैसे वह कह रहे हों— “देखा, मैंने कहा था ना? कानून और सियासत मेरे इशारे पर नाचते हैं।”
अदालत के बाहर गलियारे में भारी भीड़ जमा थी। मीडिया के कैमरे और रिपोर्टर चारों तरफ से माइक ताने खड़े थे। ब्रिजमोहन शास्त्री मुस्कुराते हुए बाहर निकले और उन्होंने बड़ी शान से मीडिया के सामने बयान दिया, “यह सत्य की जीत है! विपक्षी ताकतों ने मुझे और मेरी पार्टी को बदनाम करने के लिए यह घटिया राजनीतिक षड्यंत्र रचा था, जिसे अदालत ने बेनकाब कर दिया है।”
ठीक उसी भीड़ के बीच से गुजरते हुए इंस्पेक्टर मनीष के कदम रुक गए। उसने देखा कि अर्जुन मेहरा सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था।
मनीष तेजी से आगे बढ़ा और अर्जुन का रास्ता रोकते हुए उसके सामने खड़ा हो गया। उसकी आँखों में गुस्सा उबल रहा था।
“तुम खेल क्या रहे हो, अर्जुन?!” मनीष की आवाज गुस्से से कांप रही थी। “तुम खुद उस आग में अपने पिता को खो चुके हो! तुमने ही तो मुझे वो वीडियो दिया था, तुमने ही तो अमित और विकास को कठपुतली की तरह नचाया था! और आज… आज तुमने उसी कातिल ब्रिजमोहन शास्त्री को अपनी वकालत के दम पर बचा लिया? क्या तुम्हारी आत्मा को जरा भी कचोट नहीं होती?”
अर्जुन ने अपनी कोट के बटन बंद किए, बहुत ही शांत भाव से मनीष की आँखों में देखा, और एक गहरी मुस्कान के साथ कहा, “आत्मा? इंस्पेक्टर मनीष, आत्मा बहुत पहले उस आग में जलकर खाक हो चुकी थी।”
“तो फिर यह ड्रामा क्यों?” मनीष चिल्लाया। “क्यों अमित को मारा? क्यों विकास को फंसाया? और क्यों उस कातिल को कोर्ट से बाइज्जत bरी करवा दिया?”
अर्जुन ने मनीष के बिल्कुल करीब आकर उसके कान में फुसफुसाते हुए कहा, “क्योंकि अदालत के कागजों में न्याय मिलना मुमकिन हो सकता है, इंस्पेक्टर… लेकिन असली इंसाफ कचहरी की दीवारों के बाहर होता है। शास्त्री को मैंने अदालत से बचाया है, जिंदगी से नहीं।”
मनीष का माथा ठनक गया। उसके दिमाग में अर्जुन की बात गूँज उठी।
इससे पहले कि मनीष कुछ और पूछता, अर्जुन वहाँ से मुड़ा और अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ गया। कुछ ही पलों में उसकी कार धूल उड़ाती हुई वहां से ओझल हो गई।
रात के दो बज चुके थे। मथुरा का मौसम और ज्यादा सर्द हो चुका था।
ब्रिजमोहन शास्त्री का आलीशान बंगला अब पूरी तरह शांत था। कचहरी से छूटने के बाद शास्त्री ने अपने खास मेहमानों के साथ जश्न मनाया था, और अब वे अपने बेडरूम में गहरी नींद में सो रहे थे। सुरक्षा गार्ड बाहर गश्त लगा रहे थे, और कोहरे की चादर ने पूरे बंगले को अपनी आगोश में ले रखा था।
अचानक… बंगले की मुख्य दीवार पर किसी के कूदने की हल्की सी आवाज हुई।
एक साया, जिसने पूरी तरह काले कपड़े पहन रखे थे और चेहरे पर नकाब था, बहुत ही फुर्ती से जमीन पर उतरा। उसने बिना कोई आवाज किए गार्ड्स की नजरों से बचते हुए पीछे के वेंटिलेशन और बालकनी के रास्ते बंगले के अंदर प्रवेश कर लिया।
वह साया कोई और नहीं, बल्कि अर्जुन मेहरा था।
उसके हाथ में एक लंबी, चमकदार धातु की छड़ (या ऐसा ही कोई भारी उपकरण) थी। वह किसी चोर की तरह नहीं, बल्कि किसी यमराज की तरह खामोश और खतरनाक कदमों से आगे बढ़ रहा था। उसे बंगले का कोना-कोना पता था क्योंकि दस साल पहले इसी परिवार के साथ उसके पिता के कारोबारी रिश्ते हुआ करते थे।
चलते-चलते वह सीधे ब्रिजमोहन शास्त्री के मास्टर बेडरूम के दरवाजे के पास पहुँचा। दरवाजा अंदर से बंद था, लेकिन एक चाबी का गुच्छा उसके पास पहले से था। उसने बहुत ही सावधानी से चाबी घुमाई— *क्लिक* की हल्की सी आवाज के साथ दरवाजा खुल गया।
कमरे के अंदर सन्नाटा था। एसी की ठंडी हवा चल रही थी और बेड पर ब्रिजमोहन शास्त्री खर्राटे लेते हुए सो रहे थे।
अर्जुन धीरे-धीरे कदमों से बिस्तर के पास पहुँचा। उसने अपने चेहरे से नकाब हटा दिया। उसकी आँखों में दस साल का दर्द, गुस्सा और बदला एक साथ अंगारे की तरह दहक रहा था।
उसने अपनी जेब से एक पुराना, घिसा हुआ चांदी का लॉकेट निकाला—वही लॉकेट जो उसके पिता ने उस आग में जलने से पहले उसके गले में डाला था। उसने वह लॉकेट शास्त्री के तकिए के पास रख दिया।
लॉकेट के गिरने की हल्की सी आहट से ब्रिजमोहन शास्त्री की नींद खुल गई।
शास्त्री ने चौंककर अपनी आँखें खोलीं और सामने अंधेरे में किसी को खड़े देखा। उनकी सांसें अटक गईं। उन्होंने घबराते हुए लाइट का स्विच ऑन करना चाहा, लेकिन इससे पहले कि वे अपना हाथ बढ़ाते, अर्जुन ने तेजी से आगे बढ़कर अपना भारी हाथ उनके मुंह पर रख दिया।
“म… म… कौन?” शास्त्री की आवाज उनके गले में ही घुट कर रह गई।
अर्जुन ने अपने चेहरे को बेड की डिम लाइट के सामने किया और बहुत ही ठंडे, कातिलाना स्वर में कहा, “पहचाना नहीं, शास्त्री जी? दस साल पहले S-17 प्रोजेक्ट की उस रात… जब आपने और राकेश ने मिलकर उस गोदाम में आग लगवाई थी, तब मेरे पिता ने मुझे खिड़की से बाहर फेंका था।”
शास्त्री के होश उड़ गए। उनकी आँखें डर से फटी की फटी रह गईं। उन्होंने पहचान लिया—यह वही छोटा लड़का था, जिसे वे मरा हुआ समझ बैठे थे।
“अ… अर्जुन… तुम… तुम जिंदा हो?” शास्त्री कांपते हुए थूक निगले।
“मैं जिंदा इसलिए हूँ, शास्त्री जी, ताकि इस शहर के सबसे बड़े मक्कार को उसकी औकात याद दिला सकूँ,” अर्जुन ने अपनी आवाज को और भारी किया। “अदालत ने आपको सबूतों के अभाव में छोड़ दिया होगा… कानून की किताबें शायद आपकी पहुंच से बहुत दूर हों… लेकिन आज, Courtroom 302 का असली फैसला इस कमरे में होगा।”
शास्त्री ने घिघियाते हुए कहा, “पैसा… तुम्हें जितना पैसा चाहिए ले लो! ज़मीन, जायदाद, सब तुम्हारे नाम कर दूंगा! मुझे छोड़ दो…”
“पैसा?” अर्जुन जोर से हँसा, लेकिन उसकी हँसी में कोई खुशी नहीं, सिर्फ जहर था। “मेरे पिता की जान की कीमत दुनिया का कोई खजाना नहीं चुका सकता, शास्त्री जी। और आज मैं आपसे पैसे मांगने नहीं आया… हिसाब चुकाने आया हूँ।”
इसके बाद कमरे में क्या हुआ, इसकी गवाही सिर्फ दीवारों पर पड़ी परछाइयों ने दी। शास्त्री की दबी हुई चीखें उस आलीशान बेडरूम की दीवारों में ही दम तोड़ गईं।
अगली सुबह, मथुरा की पुलिस लाइन में फोन की घंटी लगातार बज रही थी।
सब-इंस्पेक्टर अजय भागते हुए इंस्पेक्टर मनीष के केबिन में आया। उसके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ी हुई थीं।
“सर… सर, जल्दी चलिए!” अजय ने हांफते हुए कहा।
“क्या हुआ अजय? इतनी सुबह क्यों चिल्ला रहे हो?” मनीष ने अपनी टेबल से सिर उठाते हुए पूछा।
“सर… ब्रिजमोहन शास्त्री… उनका खून हो गया है! कल रात उनके ही बेडरूम में किसी ने उनका गला रेत दिया है! और… और मौके से एक चीज मिली है जो आपको देखनी चाहिए।”
मनीष का दिल जोर से धड़क उठा। वह अपनी कुर्सी से उछलकर खड़ा हो गया। “किसका खून? शास्त्री का? और क्या मिला है मौके पर?”
“यह…” अजय ने अपने हाथ से एक पुराना चांदी का लॉकेट मनीष की टेबल पर रख दिया।
मनीष ने उस लॉकेट को उठाया। उस पर एक खास निशान बना हुआ था—वही निशान जो अर्जुन मेहरा के पास देखा गया था। और उसके साथ ही, मेज पर एक खून से सना हुआ कागज़ का टुकड़ा पड़ा था जिस पर लाल स्याही से लिखा था:
Courtroom 302 का फैसला पूरा हुआ।
मनीष की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसे अब समझ आ गया था कि अर्जुन मेहरा ने कोर्ट से शास्त्री को क्यों बरी करवाया था। वह कानून के रास्ते से नहीं, बल्कि अपने हाथों से खून का बदला लेना चाहता था।
“अर्जुन…” मनीष के मुँह से धीमी आवाज में निकला। “तूने कानून को चकमा दे दिया, लेकिन तू यह भूल गया कि इंस्पेक्टर मनीष अभी जिंदा है!”
मनीष ने अपनी सर्विस रिवॉल्वर उठाई, उसकी मैगजीन चेक की, उसे जोर से अपनी कमर में खोंसा, और थाने से बाहर की तरफ दौड़ पड़ा। मथुरा के आसमान पर अभी भी काले बादल छाए हुए थे, और सच की तलाश में एक आखिरी और सबसे खूनी जंग शुरू होने वाली थी।
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अध्याय 4: राख और सच
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मथुरा शहर सुबह की पहली किरण के साथ ही एक भयंकर सनसनी और अकल्पनीय खौफ की आगोश में आ चुका था। चौराहों और नुक्कड़ों पर पुलिस की पीसीआर वैन सायरन बजाते हुए सरपट दौड़ रही थीं, स्थानीय अखबारों और न्यूज़ चैनलों के दफ्तरों में फोन की घंटियाँ इस कदर घनघना रही थीं कि ऑपरेटरों के कान पक चुके थे, और आम जनता की जुबान पर सिर्फ और सिर्फ एक ही नाम था—ब्रिजमोहन शास्त्री।
वह शख्स जो महज कुछ ही घंटे पहले अदालत से बरी होकर अपनी राजनीतिक ताकत और रुतबे का जश्न मना रहा था, आज सुबह अपने ही घर के सबसे सुरक्षित और आलीशान बेडरूम में खून से लथपथ मृत पाया गया था। उत्तर प्रदेश की राजनीति का एक ऐसा कद्दावर स्तंभ, जिसके इशारे पर पूरा प्रशासनिक तंत्र नाचता था, आज मौत की नींद सो चुका था।
सुबह के ठीक साढ़े सात बजे, शास्त्री के वीआईपी बंगले के बाहर का इलाका छावनी में तब्दील हो चुका था। उत्तर प्रदेश पुलिस के बड़े अधिकारी, फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स की विशेष टीम, और फिंगरप्रिंट्स जुटाने वाले वैज्ञानिक मौके पर मुस्तैद थे। मीडिया के कैमरों का हुजूम गेट के बाहर इस तरह उमड़ पड़ा था जैसे कोई मेला लगा हो।
इंस्पेक्टर मनीष अपनी जिप्सी से उतरकर तेजी से उस बंगले के अंदर दाखिल हुआ। उसकी खाकी वर्दी पर रात की भागदौड़ और तनाव के निशान साफ देखे जा सकते थे। उसकी आँखें लाल थीं और चेहरे पर एक अजीब सी कठोरता जमी हुई थी।
जब वह शास्त्री के मास्टर बेडरूम में पहुँचा, तो अंदर का नजारा किसी खौफनाक सपने जैसा था। मखमली और महंगे कालीन पर खून का एक बड़ा दरिया सूख चुका था। किंग-साइज बेड के पास वही पुराना, घिसा हुआ चांदी का लॉकेट और खून से सना हुआ कागज का टुकड़ा वैसे ही रखा हुआ था। उस पर लाल स्याही से बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था:
Courtroom 302 का फैसला पूरा हुआ।
सब-इंस्पेक्टर अजय हाँफते हुए मनीष के पास आया। उसके हाथ में एक प्लास्टिक का एविडेंस बैग था, जिसमें कुछ बाल और जले हुए कपड़ों के रेशे सुरक्षित रखे गए थे।
“सर… फॉरेंसिक टीम ने कमरे और उसके आस-पास से कुछ फिंगरप्रिंट्स और सैम्पल्स कलेक्ट किए हैं,” अजय ने थोड़ी घबराई हुई आवाज में कहा। “लेकिन हत्यारे ने बेहद शातिर तरीके से काम किया है। बेडरूम और लिविंग एरिया के तमाम सीसीटीवी कैमरों की हार्ड डिस्क गायब है। और बाहर तैनात सुरक्षा गार्ड्स का कहना है कि रात में उन्होंने किसी को अंदर आते या जाते हुए नहीं देखा… सिवाय इसके…”
“सिवाय इसके कि क्या, अजय? साफ-साफ कहो,” मनीष ने अपनी सख्त निगाहें अजय पर टिकाते हुए कहा।
“सिवाय इसके कि रात को लगभग ढाई बजे एक काले रंग की, बिना नंबर प्लेट की एसयूवी गाड़ी बंगले के पिछले सर्विस गेट के पास कुछ सेकंड के लिए रुकी थी,” अजय ने अपनी छोटी सी डायरी के पन्ने पलटते हुए कहा। “और सर… अमित वर्मा की लाश के पास से जो सुसाइड नोट मिला था, और इस खून से सने नोट पर जो लिखावट है—फॉरेंसिक विशेषज्ञों की शुरुआती जाँच कहती है कि दोनों एक ही शख्स की कलम से निकले हैं। और वह शख्स कोई और नहीं, बल्कि अर्जुन मेहरा है।”
मनीष ने अपनी आँखें बंद कर लीं और एक गहरी, भारी साँस ली। वह इस सच्चाई से पहले से वाकिफ था। अर्जुन मेहरा इस पूरे खेल का मास्टरमाइंड था। वह अच्छी तरह जानता था कि कानूनी प्रक्रिया और अदालती सबूतों के जरिए ब्रिजमोहन शास्त्री को सजा मिलना नामुमकिन है। इसलिए, उसने अदालत से सिर्फ एक कानूनी कवच हासिल किया, शास्त्री को बरी करवाया, और फिर अपनी खुद की ‘व्यक्तिगत अदालत’ लगाकर उसके गुनाहों का हिसाब अपने हाथों से चुका दिया।
“अर्जुन कहाँ है?” मनीष ने अपनी आँखें खोलीं और सीधा सवाल किया।
“सर, उसकी तलाश में मथुरा ही नहीं, बल्कि आसपास के तीन जिलों की पुलिस ने नाकाबंदी कर दी है,” अजय ने जवाब दिया। “हर हाइवे, हर टोल प्लाजा पर उसकी तस्वीर भेजी जा चुकी है। लेकिन उसका कोई सुराग नहीं मिल रहा। उसका घर ताला बंद है, उसका मोबाइल फोन पूरी तरह से स्विच ऑफ है, और उसके चैंबर का स्टाफ भी भूमिगत हो चुका है।”
मनीष ने अपनी मुट्ठियाँ इस कदर भींची कि उसकी उंगलियों की पोरें सफेद पड़ गईं। “वह भागा नहीं है, अजय। अर्जुन मेहरा भागा नहीं है। वह इस खेल का पर्दाफाश अपने हाथों से करने के लिए उसी जगह गया है जहाँ से इस कहानी की सुई शुरू हुई थी।”
“कौन सी जगह, सर?” अजय ने हैरानी से पूछा।
“S-17 प्रोजेक्ट की वह पुरानी, जर्जर फैक्ट्री,” मनीष के मुँह से तल्ख आवाज में निकला। “वही खंडहर, जहाँ दस साल पहले उसके बेकसूर पिता को जिंदा जला दिया गया था। वही इस खौफनाक दास्तान का आखिरी पड़ाव है। मुझे वहीं जाना होगा।”
दोपहर ढलते-ढलते मथुरा के आसमान का मिजाज पूरी तरह बदल चुका था। आसमान में काले, घने बादलों ने इस तरह डेरा डाल रखा था जैसे अभी कयामत आ जाएगी। ठंडी हवाओं के थपेड़ों के साथ-साथ तेज बूंदाबांदी शुरू हो चुकी थी, जो धीरे-धीरे मूसलाधार बारिश में तब्दील होती जा रही थी।
शहर के बाहरी इलाके में स्थित S-17 प्रोजेक्ट का वह खंडहर इस भयानक मौसम में और भी ज्यादा डरावना और वीरान प्रतीत हो रहा था।
इंस्पेक्टर मनीष की जिप्सी बिना किसी सायरन और लाल बत्ती के, सीधे उस खंडहर के मुख्य द्वार पर आकर रुकी। मनीष ने गाड़ी का दरवाजा खोला और बाहर निकल आया। बारिश की बूंदें उसके चेहरे पर सीधे पड़ रही थीं, लेकिन उसका ध्यान सिर्फ सामने खड़ी उस जर्जर इमारत पर था। उसने अपनी सर्विस रिवॉल्वर निकाली, उसकी मैगजीन को बाहर निकालकर चेक किया कि सभी कारतूस अपनी जगह पर हैं या नहीं, और फिर उसे मजबूती से अपनी कमर में खोंस लिया।
उसने जिप्सी के पास खड़े अजय की तरफ देखा और कड़े स्वर में निर्देश दिए, “अजय, तुम और पुलिस फोर्स बाहर ही रहकर पूरे परिसर को चारों तरफ से घेर लो। अंदर कोई कदम नहीं रखेगा। अगर आधे घंटे के भीतर मैं बाहर नहीं निकलता हूँ, तो तुम पूरी फोर्स के साथ अंदर आ जाना। यह मेरा आदेश है।”
“लेकिन सर अकेले अंदर जाना…” अजय ने चिंतित स्वर में रोकना चाहा।
“यह मेरी और उसकी आखिरी लड़ाई है,” मनीष ने बीच में ही बात काटते हुए कहा, और टूटे हुए लोहे के गेट को फाँदकर अंदर दाखिल हो गया।
खंडहर के भीतर कदम रखते ही एक अजीब सी घुटन और सन्नाटे ने उसका स्वागत किया। बारिश का पानी टूटी हुई छतों और दीवारों की दरारों से टपक रहा था। फर्श पर जमी सदियों पुरानी कालिख और मिट्टी की महक हवा में तैर रही थी।
मनीष ने टॉर्च ऑन की और उसकी पीली रोशनी को आगे के अंधेरे गलियारों में घुमाया।
“अर्जुन!” मनीष की भारी और गूँजती हुई आवाज उस वीरान हॉल में गूँज उठी। “बाहर आ जाओ, अर्जुन! अब छिपने या भागने का कोई रास्ता नहीं बचा है। खेल खत्म हो चुका है!”
कोई जवाब नहीं आया। सिवाय बाहर गरजते बादलों की कड़क और टपकते पानी की आवाज़ के।
मनीष ने अपनी सतर्कता और बढ़ा दी। वह धीरे-धीरे कदमों से आगे बढ़ते हुए फैक्ट्री के उस केंद्रीय हिस्से में पहुँचा—वही जगह जहाँ दस साल पहले उस दुर्दांत आगजनी की घटना को अंजाम दिया गया था। जमीन पर आज भी जले हुए लोहे के टुकड़े और राख की परतें दबी हुई थीं।
तभी—हॉल के ठीक दूसरी कोने में रखे एक बड़े, जंग लगे लोहे के बक्से के पास से किसी के हँसने की हल्की सी आवाज सुनाई दी।
हा… हा… हा…
मनीष ने पलक झपकते ही अपनी टॉर्च की रोशनी और रिवॉल्वर का रुख उस दिशा में मोड़ दिया। टॉर्च की तेज रोशनी में वहाँ का नजारा साफ दिखाई दिया।
अर्जुन मेहरा वहीं खड़ा था।
उसने वही काला लंबा ओवरकोट पहन रखा था। उसके बाल बारिश के पानी और पसीने से पूरी तरह भीग चुके थे, चेहरे पर कालिख के निशान थे, लेकिन उसकी आँखों में कोई डर, पछतावा या घबराहट नहीं थी। बल्कि उसकी आँखों में एक अजीब सा सुकून, एक गहरी शांति और विजय का ऐसा भाव था जो किसी पागल या संत की आँखों में होता है। उसके एक हाथ में पेट्रोल की एक बड़ी केन थी और दूसरे हाथ में एक छोटा सा मेटेलिक लाइटर था।
मनीष ने अपनी रिवॉल्वर सीधे अर्जुन की छाती की तरफ तान दी और सख्त आवाज में चेतावनी दी, “एक कदम भी अपनी जगह से हिले तो गोली चला दूंगा, अर्जुन! अपने हाथ हवा में उठाओ और हथियार नीचे रखो। तुम चारों तरफ से घिर चुके हो।”
अर्जुन ने धीरे से अपनी नजरें उठाईं और मनीष की तरफ देखा। उसके चेहरे पर एक बेहद हल्की, लेकिन व्यंग्य भरी मुस्कान तैर गई। उसने अपने हाथ ऊपर नहीं उठाए, बल्कि बड़े इत्मीनान से अपनी जेब में हाथ डालकर वह पुराना, घिसा हुआ चांदी का लॉकेट निकाला और अपनी हथेली पर रख लिया।
“घिर तो मैं उसी दिन चुका था, इंस्पेक्टर मनीष,” अर्जुन की आवाज बहुत शांत, लेकिन इतनी गहरी थी कि बारिश के शोर में भी साफ सुनाई दे रही थी। “जिस दिन मेरी चौदह साल की नादान आँखों के सामने मेरे पिता को उस आग में जिंदा जला दिया गया था, उसी दिन मेरी दुनिया हमेशा के लिए खत्म हो चुकी थी। आज तो बस उस अधूरी और दर्दनाक कहानी का एक मुकम्मल फुलस्टॉप लगाने आया हूँ।”
“तुमने कानून अपने हाथ में क्यों लिया, अर्जुन?!” मनीष का गुस्सा अब फूट पड़ा। “विकास को मोहरा बनाया, अमित का इस्तेमाल किया, और अंत में शास्त्री का बेरहमी से कत्ल कर दिया! क्या तुम्हें सच में लगता है कि तुम कानून की इन लंबी बांहों से बच जाओगे?”
अर्जुन जोर से हँस पड़ा। उसकी हँसी उस खंडहर की दीवारों से टकराकर गूँज उठी। “कानून? कौन सा कानून, इंस्पेक्टर? वही कानून, जो दस साल तक झूठे सबूतों और रसूखदारों के दबाव में मेरे पिता के कातिलों को बचाता रहा? वही कानून, जिसकी आँखों पर मंत्रियों के नोटों की और भ्रष्ट अफसरों की पट्टियाँ बंधी हुई थीं? मैंने किसी बेकसूर की जान नहीं ली है, मनीष बाबू। मैंने सिर्फ उन दरिंदों को उनकी सही सजा दी है जिन्हें यह सड़ा हुआ सिस्टम कभी सजा नहीं दे सकता था।”
“लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि तुम खुद यमराज बन जाओ और फैसले करने लगो!” मनीष आगे बढ़ते हुए चीखा। “अपने हाथ नीचे करो और सरेंडर करो। मैं तुम्हें अदालत के कटघरे में देखना चाहता हूँ, इस तरह खंडहर में खुद को तबाह करते हुए नहीं!”
अर्जुन ने अपने हाथ में पकड़ा हुआ वह लाइटर ऑन किया। लाइटर की छोटी सी नीली लौ उस अंधेरे और धुंधले हॉल में चमक उठी।
“अदालत? मैंने अपनी खुद की ‘Courtroom 302’ सजा ली है, इंस्पेक्टर,” अर्जुन ने ठंडे और अडिग स्वर में कहा। “और इस अदालत का आखिरी फैसला यह है कि इस गुनाह की आग में जिस-जिस ने अपने हाथ सेके थे, वह सब इस राख में मिलकर खत्म होंगे।”
“यह क्या पागलपन है? यह पेट्रोल क्यों छिड़का है यहाँ चारों तरफ?” मनीष की साँसें तेज हो गईं और उसका दिल जोर से धड़कने लगा।
“पागलपन नहीं, यह शुद्ध इंसाफ है,” अर्जुन ने पेट्रोल की केन को तेजी से फर्श पर उड़ेलते हुए कहा। “शास्त्री मर चुका है, विकास जेल की कोठरी में सड़ रहा है, अमित अपनी मर्जी से रास्ते से हट चुका है… और अब इस कहानी का यह आखिरी किरदार—यानी मैं—भी इस आग में हमेशा के लिए विलीन होने के लिए तैयार हूँ।”
“रुक जाओ, अर्जुन! होश में आओ!” मनीष ने अपनी पूरी ताकत से छलांग लगाई ताकि वह अर्जुन तक पहुँचकर उसे दबोच सके।
लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।
अर्जुन ने वह जलता हुआ लाइटर बिना एक पल गंवाए सीधे उस पेट्रोल से भीगे हुए फर्श पर फेंक दिया।
*भभक… धू-धू करके आग भड़क उठी।*
एक ही पल में आग की ऊंची-ऊंची और विकराल लपटें चारों तरफ फैल गईं। सूखी लकड़ी, पुरानी कालिख और पेट्रोल ने मिलकर उस पूरे हॉल को अपनी चपेट में ले लिया। आग की एक दीवार सी खड़ी हो गई, जो मनीष और अर्जुन के बीच आड़े आ गई।
“अर्जुन!” मनीष की चीख उस आग के शोर में दब गई।
आग की उन लपटों के बीच से अर्जुन की हँसी गूँज रही थी—एक ऐसी हँसी जिसमें दर्द भी था और एक अजीब सी मुक्ति का अहसास भी। अर्जुन उस आग के बीचों-बीच बिना हिले-डुले खड़ा था और उसने अपनी आँखें बंद कर ली थीं, बिल्कुल वैसे ही जैसे उसके पिता ने अपनी आखिरी सांस लेते वक्त की थीं।
मनीष ने अपनी जान की परवाह न करते हुए आग के बीच से रास्ता बनाने की कोशिश की, लेकिन आग की भयंकर तपन और धुएं के गुबार ने उसे पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। उसके आँखों से बहता पानी और आंसू आपस में मिल चुके थे—न सिर्फ एक अपराधी के अंत पर, बल्कि इस लाचारी पर कि वह सिस्टम को तो बचा पाया, लेकिन उस जलते हुए इंसान को नहीं बचा सका।
कुछ ही मिनटों बाद, जब मूसलाधार बारिश अपने पूरे उफान पर थी, सब-इंस्पेक्टर अजय और भारी पुलिस बल फोर्स के साथ अंदर दाखिल हुआ।
लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
फायर ब्रिगेड की गाड़ियाँ भी पहुँच चुकी थीं और उन्होंने पानी की बौछार करके आग पर काबू पा लिया था, लेकिन तब तक अंदर सब कुछ जलकर खाक हो चुका था। फैक्ट्री का वह मुख्य हिस्सा पूरी तरह ढह चुका था। चारों तरफ सिर्फ धुआँ, पानी और जली हुई राख के ढेर बचे थे।
मनीष उस खंडहर के बाहर, बारिश के बीचों-बीच एक पत्थर के टुकड़े पर बेसुध सा बैठा हुआ था। उसकी पूरी खाकी वर्दी पर कालिख, मिट्टी और बारिश का कीचड़ लग चुका था। उसके दाहिने हाथ की हथेली में वही पुराना, जंग लगा चांदी का लॉकेट कसकर बंद था, जिसे अर्जुन वहीं छोड़ गया था।
अजय धीरे-धीरे उसके पास आया और भीगी हुई आवाज में बोला, “सर… आग पर पूरी तरह काबू पा लिया गया है। लेकिन अंदर… अंदर कुछ नहीं बचा है। सब कुछ जलकर राख हो गया है।”
मनीष ने धीरे से अपना सिर उठाया। उसकी आँखें सुन्न हो चुकी थीं, और चेहरे पर बारिश की बूंदों के साथ आंसू बह रहे थे। उसने अपनी मुट्ठी खोली और उस चांदी के लॉकेट को अपनी आँखों के सामने रखकर देखा।
“सब खत्म हो गया, अजय…” मनीष की आवाज इतनी धीमी थी कि वह हवा में ही खो गई। “केस की फाइलें हमेशा के लिए दराज में बंद हो जाएंगी। क्रिमिनल इस दुनिया से जा चुके हैं। पुलिस और कानून अपनी जीत का जश्न मना सकते हैं… लेकिन सच, सच यहाँ इस राख में दफन हो गया है।”
अजय कुछ नहीं बोल पाया। वह चुपचाप अपने सीनियर इंस्पेक्टर के कंधे पर हाथ रखकर खड़ा रहा।
बाहर मथुरा के आसमान में गरजते हुए बादल और मूसलाधार बारिश इस बात की गवाही दे रहे थे कि शहर की सतह पर भले ही सब कुछ शांत हो गया हो, लेकिन ‘Courtroom 302’ का यह खौफनाक और भावनात्मक किस्सा हमेशा-इतिहास के पन्नों में अमर हो चुका था—एक ऐसी दास्तान जहाँ खाकी, सियासत, कानून और बदले की आग ने सब कुछ जलाकर रख दिया था।
मनीष ने धीरे से उठकर अपनी जिप्सी की तरफ कदम बढ़ाए। उसने आखिरी बार उस जल चुकी और खंडहर में तब्दील हो चुकी फैक्ट्री की तरफ देखा, अपनी खाकी कैप को ठीक किया, और गाड़ी का दरवाजा खोलकर ड्राइवर सीट पर बैठ गया।
जिप्सी के पहियों ने बारिश के पानी को चीरते हुए आगे की सड़क पर रफ्तार पकड़ ली। केस की फाइलें भले ही हमेशा के लिए बंद हो चुकी थीं, लेकिन मनीष के दिल और दिमाग में यह सवाल ताउम्र गूँजता रहेगा— क्या सिर्फ कानून का होना ही न्याय है, या फिर न्याय की खातिर कानून से परे भी कुछ सच होते हैं?
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अध्याय 5: आखिरी फैसला और खामोशियाँ
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मथुरा शहर अब धीरे-धीरे अपनी सामान्य दिनचर्या की तरफ लौट रहा था। S-17 प्रोजेक्ट के खंडहर में लगी वह आग और पूर्व गृह मंत्री ब्रिजमोहन शास्त्री की सनसनीखेज हत्या—इन दोनों घटनाओं ने पूरे उत्तर प्रदेश को झकझोर कर रख दिया था। अखबारों के मुख्य पृष्ठों पर रोज नई हेडलाइंस छप रही थीं, राजनीतिक गलियारों में बयानबाजी का दौर चरम पर था, और टीवी डिबेट्स में पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए जा रहे थे।
लेकिन इन सब शोरगुल और कोलाहल से कोसों दूर, मथुरा के मुख्य पुलिस थाने का कमरा नंबर चार एकदम शांत था।
इंस्पेक्टर मनीष अपनी उसी पुरानी मेज के सामने वाली कुर्सी पर चुपचाप बैठा था। उसकी आँखों में रातों की जागृति और गहरी थकान साफ झलक रही थी। उसके सामने टेबल पर वही फाइल खुली थी—‘Courtroom 302’। उस फाइल के पन्ने अब हल्के पीले पड़ चुके थे, जिन पर समय और घटनाओं की कालिख जम चुकी थी।
दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई। सब-इंस्पेक्टर अजय अंदर आया। उसके हाथ में एक आधिकारिक लिफाफा था। उसके चेहरे पर एक गंभीर और थका हुआ भाव था।
“सर…” अजय ने धीरे से पुकारा।
मनीष ने अपनी पलकें उठाईं और अजय की तरफ देखा। “क्या है यह?”
अजय ने वह लिफाफा टेबल पर रखते हुए कहा, “हेडक्वार्टर से फाइनल क्लोजर रिपोर्ट आ गई है, सर। शास्त्री हत्याकांड और S-17 फैक्ट्री की आग वाली घटना—दोनों फाइलों को आधिकारिक तौर पर बंद कर दिया गया है।”
मनीष ने उस लिफाफे को अपनी उंगलियों से छुआ, लेकिन उसे खोला नहीं। उसने शांत स्वर में पूछा, “पुलिस विभाग ने इस पूरे मामले पर क्या निष्कर्ष निकाला है, अजय?”
“निष्कर्ष वही है जो सिस्टम सुनना चाहता था, सर,” अजय ने थोड़ा हिचकिचाते हुए कहा। “रिपोर्ट में यह दर्ज किया गया है कि अर्जुन मेहरा ही ब्रिजमोहन शास्त्री का कातिल था। और S-17 फैक्ट्री की आग में वही खुद जलकर मर चुका है। चूँकि मुख्य आरोपी इस दुनिया में नहीं है, इसलिए कानून की किताब के अनुसार यह केस हमेशा के लिए बंद किया जाता है।”
मनीष के चेहरे पर एक फीकी सी मुस्कान तैर गई—ऐसी मुस्कान जिसमें दर्द भी था और व्यवस्था पर एक गहरा व्यंग्य भी।
“कानून की किताब के हिसाब से केस बंद हो गया है, अजय,” मनीष ने अपनी कुर्सी से उठते हुए कहा, “लेकिन क्या सच सचमुच बंद हो गया है?”
अजय के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था। वह चुपचाप अपनी जगह खड़ा रहा।
मनीष ने अपनी खाकी वर्दी की कैप उठाई, उसे अपने सिर पर ठीक किया, और अपनी जेब से वह पुराना, घिसा हुआ चांदी का लॉकेट निकाला—वही लॉकेट जो अर्जुन खंडहर में छोड़ गया था। उसने उस लॉकेट को अपनी मुट्ठी में कसकर भींच लिया।
“चलते हैं, अजय,” मनीष ने दरवाजे की तरफ कदम बढ़ाते हुए कहा। “एक आखिरी जगह जाना है।”
दोपहर ढलने लगी थी। मथुरा के यमुना घाट पर ठंडी हवाएं चल रही थीं। पानी की लहरें धीरे-धीरे किनारों से टकरा रही थीं।
मनीष अकेला घाट की सीढ़ियों पर चल रहा था। उसके कदम शांत और सधे हुए थे। वह उस जगह आकर रुका जहाँ पानी का बहाव थोड़ा तेज था। उसने अपनी मुट्ठी खोली, जिसमें वह चांदी का लॉकेट रखा था।
उसने एक लंबी साँस ली और उस लॉकेट को धीरे से यमुना के शांत जल में प्रवाहित कर दिया। लॉकेट पानी की लहरों के बीच डूब गया और कुछ ही पलों में आँखों से ओझल हो गया।
उसके साथ ही, S-17 प्रोजेक्ट का वह काला अध्याय, विकास की बेबसी, अमित का खौफ, शास्त्री का अहंकार, और अर्जुन का बदला—सब कुछ इतिहास की गहराइयों में विलीन हो गया।
मनीष ने नदी के उस शांत जल की तरफ देखते हुए खुद से एक सवाल पूछा—जो सवाल उसके दिल में पहले दिन से गूँज रहा था।
*“क्या अदालत के फैसले ही असली न्याय होते हैं, या कभी-कभी न्याय को पाने के लिए कानून की उन सीमाओं को तोड़ना पड़ता है जो अपनों के आंसुओं को नहीं देख सकतीं?”*
इस सवाल का कोई औपचारिक जवाब नहीं था। मथुरा का आसमान साफ हो चुका था, सूरज ढल रहा था, और दूर किसी मंदिर से आरती की घंटियों की गूँज हवा में तैर रही थी।
‘Courtroom 302’ का मुकदमा कागजों पर हमेशा के लिए बंद हो चुका था, लेकिन उसकी गूँज और उसका सच मनीष के जमीर में ताउम्र जिंदा रहने वाला था।
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अध्याय 6: न्याय की परछाई
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अदालती फाइलों में धूल जम चुकी थी। मथुरा के पुलिस थाने की दराज में ‘Courtroom 302’ की वह फाइल अब हमेशा के लिए बंद हो चुकी थी, जिस पर ‘क्लोजर रिपोर्ट’ का लाल ठप्पा लग चुका था। शहर के गलियारों में अब वह खौफ नहीं था, अखबारों की सुर्खियां बदल चुकी थीं, और लोग उस भयानक रात को भूलकर अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में आगे बढ़ चुके थे।
लेकिन हर कहानी के खत्म होने के बाद भी कुछ ऐसी परतें छूट जाती हैं, जो वक्त के साथ और गहरी हो जाती हैं।
घटनाओं को बीते हुए कुछ महीने बीत चुके थे। मथुरा की फिजाओं में सर्दियों की विदाई और हल्की बहार की शुरुआत हो रही थी। यमुना के घाटों पर शाम के वक्त ठंडी हवा का झोंका शहर की थकान को मिटा रहा था।
इंस्पेक्टर मनीष अब उस थाने में नहीं था। प्रशासनिक फेरबदल के तहत उसका ट्रांसफर मथुरा से कुछ दूर स्थित एक शांत और छोटे से इलाके में कर दिया गया था। किसी ने इसे उसकी ईमानदारी की सजा कहा, तो किसी ने राजनीतिक दबाव का नतीजा। लेकिन मनीष के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। उसके कंधे पर सजी खाकी वर्दी की चमक अब भी वैसी ही थी, बस उसके भीतर का इंसान अब थोड़ा और शांत और गंभीर हो चुका था।
आज शाम मनीष अपने नए सरकारी क्वार्टर के बरामदे में बैठा था। उसके सामने एक छोटी सी लकड़ी की मेज रखी थी, जिस पर चाय का कप और एक पुरानी डायरी खुली पड़ी थी। वह डायरी वही थी जो अमित वर्मा ने मरने से पहले उसे सौंपी थी, और जिसमें S-17 प्रोजेक्ट के उन तमाम चेहरों के नाम और काले कारनामों का कच्चा-चिट्ठा दर्ज था, जिन्हें कभी कोई अदालत सजा नहीं दे पाई थी।
मनीष ने डायरी का आखिरी पन्ना पलटा। उस पर अर्जुन मेहरा की वह आखिरी लाइन लिखी थी— "Courtroom 302 का फैसला पूरा हुआ।"
तभी सड़क पर किसी गाड़ी के रुकने की आवाज आई। मनीष ने अपनी नजरें उठाईं और बाहर की तरफ देखा।
गेट पर एक साधारण सी कार आकर रुकी थी। कार का दरवाजा खुला और एक शख्स बाहर निकला। उसने एक ढीला-ढाला सूती कुर्ता और कंधे पर झोला टांग रखा था। उसके बाल कुछ बिखरे हुए थे और चेहरे पर एक अजीब सा सुकून था।
मनीष की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने अपनी जगह से उठकर तेजी से गेट की तरफ कदम बढ़ाए।
वह शख्स कोई और नहीं, बल्कि… अमित वर्मा था!
वही अमित वर्मा, जिसने S-17 फैक्ट्री के खंडहर में पोटैशियम साइनाइड खाकर अपनी जान देने का नाटक किया था! वही अमित वर्मा, जिसकी लाश को पुलिस ने अपनी फाइलों में मृत घोषित कर दिया था!
मनीष ने गेट पर पहुँचकर अमित को अपनी बाँहों से पकड़ लिया। उसकी आँखों में हैरानी और गुस्से का एक अजीब सा ज्वार उठ रहा था।
“अमित… तुम? तुम जिंदा हो? S-17 की उस रात… तुमने तो जहर खाया था… फॉरेंसिक रिपोर्ट… तुम्हारी लाश…” मनीष के मुँह से शब्द लड़खड़ा रहे थे।
अमित ने कोई घबराहट नहीं दिखाई। उसके चेहरे पर एक हल्की, शांत मुस्कान तैर गई। उसने धीरे से मनीष के हाथ को अपने कंधे से हटाया और चारों तरफ देखकर धीमी आवाज में कहा, “अंदर चलिए, इंस्पेक्टर साहब—या अब तो आप शायद सिर्फ मनीष बाबू हैं। खुलेआम इस तरह खड़े होकर चर्चा करना ठीक नहीं है।”
मनीष बिना कुछ बोले अमित को अपने साथ अंदर ले आया। उसने कमरे का दरवाजा बंद किया और एक कुर्सी उसकी तरफ खिसकाते हुए खुद सामने बैठ गया।
“यह सब क्या नाटक था, अमित?” मनीष की आवाज सख्त थी। “तुमने खुदकुशी का नाटक क्यों किया? पुलिस और कानून को बेवकूफ क्यों बनाया? और अर्जुन… क्या अर्जुन को भी पता था कि तुम जिंदा हो?”
अमित ने अपनी जेब से एक छोटी सी पानी की बोतल निकाली, एक घूंट पिया, और फिर बहुत ही ठंडे और स्थिर स्वर में जवाब देना शुरू किया।
“हाँ, मनीष बाबू… अर्जुन सब जानता था। बल्कि, यह पूरा प्लान हम दोनों का मिलकर बनाया हुआ था।”
मनीष का माथा ठनक गया। “प्लान? किस बात का प्लान?”
“सिस्टम को हराने का प्लान,” अमित की आँखों में एक अजीब सा चमक आ गई। “हम अच्छी तरह जानते थे कि ब्रिजमोहन शास्त्री जैसे लोग इस देश के कानून और अदालतों से कभी सजा पा ही नहीं सकते। उनके पास पैसे थे, वकील थे, और पुलिस के बड़े अफसरों का संरक्षण था। अगर हम उन्हें सिर्फ कानूनी प्रक्रिया से घेरते, तो वे किसी न किसी तकनीकी खामी का फायदा उठाकर फिर से बाहर आ जाते—ठीक वैसे ही जैसे उन्होंने कोर्टरूम 302 में किया था।”
“तो क्या अर्जुन ने शास्त्री का कत्ल नहीं किया था?” मनीष ने चौंककर पूछा।
“कत्ल?” अमित हल्की सी हँसा। “शास्त्री का कत्ल किसी ने नहीं किया, इंस्पेक्टर साहब। उस रात उस आलीशान बेडरूम में जो नाटक हुआ था, वह सिर्फ शास्त्री को डराने और उसे इस बात का अहसास कराने के लिए था कि उसके गुनाहों का अंत आ चुका है। शास्त्री पहले से ही दिल का मरीज था और उस खौफ के मारे उसका दिल बैठ गया था। हमने उसे मारा नहीं, हमने सिर्फ उसकी डर की परछाई उसके सामने ला दी थी।”
मनीष सन्न रह गया। “और तुम्हारी खुदकुशी? वह फॉरेन्सिक रिपोर्ट? वह साइनाइड?”
“वह सिर्फ एक केमिकल था, मनीष बाबू—एक ऐसा नशीला पदार्थ जो कुछ घंटों के लिए शरीर की नब्ज और सांसों को पूरी तरह रोक देता है, जिससे इंसान मुर्दा जैसा लगने लगता है,” अमित ने समझाया। “खंडहर में मैंने वही नाटक किया ताकि पुलिस की फाइलों में अमित वर्मा और अर्जुन मेहरा—दोनों हमेशा के लिए मरे हुए घोषित कर दिए जाएं। क्योंकि अगर हम जिंदा रहते, तो यह भ्रष्ट सिस्टम हमें कभी चैन से जीने नहीं देता।”
मनीष अपनी कुर्सी पर पीछे की तरफ झुक गया। उसके दिमाग में सारे समीकरण एक-एक करके साफ होने लगे। वह समझ चुका था कि अर्जुन और अमित ने किस शातिर और खतरनाक तरीके से इस पूरे खेल को अंजाम दिया था—कानून की सीमाओं से बाहर जाकर, खुद को ‘मृत’ घोषित करवाकर, उन्होंने उस व्यवस्था से मुक्ति पा ली थी जो सिर्फ ताकतवरों की सुनती थी।
“लेकिन अब तुम यहाँ क्यों आए हो, अमित?” मनीष ने गंभीर स्वर में पूछा। “अगर तुम दुनिया की नजरों में मर चुके हो, तो फिर से सामने क्यों आए? अगर किसी और को पता चल गया…”
अमित ने अपनी झोले से एक लिफाफा निकाला और उसे मनीष की मेज पर रख दिया।
“मैं यहाँ छिपने या डरने नहीं आया, मनीष बाबू,” अमित ने कहा। “मैं यहाँ सिर्फ यह फाइल आपको सौंपने आया हूँ। S-17 प्रोजेक्ट से जुड़े जितने भी बाकी बचे हुए भ्रष्ट चेहरे थे—वे उद्योगपति, वे बेईमान अधिकारी, जो परदे के पीछे बैठे थे—उन सबका डिजिटल और लीगल सबूत इस पेन ड्राइव और कागजों में है। मैंने और अर्जुन ने अपना हिस्सा पूरा कर दिया है।”
मनीष ने उस लिफाफे को देखा, फिर अमित की आँखों में झाँका। “और अर्जुन कहाँ है?”
अमित ने अपनी नजरें खिड़की के बाहर आसमान की तरफ कर लीं। उसके चेहरे पर एक हल्की सी उदासी तैर गई।
“अर्जुन अब इस शहर में नहीं है, और शायद कभी वापस नहीं आएगा,” अमित ने धीमी आवाज में कहा। “वह अपने पिता की आत्मा को शांति देने के लिए हिमालय की किसी शांत वादी में जा चुका है। उसने कहा था कि अब उसे किसी बदले की भूख नहीं है। उसका ‘Courtroom 302’ हमेशा के लिए बंद हो चुका है।”
कमरे में कुछ पलों के लिए भारी सन्नाटा छा गया।
मनीष ने उस लिफाफे को उठाया और अपनी दराज में सुरक्षित रख दिया। उसने महसूस किया कि कानून की वर्दी पहनने के बाद भी कई बार इंसान ऐसे दोराहे पर खड़ा होता है जहाँ उसे समझ नहीं आता कि सही क्या है और गलत क्या।
अमित अपनी जगह से उठा। उसने अपने कपड़े ठीक किए और दरवाजे की तरफ बढ़ने लगा। जाने से पहले उसने मुड़कर मनीष को देखा और हाथ जोड़कर मुस्कुराया— “अलविदा, इंस्पेक्टर साहब। अपना ख्याल रखिएगा। सच की इस लड़ाई में आप हमेशा सही रास्ते पर रहे हैं।”
“अमित…” मनीष ने उसे रोकना चाहा।
लेकिन जब तक मनीष दरवाजे तक पहुँचता, अमित बाहर जा चुका था। बाहर सड़क पर एक कार के स्टार्ट होने की आवाज आई और कुछ ही पलों में वह अंधेरे में ओझल हो गई।
मनीष अपने बरामदे में वापस आया। रात का सन्नाटा अब और गहरा हो चुका था। उसने आसमान की तरफ देखा जहाँ तारे टिमटिमा रहे थे।
उसने अपनी खाकी कैप उतारी, मेज पर रखी, और एक हल्की सी सांस लेते हुए खुद से कहा—
“भले ही अदालत की फाइलें बंद हो चुकी हों, और दुनिया की नजरों में सब शांत हो गया हो… लेकिन न्याय की यह परछाई हमेशा जिंदा रहेगी।”
यमुना के पानी की तरह जिंदगी का यह सफर भी अपनी रफ्तार से आगे बढ़ता गया, और ‘Courtroom 302’ का यह किस्सा मथुरा की गलियों में एक ऐसी कहानी बन गया, जिसे आने वाली पीढ़ियाँ हमेशा याद रखेंगी।
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“Courtroom 302” सिर्फ एक अदालती कमरे की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी मनोवैज्ञानिक और सस्पेंस से भरपूर क्राइम-थ्रिलर है जो व्यवस्था, सियासत, और इंसानी जज्बातों की सबसे गहरी परतों को टटोलती है।
इस कहानी की शुरुआत मथुरा की उन तंग गलियों और पुराने पुलिस थानों से होती है, जहाँ इंस्पेक्टर मनीष अपने उसूलों के साथ सच की तलाश में जुटा है। S-17 प्रोजेक्ट की जमीन पर लगी वह रहस्यमयी आग, जिसमें कई सपने और जिंदगियां जलकर खाक हो गईं, इस दास्तान का केंद्र बिंदु है। जब विकास मल्होत्रा जैसे मोहरे और अमित वर्मा जैसे किरदार इस खेल में उतरते हैं, तो मामला केवल एक कत्ल का नहीं रहता, बल्कि यह एक दशक पुराने उस हिसाब का बन जाता है जो दबा हुआ था।
कहानी का असली मोड़ तब आता है जब एक तेज-तर्रार वकील, अर्जुन मेहरा, अदालत के कटघरे में कदम रखता है। उसके सीने में दबी आग और आँखों में अपने पिता की मौत का बदला लेने की जो जिद है, वह कानून, पुलिस और मथुरा के सबसे ताकतवर राजनेता ब्रिजमोहन शास्त्री के पूरे साम्राज्य को हिलाकर रख देती है।
यह उपन्यास पाठकों को सोचने पर मजबूर करता है कि जब सिस्टम और कानून अपराधियों को बचाने लगें, तब एक इंसान अपने अपनों के आंसुओं का बदला लेने के लिए किस हद तक जा सकता है।
आइए, कदम रखें उस दहलीज के भीतर, जहाँ न्याय और बदले की इस जंग में हर एक पन्ना एक नया राज खोलता है—Courtroom 302।
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अध्याय 1: अधूरा सच
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सुबह की पहली किरण जब मथुरा की तंग गलियों और पक्के घाटों को छूती थी, तो शहर एक अजीब सी सुस्ती से बाहर निकलता था। यमुना का शांत जल, दूर मंदिरों से गूँजती घंटियों की आवाज़, और सर्द हवाओं का झोंका—सब कुछ सामान्य लगता था। लेकिन इंस्पेक्टर मनीष के लिए यह सामान्यता अब एक छलावा बन चुकी थी।
पुलिस स्टेशन के अपने छोटे से केबिन में बैठे मनीष की आंखें लाल थीं। रात भर आंखों में एक पल भी नींद नहीं आई थी। टेबल पर चाय का कप रखा था, जो अब पूरी तरह ठंडा हो चुका था। उसके सामने खुली थी—‘Courtroom 302’ की वह फाइल, जिसे बंद हुए अभी कुछ ही दिन बीते थे।
विकास मल्होत्रा को उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के बाद शहर में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया था। हर किसी को लगा था कि केस सुलझ गया है। राकेश मल्होत्रा की हत्या कातिल विकास ने की थी, गवाह रामू काका की हत्या का राज भी खुल चुका था, और अदालत ने अपना फैसला सुना दिया था। कागजों के हिसाब से केस फाइलों के बक्से में हमेशा के लिए बंद होने को तैयार था।
लेकिन मनीष का अंतःकरण कह रहा था कि यह अंत नहीं है। यह सिर्फ एक पर्दा है, जिसके पीछे असली नाटक अभी भी चल रहा है।
“सर…” दरवाजे पर हल्की सी दस्तक के साथ सब-इंस्पेक्टर अजय अंदर आया। उसके हाथ में कुछ नई फाइलें थीं। “सिटी थाने से कुछ पुराने रिकॉर्ड्स मंगवाए थे, जो S-17 प्रोजेक्ट से जुड़े हैं। जैसा आपने कहा था, हर एक पन्ने की दोबारा छंटनी कर रहे हैं।”
मनीष ने अपनी थकी हुई पलकें उठाईं और अजय को देखा। “सिर्फ छंटनी नहीं, अजय। हमें हर उस कड़ी को टटोलना है जो इस कहानी के बैकग्राउंड में छुपी हुई है। विकास ने जुर्म कुबूल कर लिया, अदालत ने सजा सुना दी, रामू काका का मुंह हमेशा के लिए बंद हो गया, और अमित वर्मा अचानक गायब होकर फिर प्रकट हो गया—तुम्हें नहीं लगता कि यह सब कुछ बहुत आसानी से हो गया?”
अजय ने फाइलें मेज पर रखते हुए कहा, “सर, कानून सबूत देखता है। और हमारे पास विकास के खिलाफ पुख्ता सबूत थे। कोर्ट ने भी मान लिया कि जमीन और संपत्ति के लालच में विकास ने अपने भाई राकेश को मारा।”
मनीष अपनी कुर्सी से उठा और खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया। बाहर पुलिस स्टेशन के प्रांगण में सुबह की धूप फैल रही थी। उसने गहरी सांस ली और कहा, “यही तो गच्चा है, अजय। विकास लालची था, इसमें कोई दो राय नहीं है। वह अपने भाई की संपत्ति हड़पना चाहता था, यह भी सच है। लेकिन क्या एक सीधा-साधा दिखने वाला इंसान, जो पुलिस के डर से कांपता था, इतनी सफाई से दो-दो हत्याएं कर सकता है? और सबसे बड़ी बात—वह कागज़… जिस पर लिखा था ‘Courtroom 302 में मिलते हैं’।”
मनीष ने मुड़कर अजय की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। “विकास की लिखावट और उस कागज़ की लिखावट का मिलान आज तक मैच नहीं हुआ था। हमने उसे नजरअंदाज कर दिया क्योंकि हमें लगा कि वह सिर्फ एक धमकी है। लेकिन वह धमकी नहीं, एक स्क्रिप्ट थी।”
“स्क्रिप्ट?” अजय ने हैरान होकर पूछा।
“हाँ, स्क्रिप्ट!” मनीष की आवाज़ सख्त हो गई। “और उस स्क्रिप्ट का लेखक कोई और है। विकास सिर्फ उस नाटक का एक ऐसा किरदार था जिसे बलि का बकरा बनाया गया।”
अजय कुछ पल के लिए शांत रहा। उसने मनीष के चेहरे के भावों को पढ़ा और धीरे से पूछा, “तो आपका इशारा किसकी तरफ है? क्या आपको अभी भी अर्जुन मेहरा पर शक है?”
अर्जुन मेहरा का नाम आते ही कमरे का तापमान जैसे बदल गया। वही वकील, जिसने शांत मुस्कान के साथ कोर्ट में आकर पूरे केस का रुख मोड़ दिया था। वही इंसान जिसने अंत में यह खुलासा किया था कि S-17 प्रोजेक्ट की जमीन पर जो आग लगी थी, उसमें उसके पिता की मौत हुई थी और राकेश, अमित व विकास उसके गुनहगार थे।
मनीष ने अपनी मेज पर रखी उस छोटी सी चिट्ठी को उठाया, जो अर्जुन ने जाते-जाते उसे दी थी— “Game Never Ends.”
“शक की बात नहीं है, अजय,” मनीष ने गंभीर स्वर में कहा, “अर्जुन ने अदालत में जो कहा, वह आधा सच था। उसके पिता की मौत उस आग में हुई थी, यह सच है। लेकिन उसने अपने इस निजी बदले को कानून के शिकंजे में इस तरह पिरोया कि पुलिस और अदालत, दोनों उसके हाथों की कठपुतली बन गईं। उसने किसी को मारा नहीं, उसने बस सबको एक ऐसे रास्ते पर धकेल दिया जहाँ वे खुद-ब-खुद एक-दूसरे को तबाह कर लें।”
“लेकिन सर, अगर उसने ऐसा किया भी है, तो हमारे पास उसके खिलाफ कानूनी रूप से क्या है?” अजय ने व्यावहारिक सवाल उठाया। “कोर्ट ने फैसला सुना दिया है। अगर हम बिना किसी ठोस सबूत के अर्जुन मेहरा के खिलाफ दोबारा जांच शुरू करेंगे, तो उच्च अधिकारियों से लेकर मीडिया तक हम पर सवाल खड़े कर देंगे। लोग कहेंगे कि पुलिस अपनी नाकामी छुपाने के लिए एक सम्मानित वकील को परेशान कर रही है।”
मनीष कुछ देर तक खामोश रहा। उसने अपनी मेज पर रखी फाइलों को देखा। वह जानता था कि अजय गलत नहीं कह रहा था। कानून सबूत मांगता है, भावनाएं या अंतःप्रेरणा नहीं। लेकिन मनीष का जमीर उसे चैन से बैठने नहीं दे रहा था।
“कानून सबूत मांगता है, अजय। तो हम सबूत ढूंढेंगे,” मनीष ने दृढ़ता से कहा। “विकास से दोबारा मिलूंगा। जेल जाने के बाद से वह एक शब्द नहीं बोला है। उसे डर है। लेकिन जब किसी इंसान का डर उसकी उम्मीद से बड़ा हो जाता है, तो वह बोलना शुरू कर देता है।”
दोपहर ढलते-ढलते मनीष जिला कारागार (जिला जेल) के गेट पर था। मथुरा की इस पुरानी जेल की ऊंची दीवारें और लोहे के भारी दरवाजे हमेशा से एक अलग ही खौफ पैदा करते थे। मनीष अपनी खाकी वर्दी में जब अंदर दाखिल हुआ, तो जेल के अधिकारियों ने उसका स्वागत किया। कुछ ही देर में उसे उस विशेष जेल के पास ले जाया गया जहाँ विकास मल्होत्रा को रखा गया था।
जेल की सलाखों के पीछे विकास जमीन पर बैठा था। उसके बाल बिखरे हुए थे, आँखों के नीचे गहरे काले घेरे थे, और शरीर पर जेल की कैदी वाली पोशाक थी। कुछ दिन पहले तक जो इंसान महंगे सूट पहनकर कोर्ट के बाहर अकड़ता था, आज वह किसी लावारिस की तरह कोने में सिमटा हुआ था।
मनीष ने लोहे की सलाखों के पास आकर धीरे से कहा, “विकास।”
आवाज़ सुनकर विकास ने चौंककर सिर उठाया। जब उसने सामने इंस्पेक्टर मनीष को खड़ा देखा, तो उसके चेहरे की हवाइयाँ उड़ गईं। वह तेजी से पीछे हटा, जैसे किसी भूत को देख लिया हो।
“आप… आप यहाँ क्यों आए हैं?” विकास की आवाज़ कांप रही थी। “फैसला हो चुका है। मुझे उम्रकैद मिल चुकी है। अब और क्या चाहिए आपको?”
मनीष ने कोई गुस्सा नहीं दिखाया। वह बहुत शांत और संयमित स्वर में सलाखों के पास एक छोटी सी लोहे की बेंच पर बैठ गया।
“फैसला कागजों पर हुआ है, विकास, जमीर पर नहीं,” मनीष ने उसकी आँखों में झांकते हुए कहा। “तू जानता है और मैं भी जानता हूँ कि तूने अपने भाई राकेश का खून नहीं किया था।”
विकास का दिल जोरों से धड़कने लगा। उसने इधर-उधर देखा, जैसे कोई उसकी बात सुन रहा हो। उसके होंठ थरथराए, “नहीं… मैंने सब कबूल किया है। जज साहब के सामने मैंने कहा था कि मैंने मारा है।”
“क्यूंकि तुझे सिखाया गया था कि यही तेरे बचने का इकलौता रास्ता है,” मनीष ने बात काटते हुए कहा। “तुझे कहा गया था कि अगर तू जुर्म कबूल कर लेगा, तो तुझे कम सजा मिलेगी या किसी गुप्त रास्ते से निकाल लिया जाएगा। लेकिन तुझे बेवकूफ बनाया गया, विकास। अर्जुन मेहरा ने तुझे मोहरा बनाया। उसने अपने पिता की मौत का बदला लेने के लिए तेरी और तेरे भाई की दुश्मनी का इस्तेमाल किया।”
विकास के चेहरे का रंग फीका पड़ गया। उसने अपना सिर दोनों हाथों में थाम लिया और धीमी सुबकियों के साथ बोला, “आप कुछ नहीं जानते… वह बहुत खतरनाक आदमी है। अगर मैं कुछ बोलूंगा, तो मैं जिंदा नहीं बचूँगा। जेल के अंदर भी उसकी पहुँच है।”
मनीष तुरंत अपनी जगह से उठा और सलाखों के बिलकुल करीब आ गया। उसने विकास के कंधे को कसकर पकड़ लिया।
“मुझसे डरने की जरूरत नहीं है, विकास। जेल के अंदर तू सुरक्षित है, बशर्ते तू मुझे सच बता दे। उस रात वाकई क्या हुआ था? जब तू राकेश के कमरे में गया था, तो वहाँ कौन था?”
विकास की आँखें आंसुओं से भर गईं। उसका शरीर कांप रहा था। उसने फंसी हुई आवाज़ में कहा, “उस रात… जब मैं अपने कमरे से निकला था क्योंकि मुझे राकेश से पैसों के विवाद पर बात करनी थी… तब… तब जब मैं उसके कमरे के पास पहुँचा, तो दरवाजा खुला हुआ था।”
“फिर?” मनीष की सांसें तेज हो गईं।
“मैंने अंदर झांका… राकेश जमीन पर खून से लथपथ पड़ा था। उसकी साँसों की डोर टूट चुकी थी। मैं डर गया… मैं चीखना चाहता था, लेकिन तभी… तभी पीछे से किसी ने मेरे मुंह भींच दिया।” विकास की आवाज़ और धीमी हो गई, मानो वह उस भयानक रात को दोबारा जी रहा हो।
“किसने?” मनीष ने लगभग डांटते हुए पूछा।
“मुझे चेहरा साफ नहीं दिखा… कमरे में अंधेरा था… सिर्फ खिड़की से आती हल्की रोशनी थी। उस आदमी ने मेरे हाथ पकड़कर उस खून से सने चाकू पर जबरदस्ती रखवा दिए। उसने मेरे कान में कहा था—‘अगर जिंदा रहना चाहता है, तो चुपचाप पुलिस के सामने वही बोलियो जो मैं कहूँ। वरना अगला नंबर तेरा होगा।’”
मनीष का माथा ठनक गया। “और वह आदमी कौन था? क्या वह अर्जुन मेहरा था?”
विकास ने सिर हिलाया, “चेहरा तो मैंने नहीं देखा… लेकिन… लेकिन उसकी कलाई पर एक खास तरह का कड़ा बंधा हुआ था। एक भारी चांदी का कड़ा, जिस पर कुछ डिजाइन बनी थी।”
मनीष के दिमाग में बिजली कौंध गई। चांदी का कड़ा… भारी डिजाइन… यह हुलिया उसके दिमाग में किसी और की तरफ इशारा कर रहा था या खुद अर्जुन की तरफ?
“क्या वह अर्जुन था?” मनीष ने जोर देकर पूछा।
“नहीं… वह अर्जुन नहीं था,” विकास ने रोते हुए कहा। “अर्जुन मेहरा तो बाद में आया था… जब पुलिस आ चुकी थी। वह आदमी कोई और था… कोई ऐसा, जो बहुत लंबा और ताकतवर था… जिसकी परछाईं मैंने बाद में उस सीसीटीवी फुटेज में भी देखी थी!”
यह एक बहुत बड़ा सुराग था। मनीष को समझ आ गया कि केस में एक और किरदार ऐसा था जिसे अभी तक किसी ने नहीं देखा था—एक ‘दूसरा आदमी’, जो पर्दे के पीछे रहकर इस पूरे खेल को चला रहा था।
जेल से बाहर निकलते ही मनीष ने सीधे अपने दफ्तर का रुख नहीं किया। उसने अपनी गाड़ी का रुख शहर के उस पुराने पॉश इलाके की तरफ मोड़ा, जहाँ अर्जुन मेहरा का ऑफिस और आवास था।
धुंधलका गहराने लगा था। सर्दियों की शाम में मथुरा की सड़कों पर कोहरा छाने लगा था। मनीष की जिप्सी जब अर्जुन मेहरा के आलीशान बंगले के बाहर रुकी, तो वहाँ का सन्नाटा कुछ अजीब सा लग रहा था। बंगले के बाहर कोई गार्ड नजर नहीं आ रहा था, और मुख्य गेट पर एक ताला लटका हुआ था।
मनीष ने गाड़ी से उतरकर गेट के पास जाकर देखा। ताले पर धूल जमी थी, जिससे साफ पता चलता था कि यह पिछले दो-तीन दिनों से बंद है।
“अरे साहब, इन्हें ढूंढ रहे हो क्या?” पास ही पान की एक दुकान चलाने वाले बूढ़े ने अपनी दुकान से बाहर झांकते हुए कहा।
मनीष तेजी से उस बूढ़े के पास गया और अपना आईकार्ड दिखाते हुए पूछा, “बाबा, यहाँ जो वकील साहब रहते थे—अर्जुन मेहरा—वे कहाँ गए? पिछले दो दिनों से ताला क्यों लगा है?”
बूढ़े ने पान थूकते हुए कहा, “साहब, वे तो कल सुबह ही अपनी बड़ी सी गाड़ी में सारा सामान समेटकर कहीं बाहर चले गए। जाते वक्त कह रहे थे कि अब वे इस शहर में कभी वापस नहीं आएंगे। उन्होंने तो अपने दफ्तर के स्टाफ को भी एडवांस सैलरी देकर छुट्टी दे दी थी।”
मनीष का दिल एक पल के लिए बैठ गया।
वह भागकर अर्जुन के बंगले की दीवार के पास गया और फलांग कर अंदर कूद गया। बगीचे में सन्नाटा था। उसने बंगले के मुख्य दरवाजे के पास जाकर देखा—दरवाजा अंदर से बंद था, लेकिन एक खिड़की का शीशा हल्का सा चटका हुआ था।
मनीष ने अपनी जेब से एक छोटी सी लोहे की रॉड निकाली और सावधानी से खिड़की का कुंडा खोलकर अंदर दाखिल हुआ।
अंदर का नजारा चौंकाने वाला था।
आलीशान ड्राइंग रूम पूरी तरह खाली था। दीवारें सूखी थीं जहाँ से तस्वीरें उतार ली गई थीं। फर्नीचर पर चादरें पड़ी थीं। ऐसा लग रहा था कि यह घर महीनों से नहीं, बल्कि सालों से खाली हो। लेकिन एक बात अजीब थी—हवा में कॉफी की हल्की सी खुशबू आ रही थी, और सेंटर टेबल पर एक कप में अभी भी आधी कॉफी भरी हुई थी, जो हल्की गर्म थी।
मतलब, यहाँ कोई कुछ मिनट पहले ही मौजूद था।
मनीष ने अपनी सर्विस रिवॉल्वर निकाली और सतर्क कदमों से आगे बढ़ने लगा। घर के हर कमरे की तलाशी लेते हुए वह जब अर्जुन के स्टडी रूम में पहुँचा, तो वहाँ की दीवार पर टंगी एक बड़ी सी पेंटिंग के पास उसकी नजर रुक गई।
वह पेंटिंग S-17 प्रोजेक्ट की किसी पुरानी जमीन की थी।
मनीष ने उस पेंटिंग को थोड़ा सा हटाया, तो पीछे दीवार में एक छोटा सा तिजोरी नुमा बॉक्स बना हुआ था, जो खुला हुआ था। उसके अंदर एक पेन ड्राइव और एक लिफाफा रखा था।
मनीष ने दस्ताने पहने, पेन ड्राइव और लिफाफे को उठाया। लिफाफे पर उसके ही नाम से कुछ लिखा था— “For Inspector Manish Chaudhary.”
उसने दिल की धड़कनों को थामते हुए लिफाफा खोला और उसके अंदर का पत्र पढ़ा। लाल स्याही से बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था:
“प्रिय इंस्पेक्टर मनीष,
अगर आप यह पत्र पढ़ रहे हैं, तो इसका मतलब है कि आपकी जिद ने आपको यहाँ तक खींच ही लिया। आप एक अच्छे पुलिसवाले हैं, मनीष बाबू। आप सच की तलाश करना चाहते हैं, लेकिन आप यह भूल जाते हैं कि हर सच के कई पहलू होते हैं।
विकास मोहरा था, राकेश पापी था, और रामू काका अपनी किस्मत के मारे थे। लेकिन इस खेल का अंत अभी नहीं हुआ है। S-17 प्रोजेक्ट की असली फाइल अब डिजिटल रूप में इस पेन ड्राइव में है। उस आग में सिर्फ तीन लोग नहीं मरे थे, बल्कि चार लोग थे। चौथे इंसान का नाम क्या था? यह आपको इस पेन ड्राइव में मिल जाएगा। खेल अभी बाकी है, इंस्पेक्टर। मिलते हैं किसी नए मोड़ पर…”
पत्र पढ़ते ही मनीष की रीढ़ में एक सिहरन दौड़ गई।
चौथा इंसान?
S-17 प्रोजेक्ट की आग में तीन लोगों के मरने की बात सामने आई थी—जैसा कि रिकॉर्ड्स में दर्ज था। लेकिन अगर चौथा इंसान भी था, तो वह कौन था? और क्या वह जिंदा है या उसी आग में उसकी भी बलि दी गई थी?
मनीष ने तेजी से पेन ड्राइव अपनी जेब में रखी और बंगले से बाहर निकल आया। उसके माथै पर पसीना आ गया था, भले ही ठंड का मौसम था। उसे समझ आ गया था कि अर्जुन मेhra भागा नहीं है, बल्कि उसने जानबूझकर मनीष के लिए यह सुराग छोड़ा है। वह चाहता था कि मनीष इस गहराई तक उतरे।
रात के दस बज चुके थे। पुलिस स्टेशन का माहौल शांत था। मनीष अपने केबिन में अकेला बैठा था। उसने अपना पर्सनल लैपटॉप निकाला और उस पेन ड्राइव को उसमें प्लग इन किया।
ड्राइव में सिर्फ एक ही वीडियो फाइल थी। फाइल का नाम था— “The Truth of S-17.”
मनीष ने गहरी सांस ली और वीडियो प्ले कर दिया।
स्क्रीन पर अंधेरा था। कुछ सेकंड बाद एक पुराना, घबराया हुआ वीडियो चलना शुरू हुआ। यह किसी हैंडिकॉम कैमरे से शूट किया गया था। वीडियो में एक पुरानी फैक्ट्री का परिसर दिख रहा था—वही S-17 प्रोजेक्ट वाली जमीन। रात का वक्त था। चारों तरफ मशीनें थीं।
वीडियो में तीन लोग आपस में बहस कर रहे थे। एक तरफ राकेश मल्होत्रा था, दूसरी तरफ अमित वर्मा था, और तीसरा इंसान कौन था, उसका चेहरा साफ नहीं दिख रहा था क्योंकि उसने जैकेट का हुड पहना हुआ था।
वे तीनों किसी बात को लेकर आपस में झगड़ रहे थे।
तभी वीडियो में एक चौथी आवाज़ गूंजी—एक युवा लड़के की रोती हुई आवाज़।
“पापा! इन्हें मत छोड़िए! इन्होंने सब कुछ छीन लिया है हमारा!”
स्क्रीन पर एक चौदह-पंद्रह साल का लड़का दिखाई दिया, जिसके हाथ बंधे हुए थे और उसे एक खंभे से बांधा गया था। वह लड़का कोई और नहीं, बल्कि खुद अर्जुन मेहरा था—अपने बचपन के दिनों में!
मनीष की आँखें फटी की फटी रह गईं।
वीडियो में आगे दिखा कि राकेश मल्होत्रा ने गुस्से में आकर कहा, “अगर यह लड़का और इसका बाप जिंदा रहे, तो यह प्रोजेक्ट हमारे हाथ से निकल जाएगा। आग लगा दो इस गोदाम में! किसी को पता नहीं चलना चाहिए कि यहाँ कोई था।”
और इसके बाद… स्क्रीन पर चीख-पुकार मच गई। आग की लपटें उठने लगीं। कैमरे का एंगल हिल गया और जमीन पर गिर गया। वीडियो में दिख रहा था कि कैसे अर्जुन के पिता ने अपनी जान पर खेलकर उस छोटे से अर्जुन को एक खिड़की से बाहर धकेल दिया था, और खुद उस आग की भट्टी में समा गए थे।
वीडियो यहीं खत्म हो गया।
मनीष का खून खौल उठा। उसके हाथ कांपने लगे।
वह अब समझ चुका था कि अर्जुन मेहरा के दिल में यह नफरत क्यों थी। वह कोई आम क्रिमिनल या शातिर वकील नहीं था, बल्कि वह उस बच्चे का बड़ा हुआ रूप था, जिसके सामने उसके पिता को जिंदा जला दिया गया था। उसने कानूनी सिस्टम को हथियारों की तरह इस्तेमाल करके उन सभी लोगों को तबाह कर दिया जिन्होंने उसके परिवार को उजाड़ा था।
लेकिन… एक सवाल अभी भी बाकी था।
अगर अर्जुन ने यह सब बदला लेने के लिए किया, तो क्या इस खेल में कोई और भी शामिल था? वह ‘दूसरा आदमी’ कौन था जिसकी कलाई पर चांदी का कड़ा बंधा हुआ था और जिसका जिक्र विकास ने किया था?
तभी मनीष के फोन की घंटी बजी।
स्क्रीन पर अज्ञात नंबर फ्लैश हो रहा था।
मनीष ने तुरंत फोन उठाया और सख्त आवाज़ में कहा, “कौन है?”
फोन के दूसरी तरफ से एक ठंडी, सिहरन भरी हँसी गूंजी। वह आवाज़ अर्जुन मेहरा की नहीं थी। वह कोई और था।
“इंस्पेक्टर मनीष… वीडियो कैसा लगा? सच डरावना होता है ना?” उस शख्स ने कहा।
“तू कौन है? सामने आ!” मनीष चिल्लाया।
“मैं वहीं हूँ, इंस्पेक्टर साहब… जहाँ से इस खेल की शुरुआत हुई थी। अगर अपने उस छोटे से थाने से जिंदा बाहर निकलना चाहते हो, और सच का पूरा पर्दाफाश देखना चाहते हो, तो कल सुबह ठीक पाँच बजे… उसी पुरानी S-17 फैक्ट्री के खंडहर में अकेले आ जाना। वरना… अगला नंबर तुम्हारा होगा।”
फोन कट गया।
पूँ-पूँ की आवाज़ के साथ लाइन डेड हो गई।
मनीष ने फोन को मेज पर पटका। उसकी आँखों में डर नहीं, बल्कि एक अजीब सी जिद्द थी। उसने अपनी सर्विस रिवॉल्वर निकाली, उसकी मैगजीन चेक की, उसे लोड किया और अपनी कमर में खोंस लिया।
“खेल खत्म नहीं हुआ है…” मनीष ने खुद से कहा, और अपने केबिन की लाइट बुझाकर बाहर निकल गया।
बाहर मथुरा की ठंडी रात में कोहरा और घना हो चुका था, और उस कोहरे के पार एक ऐसा सच इंतजार कर रहा था जो सब कुछ बदल देने वाला था।
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अध्याय 2: खाकी और परछाई
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सर्दियों की उस रात का कोहरा मथुरा की सड़कों पर इस तरह पसर चुका था जैसे किसी ने सफेद चादर तान दी हो। घड़ी की सुई सुबह के चार बजा रही थी। हवा में गलन इतनी थी कि सांस लेते ही मुंह से धुंआ निकल रहा था। ऐसे वक्त में जहां पूरा शहर गहरी नींद में डूबा हुआ था, इंस्पेक्टर मनीष की गाड़ी की हेडलाइट्स अंधेरे को चीरती हुई शहर के बाहरी इलाके की तरफ बढ़ रही थीं।
जिप्सी का स्टीयरिंग थामे मनीष के हाथ कसकर भींचे हुए थे। उसके कानों में उस अज्ञात शख्स की वह धमकी बार-बार गूंज रही थी— "अगर अपने उस छोटे से थाने से जिंदा बाहर निकलना चाहते हो, तो कल सुबह ठीक पाँच बजे… उसी पुरानी S-17 फैक्ट्री के खंडहर में अकेले आ जाना।"
मनीष ने अपनी सर्विस रिवॉल्वर पर एक बार हाथ फेरकर यह सुनिश्चित कर लिया कि वह ठीक जगह पर है। वह जानता था कि यह बुलावा एक खतरनाक जाल हो सकता है। यह भी मुमकिन था कि वह फैक्ट्री मौत का कुआँ साबित हो, जहाँ कोई उसका इंतजार कर रहा हो। लेकिन मनीष चौधरी नाम का इंस्पेक्टर अपनी जान बचाने के लिए पीछे हटने वालों में से नहीं था। उसके जमीर में एक पुलिसवाले का कर्तव्य और एक इंसान की जिज्ञासा दोनों कुलाचे मार रहे थे।
दस मिनट बाद, जिप्सी एक वीरान और सुनसान इलाके में आकर रुकी।
सामने खड़ी थी—S-17 प्रोजेक्ट की वह पुरानी, जर्जर फैक्ट्री। दस साल पहले लगी उस रहस्यमयी आग ने इस इमारत को मलबे और कालिख में बदल दिया था। लोहे के बड़े-बड़े गार्टर मुड़े हुए थे, दीवारें आधी-अधूरी और काली पड़ चुकी थीं, और चारों तरफ झाड़ियों का साम्राज्य था। यहाँ परिंदा भी पर नहीं मारता था।
मनीष ने गाड़ी का दरवाजा खोला और बाहर पैर रखा। उसके जूतों के नीचे टूटी हुई ईंटें और कांच के टुकड़े चटकने की आवाज करने लगे। उसने अपनी टॉर्च ऑन की और उसकी पीली रोशनी को आगे के अंधेरे में घुमाया।
“कोई है?” मनीष की भारी और सख्त आवाज सन्नाटे को चीरते हुए गूंज उठी।
कोई जवाब नहीं आया। सिवाय ठंडी हवा के सनसनाहट के, वहाँ चारों तरफ मौत जैसी खामोशी छाई हुई थी।
मनीष ने सतर्क कदमों से आगे बढ़ना शुरू किया। उसने अपनी टॉर्च की रोशनी को फैक्ट्री के मुख्य हॉल की तरफ डाला। जहाँ कभी करोड़ों का कारोबार और मशीनों की गड़गड़ाहट गूंजती थी, आज वहाँ खामोश खंडहर और चमगादड़ों का डेरा था। फर्श पर जगह-जगह कालिख जमी हुई थी।
तभी—करीब सौ मीटर दूर, अंदरूनी हिस्से से किसी के जूतों के कदमों की आवाज सुनाई दी। खटाक… खटाक…
मनीष तुरंत एक टूटे हुए कंक्रीट के खंभे के पीछे छिप गया। उसने अपनी रिवॉल्वर को तान लिया और अपनी सांसों को रोक लिया ताकि कोई आवाज न हो।
“मुझे पता है तुम आ चुके हो, इंस्पेक्टर मनीष…” एक भारी और ठंडी आवाज उस अंधेरे हॉल में गूंजी। वह आवाज किसी इंसान की नहीं, बल्कि किसी गहरे कुएं से आती हुई प्रतीत हो रही थी। “इतनी ठंड में अकेले आना तुम्हारी बहादुरी है या बेवकूफी, यह तो वक्त बताएगा।”
मनीष ने खंभे की आड़ से बाहर झांकने की कोशिश की। टॉर्च की रोशनी में उसने देखा कि हॉल के बीचों-बीच एक साया खड़ा था। उसने लंबी काली ओवरकोट पहन रखा था, और सिर पर हुड था जिससे उसका आधा चेहरा ढंका हुआ था।
मनीष ने अपनी आवाज को कड़क बनाते हुए कहा, “सामने आओ! छिपकर बात करने से डर छिपता नहीं है। तुम कौन हो और इस खेल के पीछे तुम्हारा क्या मकसद है?”
वह साया हल्का सा मुस्कुराया। उसकी हंसी उस सन्नाटे में अजीब सी डरावनी लग रही थी। वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा। जैसे ही वह रोशनी के दायरे में आया, मनीष की आंखें फटी की फटी रह गईं।
वह शख्स कोई और नहीं, बल्कि… अमित वर्मा था!
वही अमित वर्मा, जिसे कुछ दिन पहले पुलिस ने संदिग्ध माना था, फिर जो अदालत में गवाह बनकर आया था, और जो पिछले कुछ दिनों से शहर से गायब चल रहा था।
मनीष ने अपनी रिवॉल्वर को और कसकर पकड़ा और आगे बढ़ते हुए कहा, “अमित! तुम? तुम इस सब के पीछे हो? विकास को मोहरा बनाना, रामू काका को रास्ते से हटाना, और अब यह नाटक… यह सब तुमने किया है?”
अमित ने अपनी हुड हटाई। उसके चेहरे पर कोई घबराहट नहीं थी, बल्कि एक अजीब सा सुकून था—जैसे कोई बहुत बड़ा बोझ उसके सिर से उतर गया हो। उसने अपने दोनों हाथ हवा में उठाए और व्यंग्य भरी मुस्कान के साथ कहा, “नाटक? वाह, इंस्पेक्टर साहब! इसे नाटक कहते हैं? यह तो वह हिसाब है जो दस साल से इस शहर के बाहुबली और अमीर लोग दबाए बैठे थे।”
“हिसाब?” मनीष ने गुस्से से पूछा, “खून बहाकर और बेकसूरों को फंसाकर कैसा हिसाब? राकेश मारा गया, रामू काका की गर्दन मरोड़ दी गई, और विकास जेल की सलाखों के पीछे सड़ रहा है। क्या यही तुम्हारा न्याय है?”
अमित जोर से हँस पड़ा। उसकी हँसी उस खंडहर की दीवारों से टकराकर गूँज उठी। “न्याय? इंस्पेक्टर, तुम पुलिस वाले कानून की किताब की रट लगाते हो। कानून उन लोगों के लिए बनता है जिनकी जेबें गर्म होती हैं। जब दस साल पहले इसी फैक्ट्री में राकेश मल्होत्रा और उसके साथियों ने हमारे सपनों को, हमारे अपनों को जिंदा जला दिया था, तब तुम्हारा यह कानून कहाँ था? तब क्या तुम्हें गरीबों के चीखने की आवाज सुनाई नहीं दी थी?”
मनीष का दिमाग तेजी से काम करने लगा। उसने अमित की तरफ देखते हुए कहा, “तो इसका मतलब अर्जुन मेहरा अकेला नहीं था… तुम दोनों इस खेल में साथ हो?”
“साथ?” अमित ने एक कदम आगे बढ़ाया। “अर्जुन और मेरा खून एक ही आग से खौला है, इंस्पेक्टर। बस फर्क इतना था कि अर्जुन पर्दे के आगे वकील बनकर खेल खेल रहा था, और मैं पर्दे के पीछे रहकर मोहरों को हिला रहा था।”
“तो फिर विकास को क्यों फंसाया? विकास तो तुम्हारा पार्टनर था!” मनीष ने सवाल किया।
“पार्टनर?” अमित के चेहरे पर नफरत के भाव उभर आए। “विकास और राकेश दोनों एक ही थाली के चट्टे-बट्टे थे। विकास अपनी कंजूसी और लालच में अपने ही भाई से नफरत करता था। मैंने तो बस उसकी नफरत को थोड़ा सा हवा दी, और बाकी का काम उसके अपने ही लालच ने कर दिया। मैंने तो सिर्फ चाकू पर उसके फिंगरप्रिंट्स लगाए थे, बाकी का जाल तो उसने खुद अपने इर्द-गिर्द बुन लिया था।”
“और रामू काका?” मनीष की आवाज में अब गुस्सा उबल रहा था। “वह बूढ़ा आदमी क्या गुनाह किया था? उसने तो सिर्फ एक रात चीख सुनी थी! उसे क्यों मारा?”
अमित का चेहरा अचानक गंभीर हो गया। उसकी आँखों में एक अजीब सा अंधकार तैर गया। “रामू काका ने उस रात सिर्फ चीख नहीं सुनी थी, इंस्पेक्टर… उसने मुझे उस कमरे से निकलते हुए देख लिया था। अगर वह जिंदा रहता, तो मेरा नाम सबसे पहले सामने आता। और मैं अभी जेल नहीं जाना चाहता था… मेरा मकसद अभी अधूरा था।”
“अधूरा मकसद?” मनीष ने सतर्क होते हुए पूछा। “यानी अभी इस खेल में और भी खून होना बाकी है?”
अमित ने अपनी जेब में हाथ डाला। मनीष को लगा कि वह कोई हथियार निकाल रहा है, इसलिए उसने तुरंत चेतावनी दी, “एक इंच भी हिले तो गोली मार दूंगा, अमित! हाथ बाहर निकालो!”
लेकिन अमित ने घबराने के बजाय अपनी जेब से एक छोटा सा कैसेट और एक डायरी निकाली और उन्हें जमीन पर फेंक दिया।
“गोली मारना चाहो तो मार लो, इंस्पेक्टर साहब,” अमित ने ठंडे स्वर में कहा। “वैसे भी मेरी जिंदगी का मकसद पूरा हो चुका है। राकेश मर चुका है, विकास जेल में है, और इस डायरी में S-17 प्रोजेक्ट के उन तमाम काले कारनामों और भ्रष्ट नेताओं के नाम दर्ज हैं जिन्होंने उस आग को लगवाने में राकेश की मदद की थी। यह सब कुछ मैंने तुम्हारे लिए यहाँ छोड़ा है।”
मनीष हैरान था। “तुम यह सब मुझे क्यों दे रहे हो? तुम खुद क्यों सरेंडर कर रहे हो?”
अमित ने आसमान की तरफ देखा जहाँ कोहरे के बीच सुबह की हल्की सी लाली फूटने लगी थी। “सरेंडर? मैं सरेंडर नहीं कर रहा, इंस्पेक्टर। मैं तो बस उस अंजाम तक पहुँच रहा हूँ जो दस साल पहले तय हो चुका था।”
इससे पहले कि मनीष कुछ समझ पाता, अमित ने अपनी जेब से कुछ निकाला और उसे अपने मुंह में रख लिया। उसके जबड़े तेजी से हिले, और एक तीखी गंध हवा में फैल गई।
“अमित! यह क्या किया तुमने?!” मनीष चीखते हुए उसकी तरफ दौड़ा।
लेकिन बहुत देर हो चुकी थी। अमित की आँखें फैल गईं, उसके मुँह से झाग निकलने लगा, और वह लड़खड़ाकर उसी कालिख से सने फर्श पर धड़ाम से गिर पड़ा। मनीष ने उसके पास बैठकर उसकी नब्ज टटोली—वह ठंडी पड़ चुकी थी। अमित ने पोटैशियम साइनाइड खाकर मौके पर ही दम तोड़ दिया था।
खंडहर में एक बार फिर भयानक सन्नाटा छा गया।
मनीष उस लाश के पास खड़ा होकर सांसें ले रहा था। उसके माथे से पसीने की बूंदें टपक रही थीं। खेल का एक और मुख्य किरदार खामोश हो चुका था।
सूरज पूरी तरह निकल चुका था, लेकिन मथुरा शहर पर छाई धुंध और कोहरा कम होने का नाम नहीं ले रहा था।
पुलिस स्टेशन के अपने केबिन में लौटे मनीष की आँखें लाल थीं। उसके हाथ में वह डायरी और पुराना कैसेट था जो अमित ने मरने से पहले छोड़ा था। उसके साथ सब-इंस्पेक्टर अजय भी खड़ा था, जिसके चेहरे पर खौफ और हैरानी के भाव साफ झलक रहे थे।
“सर… अमित ने… अमित ने खुदकुशी कर ली?” अजय की आवाज कांप रही थी। “मतलब पूरा केस अब बंद हो जाएगा? गवाह भी गया, आरोपी भी गया?”
मनीष ने अपनी मेज पर मुक्का मारा, जिससे चाय का कप खनक उठा। “बंद नहीं हुआ है, अजय! यह तो असली शुरुआत है। अमित ने मरते वक्त मुझे जो डायरी दी है, वह इस शहर के कई बड़े दिग्गजों के गले की फांस बनने वाली है।”
मनीष ने अपनी मेज पर रखी उस डायरी को खोला। पन्ने पीले पड़ चुके थे, लेकिन उस पर लिखी गई हर एक लाइन किसी बम से कम नहीं थी। डायरी में मथुरा के कई जाने-माने उद्योगपति, दो बड़े राजनेता, और एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का नाम दर्ज था—जिन्होंने S-17 प्रोजेक्ट की उस जमीन पर कब्जा करने के लिए राकेश मल्होत्रा के साथ मिलकर उस भयानक आग की साजिश रची थी।
“इसका मतलब,” अजय ने हैरान होकर कहा, “राकेश सिर्फ एक मोहरा था? या वह इन सबका सरगना था?”
“राकेश उस syndicate का सिर्फ एक प्यादा था जो जमीन हड़पना चाहता था,” मनीष ने गंभीर स्वर में कहा। “और इस डायरी के हिसाब से, उस सिंडिकेट का सबसे बड़ा चेहरा कोई और है… एक ऐसा शख्स जो आज भी पर्दे के पीछे बैठकर शहर की राजनीति और कानून को चला रहा है।”
“कौन है वह शख्स, सर?” अजय ने सांस रोककर पूछा।
मनीष ने डायरी के आखिरी पन्ने को पलटा। उस पर एक नाम लिखा था— ‘ब्रिजमोहन शास्त्री’।
इस नाम को पढ़ते ही मनीष के पैरों तले जमीन खिसक गई। ब्रिजमोहन शास्त्री—वही शख्स जो शहर का सबसे बड़ा विधायक और पूर्व गृह मंत्री था, जिसके बंगले पर पुलिस के बड़े-बड़े अधिकारी माथा टेकते थे, और जिसके नाम से पूरा प्रशासनिक तंत्र कांपता था।
“ब्रिजमोहन शास्त्री…” मनीष के मुंह से धीमी आवाज में निकला। “तो यह खेल सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि सत्ता और खून की सियासत का था।”
“लेकिन सर, अगर यह सच है, तो हमारे पास क्या सबूत है?” अजय ने घबराते हुए कहा। “ब्रिजमोहन शास्त्री के खिलाफ हाथ डालना आग से खेलने जैसा है। बिना पुख्ता सबूत के हम उसका बाल भी बांका नहीं कर सकते, और ऊपर से राजनीतिक दबाव अलग से आएगा।”
मनीष अपनी कुर्सी से खड़ा हुआ। उसकी आँखों में अब कोई उलझन नहीं थी, बल्कि एक चट्टान जैसी दृढ़ता थी। उसने अपनी खाकी वर्दी की कॉलर को ठीक किया और अपनी सर्विस रिवॉल्वर को वापस कमर में खोंस लिया।
“सबूत इस डायरी में भी है, अजय… और उस पेन ड्राइव में भी जो अर्जुन ने मुझे दी थी,” मनीष ने कड़े स्वर में कहा। “लेकिन सबसे बड़ा सबूत यह है कि अब सच हमारे सामने आ चुका है। चाहे किती भी बड़ी राजनीतिक ताकत क्यों न हो, खाकी का इकबाल अभी मरा नहीं है।”
“सर, आप क्या करने वाले हैं?” अजय ने पूछा।
“मैं जा रहा हूँ… उस शख्स के पास जो इस पूरे खेल का असली मास्टरमाइंड है,” मनीष ने दरवाजे की तरफ कदम बढ़ाते हुए कहा। “अर्जुन मेहरा ने अपने पिता की मौत का बदला लेने के लिए इस सिस्टम को हिला दिया था। अब मेरी बारी है… इस सिस्टम से न्याय छीनने की।”
दोपहर का वक्त था। मथुरा के वीआईपी इलाके में स्थित ब्रिजमोहन शास्त्री का आलीशान कोठीनुमा बंगला किसी किले से कम नहीं था। बंगले के बाहर सुरक्षा गार्डों का कड़ा पहरा था, और कई लग्जरी गाड़ियाँ खड़ी थीं।
मनीष की जिप्सी जब सीधे उस बंगले के मुख्य गेट पर जाकर रुकी, तो वहां मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने तुरंत बंदूकें तान लीं।
“रुकिए! आगे जाना मना है! यह विधायक ब्रिजमोहन शास्त्री का निवास है!” एक गार्ड ने चिल्लाते हुए कहा।
मनीष ने जिप्सी का दरवाजा खोला और नीचे उतरा। उसने अपनी खाकी वर्दी के बटनों को ठीक किया, चेहरे पर एक सख्त और निर्भीक भाव लिए वह सीधे गेट की तरफ बढ़ा। उसने अपना पुलिस आईडी कार्ड गार्ड के चेहरे के सामने कर दिया।
“इंस्पेक्टर मनीष चौधरी,” मनीष की आवाज में लोहे जैसी कड़क थी। “मुझे विधायक ब्रिजमोहन शास्त्री से तुरंत मिलना है। रास्ता छोड़ो।”
गार्ड ने आईडी कार्ड देखा और घबरा गया। उसने तुरंत अंदर फोन घुमाया। कुछ ही पलों में गेट का बड़ा सा लोहे का दरवाजा खुल गया।
मनीष बिना किसी हिचकिचाहट के अंदर दाखिल हुआ। संगमरमर के फर्श वाले उस विशाल ड्राइंग रूम में जब वह पहुँचा, तो उसने देखा कि सफेद खादी के कुर्ते-पजामे में सजे ब्रिजमोहन शास्त्री एक बड़े से सोफे पर बैठे थे, और उनके सामने एक मेज पर चाय की प्याली रखी थी। उनके चेहरे पर वही पुरानी, राजनीतिक और मक्कार मुस्कान थी।
“आइए, आइए इंस्पेक्टर मनीष!” ब्रिजमोहन शास्त्री ने अपनी जगह से उठे बिना हाथ जोड़कर कहा, जैसे वे किसी पुराने दोस्त का स्वागत कर रहे हों। “मैंने अखबारों में तुम्हारी बहादुरी के चर्चे बहुत सुने हैं। बैठिए, चाय लेंगे या कॉफी?”
मनीष ने उनकी तरफ देखा, लेकिन सोफे पर बैठने के बजाय वह उनके बिल्कुल सामने आकर खड़ा हो गया। उसने अपनी जैकेट की जेब से वह पुरानी डायरी निकाली और सीधे ब्रिजमोहन शास्त्री की चाय की मेज पर पटक दी।
डायरी के गिरते ही ब्रिजमोहन की वह मुस्कान पल भर के लिए फीकी पड़ गई। उन्होंने अपनी नजरें उस डायरी पर डालीं, फिर धीरे से ऊपर उठाकर मनीष को देखा।
“यह क्या है, इंस्पेक्टर साहब?” शास्त्री ने शांत स्वर में पूछा, हालांकि उनकी आवाज में हल्की सी कनकनी थी।
“यह उस आग का दस्तावेज है, शास्त्री जी… जो दस साल पहले S-17 प्रोजेक्ट की जमीन पर जलाई गई थी,” मनीष ने अपनी आँखों को उनकी आँखों में गड़ाते हुए कहा। “राकेश मोहरा था, अमित प्यादा था, और विकास बेवकूफ था… लेकिन इस खेल का असली राजा आप हैं।”
कमरे का तापमान अचानक जैसे शून्य पर पहुँच गया। आसपास खड़े सुरक्षा गार्डों ने अपनी बंदूकों के हथियारों पर हाथ रख लिया।
ब्रिजमोहन शास्त्री ने धीरे से चाय की प्याली उठाई, एक घूंट पिया, और फिर बड़े इत्मीनान से उसे वापस रख दिया। उन्होंने अपनी सफेद मूंछों पर हाथ फेरा और ठंडी हंसी हँसे।
“इंस्पेक्टर मनीष…” शास्त्री ने बहुत नपे-तुले शब्दों में कहा, “तुम्हारी उम्र अभी बहुत कम है। तुम सिर्फ वर्दी के नशे में तैर रहे हो। यह सियासत है बेटा… यहाँ आग कोई और लगाता है, और हाथ किसी और के जलते हैं। जो डायरी तुमने मेज पर रखी है ना, यह कानून की नजर में एक कबाड़ का कागज है। कोर्ट इसे सबूत नहीं मानेगा।”
“कानून सबूत मांगेगा या नहीं, यह अदालत तय करेगी, शास्त्री जी,” मनीष ने अपनी आवाज को और सख्त करते हुए कहा। “लेकिन यह सच है कि आपके हाथों पर उन बेकसूरों का खून लगा है। और उस खून का हिसाब अब थाने में नहीं, सीधे कटघरे में होगा।”
शास्त्री अपनी जगह से खड़े हो गए। उनकी लंबाई और उनका रसूख उस कमरे में भारी पड़ने लगा था। उन्होंने मनीष के बिल्कुल करीब आकर उसके कंधे पर हाथ रखा और फुसफुसाते हुए कहा, “तुम मुझे गिरफ्तार नहीं कर पाओगे, मनीष बाबू। क्योंकि थोड़ी देर में कमिश्नर का फोन तुम्हारे थाने की घंटी बजा रहा होगा… और तुम्हारा ट्रांसफर इस शहर से इतनी दूर हो चुका होगा जहाँ से तुम कभी वापस लौटकर नहीं आ पाओगे।”
मनीष ने बिना एक पल गंवाए, अपना हाथ आगे बढ़ाया और ब्रिजमोहन शास्त्री की कलाई को कसकर दबोचते हुए अपनी कमर से हथकड़ी निकाल ली।
“ट्रांसफर बाद में देख लेना, शास्त्री जी…” मनीष की आवाज में गजब का खौफ और दृढ़ता थी। “फिलहाल… गिरफ़्तारी का वक्त हो गया है।”
छन से हथकड़ी की धातु की आवाज उस आलीशान कमरे में गूँज उठी। ब्रिजमोहन शास्त्री के चेहरे का रंग उड़ गया, और उनके मुँह से चीख निकल पड़ी— “यह तुम्हारी सबसे बड़ी भूल है, इंस्पेक्टर! तुम नहीं जानते तुम किससे पंगा ले रहे हो!”
“मैं जानता हूँ,” मनीष ने हथकड़ी को कसते हुए कहा, “मैं खाकी से पंगा ले रहा हूँ जब वह बिक जाए, और सच से पंगा ले रहा हूँ जब वह छिप जाए… पर आज सच जीतेगा।”
कोहरे से ढकी मथुरा की उस दोपहर में, एक भ्रष्ट राजनेता के हाथों में हथकड़ी पड़ चुकी थी। लेकिन मनीष जानता था कि यह सिर्फ एक लड़ाई की जीत थी। असली युद्ध—यानी Courtroom 302 का दूसरा अध्याय—तो अब शुरू होने वाला था, जहाँ कानून, राजनीति और बदले की आग आमने-सामने खड़ी होने वाली थी।
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अध्याय 3: कटघरे का चक्रव्यूह
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मथुरा की जिला अदालत का परिसर हमेशा की तरह खचाखच भरा हुआ था। कचहरी की पुरानी दीवारों, वकीलों के काले कोटों की फड़फड़ाहट, मुंसियों की दौड़-भाग और मुवक्किलों की उम्मीद भरी आंखों के बीच आज एक अजीब सा तनाव हवा में तैर रहा था। बात ही कुछ ऐसी थी। शहर के सबसे शक्तिशाली और रसूखदार राजनेता—पूर्व गृह मंत्री ब्रिजमोहन शास्त्री—की गिरफ्तारी ने पूरे उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में भूचाल ला दिया था।
जो शख्स कभी पुलिस कमिश्नर से लेकर अदालतों के फैसलों तक को अपनी उंगलियों पर नचाता था, आज वह उसी सिस्टम की गिरफ्त में था।
ठीक सुबह दस बजे, अदालत के मुख्य द्वार पर पुलिस की वैन आकर रुकी। भारी पुलिस बल के बीच जब ब्रिजमोहन शास्त्री को उतारा गया, तो उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। उनके सफेद खादी के कुर्ते पर एक भी सिलवट नहीं थी, और उनकी चाल में वही पुराना राजनीतिक अहंकार झलक रहा था। उनके चारों तरफ वकीलों की फौज थी, जो मीडिया के कैमरों से उन्हें बचाते हुए अंदर ले जा रही थी।
उसी भीड़ के ठीक पीछे, इंस्पेक्टर मनीष अपनी खाकी वर्दी में शान से सिर उठाकर चल रहा था। उसकी आँखों में एक अजीब सा सुकून और जीत की चमक थी। उसने एक भ्रष्ट राजनेता को हथकड़ियों में जकड़कर अदालत के दरवाजे तक पहुंचा दिया था। उसे लगा था कि अब सच की जीत पक्की है, और ‘Courtroom 302’ में न्याय का सूरज पूरी चमक के साथ उगेगा।
लेकिन मनीष यह नहीं जानता था कि राजनीति और कानून की इस शतरंज की बिसात पर, प्यादे सिर्फ मोहरे बदलते हैं, खिलाड़ी वही रहते हैं।
Courtroom 302 के अंदर खामोशी पसरी हुई थी। यह वही कमरा था जहाँ कुछ दिन पहले विकास मल्होत्रा को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। आज इस कमरे का माहौल और भी ज्यादा गंभीर था। जज साहब अपनी कुर्सी पर विराजमान हो चुके थे। वकीलों की बहस शुरू होने से पहले ही कमरे में एक भारी सन्नाटा छाया हुआ था।
कठघरे में खड़े ब्रिजमोहन शास्त्री ने एक गहरी सांस ली और अपने महंगे चमड़े के जूतों पर नजर डाली। उनके चेहरे पर वह मक्कार मुस्कान फिर से लौट आई थी।
“सरकारी वकील साहब,” जज साहब ने अपनी गंभीर आवाज में कहा, “अभियोजन पक्ष यह स्पष्ट करे कि इतने साल पुराने मामले में अचानक इस तरह की गिरफ्तारी का आधार क्या है? और आपके पास आरोपी के खिलाफ क्या ठोस सबूत हैं?”
सरकारी वकील साहब थोड़े असहज दिखे। उन्होंने अपनी फाइल खोली और हकलाते हुए बोले, “म्यूलॉर्ड, हमारे पास एक डायरी है जो अमित वर्मा नाम के एक शख्स के पास से मिली थी, और साथ ही S-17 प्रोजेक्ट की एक पेन ड्राइव है। इसमें आरोपी ब्रिजमोहन शास्त्री और अन्य लोगों के नाम उस आगजनी की साजिश में शामिल होने के पुख्ता संकेत मिलते हैं…”
“इत्यादि, इत्यादि! सिर्फ कयास और कबाड़ के कागजात!”
एक तीखी, कड़क और जानी-पहचानी आवाज ने सरकारी वकील की बात बीच में ही काट दी।
Courtroom 302 के दरवाजे खुले, और काले कोट में लिपटा एक शख्स बहुत ही शालीनता से अंदर दाखिल हुआ। उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी, और उसके कदम सधे हुए थे।
इंस्पेक्टर मनीष ने जैसे ही उस शख्स को देखा, उसका खून खौल उठा।
वह अर्जुन मेहरा था!
वही अर्जुन मेहरा, जो कुछ दिन पहले शहर छोड़कर जाने का नाटक कर रहा था, जो अमित वर्मा और विकास को अपने इशारों पर नचा रहा था, और जो अब इस खेल का सबसे बड़ा मास्टरमाइंड बनकर सामने खड़ा था।
जज साहब ने चौंककर पूछा, “आप कौन हैं? और अनुमति के बिना अदालत की कार्यवाही में इस तरह दखल क्यों दे रहे हैं?”
अर्जुन मेहरा ने अपनी टाई ठीक की, जज की तरफ झुककर सम्मानपूर्वक सिर झुकाया, और फिर अपनी आवाज में गजब का ठहराव लाते हुए कहा, “म्यूलॉर्ड, मैं अर्जुन मेहरा हूँ—एडवोकेट। और आज इस अदालत में, मैं किसी और का नहीं, बल्कि खुद न्याय का प्रतिनिधित्व करने आया हूँ। और सबसे बड़ी बात यह है कि इस मामले में जो डायरी और पेन ड्राइव पेश की गई है, वह कानून की नजर में पूरी तरह से अवैध और नाकाफी है।”
यह सुनकर सरकारी वकील के साथ-साथ इंस्पेक्टर मनीष के भी होश उड़ गए। मनीष अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ और गुस्से से लगभग चीखते हुए बोला, “झूठ बोल रहा है यह! वह डायरी और पेन ड्राइव इस बात का सबूत है कि शास्त्री ने उस आगजनी की साजिश रची थी जिसमें बेकसूरों की जान गई थी!”
“ऑर्डर! ऑर्डर!” जज साहब ने अपनी हथौड़ी मेज पर जोर से मारी। “इंस्पेक्टर मनीष, यह कोई पुलिस स्टेशन नहीं है, अदालत है! आप अपनी जगह पर बैठिए। कोर्ट की अवमानना के लिए आपको बाहर भी निकाला जा सकता है।”
मनीष मुट्ठियाँ भींचकर अपनी बेंच पर बैठ गया, लेकिन उसकी आँखें अर्जुन मेहरा पर टिकी थीं। अर्जुन ने एक ठंडी नजर मनीष पर डाली, उसके बाद जज की तरफ मुड़कर बड़े ही सधे हुए शब्दों में अपनी दलील रखनी शुरू की।
“म्यूलॉर्ड,” अर्जुन ने अदालत में घूमते हुए कहा, “सरकारी पक्ष जिस डायरी और पेन ड्राइव को सबूत बता रहा है, उसकी प्रामाणिकता (Authenticity) क्या है? कानून कहता है कि कोई भी दस्तावेज जो किसी मृत व्यक्ति (अमित वर्मा, जिसने खुदकुशी कर ली) के पास से मिला हो और जिसकी फोरेंसिक जांच अभी तक पूरी तरह से वेरिफाई न हुई हो, उसे सीधा सबूत नहीं माना जा सकता। और जहाँ तक पेन ड्राइव का सवाल है, वह एक अज्ञात स्रोत से आई है। डिजिटल एविडेंस एक्ट के तहत बिना किसी सर्टिफाइड सर्टिफिकेट के ऐसी पेन ड्राइव कचरे के डिब्बे में डालने लायक होती है, अदालत में पेश करने लायक नहीं।”
न्यायाधीश ने गंभीर मुद्रा में अपनी फाइल देखी और फिर सरकारी वकील से पूछा, “क्या अभियोजन पक्ष के पास इस बात का कोई चश्मदीद गवाह या फोरेंसिक रिपोर्ट है जो यह साबित कर सके कि ब्रिजमोहन शास्त्री उस रात S-17 प्रोजेक्ट पर मौजूद थे या उन्होंने कोई लिखित आदेश दिया था?”
सरकारी वकील के पास कोई जवाब नहीं था। वह पसीना पोंछते हुए खामोश खड़ा रहा।
अर्जुन मेहरा ने मुस्कुराते हुए अंतिम प्रहार किया, “म्यूलॉर्ड, पुलिस ने अपनी वाहवाही लूटने और मीडिया की सुर्खियों में बने रहने के लिए एक सम्मानित राजनेता को बिना किसी पुख्ता और कानूनी रूप से वैध सबूत के गिरफ्तार कर लिया है। यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन है। इसलिए, मैं इस अदालत से मांग करता हूँ कि ब्रिजमोहन शास्त्री को तत्काल प्रभाव से इस झूठे और मनगढ़ंत मामले से बरी किया जाए!”
Courtroom 302 में एक सन्नाटा छा गया।
जज साहब ने कुछ पलों के लिए फाइल को देखा, फिर ब्रिजमोहन शास्त्री की तरफ नजर डाली, और अंत में कड़े स्वर में फैसला सुनाया— “चूंकि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ कोई ठोस और कानूनी रूप से स्वीकार्य सबूत पेश करने में असमर्थ रहा है, और प्रस्तुत किए गए दस्तावेज फोरेंसिक जांच के दायरे में अस्पष्ट हैं, इसलिए अदालत ब्रिजमोहन शास्त्री को इस मामले से बरी करती है। पुलिस को कड़ी चेतावनी दी जाती है कि वे इस तरह की आधारहीन कार्रवाई से बचें।”
“केस डिसमिस्ड!”
हथौड़ी की एक और गूँज के साथ Courtroom 302 का पासा पूरी तरह पलट चुका था।
ब्रिजमोहन शास्त्री के चेहरे पर विजय की एक भयानक मुस्कान तैर गई। उनके वकील और समर्थक उन्हें बधाई देने लगे। शास्त्री ने उठते हुए एक बार तिरछी नजरों से इंस्पेक्टर मनीष की तरफ देखा, जैसे वह कह रहे हों— “देखा, मैंने कहा था ना? कानून और सियासत मेरे इशारे पर नाचते हैं।”
अदालत के बाहर गलियारे में भारी भीड़ जमा थी। मीडिया के कैमरे और रिपोर्टर चारों तरफ से माइक ताने खड़े थे। ब्रिजमोहन शास्त्री मुस्कुराते हुए बाहर निकले और उन्होंने बड़ी शान से मीडिया के सामने बयान दिया, “यह सत्य की जीत है! विपक्षी ताकतों ने मुझे और मेरी पार्टी को बदनाम करने के लिए यह घटिया राजनीतिक षड्यंत्र रचा था, जिसे अदालत ने बेनकाब कर दिया है।”
ठीक उसी भीड़ के बीच से गुजरते हुए इंस्पेक्टर मनीष के कदम रुक गए। उसने देखा कि अर्जुन मेहरा सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था।
मनीष तेजी से आगे बढ़ा और अर्जुन का रास्ता रोकते हुए उसके सामने खड़ा हो गया। उसकी आँखों में गुस्सा उबल रहा था।
“तुम खेल क्या रहे हो, अर्जुन?!” मनीष की आवाज गुस्से से कांप रही थी। “तुम खुद उस आग में अपने पिता को खो चुके हो! तुमने ही तो मुझे वो वीडियो दिया था, तुमने ही तो अमित और विकास को कठपुतली की तरह नचाया था! और आज… आज तुमने उसी कातिल ब्रिजमोहन शास्त्री को अपनी वकालत के दम पर बचा लिया? क्या तुम्हारी आत्मा को जरा भी कचोट नहीं होती?”
अर्जुन ने अपनी कोट के बटन बंद किए, बहुत ही शांत भाव से मनीष की आँखों में देखा, और एक गहरी मुस्कान के साथ कहा, “आत्मा? इंस्पेक्टर मनीष, आत्मा बहुत पहले उस आग में जलकर खाक हो चुकी थी।”
“तो फिर यह ड्रामा क्यों?” मनीष चिल्लाया। “क्यों अमित को मारा? क्यों विकास को फंसाया? और क्यों उस कातिल को कोर्ट से बाइज्जत bरी करवा दिया?”
अर्जुन ने मनीष के बिल्कुल करीब आकर उसके कान में फुसफुसाते हुए कहा, “क्योंकि अदालत के कागजों में न्याय मिलना मुमकिन हो सकता है, इंस्पेक्टर… लेकिन असली इंसाफ कचहरी की दीवारों के बाहर होता है। शास्त्री को मैंने अदालत से बचाया है, जिंदगी से नहीं।”
मनीष का माथा ठनक गया। उसके दिमाग में अर्जुन की बात गूँज उठी।
इससे पहले कि मनीष कुछ और पूछता, अर्जुन वहाँ से मुड़ा और अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ गया। कुछ ही पलों में उसकी कार धूल उड़ाती हुई वहां से ओझल हो गई।
रात के दो बज चुके थे। मथुरा का मौसम और ज्यादा सर्द हो चुका था।
ब्रिजमोहन शास्त्री का आलीशान बंगला अब पूरी तरह शांत था। कचहरी से छूटने के बाद शास्त्री ने अपने खास मेहमानों के साथ जश्न मनाया था, और अब वे अपने बेडरूम में गहरी नींद में सो रहे थे। सुरक्षा गार्ड बाहर गश्त लगा रहे थे, और कोहरे की चादर ने पूरे बंगले को अपनी आगोश में ले रखा था।
अचानक… बंगले की मुख्य दीवार पर किसी के कूदने की हल्की सी आवाज हुई।
एक साया, जिसने पूरी तरह काले कपड़े पहन रखे थे और चेहरे पर नकाब था, बहुत ही फुर्ती से जमीन पर उतरा। उसने बिना कोई आवाज किए गार्ड्स की नजरों से बचते हुए पीछे के वेंटिलेशन और बालकनी के रास्ते बंगले के अंदर प्रवेश कर लिया।
वह साया कोई और नहीं, बल्कि अर्जुन मेहरा था।
उसके हाथ में एक लंबी, चमकदार धातु की छड़ (या ऐसा ही कोई भारी उपकरण) थी। वह किसी चोर की तरह नहीं, बल्कि किसी यमराज की तरह खामोश और खतरनाक कदमों से आगे बढ़ रहा था। उसे बंगले का कोना-कोना पता था क्योंकि दस साल पहले इसी परिवार के साथ उसके पिता के कारोबारी रिश्ते हुआ करते थे।
चलते-चलते वह सीधे ब्रिजमोहन शास्त्री के मास्टर बेडरूम के दरवाजे के पास पहुँचा। दरवाजा अंदर से बंद था, लेकिन एक चाबी का गुच्छा उसके पास पहले से था। उसने बहुत ही सावधानी से चाबी घुमाई— *क्लिक* की हल्की सी आवाज के साथ दरवाजा खुल गया।
कमरे के अंदर सन्नाटा था। एसी की ठंडी हवा चल रही थी और बेड पर ब्रिजमोहन शास्त्री खर्राटे लेते हुए सो रहे थे।
अर्जुन धीरे-धीरे कदमों से बिस्तर के पास पहुँचा। उसने अपने चेहरे से नकाब हटा दिया। उसकी आँखों में दस साल का दर्द, गुस्सा और बदला एक साथ अंगारे की तरह दहक रहा था।
उसने अपनी जेब से एक पुराना, घिसा हुआ चांदी का लॉकेट निकाला—वही लॉकेट जो उसके पिता ने उस आग में जलने से पहले उसके गले में डाला था। उसने वह लॉकेट शास्त्री के तकिए के पास रख दिया।
लॉकेट के गिरने की हल्की सी आहट से ब्रिजमोहन शास्त्री की नींद खुल गई।
शास्त्री ने चौंककर अपनी आँखें खोलीं और सामने अंधेरे में किसी को खड़े देखा। उनकी सांसें अटक गईं। उन्होंने घबराते हुए लाइट का स्विच ऑन करना चाहा, लेकिन इससे पहले कि वे अपना हाथ बढ़ाते, अर्जुन ने तेजी से आगे बढ़कर अपना भारी हाथ उनके मुंह पर रख दिया।
“म… म… कौन?” शास्त्री की आवाज उनके गले में ही घुट कर रह गई।
अर्जुन ने अपने चेहरे को बेड की डिम लाइट के सामने किया और बहुत ही ठंडे, कातिलाना स्वर में कहा, “पहचाना नहीं, शास्त्री जी? दस साल पहले S-17 प्रोजेक्ट की उस रात… जब आपने और राकेश ने मिलकर उस गोदाम में आग लगवाई थी, तब मेरे पिता ने मुझे खिड़की से बाहर फेंका था।”
शास्त्री के होश उड़ गए। उनकी आँखें डर से फटी की फटी रह गईं। उन्होंने पहचान लिया—यह वही छोटा लड़का था, जिसे वे मरा हुआ समझ बैठे थे।
“अ… अर्जुन… तुम… तुम जिंदा हो?” शास्त्री कांपते हुए थूक निगले।
“मैं जिंदा इसलिए हूँ, शास्त्री जी, ताकि इस शहर के सबसे बड़े मक्कार को उसकी औकात याद दिला सकूँ,” अर्जुन ने अपनी आवाज को और भारी किया। “अदालत ने आपको सबूतों के अभाव में छोड़ दिया होगा… कानून की किताबें शायद आपकी पहुंच से बहुत दूर हों… लेकिन आज, Courtroom 302 का असली फैसला इस कमरे में होगा।”
शास्त्री ने घिघियाते हुए कहा, “पैसा… तुम्हें जितना पैसा चाहिए ले लो! ज़मीन, जायदाद, सब तुम्हारे नाम कर दूंगा! मुझे छोड़ दो…”
“पैसा?” अर्जुन जोर से हँसा, लेकिन उसकी हँसी में कोई खुशी नहीं, सिर्फ जहर था। “मेरे पिता की जान की कीमत दुनिया का कोई खजाना नहीं चुका सकता, शास्त्री जी। और आज मैं आपसे पैसे मांगने नहीं आया… हिसाब चुकाने आया हूँ।”
इसके बाद कमरे में क्या हुआ, इसकी गवाही सिर्फ दीवारों पर पड़ी परछाइयों ने दी। शास्त्री की दबी हुई चीखें उस आलीशान बेडरूम की दीवारों में ही दम तोड़ गईं।
अगली सुबह, मथुरा की पुलिस लाइन में फोन की घंटी लगातार बज रही थी।
सब-इंस्पेक्टर अजय भागते हुए इंस्पेक्टर मनीष के केबिन में आया। उसके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ी हुई थीं।
“सर… सर, जल्दी चलिए!” अजय ने हांफते हुए कहा।
“क्या हुआ अजय? इतनी सुबह क्यों चिल्ला रहे हो?” मनीष ने अपनी टेबल से सिर उठाते हुए पूछा।
“सर… ब्रिजमोहन शास्त्री… उनका खून हो गया है! कल रात उनके ही बेडरूम में किसी ने उनका गला रेत दिया है! और… और मौके से एक चीज मिली है जो आपको देखनी चाहिए।”
मनीष का दिल जोर से धड़क उठा। वह अपनी कुर्सी से उछलकर खड़ा हो गया। “किसका खून? शास्त्री का? और क्या मिला है मौके पर?”
“यह…” अजय ने अपने हाथ से एक पुराना चांदी का लॉकेट मनीष की टेबल पर रख दिया।
मनीष ने उस लॉकेट को उठाया। उस पर एक खास निशान बना हुआ था—वही निशान जो अर्जुन मेहरा के पास देखा गया था। और उसके साथ ही, मेज पर एक खून से सना हुआ कागज़ का टुकड़ा पड़ा था जिस पर लाल स्याही से लिखा था:
Courtroom 302 का फैसला पूरा हुआ।
मनीष की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसे अब समझ आ गया था कि अर्जुन मेहरा ने कोर्ट से शास्त्री को क्यों बरी करवाया था। वह कानून के रास्ते से नहीं, बल्कि अपने हाथों से खून का बदला लेना चाहता था।
“अर्जुन…” मनीष के मुँह से धीमी आवाज में निकला। “तूने कानून को चकमा दे दिया, लेकिन तू यह भूल गया कि इंस्पेक्टर मनीष अभी जिंदा है!”
मनीष ने अपनी सर्विस रिवॉल्वर उठाई, उसकी मैगजीन चेक की, उसे जोर से अपनी कमर में खोंसा, और थाने से बाहर की तरफ दौड़ पड़ा। मथुरा के आसमान पर अभी भी काले बादल छाए हुए थे, और सच की तलाश में एक आखिरी और सबसे खूनी जंग शुरू होने वाली थी।
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अध्याय 4: राख और सच
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मथुरा शहर सुबह की पहली किरण के साथ ही एक भयंकर सनसनी और अकल्पनीय खौफ की आगोश में आ चुका था। चौराहों और नुक्कड़ों पर पुलिस की पीसीआर वैन सायरन बजाते हुए सरपट दौड़ रही थीं, स्थानीय अखबारों और न्यूज़ चैनलों के दफ्तरों में फोन की घंटियाँ इस कदर घनघना रही थीं कि ऑपरेटरों के कान पक चुके थे, और आम जनता की जुबान पर सिर्फ और सिर्फ एक ही नाम था—ब्रिजमोहन शास्त्री।
वह शख्स जो महज कुछ ही घंटे पहले अदालत से बरी होकर अपनी राजनीतिक ताकत और रुतबे का जश्न मना रहा था, आज सुबह अपने ही घर के सबसे सुरक्षित और आलीशान बेडरूम में खून से लथपथ मृत पाया गया था। उत्तर प्रदेश की राजनीति का एक ऐसा कद्दावर स्तंभ, जिसके इशारे पर पूरा प्रशासनिक तंत्र नाचता था, आज मौत की नींद सो चुका था।
सुबह के ठीक साढ़े सात बजे, शास्त्री के वीआईपी बंगले के बाहर का इलाका छावनी में तब्दील हो चुका था। उत्तर प्रदेश पुलिस के बड़े अधिकारी, फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स की विशेष टीम, और फिंगरप्रिंट्स जुटाने वाले वैज्ञानिक मौके पर मुस्तैद थे। मीडिया के कैमरों का हुजूम गेट के बाहर इस तरह उमड़ पड़ा था जैसे कोई मेला लगा हो।
इंस्पेक्टर मनीष अपनी जिप्सी से उतरकर तेजी से उस बंगले के अंदर दाखिल हुआ। उसकी खाकी वर्दी पर रात की भागदौड़ और तनाव के निशान साफ देखे जा सकते थे। उसकी आँखें लाल थीं और चेहरे पर एक अजीब सी कठोरता जमी हुई थी।
जब वह शास्त्री के मास्टर बेडरूम में पहुँचा, तो अंदर का नजारा किसी खौफनाक सपने जैसा था। मखमली और महंगे कालीन पर खून का एक बड़ा दरिया सूख चुका था। किंग-साइज बेड के पास वही पुराना, घिसा हुआ चांदी का लॉकेट और खून से सना हुआ कागज का टुकड़ा वैसे ही रखा हुआ था। उस पर लाल स्याही से बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था:
Courtroom 302 का फैसला पूरा हुआ।
सब-इंस्पेक्टर अजय हाँफते हुए मनीष के पास आया। उसके हाथ में एक प्लास्टिक का एविडेंस बैग था, जिसमें कुछ बाल और जले हुए कपड़ों के रेशे सुरक्षित रखे गए थे।
“सर… फॉरेंसिक टीम ने कमरे और उसके आस-पास से कुछ फिंगरप्रिंट्स और सैम्पल्स कलेक्ट किए हैं,” अजय ने थोड़ी घबराई हुई आवाज में कहा। “लेकिन हत्यारे ने बेहद शातिर तरीके से काम किया है। बेडरूम और लिविंग एरिया के तमाम सीसीटीवी कैमरों की हार्ड डिस्क गायब है। और बाहर तैनात सुरक्षा गार्ड्स का कहना है कि रात में उन्होंने किसी को अंदर आते या जाते हुए नहीं देखा… सिवाय इसके…”
“सिवाय इसके कि क्या, अजय? साफ-साफ कहो,” मनीष ने अपनी सख्त निगाहें अजय पर टिकाते हुए कहा।
“सिवाय इसके कि रात को लगभग ढाई बजे एक काले रंग की, बिना नंबर प्लेट की एसयूवी गाड़ी बंगले के पिछले सर्विस गेट के पास कुछ सेकंड के लिए रुकी थी,” अजय ने अपनी छोटी सी डायरी के पन्ने पलटते हुए कहा। “और सर… अमित वर्मा की लाश के पास से जो सुसाइड नोट मिला था, और इस खून से सने नोट पर जो लिखावट है—फॉरेंसिक विशेषज्ञों की शुरुआती जाँच कहती है कि दोनों एक ही शख्स की कलम से निकले हैं। और वह शख्स कोई और नहीं, बल्कि अर्जुन मेहरा है।”
मनीष ने अपनी आँखें बंद कर लीं और एक गहरी, भारी साँस ली। वह इस सच्चाई से पहले से वाकिफ था। अर्जुन मेहरा इस पूरे खेल का मास्टरमाइंड था। वह अच्छी तरह जानता था कि कानूनी प्रक्रिया और अदालती सबूतों के जरिए ब्रिजमोहन शास्त्री को सजा मिलना नामुमकिन है। इसलिए, उसने अदालत से सिर्फ एक कानूनी कवच हासिल किया, शास्त्री को बरी करवाया, और फिर अपनी खुद की ‘व्यक्तिगत अदालत’ लगाकर उसके गुनाहों का हिसाब अपने हाथों से चुका दिया।
“अर्जुन कहाँ है?” मनीष ने अपनी आँखें खोलीं और सीधा सवाल किया।
“सर, उसकी तलाश में मथुरा ही नहीं, बल्कि आसपास के तीन जिलों की पुलिस ने नाकाबंदी कर दी है,” अजय ने जवाब दिया। “हर हाइवे, हर टोल प्लाजा पर उसकी तस्वीर भेजी जा चुकी है। लेकिन उसका कोई सुराग नहीं मिल रहा। उसका घर ताला बंद है, उसका मोबाइल फोन पूरी तरह से स्विच ऑफ है, और उसके चैंबर का स्टाफ भी भूमिगत हो चुका है।”
मनीष ने अपनी मुट्ठियाँ इस कदर भींची कि उसकी उंगलियों की पोरें सफेद पड़ गईं। “वह भागा नहीं है, अजय। अर्जुन मेहरा भागा नहीं है। वह इस खेल का पर्दाफाश अपने हाथों से करने के लिए उसी जगह गया है जहाँ से इस कहानी की सुई शुरू हुई थी।”
“कौन सी जगह, सर?” अजय ने हैरानी से पूछा।
“S-17 प्रोजेक्ट की वह पुरानी, जर्जर फैक्ट्री,” मनीष के मुँह से तल्ख आवाज में निकला। “वही खंडहर, जहाँ दस साल पहले उसके बेकसूर पिता को जिंदा जला दिया गया था। वही इस खौफनाक दास्तान का आखिरी पड़ाव है। मुझे वहीं जाना होगा।”
दोपहर ढलते-ढलते मथुरा के आसमान का मिजाज पूरी तरह बदल चुका था। आसमान में काले, घने बादलों ने इस तरह डेरा डाल रखा था जैसे अभी कयामत आ जाएगी। ठंडी हवाओं के थपेड़ों के साथ-साथ तेज बूंदाबांदी शुरू हो चुकी थी, जो धीरे-धीरे मूसलाधार बारिश में तब्दील होती जा रही थी।
शहर के बाहरी इलाके में स्थित S-17 प्रोजेक्ट का वह खंडहर इस भयानक मौसम में और भी ज्यादा डरावना और वीरान प्रतीत हो रहा था।
इंस्पेक्टर मनीष की जिप्सी बिना किसी सायरन और लाल बत्ती के, सीधे उस खंडहर के मुख्य द्वार पर आकर रुकी। मनीष ने गाड़ी का दरवाजा खोला और बाहर निकल आया। बारिश की बूंदें उसके चेहरे पर सीधे पड़ रही थीं, लेकिन उसका ध्यान सिर्फ सामने खड़ी उस जर्जर इमारत पर था। उसने अपनी सर्विस रिवॉल्वर निकाली, उसकी मैगजीन को बाहर निकालकर चेक किया कि सभी कारतूस अपनी जगह पर हैं या नहीं, और फिर उसे मजबूती से अपनी कमर में खोंस लिया।
उसने जिप्सी के पास खड़े अजय की तरफ देखा और कड़े स्वर में निर्देश दिए, “अजय, तुम और पुलिस फोर्स बाहर ही रहकर पूरे परिसर को चारों तरफ से घेर लो। अंदर कोई कदम नहीं रखेगा। अगर आधे घंटे के भीतर मैं बाहर नहीं निकलता हूँ, तो तुम पूरी फोर्स के साथ अंदर आ जाना। यह मेरा आदेश है।”
“लेकिन सर अकेले अंदर जाना…” अजय ने चिंतित स्वर में रोकना चाहा।
“यह मेरी और उसकी आखिरी लड़ाई है,” मनीष ने बीच में ही बात काटते हुए कहा, और टूटे हुए लोहे के गेट को फाँदकर अंदर दाखिल हो गया।
खंडहर के भीतर कदम रखते ही एक अजीब सी घुटन और सन्नाटे ने उसका स्वागत किया। बारिश का पानी टूटी हुई छतों और दीवारों की दरारों से टपक रहा था। फर्श पर जमी सदियों पुरानी कालिख और मिट्टी की महक हवा में तैर रही थी।
मनीष ने टॉर्च ऑन की और उसकी पीली रोशनी को आगे के अंधेरे गलियारों में घुमाया।
“अर्जुन!” मनीष की भारी और गूँजती हुई आवाज उस वीरान हॉल में गूँज उठी। “बाहर आ जाओ, अर्जुन! अब छिपने या भागने का कोई रास्ता नहीं बचा है। खेल खत्म हो चुका है!”
कोई जवाब नहीं आया। सिवाय बाहर गरजते बादलों की कड़क और टपकते पानी की आवाज़ के।
मनीष ने अपनी सतर्कता और बढ़ा दी। वह धीरे-धीरे कदमों से आगे बढ़ते हुए फैक्ट्री के उस केंद्रीय हिस्से में पहुँचा—वही जगह जहाँ दस साल पहले उस दुर्दांत आगजनी की घटना को अंजाम दिया गया था। जमीन पर आज भी जले हुए लोहे के टुकड़े और राख की परतें दबी हुई थीं।
तभी—हॉल के ठीक दूसरी कोने में रखे एक बड़े, जंग लगे लोहे के बक्से के पास से किसी के हँसने की हल्की सी आवाज सुनाई दी।
हा… हा… हा…
मनीष ने पलक झपकते ही अपनी टॉर्च की रोशनी और रिवॉल्वर का रुख उस दिशा में मोड़ दिया। टॉर्च की तेज रोशनी में वहाँ का नजारा साफ दिखाई दिया।
अर्जुन मेहरा वहीं खड़ा था।
उसने वही काला लंबा ओवरकोट पहन रखा था। उसके बाल बारिश के पानी और पसीने से पूरी तरह भीग चुके थे, चेहरे पर कालिख के निशान थे, लेकिन उसकी आँखों में कोई डर, पछतावा या घबराहट नहीं थी। बल्कि उसकी आँखों में एक अजीब सा सुकून, एक गहरी शांति और विजय का ऐसा भाव था जो किसी पागल या संत की आँखों में होता है। उसके एक हाथ में पेट्रोल की एक बड़ी केन थी और दूसरे हाथ में एक छोटा सा मेटेलिक लाइटर था।
मनीष ने अपनी रिवॉल्वर सीधे अर्जुन की छाती की तरफ तान दी और सख्त आवाज में चेतावनी दी, “एक कदम भी अपनी जगह से हिले तो गोली चला दूंगा, अर्जुन! अपने हाथ हवा में उठाओ और हथियार नीचे रखो। तुम चारों तरफ से घिर चुके हो।”
अर्जुन ने धीरे से अपनी नजरें उठाईं और मनीष की तरफ देखा। उसके चेहरे पर एक बेहद हल्की, लेकिन व्यंग्य भरी मुस्कान तैर गई। उसने अपने हाथ ऊपर नहीं उठाए, बल्कि बड़े इत्मीनान से अपनी जेब में हाथ डालकर वह पुराना, घिसा हुआ चांदी का लॉकेट निकाला और अपनी हथेली पर रख लिया।
“घिर तो मैं उसी दिन चुका था, इंस्पेक्टर मनीष,” अर्जुन की आवाज बहुत शांत, लेकिन इतनी गहरी थी कि बारिश के शोर में भी साफ सुनाई दे रही थी। “जिस दिन मेरी चौदह साल की नादान आँखों के सामने मेरे पिता को उस आग में जिंदा जला दिया गया था, उसी दिन मेरी दुनिया हमेशा के लिए खत्म हो चुकी थी। आज तो बस उस अधूरी और दर्दनाक कहानी का एक मुकम्मल फुलस्टॉप लगाने आया हूँ।”
“तुमने कानून अपने हाथ में क्यों लिया, अर्जुन?!” मनीष का गुस्सा अब फूट पड़ा। “विकास को मोहरा बनाया, अमित का इस्तेमाल किया, और अंत में शास्त्री का बेरहमी से कत्ल कर दिया! क्या तुम्हें सच में लगता है कि तुम कानून की इन लंबी बांहों से बच जाओगे?”
अर्जुन जोर से हँस पड़ा। उसकी हँसी उस खंडहर की दीवारों से टकराकर गूँज उठी। “कानून? कौन सा कानून, इंस्पेक्टर? वही कानून, जो दस साल तक झूठे सबूतों और रसूखदारों के दबाव में मेरे पिता के कातिलों को बचाता रहा? वही कानून, जिसकी आँखों पर मंत्रियों के नोटों की और भ्रष्ट अफसरों की पट्टियाँ बंधी हुई थीं? मैंने किसी बेकसूर की जान नहीं ली है, मनीष बाबू। मैंने सिर्फ उन दरिंदों को उनकी सही सजा दी है जिन्हें यह सड़ा हुआ सिस्टम कभी सजा नहीं दे सकता था।”
“लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि तुम खुद यमराज बन जाओ और फैसले करने लगो!” मनीष आगे बढ़ते हुए चीखा। “अपने हाथ नीचे करो और सरेंडर करो। मैं तुम्हें अदालत के कटघरे में देखना चाहता हूँ, इस तरह खंडहर में खुद को तबाह करते हुए नहीं!”
अर्जुन ने अपने हाथ में पकड़ा हुआ वह लाइटर ऑन किया। लाइटर की छोटी सी नीली लौ उस अंधेरे और धुंधले हॉल में चमक उठी।
“अदालत? मैंने अपनी खुद की ‘Courtroom 302’ सजा ली है, इंस्पेक्टर,” अर्जुन ने ठंडे और अडिग स्वर में कहा। “और इस अदालत का आखिरी फैसला यह है कि इस गुनाह की आग में जिस-जिस ने अपने हाथ सेके थे, वह सब इस राख में मिलकर खत्म होंगे।”
“यह क्या पागलपन है? यह पेट्रोल क्यों छिड़का है यहाँ चारों तरफ?” मनीष की साँसें तेज हो गईं और उसका दिल जोर से धड़कने लगा।
“पागलपन नहीं, यह शुद्ध इंसाफ है,” अर्जुन ने पेट्रोल की केन को तेजी से फर्श पर उड़ेलते हुए कहा। “शास्त्री मर चुका है, विकास जेल की कोठरी में सड़ रहा है, अमित अपनी मर्जी से रास्ते से हट चुका है… और अब इस कहानी का यह आखिरी किरदार—यानी मैं—भी इस आग में हमेशा के लिए विलीन होने के लिए तैयार हूँ।”
“रुक जाओ, अर्जुन! होश में आओ!” मनीष ने अपनी पूरी ताकत से छलांग लगाई ताकि वह अर्जुन तक पहुँचकर उसे दबोच सके।
लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।
अर्जुन ने वह जलता हुआ लाइटर बिना एक पल गंवाए सीधे उस पेट्रोल से भीगे हुए फर्श पर फेंक दिया।
*भभक… धू-धू करके आग भड़क उठी।*
एक ही पल में आग की ऊंची-ऊंची और विकराल लपटें चारों तरफ फैल गईं। सूखी लकड़ी, पुरानी कालिख और पेट्रोल ने मिलकर उस पूरे हॉल को अपनी चपेट में ले लिया। आग की एक दीवार सी खड़ी हो गई, जो मनीष और अर्जुन के बीच आड़े आ गई।
“अर्जुन!” मनीष की चीख उस आग के शोर में दब गई।
आग की उन लपटों के बीच से अर्जुन की हँसी गूँज रही थी—एक ऐसी हँसी जिसमें दर्द भी था और एक अजीब सी मुक्ति का अहसास भी। अर्जुन उस आग के बीचों-बीच बिना हिले-डुले खड़ा था और उसने अपनी आँखें बंद कर ली थीं, बिल्कुल वैसे ही जैसे उसके पिता ने अपनी आखिरी सांस लेते वक्त की थीं।
मनीष ने अपनी जान की परवाह न करते हुए आग के बीच से रास्ता बनाने की कोशिश की, लेकिन आग की भयंकर तपन और धुएं के गुबार ने उसे पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। उसके आँखों से बहता पानी और आंसू आपस में मिल चुके थे—न सिर्फ एक अपराधी के अंत पर, बल्कि इस लाचारी पर कि वह सिस्टम को तो बचा पाया, लेकिन उस जलते हुए इंसान को नहीं बचा सका।
कुछ ही मिनटों बाद, जब मूसलाधार बारिश अपने पूरे उफान पर थी, सब-इंस्पेक्टर अजय और भारी पुलिस बल फोर्स के साथ अंदर दाखिल हुआ।
लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
फायर ब्रिगेड की गाड़ियाँ भी पहुँच चुकी थीं और उन्होंने पानी की बौछार करके आग पर काबू पा लिया था, लेकिन तब तक अंदर सब कुछ जलकर खाक हो चुका था। फैक्ट्री का वह मुख्य हिस्सा पूरी तरह ढह चुका था। चारों तरफ सिर्फ धुआँ, पानी और जली हुई राख के ढेर बचे थे।
मनीष उस खंडहर के बाहर, बारिश के बीचों-बीच एक पत्थर के टुकड़े पर बेसुध सा बैठा हुआ था। उसकी पूरी खाकी वर्दी पर कालिख, मिट्टी और बारिश का कीचड़ लग चुका था। उसके दाहिने हाथ की हथेली में वही पुराना, जंग लगा चांदी का लॉकेट कसकर बंद था, जिसे अर्जुन वहीं छोड़ गया था।
अजय धीरे-धीरे उसके पास आया और भीगी हुई आवाज में बोला, “सर… आग पर पूरी तरह काबू पा लिया गया है। लेकिन अंदर… अंदर कुछ नहीं बचा है। सब कुछ जलकर राख हो गया है।”
मनीष ने धीरे से अपना सिर उठाया। उसकी आँखें सुन्न हो चुकी थीं, और चेहरे पर बारिश की बूंदों के साथ आंसू बह रहे थे। उसने अपनी मुट्ठी खोली और उस चांदी के लॉकेट को अपनी आँखों के सामने रखकर देखा।
“सब खत्म हो गया, अजय…” मनीष की आवाज इतनी धीमी थी कि वह हवा में ही खो गई। “केस की फाइलें हमेशा के लिए दराज में बंद हो जाएंगी। क्रिमिनल इस दुनिया से जा चुके हैं। पुलिस और कानून अपनी जीत का जश्न मना सकते हैं… लेकिन सच, सच यहाँ इस राख में दफन हो गया है।”
अजय कुछ नहीं बोल पाया। वह चुपचाप अपने सीनियर इंस्पेक्टर के कंधे पर हाथ रखकर खड़ा रहा।
बाहर मथुरा के आसमान में गरजते हुए बादल और मूसलाधार बारिश इस बात की गवाही दे रहे थे कि शहर की सतह पर भले ही सब कुछ शांत हो गया हो, लेकिन ‘Courtroom 302’ का यह खौफनाक और भावनात्मक किस्सा हमेशा-इतिहास के पन्नों में अमर हो चुका था—एक ऐसी दास्तान जहाँ खाकी, सियासत, कानून और बदले की आग ने सब कुछ जलाकर रख दिया था।
मनीष ने धीरे से उठकर अपनी जिप्सी की तरफ कदम बढ़ाए। उसने आखिरी बार उस जल चुकी और खंडहर में तब्दील हो चुकी फैक्ट्री की तरफ देखा, अपनी खाकी कैप को ठीक किया, और गाड़ी का दरवाजा खोलकर ड्राइवर सीट पर बैठ गया।
जिप्सी के पहियों ने बारिश के पानी को चीरते हुए आगे की सड़क पर रफ्तार पकड़ ली। केस की फाइलें भले ही हमेशा के लिए बंद हो चुकी थीं, लेकिन मनीष के दिल और दिमाग में यह सवाल ताउम्र गूँजता रहेगा— क्या सिर्फ कानून का होना ही न्याय है, या फिर न्याय की खातिर कानून से परे भी कुछ सच होते हैं?
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अध्याय 5: आखिरी फैसला और खामोशियाँ
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मथुरा शहर अब धीरे-धीरे अपनी सामान्य दिनचर्या की तरफ लौट रहा था। S-17 प्रोजेक्ट के खंडहर में लगी वह आग और पूर्व गृह मंत्री ब्रिजमोहन शास्त्री की सनसनीखेज हत्या—इन दोनों घटनाओं ने पूरे उत्तर प्रदेश को झकझोर कर रख दिया था। अखबारों के मुख्य पृष्ठों पर रोज नई हेडलाइंस छप रही थीं, राजनीतिक गलियारों में बयानबाजी का दौर चरम पर था, और टीवी डिबेट्स में पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए जा रहे थे।
लेकिन इन सब शोरगुल और कोलाहल से कोसों दूर, मथुरा के मुख्य पुलिस थाने का कमरा नंबर चार एकदम शांत था।
इंस्पेक्टर मनीष अपनी उसी पुरानी मेज के सामने वाली कुर्सी पर चुपचाप बैठा था। उसकी आँखों में रातों की जागृति और गहरी थकान साफ झलक रही थी। उसके सामने टेबल पर वही फाइल खुली थी—‘Courtroom 302’। उस फाइल के पन्ने अब हल्के पीले पड़ चुके थे, जिन पर समय और घटनाओं की कालिख जम चुकी थी।
दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई। सब-इंस्पेक्टर अजय अंदर आया। उसके हाथ में एक आधिकारिक लिफाफा था। उसके चेहरे पर एक गंभीर और थका हुआ भाव था।
“सर…” अजय ने धीरे से पुकारा।
मनीष ने अपनी पलकें उठाईं और अजय की तरफ देखा। “क्या है यह?”
अजय ने वह लिफाफा टेबल पर रखते हुए कहा, “हेडक्वार्टर से फाइनल क्लोजर रिपोर्ट आ गई है, सर। शास्त्री हत्याकांड और S-17 फैक्ट्री की आग वाली घटना—दोनों फाइलों को आधिकारिक तौर पर बंद कर दिया गया है।”
मनीष ने उस लिफाफे को अपनी उंगलियों से छुआ, लेकिन उसे खोला नहीं। उसने शांत स्वर में पूछा, “पुलिस विभाग ने इस पूरे मामले पर क्या निष्कर्ष निकाला है, अजय?”
“निष्कर्ष वही है जो सिस्टम सुनना चाहता था, सर,” अजय ने थोड़ा हिचकिचाते हुए कहा। “रिपोर्ट में यह दर्ज किया गया है कि अर्जुन मेहरा ही ब्रिजमोहन शास्त्री का कातिल था। और S-17 फैक्ट्री की आग में वही खुद जलकर मर चुका है। चूँकि मुख्य आरोपी इस दुनिया में नहीं है, इसलिए कानून की किताब के अनुसार यह केस हमेशा के लिए बंद किया जाता है।”
मनीष के चेहरे पर एक फीकी सी मुस्कान तैर गई—ऐसी मुस्कान जिसमें दर्द भी था और व्यवस्था पर एक गहरा व्यंग्य भी।
“कानून की किताब के हिसाब से केस बंद हो गया है, अजय,” मनीष ने अपनी कुर्सी से उठते हुए कहा, “लेकिन क्या सच सचमुच बंद हो गया है?”
अजय के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था। वह चुपचाप अपनी जगह खड़ा रहा।
मनीष ने अपनी खाकी वर्दी की कैप उठाई, उसे अपने सिर पर ठीक किया, और अपनी जेब से वह पुराना, घिसा हुआ चांदी का लॉकेट निकाला—वही लॉकेट जो अर्जुन खंडहर में छोड़ गया था। उसने उस लॉकेट को अपनी मुट्ठी में कसकर भींच लिया।
“चलते हैं, अजय,” मनीष ने दरवाजे की तरफ कदम बढ़ाते हुए कहा। “एक आखिरी जगह जाना है।”
दोपहर ढलने लगी थी। मथुरा के यमुना घाट पर ठंडी हवाएं चल रही थीं। पानी की लहरें धीरे-धीरे किनारों से टकरा रही थीं।
मनीष अकेला घाट की सीढ़ियों पर चल रहा था। उसके कदम शांत और सधे हुए थे। वह उस जगह आकर रुका जहाँ पानी का बहाव थोड़ा तेज था। उसने अपनी मुट्ठी खोली, जिसमें वह चांदी का लॉकेट रखा था।
उसने एक लंबी साँस ली और उस लॉकेट को धीरे से यमुना के शांत जल में प्रवाहित कर दिया। लॉकेट पानी की लहरों के बीच डूब गया और कुछ ही पलों में आँखों से ओझल हो गया।
उसके साथ ही, S-17 प्रोजेक्ट का वह काला अध्याय, विकास की बेबसी, अमित का खौफ, शास्त्री का अहंकार, और अर्जुन का बदला—सब कुछ इतिहास की गहराइयों में विलीन हो गया।
मनीष ने नदी के उस शांत जल की तरफ देखते हुए खुद से एक सवाल पूछा—जो सवाल उसके दिल में पहले दिन से गूँज रहा था।
*“क्या अदालत के फैसले ही असली न्याय होते हैं, या कभी-कभी न्याय को पाने के लिए कानून की उन सीमाओं को तोड़ना पड़ता है जो अपनों के आंसुओं को नहीं देख सकतीं?”*
इस सवाल का कोई औपचारिक जवाब नहीं था। मथुरा का आसमान साफ हो चुका था, सूरज ढल रहा था, और दूर किसी मंदिर से आरती की घंटियों की गूँज हवा में तैर रही थी।
‘Courtroom 302’ का मुकदमा कागजों पर हमेशा के लिए बंद हो चुका था, लेकिन उसकी गूँज और उसका सच मनीष के जमीर में ताउम्र जिंदा रहने वाला था।
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अध्याय 6: न्याय की परछाई
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अदालती फाइलों में धूल जम चुकी थी। मथुरा के पुलिस थाने की दराज में ‘Courtroom 302’ की वह फाइल अब हमेशा के लिए बंद हो चुकी थी, जिस पर ‘क्लोजर रिपोर्ट’ का लाल ठप्पा लग चुका था। शहर के गलियारों में अब वह खौफ नहीं था, अखबारों की सुर्खियां बदल चुकी थीं, और लोग उस भयानक रात को भूलकर अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में आगे बढ़ चुके थे।
लेकिन हर कहानी के खत्म होने के बाद भी कुछ ऐसी परतें छूट जाती हैं, जो वक्त के साथ और गहरी हो जाती हैं।
घटनाओं को बीते हुए कुछ महीने बीत चुके थे। मथुरा की फिजाओं में सर्दियों की विदाई और हल्की बहार की शुरुआत हो रही थी। यमुना के घाटों पर शाम के वक्त ठंडी हवा का झोंका शहर की थकान को मिटा रहा था।
इंस्पेक्टर मनीष अब उस थाने में नहीं था। प्रशासनिक फेरबदल के तहत उसका ट्रांसफर मथुरा से कुछ दूर स्थित एक शांत और छोटे से इलाके में कर दिया गया था। किसी ने इसे उसकी ईमानदारी की सजा कहा, तो किसी ने राजनीतिक दबाव का नतीजा। लेकिन मनीष के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। उसके कंधे पर सजी खाकी वर्दी की चमक अब भी वैसी ही थी, बस उसके भीतर का इंसान अब थोड़ा और शांत और गंभीर हो चुका था।
आज शाम मनीष अपने नए सरकारी क्वार्टर के बरामदे में बैठा था। उसके सामने एक छोटी सी लकड़ी की मेज रखी थी, जिस पर चाय का कप और एक पुरानी डायरी खुली पड़ी थी। वह डायरी वही थी जो अमित वर्मा ने मरने से पहले उसे सौंपी थी, और जिसमें S-17 प्रोजेक्ट के उन तमाम चेहरों के नाम और काले कारनामों का कच्चा-चिट्ठा दर्ज था, जिन्हें कभी कोई अदालत सजा नहीं दे पाई थी।
मनीष ने डायरी का आखिरी पन्ना पलटा। उस पर अर्जुन मेहरा की वह आखिरी लाइन लिखी थी— "Courtroom 302 का फैसला पूरा हुआ।"
तभी सड़क पर किसी गाड़ी के रुकने की आवाज आई। मनीष ने अपनी नजरें उठाईं और बाहर की तरफ देखा।
गेट पर एक साधारण सी कार आकर रुकी थी। कार का दरवाजा खुला और एक शख्स बाहर निकला। उसने एक ढीला-ढाला सूती कुर्ता और कंधे पर झोला टांग रखा था। उसके बाल कुछ बिखरे हुए थे और चेहरे पर एक अजीब सा सुकून था।
मनीष की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने अपनी जगह से उठकर तेजी से गेट की तरफ कदम बढ़ाए।
वह शख्स कोई और नहीं, बल्कि… अमित वर्मा था!
वही अमित वर्मा, जिसने S-17 फैक्ट्री के खंडहर में पोटैशियम साइनाइड खाकर अपनी जान देने का नाटक किया था! वही अमित वर्मा, जिसकी लाश को पुलिस ने अपनी फाइलों में मृत घोषित कर दिया था!
मनीष ने गेट पर पहुँचकर अमित को अपनी बाँहों से पकड़ लिया। उसकी आँखों में हैरानी और गुस्से का एक अजीब सा ज्वार उठ रहा था।
“अमित… तुम? तुम जिंदा हो? S-17 की उस रात… तुमने तो जहर खाया था… फॉरेंसिक रिपोर्ट… तुम्हारी लाश…” मनीष के मुँह से शब्द लड़खड़ा रहे थे।
अमित ने कोई घबराहट नहीं दिखाई। उसके चेहरे पर एक हल्की, शांत मुस्कान तैर गई। उसने धीरे से मनीष के हाथ को अपने कंधे से हटाया और चारों तरफ देखकर धीमी आवाज में कहा, “अंदर चलिए, इंस्पेक्टर साहब—या अब तो आप शायद सिर्फ मनीष बाबू हैं। खुलेआम इस तरह खड़े होकर चर्चा करना ठीक नहीं है।”
मनीष बिना कुछ बोले अमित को अपने साथ अंदर ले आया। उसने कमरे का दरवाजा बंद किया और एक कुर्सी उसकी तरफ खिसकाते हुए खुद सामने बैठ गया।
“यह सब क्या नाटक था, अमित?” मनीष की आवाज सख्त थी। “तुमने खुदकुशी का नाटक क्यों किया? पुलिस और कानून को बेवकूफ क्यों बनाया? और अर्जुन… क्या अर्जुन को भी पता था कि तुम जिंदा हो?”
अमित ने अपनी जेब से एक छोटी सी पानी की बोतल निकाली, एक घूंट पिया, और फिर बहुत ही ठंडे और स्थिर स्वर में जवाब देना शुरू किया।
“हाँ, मनीष बाबू… अर्जुन सब जानता था। बल्कि, यह पूरा प्लान हम दोनों का मिलकर बनाया हुआ था।”
मनीष का माथा ठनक गया। “प्लान? किस बात का प्लान?”
“सिस्टम को हराने का प्लान,” अमित की आँखों में एक अजीब सा चमक आ गई। “हम अच्छी तरह जानते थे कि ब्रिजमोहन शास्त्री जैसे लोग इस देश के कानून और अदालतों से कभी सजा पा ही नहीं सकते। उनके पास पैसे थे, वकील थे, और पुलिस के बड़े अफसरों का संरक्षण था। अगर हम उन्हें सिर्फ कानूनी प्रक्रिया से घेरते, तो वे किसी न किसी तकनीकी खामी का फायदा उठाकर फिर से बाहर आ जाते—ठीक वैसे ही जैसे उन्होंने कोर्टरूम 302 में किया था।”
“तो क्या अर्जुन ने शास्त्री का कत्ल नहीं किया था?” मनीष ने चौंककर पूछा।
“कत्ल?” अमित हल्की सी हँसा। “शास्त्री का कत्ल किसी ने नहीं किया, इंस्पेक्टर साहब। उस रात उस आलीशान बेडरूम में जो नाटक हुआ था, वह सिर्फ शास्त्री को डराने और उसे इस बात का अहसास कराने के लिए था कि उसके गुनाहों का अंत आ चुका है। शास्त्री पहले से ही दिल का मरीज था और उस खौफ के मारे उसका दिल बैठ गया था। हमने उसे मारा नहीं, हमने सिर्फ उसकी डर की परछाई उसके सामने ला दी थी।”
मनीष सन्न रह गया। “और तुम्हारी खुदकुशी? वह फॉरेन्सिक रिपोर्ट? वह साइनाइड?”
“वह सिर्फ एक केमिकल था, मनीष बाबू—एक ऐसा नशीला पदार्थ जो कुछ घंटों के लिए शरीर की नब्ज और सांसों को पूरी तरह रोक देता है, जिससे इंसान मुर्दा जैसा लगने लगता है,” अमित ने समझाया। “खंडहर में मैंने वही नाटक किया ताकि पुलिस की फाइलों में अमित वर्मा और अर्जुन मेहरा—दोनों हमेशा के लिए मरे हुए घोषित कर दिए जाएं। क्योंकि अगर हम जिंदा रहते, तो यह भ्रष्ट सिस्टम हमें कभी चैन से जीने नहीं देता।”
मनीष अपनी कुर्सी पर पीछे की तरफ झुक गया। उसके दिमाग में सारे समीकरण एक-एक करके साफ होने लगे। वह समझ चुका था कि अर्जुन और अमित ने किस शातिर और खतरनाक तरीके से इस पूरे खेल को अंजाम दिया था—कानून की सीमाओं से बाहर जाकर, खुद को ‘मृत’ घोषित करवाकर, उन्होंने उस व्यवस्था से मुक्ति पा ली थी जो सिर्फ ताकतवरों की सुनती थी।
“लेकिन अब तुम यहाँ क्यों आए हो, अमित?” मनीष ने गंभीर स्वर में पूछा। “अगर तुम दुनिया की नजरों में मर चुके हो, तो फिर से सामने क्यों आए? अगर किसी और को पता चल गया…”
अमित ने अपनी झोले से एक लिफाफा निकाला और उसे मनीष की मेज पर रख दिया।
“मैं यहाँ छिपने या डरने नहीं आया, मनीष बाबू,” अमित ने कहा। “मैं यहाँ सिर्फ यह फाइल आपको सौंपने आया हूँ। S-17 प्रोजेक्ट से जुड़े जितने भी बाकी बचे हुए भ्रष्ट चेहरे थे—वे उद्योगपति, वे बेईमान अधिकारी, जो परदे के पीछे बैठे थे—उन सबका डिजिटल और लीगल सबूत इस पेन ड्राइव और कागजों में है। मैंने और अर्जुन ने अपना हिस्सा पूरा कर दिया है।”
मनीष ने उस लिफाफे को देखा, फिर अमित की आँखों में झाँका। “और अर्जुन कहाँ है?”
अमित ने अपनी नजरें खिड़की के बाहर आसमान की तरफ कर लीं। उसके चेहरे पर एक हल्की सी उदासी तैर गई।
“अर्जुन अब इस शहर में नहीं है, और शायद कभी वापस नहीं आएगा,” अमित ने धीमी आवाज में कहा। “वह अपने पिता की आत्मा को शांति देने के लिए हिमालय की किसी शांत वादी में जा चुका है। उसने कहा था कि अब उसे किसी बदले की भूख नहीं है। उसका ‘Courtroom 302’ हमेशा के लिए बंद हो चुका है।”
कमरे में कुछ पलों के लिए भारी सन्नाटा छा गया।
मनीष ने उस लिफाफे को उठाया और अपनी दराज में सुरक्षित रख दिया। उसने महसूस किया कि कानून की वर्दी पहनने के बाद भी कई बार इंसान ऐसे दोराहे पर खड़ा होता है जहाँ उसे समझ नहीं आता कि सही क्या है और गलत क्या।
अमित अपनी जगह से उठा। उसने अपने कपड़े ठीक किए और दरवाजे की तरफ बढ़ने लगा। जाने से पहले उसने मुड़कर मनीष को देखा और हाथ जोड़कर मुस्कुराया— “अलविदा, इंस्पेक्टर साहब। अपना ख्याल रखिएगा। सच की इस लड़ाई में आप हमेशा सही रास्ते पर रहे हैं।”
“अमित…” मनीष ने उसे रोकना चाहा।
लेकिन जब तक मनीष दरवाजे तक पहुँचता, अमित बाहर जा चुका था। बाहर सड़क पर एक कार के स्टार्ट होने की आवाज आई और कुछ ही पलों में वह अंधेरे में ओझल हो गई।
मनीष अपने बरामदे में वापस आया। रात का सन्नाटा अब और गहरा हो चुका था। उसने आसमान की तरफ देखा जहाँ तारे टिमटिमा रहे थे।
उसने अपनी खाकी कैप उतारी, मेज पर रखी, और एक हल्की सी सांस लेते हुए खुद से कहा—
“भले ही अदालत की फाइलें बंद हो चुकी हों, और दुनिया की नजरों में सब शांत हो गया हो… लेकिन न्याय की यह परछाई हमेशा जिंदा रहेगी।”
यमुना के पानी की तरह जिंदगी का यह सफर भी अपनी रफ्तार से आगे बढ़ता गया, और ‘Courtroom 302’ का यह किस्सा मथुरा की गलियों में एक ऐसी कहानी बन गया, जिसे आने वाली पीढ़ियाँ हमेशा याद रखेंगी।
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