परिचय
कुछ कहानियाँ पढ़ी नहीं जातीं… महसूस की जाती हैं।
“वो बचपन… जो स्क्रीन में नहीं, यादों में बसता था” केवल एक कहानी नहीं, बल्कि उन अनगिनत यादों का संग्रह है जिन्हें हमारी पीढ़ी ने जिया है।
यह उस दौर की कहानी है, जब सुबह मोबाइल की घंटी से नहीं, माँ की प्यारी पुकार से होती थी। जब शामें स्क्रीन के सामने नहीं, मोहल्ले के मैदानों में बीतती थीं। जब दोस्ती किसी “फ्रेंड रिक्वेस्ट” की मोहताज नहीं थी, बल्कि विश्वास, अपनापन और साथ निभाने की पहचान थी।
इस पुस्तक का उद्देश्य तकनीक का विरोध करना नहीं है। तकनीक ने हमारे जीवन को सरल और तेज़ बनाया है, लेकिन उसके साथ-साथ उन मानवीय मूल्यों को भी याद रखना ज़रूरी है, जिन्होंने हमारे बचपन को इतना सुंदर बनाया—परिवार के साथ बिताया समय, दादी-नानी की कहानियाँ, दोस्तों की बेफ़िक्र हँसी, मिट्टी की खुशबू, त्योहारों की रौनक और बिना किसी स्वार्थ के बने रिश्ते।
इस कहानी का हर अध्याय आपको उस दुनिया में ले जाएगा, जहाँ छोटी-छोटी खुशियाँ ही सबसे बड़ी दौलत थीं। शायद इन पन्नों में आपको अपना बचपन मिल जाए, अपने पुराने दोस्त याद आ जाएँ, माँ की आवाज़ सुनाई देने लगे या दादी की कोई भूली हुई कहानी फिर से मन में गूँज उठे।
यदि इस पुस्तक को पढ़ने के बाद आप एक बार अपने परिवार के साथ बैठकर बातें करें, अपने बच्चों के साथ कुछ देर खुलकर खेलें, या किसी पुराने मित्र को सिर्फ़ हालचाल पूछने के लिए फ़ोन करें, तो यही इस पुस्तक की सबसे बड़ी सफलता होगी।
आइए…
कुछ देर के लिए समय की रफ़्तार को धीमा करते हैं।
मोबाइल की स्क्रीन से नज़रें हटाकर यादों के उस आँगन में चलते हैं…
जहाँ बचपन आज भी हमारा इंतज़ार कर रहा है।
अध्याय 1
सुबह की पहली किरण और माँ की पुकार
पूर्वी आसमान पर हल्की-सी लालिमा फैलनी शुरू ही हुई थी। रात की ठंडी हवा अब धीरे-धीरे सुबह की ताज़गी में बदल रही थी। गाँव की पगडंडियों पर ओस की छोटी-छोटी बूँदें मोतियों की तरह चमक रही थीं। दूर खेतों में खड़ी गेहूँ की बालियाँ हवा के साथ ऐसे झूम रही थीं, मानो नई सुबह का स्वागत कर रही हों। आम के पेड़ों पर बैठे पक्षियों ने चहचहाना शुरू कर दिया था। कहीं कोयल की मीठी कूक सुनाई दे रही थी तो कहीं मुर्गे की बाँग पूरे गाँव को जगाने का काम कर रही थी।
उस समय सुबह का मतलब मोबाइल का अलार्म नहीं होता था। सुबह का मतलब होता था माँ की आवाज़।
“बेटा… सूरज सिर पर चढ़ जाएगा, उठ जा।”
यह आवाज़ किसी अलार्म से कहीं ज़्यादा प्यारी होती थी। इसमें आदेश कम और अपनापन ज़्यादा होता था। माँ एक बार पुकारती, फिर दूसरी बार थोड़ा मुस्कुराकर, और तीसरी बार कमरे में आकर धीरे से सिर पर हाथ फेर देती।
मिट्टी से बने उस छोटे-से घर में खिड़की से आती सुनहरी धूप धीरे-धीरे कमरे के कोने तक पहुँच रही थी। बाँस की चारपाई पर लेटा दस साल का आरव अभी भी चादर में मुँह छिपाए सोने का नाटक कर रहा था।
माँ ने उसके बालों को सहलाते हुए कहा, “इतनी देर तक सोएगा तो तेरे दोस्त खेलने निकल जाएँगे।”
बस इतना सुनना था कि आरव की आँखें एकदम खुल गईं।
“सच माँ? मोहित आ गया क्या?”
माँ हँस पड़ी।
“अभी नहीं आया, लेकिन आएगा तो तुझे ही ढूँढ़ेगा।”
आरव चारपाई से ऐसे उछलकर नीचे उतरा जैसे किसी ने उसे कोई बड़ा इनाम देने का वादा कर दिया हो।
आज की तरह उसके हाथ सबसे पहले मोबाइल खोजने नहीं बढ़े। उस समय बच्चों की पहली चिंता यह होती थी कि आज कौन-सा खेल खेलेंगे।
वह आँगन में आया। मिट्टी अभी भी रात की नमी से ठंडी थी। नंगे पैर चलते हुए उसे जो सुकून मिलता था, वह किसी महँगे जूते से कभी नहीं मिल सकता था।
आँगन के बीचोंबीच तुलसी का चौरा था। उसके पास दीया अभी भी हल्का-हल्का जल रहा था। दादी हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रही थीं।
“आ गया मेरा शेर?”
दादी ने मुस्कुराकर पूछा।
“हाँ दादी…”
“चल पहले भगवान को प्रणाम कर।”
आरव ने दोनों हाथ जोड़कर आँखें बंद कीं। उसे तब समझ नहीं थी कि प्रार्थना का अर्थ क्या है, लेकिन उसे इतना पता था कि दादी ऐसा करती हैं तो इसमें ज़रूर कुछ अच्छा होगा।
रसोई से लकड़ी के चूल्हे पर जलती आग की खुशबू आ रही थी। तवे पर सिकती रोटियों की महक पूरे घर में फैल चुकी थी।
माँ ने पीतल के गिलास में गरम दूध रखा।
“पहले दूध पी ले।”
आरव ने मुँह बनाया।
“माँ… बाद में।”
“नहीं, पहले दूध।”
“दोस्त आ जाएँगे।”
“दोस्त कहीं भाग नहीं जाएँगे।”
माँ ने मुस्कुराकर उसके हाथ में गिलास पकड़ा दिया।
कुछ ही देर बाद बाहर से आवाज़ आई—
“आरव… ओ आरव…”
बस, यही वह आवाज़ थी जिसका उसे इंतज़ार था।
वह आधा दूध पीकर ही दरवाज़े की ओर भागा।
माँ पीछे से बोली—
“पूरा पीकर जाना।”
वह वापस आया, एक ही साँस में पूरा गिलास खाली किया और हँसते हुए बाहर निकल गया।
गली में मोहित, सोनू, दीपक और छोटू पहले से खड़े थे।
किसी के पैरों में चप्पल नहीं थी।
किसी की शर्ट का एक बटन टूटा हुआ था।
किसी की निक्कर घुटनों तक फटी हुई थी।
लेकिन किसी के चेहरे पर शर्म नहीं थी।
क्योंकि उस समय कपड़ों से नहीं, मुस्कान से पहचान होती थी।
“आज क्या खेलेंगे?”
सोनू ने पूछा।
“पहले क्रिकेट।”
“गेंद कहाँ है?”
“कल नाले में चली गई थी।”
“तो?”
“कोई बात नहीं…”
मोहित घर से पुरानी टेनिस बॉल उठा लाया।
बैट? वह भी नया नहीं था।
पुराने तख़्ते से बनाया गया लकड़ी का बैट ही उनके लिए दुनिया का सबसे अच्छा बैट था।
स्टंप?
दीवार पर कोयले से तीन लाइनें खींच दी गईं।
मैदान?
पूरा मोहल्ला।
कोई बाउंड्री नहीं।
कोई अंपायर नहीं।
कोई ट्रॉफी नहीं।
फिर भी हर मैच विश्व कप के फ़ाइनल से कम नहीं लगता था।
पहली गेंद फेंकी गई।
आरव ने ज़ोर से बल्ला घुमाया।
गेंद सीधे शर्मा चाचा के आँगन में जाकर गिरी।
सब एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
“अब कौन जाएगा?”
सभी चुप।
आख़िरकार छोटू बोला—
“मैं जाता हूँ।”
वह धीरे-धीरे अंदर गया।
शर्मा चाचा ने गेंद उठाकर उसकी ओर देखा।
“फिर आ गई?”
छोटू डर गया।
लेकिन अगले ही पल शर्मा चाचा मुस्कुरा दिए।
“अगली बार थोड़ा संभालकर खेलना।”
उन्होंने गेंद वापस दे दी।
उस समय मोहल्ले के बड़े लोग बच्चों की शरारतों से परेशान कम और खुश ज़्यादा होते थे।
खेल फिर शुरू हुआ।
समय कैसे बीत गया, किसी को पता ही नहीं चला।
तभी दूर से माँ की आवाज़ आई—
“आरव… खाना तैयार है।”
“बस पाँच मिनट।”
यह पाँच मिनट हर बच्चे के जीवन का सबसे बड़ा झूठ हुआ करता था।
दस मिनट बीत गए।
फिर आवाज़ आई—
“अबकी बार नहीं आया तो मैं खुद आ रही हूँ।”
सारे बच्चे हँसने लगे।
“जा… तेरी माँ सच में आ जाएगी।”
आरव दौड़ते हुए घर पहुँचा।
रसोई में गरम-गरम दाल, आलू की सब्ज़ी और ताज़ी रोटियाँ रखी थीं।
सब एक साथ बैठकर खाना खाते थे।
टीवी बंद।
मोबाइल नहीं।
कोई जल्दबाज़ी नहीं।
पिता खेत से लौटे तो सबसे पहले बच्चों से पूछा—
“आज कितने रन बनाए?”
आरव गर्व से बोला—
“छब्बीस।”
पिता मुस्कुराए।
“कल पचास बनाना।”
इतनी-सी बात सुनकर आरव का चेहरा खिल उठा।
उसे किसी सोशल मीडिया पर लाइक नहीं चाहिए थे।
पिता की मुस्कान ही उसकी सबसे बड़ी जीत थी।
दोपहर की तेज़ धूप में बाहर निकलना मना था।
दादी ने चारपाई बिछाई।
“आ जा, आज एक नई कहानी सुनाती हूँ।”
आरव उनके पास लेट गया।
दादी ने कहानी शुरू की।
कहानी किसी राजा की थी।
किसी जंगल की थी।
किसी ईमानदार लकड़हारे की थी।
लेकिन हर कहानी के अंत में एक सीख होती थी।
वह सीख किताबों में नहीं, सीधे दिल में उतर जाती थी।
धीरे-धीरे कहानी सुनते-सुनते आरव की आँख लग गई।
शाम होते ही वह फिर बाहर था।
इस बार पूरा मोहल्ला बच्चों की आवाज़ों से गूँज रहा था।
कोई कबड्डी खेल रहा था।
कोई लुका-छिपी।
कोई पिट्ठू।
कोई साइकिल सीख रहा था।
किसी के गिरने पर बाकी बच्चे हँसते भी थे और तुरंत उठाने भी दौड़ पड़ते थे।
उस समय दोस्ती में प्रतियोगिता थी, लेकिन ईर्ष्या नहीं।
जीतने की इच्छा थी, लेकिन किसी को हराकर छोटा दिखाने की नहीं।
सूरज धीरे-धीरे ढलने लगा।
आसमान नारंगी रंग से भर गया।
माँ फिर दरवाज़े पर खड़ी थीं।
“बस, अब घर आ जाओ।”
इस बार किसी ने बहाना नहीं बनाया।
क्योंकि सब जानते थे कि अब घर में परिवार साथ बैठेगा।
रात का खाना होगा।
दादी की एक और कहानी होगी।
और फिर कल की नई सुबह का इंतज़ार।
उस दौर में दिन छोटे नहीं होते थे।
घड़ियाँ भी वही थीं, चौबीस घंटे भी वही थे, लेकिन समय जैसे ठहर-ठहरकर चलता था।
हर पल को जीने की फुर्सत थी।
हर रिश्ते को महसूस करने का समय था।
बच्चे एक-दूसरे के चेहरे पढ़ते थे, स्टेटस नहीं।
माँ की आँखों में प्यार देखते थे, स्क्रीन की चमक नहीं।
पिता के कंधों पर बैठकर दुनिया देखते थे, मोबाइल की छोटी-सी स्क्रीन पर नहीं।
किसी को यह चिंता नहीं होती थी कि दुनिया क्या कर रही है।
हर किसी को बस अपने घर, अपने दोस्तों और अपने परिवार के साथ बिताए हर पल की चिंता होती थी।
उन्हें पता भी नहीं था कि आने वाले वर्षों में एक ऐसी दुनिया आने वाली है, जहाँ सुबह की पहली आवाज़ माँ की नहीं, मोबाइल के अलार्म की होगी…
जहाँ दोस्त गली के मोड़ पर नहीं, स्क्रीन के पीछे मिलेंगे…
और जहाँ बचपन धीरे-धीरे खेल के मैदानों से निकलकर हथेली में समा जाएगा।
लेकिन उस सुबह…
उस छोटे-से गाँव में…
आरव और उसके दोस्तों के लिए दुनिया अब भी उतनी ही बड़ी थी, जितनी उनके सपनों की उड़ान। और शायद यही उस बचपन की सबसे बड़ी खूबसूरती थी—वह किसी स्क्रीन में नहीं, लोगों के दिलों और यादों में बसता था।
अध्याय 2
मिट्टी की खुशबू और खेलों की दुनिया
सूरज अभी पूरी तरह निकला भी नहीं था कि गाँव की गलियों में बच्चों की आवाज़ें गूँजने लगी थीं। रात की हल्की ठंडक अभी भी हवा में घुली हुई थी। खेतों से आती मिट्टी की भीनी-भीनी खुशबू पूरे वातावरण को महका रही थी। पेड़ों पर बैठी गौरैया और मैना चहचहा रही थीं, मानो वे भी बच्चों के साथ खेलने की तैयारी कर रही हों।
आरव आज फिर जल्दी उठ गया था। उसकी आँख खुलते ही सबसे पहला ख़याल यही आया कि आज कौन-सा खेल खेला जाएगा। उस समय हर सुबह एक नया रोमांच लेकर आती थी। कोई नोटिफिकेशन नहीं, कोई मोबाइल स्क्रीन नहीं, कोई गेम डाउनलोड नहीं। बस एक ही उत्सुकता—“आज दोस्तों के साथ क्या नया होगा?”
जल्दी-जल्दी नाश्ता करके वह घर से बाहर निकला। गली के मोड़ पर पहुँचते ही उसने देखा कि मोहित पहले से ही एक लकड़ी का डंडा हाथ में लिए खड़ा था।
“चल, आज गिल्ली-डंडा खेलते हैं।”
आरव की आँखें चमक उठीं।
“गिल्ली बनाई क्या?”
“हाँ, कल शाम को पिताजी ने बना दी थी।”
दोनों दौड़ते हुए पुराने बरगद के पेड़ के पास पहुँचे। थोड़ी ही देर में सोनू, दीपक, छोटू और बाकी बच्चे भी वहाँ आ गए। किसी ने किसी को फ़ोन नहीं किया था। किसी ने मैसेज नहीं भेजा था। फिर भी सब एक ही समय पर पहुँच गए। जैसे हर बच्चे की घड़ी एक-दूसरे के दिल से जुड़ी हुई थी।
मोहित ने छोटी-सी लकड़ी की गिल्ली ज़मीन पर रखी और डंडे से उसे उछालकर ज़ोर से मारा।
गिल्ली हवा में इतनी दूर गई कि सब बच्चे उसकी दिशा में दौड़ पड़े।
“पकड़… पकड़…!”
हर तरफ़ सिर्फ़ हँसी और दौड़ते कदमों की आवाज़ थी।
कोई हारने पर नाराज़ नहीं होता था। कोई जीतकर घमंड नहीं करता था। खेल का सबसे बड़ा इनाम खेलना ही होता था।
कुछ देर बाद गिल्ली-डंडा खत्म हुआ तो दीपक बोला—
“चलो अब पिट्ठू खेलते हैं।”
पास पड़े सात छोटे-छोटे सपाट पत्थर इकट्ठा किए गए। उन्हें एक-दूसरे के ऊपर रखा गया। पुरानी टेनिस बॉल हाथ में आई और खेल शुरू हो गया।
आरव ने निशाना लगाया।
पत्थरों का ढेर बिखर गया।
“भागो…!”
सभी बच्चे इधर-उधर दौड़ पड़े।
जिसे गेंद लग जाती, वह हँसते हुए बाहर हो जाता। कोई बहस नहीं, कोई झगड़ा नहीं।
कभी-कभी छोटे-मोटे विवाद भी होते थे।
“अरे, लगी ही नहीं!”
“लगी थी।”
“झूठ बोल रहा है।”
फिर दो मिनट बाद वही दोनों बच्चे फिर से साथ खेलते दिखाई देते।
न कोई अहंकार था, न कोई मनमुटाव।
बचपन की नाराज़गी भी कितनी छोटी होती थी।
दस मिनट की।
उसके बाद सब पहले जैसा।
धूप अब तेज़ होने लगी थी।
सोनू ने अचानक कहा—
“चलो आम के बाग़ में चलते हैं।”
सभी बच्चों की आँखों में चमक आ गई।
गाँव से थोड़ा दूर एक बड़ा आम का बाग़ था।
वहाँ जाने की मनाही थी।
और शायद यही वजह थी कि वहाँ जाना सबसे रोमांचक लगता था।
सब धीरे-धीरे दबे पाँव बाग़ में पहुँचे।
पेड़ों पर कच्चे आम लटक रहे थे।
मोहित सबसे फुर्तीला था।
वह पेड़ पर चढ़ गया।
नीचे खड़े बच्चे अपनी बनियान फैलाकर आम पकड़ने लगे।
अचानक दूर से किसी की आवाज़ आई—
“कौन है वहाँ?”
“भागो…!”
इतना सुनना था कि सारे बच्चे अलग-अलग दिशाओं में दौड़ पड़े।
कोई खेत में घुस गया।
कोई मेड़ के पीछे छिप गया।
कोई हँसते-हँसते गिर पड़ा।
कुछ देर बाद जब सब सुरक्षित मिले तो उनकी हँसी रुक ही नहीं रही थी।
आरव ने साँस सँभालते हुए कहा—
“इतना मज़ा तो किसी मेले में भी नहीं आता।”
सब फिर ज़ोर से हँस पड़े।
दोपहर तक कपड़े धूल से भर चुके थे।
घुटनों पर मिट्टी लगी थी।
किसी की कोहनी छिल गई थी।
किसी की चप्पल टूट गई थी।
लेकिन किसी को इसकी परवाह नहीं थी।
उस समय बचपन की सबसे बड़ी पहचान यही थी कि शाम तक कपड़े जितने गंदे होते, दिन उतना ही अच्छा माना जाता।
घर लौटते समय रास्ते में नहर पड़ती थी।
सभी बच्चे वहीं रुक गए।
सबने हाथ-मुँह धोया।
ठंडे पानी की छींटें चेहरे पर पड़ते ही जैसे सारी थकान गायब हो गई।
किसी ने पानी उछाला।
दूसरे ने बदला लिया।
कुछ ही पल में नहर के किनारे पानी की छोटी-सी लड़ाई शुरू हो गई।
हँसी इतनी गूँज रही थी कि पास खेत में काम कर रहे किसान भी मुस्कुरा उठे।
घर पहुँचे तो माँ दरवाज़े पर ही खड़ी थीं।
“आज फिर मिट्टी में लोटकर आए हो?”
आरव मुस्कुरा दिया।
“बस थोड़ा-सा खेल रहे थे।”
माँ ने उसके कपड़ों की ओर देखा।
“थोड़ा-सा?”
फिर खुद ही हँस पड़ीं।
उन्होंने डाँटा कम, प्यार ज़्यादा किया।
“चलो, पहले नहा लो।”
बाल्टी में भरा ठंडा पानी सिर पर पड़ते ही पूरा शरीर ताज़ा हो गया।
नहाकर जब वह बाहर आया तो माँ ने गरम-गरम रोटियाँ और आम का अचार परोसा।
इतनी भूख लगी थी कि कुछ ही मिनटों में थाली साफ़ हो गई।
दादी मुस्कुराते हुए बोलीं—
“लगता है आज खूब खेले हो।”
“हाँ दादी…”
“याद रखना, जो बच्चा मिट्टी से दोस्ती करता है, वही जीवन में मज़बूत बनता है।”
आरव ने उस समय उस बात का अर्थ नहीं समझा।
लेकिन दादी की हर बात उसके मन में कहीं न कहीं बस जाती थी।
शाम ढलने लगी।
आज कबड्डी का मुकाबला होना था।
पूरा मोहल्ला इकट्ठा था।
छोटे बच्चे, बड़े बच्चे, चाचा, ताऊ, दादाजी…
सब मैदान के किनारे खड़े होकर तालियाँ बजा रहे थे।
किसी के हाथ में कैमरा नहीं था।
कोई वीडियो रिकॉर्ड नहीं कर रहा था।
फिर भी हर पल लोगों की यादों में हमेशा के लिए रिकॉर्ड हो रहा था।
“कबड्डी… कबड्डी… कबड्डी…”
आरव साँस रोककर विरोधी टीम के बीच पहुँचा।
सामने चार बच्चे खड़े थे।
एक ने पैर पकड़ लिया।
दूसरे ने कमर।
तीसरे ने हाथ।
लेकिन आरव किसी तरह खींचते हुए अपनी लाइन तक पहुँच गया।
पूरा मैदान तालियों से गूँज उठा।
उस दिन उसे लगा जैसे उसने कोई बहुत बड़ी जीत हासिल कर ली हो।
सूरज अब ढल चुका था।
आकाश में लालिमा फैल गई थी।
घरों से चूल्हों का धुआँ उठने लगा।
माएँ अपने-अपने बच्चों को आवाज़ देने लगीं।
एक-एक करके सब बच्चे घर लौटने लगे।
जाते-जाते भी बातें खत्म नहीं होती थीं।
“कल सुबह जल्दी आना।”
“हाँ, कल नई गेंद लाऊँगा।”
“और कल छुपन-छुपाई भी खेलेंगे।”
“ठीक है।”
घर पहुँचकर आरव आँगन में बैठ गया।
दादी चरखा चला रही थीं।
पिताजी खेत से लौट चुके थे।
माँ रसोई में रात का खाना बना रही थीं।
घर के भीतर एक अजीब-सी शांति थी।
वह शांति, जिसमें अपनापन था।
बाहर अँधेरा बढ़ रहा था, लेकिन घर के भीतर रिश्तों की रोशनी फैली हुई थी।
आरव ने आसमान की ओर देखा।
अनगिनत तारे चमक रहे थे।
उसने धीरे से पूछा—
“दादी, इतने सारे तारे कहाँ से आते हैं?”
दादी मुस्कुराईं।
“ये उन लोगों की दुआएँ हैं, जो अच्छे काम करते हैं।”
आरव बिना कुछ कहे तारों को देखता रहा।
आज की तरह उस समय रातें मोबाइल की नीली रोशनी में नहीं बीतती थीं।
रातें तारों को गिनते हुए बीतती थीं।
दिन मिट्टी में खेलते हुए बीतते थे।
और बचपन…
वह किसी ऐप, किसी स्क्रीन या किसी डिजिटल दुनिया का हिस्सा नहीं था।
वह खेतों की हरियाली में था।
धूल से सने कपड़ों में था।
घुटनों के छोटे-छोटे घावों में था।
दोस्तों की खिलखिलाहट में था।
और उस मिट्टी की भीनी-भीनी खुशबू में था, जो बरसों बाद भी बड़े होने पर अचानक बारिश की पहली बूँद के साथ याद बनकर लौट आती है।
शायद इसी लिए कहा जाता है—
जिस बचपन के हाथों में मिट्टी लगी होती है, उसकी यादें पूरी ज़िंदगी दिल से कभी नहीं मिटतीं।
अध्याय 3
दोस्त, जो परिवार से कम नहीं थे
गाँव की सुबहें जितनी सुंदर होती थीं, उतनी ही प्यारी उसकी शामें भी होती थीं। सूरज जैसे-जैसे पश्चिम की ओर ढलता, पूरा गाँव बच्चों की हँसी से भर उठता। हर गली, हर चौपाल और हर मैदान में जीवन दौड़ता हुआ दिखाई देता। उस समय दोस्ती किसी मोबाइल नंबर, चैट लिस्ट या सोशल मीडिया पर बने “फ्रेंड” से नहीं होती थी। दोस्ती आँखों की पहचान से होती थी, आवाज़ की मिठास से होती थी और उस भरोसे से होती थी, जो बिना किसी वादे के भी हमेशा कायम रहता था।
आरव के लिए उसके दोस्त ही उसकी सबसे बड़ी दुनिया थे।
मोहित, सोनू, दीपक, छोटू और इमरान—ये पाँचों अलग-अलग घरों में पैदा हुए थे, लेकिन पूरे गाँव में लोग उन्हें एक ही टोली के नाम से जानते थे। अगर किसी एक को ढूँढ़ना होता, तो बाकी चार अपने-आप मिल जाते।
उनकी दोस्ती में कभी अमीरी-गरीबी का फ़र्क नहीं आया। किसी के पिता किसान थे, किसी के बढ़ई, किसी के दूध का काम था, तो किसी के घर छोटी-सी किराने की दुकान। लेकिन बच्चों की दुनिया में इन बातों की कोई कीमत नहीं थी।
एक दिन सुबह-सुबह मोहित घर के बाहर आया और ज़ोर से आवाज़ लगाई—
“आरव… जल्दी बाहर आ!”
आरव दौड़ता हुआ बाहर निकला।
“क्या हुआ?”
मोहित की आँखों में चमक थी।
“नहर के पास वाले खेत में एक नया झूला बाँधा है।”
“सच?”
“चल, सब वहीं जा रहे हैं।”
दोनों बिना एक पल गँवाए दौड़ पड़े।
रास्ते में सोनू और दीपक भी मिल गए। छोटू तो पहले से ही आगे भाग रहा था। पाँचों की दौड़ देखकर रास्ते में खड़े लोग मुस्कुरा देते।
“लो, आ गई गाँव की फौज।”
गाँव के बड़े-बुज़ुर्ग अक्सर उन्हें इसी नाम से बुलाते थे।
नहर के किनारे एक पुराने पीपल के पेड़ पर मोटी रस्सी का झूला बँधा था। रस्सी शायद किसी किसान ने अपने बच्चों के लिए बाँधी थी, लेकिन गाँव में कोई भी बच्चा उसे अपना ही समझता था।
सबसे पहले छोटू झूले पर बैठा।
मोहित ने ज़ोर से धक्का दिया।
झूला हवा में ऊपर उठा।
छोटू खुशी से चिल्लाया—
“और तेज़…!”
उसकी हँसी पूरे खेत में गूँज गई।
एक-एक करके सब झूला झूलने लगे।
किसी को जल्दी नहीं थी।
किसी के हाथ में घड़ी नहीं थी।
उस समय समय नहीं चलता था, बचपन चलता था।
दोपहर होने लगी तो सब लोग बरगद के पेड़ की छाया में बैठ गए।
दीपक अपने घर से गुड़ और चने लाया था।
सोनू की माँ ने पराँठे रख दिए थे।
मोहित के पास आम का अचार था।
आरव अपने घर से गुड़ वाली रोटी लेकर आया था।
किसी ने नहीं पूछा—
“ये मेरा है या तुम्हारा?”
जो जिसके पास था, वह सबका था।
एक रोटी पाँच हिस्सों में टूट जाती थी।
एक आम सब मिलकर खाते थे।
एक लोटे से सब पानी पी लेते थे।
आज जैसी अलग-अलग पानी की बोतलें नहीं होती थीं।
उस समय दिल बड़े थे, इसलिए चीज़ें छोटी होने पर भी सबके लिए काफ़ी होती थीं।
खाना खाते-खाते अचानक छोटू उदास हो गया।
आरव ने पूछा—
“क्या हुआ?”
छोटू ने धीरे से कहा—
“पिताजी बीमार हैं… कल से काम पर नहीं गए।”
कुछ पल के लिए सब चुप हो गए।
फिर मोहित बोला—
“चल, शाम को सब मिलकर तेरे घर चलेंगे।”
शाम को पाँचों दोस्त छोटू के घर पहुँचे।
छोटा-सा मिट्टी का घर।
आँगन में पुरानी चारपाई।
उस पर छोटू के पिता लेटे हुए थे।
आरव ने धीरे से उनके पैर छुए।
“चाचा, जल्दी ठीक हो जाइए।”
उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
दीपक ने अपनी जेब से दो अमरूद निकाले।
“चाचा, ये आपके लिए।”
सोनू ने कहा—
“मेरी माँ ने दलिया भेजा है।”
छोटू की माँ की आँखें भर आईं।
उन्होंने कहा—
“तुम सब तो इसके दोस्त नहीं… भाई हो।”
उस दिन बच्चों को पहली बार एहसास हुआ कि दोस्ती सिर्फ़ साथ खेलने का नाम नहीं होती।
दोस्ती मुश्किल समय में बिना बुलाए साथ खड़े होने का नाम भी होती है।
कुछ दिन बाद स्कूल खुला।
हर दिन की तरह सब साथ-साथ पैदल स्कूल जाते।
रास्ते भर बातें।
पहेलियाँ।
हँसी।
कभी दौड़।
कभी पेड़ों से इमली तोड़ना।
कभी रास्ते में बहती छोटी नहर में पैर डालकर बैठ जाना।
स्कूल पहुँचने की कोई जल्दी नहीं होती थी।
रास्ता ही आधा मज़ा होता था।
एक दिन स्कूल में मास्टर जी ने कहा—
“कल हर बच्चा अपनी पसंद की कोई चीज़ लेकर आएगा।”
अगले दिन कोई नया पेंसिल बॉक्स लाया।
कोई रंगीन कॉपी।
कोई खिलौना।
लेकिन छोटू कुछ नहीं लाया।
वह चुपचाप सबसे पीछे बैठा रहा।
मास्टर जी ने पूछा—
“तुम कुछ नहीं लाए?”
उसने सिर झुका लिया।
“घर में पैसे नहीं थे।”
पूरी कक्षा शांत हो गई।
इतने में आरव अपनी नई पेंसिल लेकर उसके पास गया।
“ये हमारी है।”
मोहित बोला—
“और ये कॉपी भी।”
दीपक ने अपना रबर दे दिया।
सोनू ने कहा—
“अब तो तेरे पास सबसे ज़्यादा सामान है।”
छोटू की आँखों में आँसू आ गए।
लेकिन उन आँसुओं में दुख नहीं था।
वह अपनापन था।
मास्टर जी कुछ देर तक बच्चों को देखते रहे।
फिर मुस्कुराकर बोले—
“आज तुम लोगों ने किताबों से बड़ी शिक्षा दी है।”
उस दिन किसी को पुरस्कार नहीं मिला।
लेकिन पाँचों दोस्तों ने एक-दूसरे का दिल जीत लिया।
समय बीतता गया।
बरसात का मौसम आया।
पूरा गाँव भीग गया।
गलियों में पानी भर गया।
कच्ची मिट्टी नरम हो गई।
माएँ बार-बार मना करतीं—
“बाहर मत जाना, फिसल जाओगे।”
लेकिन बच्चों के लिए यही तो सबसे अच्छा मौसम था।
सब बारिश में भीगते हुए बाहर निकल पड़े।
कागज़ की नाव बनाई गई।
नालियों में बहते पानी में उसे छोड़ दिया गया।
जिसकी नाव सबसे दूर जाती, वही विजेता कहलाता।
अचानक मोहित फिसलकर कीचड़ में गिर गया।
एक पल के लिए सब उसे देखने लगे।
फिर अगले ही पल…
सब खुद भी कीचड़ में कूद पड़े।
अब कोई साफ़ नहीं बचा था।
जब सब गंदे हो गए, तब किसी को किसी पर हँसने की ज़रूरत ही नहीं रही।
शाम को सबकी माओं ने डाँटा।
लेकिन बच्चों के चेहरे की मुस्कान नहीं गई।
उस समय दोस्ती की सबसे बड़ी पहचान यही थी—
अगर एक रोता था, तो बाकी उसे हँसाने की कोशिश करते थे।
अगर एक गिरता था, तो बाकी उसे उठाने दौड़ पड़ते थे।
अगर एक के पास कुछ नहीं होता था, तो बाकी अपना बाँट देते थे।
और अगर एक गलती करता था, तो बाकी भी उसके साथ खड़े रहते थे।
कई बार शरारतें भी सब मिलकर करते।
एक बार पूरे समूह ने मिलकर चौधरी चाचा के आम के पेड़ से आम तोड़ लिए।
अगले दिन चाचा ने सभी बच्चों को बुला लिया।
सब डर गए।
सोचा, आज तो खूब डाँट पड़ेगी।
चाचा ने पूछा—
“बताओ, आम किसने तोड़े?”
कोई कुछ नहीं बोला।
फिर आरव आगे आया।
“चाचा… गलती हम सबकी थी।”
मोहित भी आगे आ गया।
“अगर डाँटना है, तो हम सबको डाँटिए।”
चौधरी चाचा कुछ पल उन्हें देखते रहे।
फिर हँस पड़े।
“अच्छा… चोरी भी साथ और सज़ा भी साथ?”
सबने एक साथ सिर हिला दिया।
चाचा घर के अंदर गए और एक टोकरी भरकर पके हुए आम ले आए।
“अगली बार माँग लेना… चोरी मत करना।”
बच्चों ने शर्म से सिर झुका लिया।
उस दिन उन्होंने सीखा—
गलती मान लेना इंसान को छोटा नहीं बनाता।
झूठ उसे छोटा बनाता है।
धीरे-धीरे शाम हो गई।
सूरज खेतों के पीछे छिपने लगा।
पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे।
पाँचों दोस्त गाँव की चौपाल पर बैठे थे।
कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला।
बस हवा चल रही थी।
सामने डूबता सूरज था।
आरव ने धीरे से कहा—
“हम हमेशा ऐसे ही साथ रहेंगे ना?”
मोहित मुस्कुराया।
“जब तक ये गाँव है… तब तक हम हैं।”
दीपक बोला—
“और अगर कोई कहीं चला भी गया…”
सोनू ने उसकी बात पूरी की—
“…तो भी दोस्ती नहीं जाएगी।”
छोटू ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
एक-एक करके सबने अपना हाथ उसके ऊपर रख दिया।
किसी ने कसम नहीं खाई।
कोई बड़ी-बड़ी बातें नहीं कीं।
फिर भी उस शाम पाँच छोटे हाथों ने जो वादा किया, वह किसी लिखित समझौते से कहीं ज़्यादा मज़बूत था।
उन्हें नहीं पता था कि आने वाला समय बहुत कुछ बदल देगा।
कुछ लोग शहर चले जाएँगे।
कुछ नई ज़िम्मेदारियों में उलझ जाएँगे।
कुछ मुलाक़ातें कम हो जाएँगी।
लेकिन बचपन की सच्ची दोस्ती की एक खूबी होती है—
वह समय के साथ पुरानी नहीं होती, बल्कि यादों में और भी कीमती हो जाती है।
बरसों बाद जब इंसान अपनी ज़िंदगी की सबसे सुंदर यादें तलाशता है, तो उसे न महँगे खिलौने याद आते हैं, न नए कपड़े।
उसे याद आते हैं वे दोस्त…
जो बिना किसी मतलब के साथ चलते थे।
जो बिना बुलाए घर आ जाते थे।
जो बिना पूछे अपना टिफ़िन बाँट देते थे।
और जो बिना किसी शर्त के परिवार से कम नहीं होते थे।
अध्याय 4
दादी-नानी की कहानियों वाली रातें
गाँव में रात धीरे-धीरे उतरती थी। सूरज के ढलते ही आकाश सुनहरे रंग से नारंगी और फिर गहरे नीले रंग में बदल जाता। दूर-दूर तक फैले खेतों से ठंडी हवा चलने लगती। पेड़ों पर लौटते पक्षियों का शोर धीरे-धीरे शांत हो जाता और उसकी जगह झींगुरों की मधुर आवाज़ें सुनाई देने लगतीं। उस समय रात का मतलब अँधेरा नहीं, बल्कि पूरे परिवार का एक साथ बैठना होता था।
आरव के घर में भी यही परंपरा थी।
जैसे ही माँ रसोई में रात का खाना बनाना शुरू करतीं, पूरे घर में चूल्हे पर जलती लकड़ियों की खुशबू फैल जाती। सरसों के तेल में तड़का लगने की आवाज़, तवे पर सिकती रोटियों की महक और मिट्टी के घर की सादगी—यही उस समय की सबसे बड़ी दौलत थी।
पिताजी खेत से लौट चुके थे। उनके कपड़ों पर मिट्टी लगी रहती, माथे पर पसीना होता, लेकिन चेहरे पर हमेशा सुकून दिखाई देता। घर लौटते ही सबसे पहले वे आँगन में रखे घड़े से पानी पीते, फिर दादी के पास बैठकर दिनभर की बातें करते।
आरव और उसके दोस्त भी शाम का खेल खत्म करके अपने-अपने घर लौट चुके थे। खेल की थकान शरीर में होती थी, लेकिन चेहरे पर मुस्कान हमेशा बनी रहती थी।
रात का खाना पूरे परिवार के साथ बैठकर खाया जाता।
न कोई जल्दी।
न कोई मोबाइल।
न कोई टीवी की तेज़ आवाज़।
बस रोटियों की खुशबू, सब्ज़ी का स्वाद और परिवार की बातें।
माँ एक-एक करके सबकी थाली में गरम रोटियाँ रखती जातीं।
“एक और रोटी ले लो।”
“नहीं माँ, पेट भर गया।”
“अभी तो तुमने दो ही खाई हैं।”
दादी हँसकर कहतीं—
“अरे, खेलने में जितनी ताक़त लगाता है, उससे ज़्यादा तो खाना चाहिए।”
सब हँस पड़ते।
खाना खत्म होते ही आरव को सबसे ज़्यादा जिस पल का इंतज़ार रहता था, वह अब आने वाला था।
दादी की कहानी।
गर्मियों के दिनों में आँगन में चारपाइयाँ बिछा दी जातीं। ऊपर खुला आसमान होता। लाखों तारे ऐसे चमकते, जैसे किसी ने काले मखमल पर चाँदी बिखेर दी हो।
दादी अपनी पुरानी चारपाई पर बैठ जातीं।
आरव उनके बिल्कुल पास लेट जाता।
कुछ ही देर में उसकी छोटी बहन गुड़िया भी आ जाती।
पड़ोस के दो-तीन बच्चे भी धीरे-धीरे आकर बैठ जाते।
किसी को किसी ने बुलाया नहीं था।
लेकिन पूरे मोहल्ले को पता होता था—
अब दादी की कहानी शुरू होने वाली है।
दादी ने हमेशा की तरह मुस्कुराकर पूछा—
“आज कौन-सी कहानी सुनोगे?”
आरव ने तुरंत कहा—
“राजा वाली।”
गुड़िया बोली—
“नहीं… परी वाली।”
पड़ोस का छोटा बच्चा बोला—
“मुझे भूत वाली सुननी है।”
दादी ज़ोर से हँस पड़ीं।
“अच्छा… आज ऐसी कहानी सुनाती हूँ जिसमें राजा भी होगा, जंगल भी होगा और सीख भी होगी।”
सभी बच्चे चुपचाप लेट गए।
दादी ने कहानी शुरू की—
“बहुत समय पहले एक छोटा-सा राज्य था…”
जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती, बच्चों की आँखों के सामने पूरा दृश्य जीवित हो उठता।
उन्हें लगता, सचमुच कोई महल है।
सचमुच कोई घना जंगल है।
सचमुच कोई बहादुर राजकुमार घोड़े पर बैठा है।
उस समय कल्पना की दुनिया किसी मोबाइल स्क्रीन से कहीं बड़ी होती थी।
क्योंकि वह आँखों से नहीं, मन से दिखाई देती थी।
दादी कभी-कभी कहानी के बीच में रुक जातीं।
“बताओ, अगर तुम उस राजकुमार की जगह होते तो क्या करते?”
आरव सोचने लगता।
“मैं पहले उस बूढ़े आदमी की मदद करता।”
दादी मुस्कुरातीं।
“बस, यही तो कहानी की सीख है।”
हर कहानी के अंत में कोई न कोई शिक्षा छिपी होती।
सच बोलना।
बड़ों का सम्मान करना।
लालच से दूर रहना।
ज़रूरतमंद की मदद करना।
ईमानदारी से मेहनत करना।
बच्चों को कभी यह महसूस ही नहीं होता था कि उन्हें शिक्षा दी जा रही है।
सीख कहानी के साथ अपने-आप दिल में उतर जाती थी।
एक रात अचानक बिजली चली गई।
पूरा गाँव अँधेरे में डूब गया।
लेकिन उस समय बिजली जाना कोई बड़ी बात नहीं थी।
माँ ने लालटेन जला दी।
पीली रोशनी पूरे आँगन में फैल गई।
लालटेन की टिमटिमाती लौ में दादी का चेहरा और भी अपनापन लिए दिखाई दे रहा था।
हवा चलती तो लौ हल्की-सी काँप जाती।
दीवार पर सबकी परछाइयाँ बनतीं।
गुड़िया डरकर दादी का हाथ पकड़ लेती।
दादी मुस्कुराकर कहतीं—
“डर मत… मैं हूँ ना।”
बस इतना सुनते ही उसका डर गायब हो जाता।
दादी ने उस रात पंचतंत्र की एक कहानी सुनाई।
कहानी दो मित्रों की थी।
एक संकट में दूसरे को छोड़कर भाग गया।
दूसरा अपने साहस और बुद्धिमानी से बच निकला।
कहानी खत्म होने के बाद दादी ने पूछा—
“बताओ, सच्चा दोस्त कौन था?”
आरव ने बिना सोचे जवाब दिया—
“जो साथ छोड़कर नहीं भागा।”
दादी ने सिर हिलाया।
“याद रखना, अच्छे समय में साथ देने वाले बहुत मिलेंगे। मुश्किल समय में जो साथ खड़ा रहे, वही अपना होता है।”
यह बात आरव के मन में गहराई तक उतर गई।
कुछ दिनों बाद बारिश का मौसम आ गया।
उस रात बाहर तेज़ बारिश हो रही थी।
टीन की छत पर गिरती बारिश की आवाज़ किसी मधुर संगीत जैसी लग रही थी।
बिजली चमकती।
बादल गरजते।
गुड़िया डरकर दादी से लिपट जाती।
दादी कहानी बीच में रोककर उसके सिर पर हाथ फेरतीं।
“देखो, बादल लड़ नहीं रहे… बस खेल रहे हैं।”
गुड़िया मुस्कुरा देती।
दादी फिर कहानी शुरू कर देतीं।
ऐसा लगता था जैसे हर मौसम के लिए उनके पास अलग कहानी हो।
गर्मी की अलग।
बरसात की अलग।
सर्दियों की अलग।
त्योहारों की अलग।
और हर कहानी के साथ उनका अनुभव जुड़ा होता।
एक दिन आरव ने पूछा—
“दादी, आपको इतनी सारी कहानियाँ याद कैसे रहती हैं?”
दादी कुछ देर आसमान की ओर देखती रहीं।
फिर बोलीं—
“बेटा, ये कहानियाँ मैंने भी अपनी दादी से सुनी थीं। उन्होंने अपनी दादी से सुनी थीं। कहानी सिर्फ़ कहानी नहीं होती, पीढ़ियों की धरोहर होती है।”
आरव चुप हो गया।
उसे पहली बार लगा कि दादी सिर्फ़ कहानी नहीं सुना रहीं।
वे समय को आगे बढ़ा रही हैं।
धीरे-धीरे रात गहरी हो जाती।
एक-एक करके बच्चों की आँखें बंद होने लगतीं।
कई बार कहानी पूरी होने से पहले ही आरव सो जाता।
सुबह उठकर पूछता—
“दादी, कल कहानी का अंत क्या हुआ था?”
दादी हँसकर कहतीं—
“आज रात फिर से सुनाऊँगी।”
उस समय किसी कहानी को दोबारा सुनने में भी उतना ही आनंद आता था।
क्योंकि कहानी का मज़ा उसके अंत में नहीं, उसे सुनाने वाले के प्यार में होता था।
समय धीरे-धीरे बदलने लगा।
गाँव में कुछ घरों में टेलीविज़न आ गया।
शाम को लोग धारावाहिक देखने लगे।
फिर कुछ वर्षों बाद मोबाइल भी आने लगे।
धीरे-धीरे रातें बदलने लगीं।
जहाँ कभी आँगन में चारपाइयाँ बिछती थीं, वहाँ अब कमरों के दरवाज़े बंद रहने लगे।
जहाँ कभी बच्चे दादी के पास बैठते थे, वहाँ अब वे स्क्रीन के सामने बैठने लगे।
कहानियाँ सुनाने वाली आवाज़ें कम होती गईं।
वीडियो की आवाज़ें बढ़ती गईं।
रिश्ते पहले जैसे थे, लेकिन साथ बिताया जाने वाला समय कम हो गया।
एक रात आरव ने देखा कि पड़ोस के चाचा का पोता मोबाइल में कार्टून देख रहा था।
दादी पास बैठी थीं।
उन्होंने प्यार से कहा—
“आओ बेटा, आज एक कहानी सुनाऊँ?”
बच्चे ने बिना सिर उठाए जवाब दिया—
“नहीं दादी… अभी नहीं।”
दादी मुस्कुराईं।
उन्होंने कुछ नहीं कहा।
लेकिन उनकी आँखों में एक हल्की-सी उदासी उतर आई।
आरव ने वह उदासी पहली बार देखी।
उसे याद आया—
वह भी तो कभी दादी की कहानी सुनते-सुनते उनकी गोद में सो जाता था।
उसने धीरे से दादी का हाथ पकड़ा।
“दादी…”
“हाँ बेटा?”
“आज मुझे वही राजा वाली कहानी फिर से सुनाओ।”
दादी के चेहरे पर फिर वही पुरानी मुस्कान लौट आई।
उन्होंने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा और कहा—
“कहानी कभी पुरानी नहीं होती बेटा… सुनने वाले बदल जाते हैं।”
उस रात फिर वही कहानी शुरू हुई।
वही आवाज़।
वही अपनापन।
वही सीख।
और उसी खुले आसमान के नीचे आरव ने महसूस किया कि दुनिया चाहे कितनी भी बदल जाए, दादी की कहानियाँ सिर्फ़ शब्द नहीं होतीं—
वे परिवार को एक साथ बाँधने वाला वह अदृश्य धागा होती हैं, जो पीढ़ियों को जोड़ता है, संस्कारों को जीवित रखता है और बचपन को हमेशा के लिए यादों में अमर बना देता है।
अध्याय 5
त्योहारों की असली रौनक
सर्दियों की हल्की सुबह थी। खेतों पर धुंध की एक सफ़ेद चादर बिछी हुई थी। सूरज की पहली किरणें जब उस धुंध को चीरते हुए धरती पर उतरतीं, तो पूरा गाँव किसी चित्र की तरह सुंदर दिखाई देता। हवा में ठंडक थी, लेकिन लोगों के दिलों में त्योहार की गर्माहट थी। आज गाँव में दीपावली की तैयारियाँ शुरू हो चुकी थीं।
उस समय त्योहार केवल एक दिन का उत्सव नहीं होते थे। त्योहार कई दिनों पहले घरों में उतर आते थे। हर घर में सफ़ाई शुरू हो जाती। बच्चे, बड़े, बूढ़े—सब अपने-अपने काम में लग जाते। किसी को यह नहीं लगता था कि यह सिर्फ़ महिलाओं का या पुरुषों का काम है। पूरा परिवार मिलकर घर सजाता था।
आरव सुबह उठते ही आँगन में पहुँचा। माँ मिट्टी और गोबर से आँगन लीप रही थीं। दादी तुलसी के चौरे को साफ़ कर रही थीं। पिताजी पुराने लकड़ी के दरवाज़े पर नया रंग लगा रहे थे।
“माँ, मैं क्या करूँ?”
माँ ने मुस्कुराकर कहा—
“पहले झाड़ू उठा और बरामदा साफ़ कर दे।”
आरव बिना कोई बहाना बनाए झाड़ू उठाकर पूरे मन से सफ़ाई करने लगा।
कुछ ही देर बाद मोहित, सोनू, दीपक और छोटू भी अपने-अपने घरों का काम पूरा करके आ गए।
“चलो, बाज़ार चलते हैं!”
मोहित ने उत्साह से कहा।
पिताजी ने मुस्कुराकर पाँचों बच्चों को कुछ पैसे दिए।
“ध्यान से जाना… और ज़रूरत की चीज़ें ही लेना।”
गाँव का छोटा-सा बाज़ार आज रंगों से भर गया था। हर दुकान पर मिट्टी के दीये सजे थे। कहीं रंगोली के रंग रखे थे, कहीं खिलौने, कहीं मिठाइयों की खुशबू हवा में घुली हुई थी।
बच्चों की आँखें हर दुकान पर ठहर जातीं।
लेकिन उनके पास पैसे बहुत कम थे।
उन्हें सोच-समझकर ख़रीदारी करनी थी।
सोनू बोला—
“पहले दीये लेते हैं।”
दीपक ने कहा—
“फिर फुलझड़ी।”
छोटू बोला—
“और थोड़ा-सा बताशा भी।”
पाँचों ने मिलकर हिसाब लगाया।
हर पैसे की कीमत समझते थे।
आख़िरकार उन्होंने मिट्टी के दीये, थोड़ी-सी फुलझड़ियाँ, कुछ रंग और थोड़ी मिठाई खरीदी।
वापस लौटते समय रास्ते में एक बूढ़े कुम्हार बैठे थे। उनके सामने बहुत सारे मिट्टी के दीये रखे थे, लेकिन कोई उन्हें ख़रीद नहीं रहा था।
दादी की बात अचानक आरव को याद आई—
“त्योहार तभी पूरा होता है, जब किसी और के चेहरे पर भी मुस्कान आ जाए।”
आरव ने अपने दोस्तों से कहा—
“चलो, यहीं से कुछ और दीये लेते हैं।”
“लेकिन पैसे?”
मोहित ने पूछा।
“हम सब थोड़ा-थोड़ा मिला देते हैं।”
सबने अपनी जेब टटोली।
जो कुछ बचा था, सबने एक साथ रख दिया।
उन्होंने उस बूढ़े कुम्हार से कुछ और दीये खरीद लिए।
कुम्हार की आँखें भर आईं।
उन्होंने काँपते हाथों से बच्चों के सिर पर हाथ रखा।
“भगवान तुम सबको हमेशा खुश रखे।”
बच्चों को पहली बार एहसास हुआ कि किसी की मदद करने से मिलने वाली खुशी, कोई चीज़ खरीदने से कहीं बड़ी होती है।
घर पहुँचते ही तैयारियाँ फिर शुरू हो गईं।
माँ रसोई में गुजिया, नमकपारे और शक्करपारे बना रही थीं।
पूरा घर घी और इलायची की खुशबू से भर गया था।
आरव बार-बार रसोई में झाँकता।
“माँ… एक गुजिया दे दो ना।”
“अभी नहीं।”
“बस एक।”
माँ मुस्कुराईं।
“ठीक है… लेकिन किसी को बताना मत।”
उन्होंने गरम-गरम गुजिया उसके हाथ में रख दी।
आरव धीरे से बाहर निकला।
लेकिन बाहर उसके चारों दोस्त पहले से खड़े थे।
सब उसकी तरफ़ देखने लगे।
वह कुछ पल चुप रहा।
फिर मुस्कुराकर गुजिया के पाँच टुकड़े कर दिए।
सबने एक-एक टुकड़ा खाया।
स्वाद से ज़्यादा उन्हें बाँटने की खुशी मिली।
शाम होने लगी।
पूरा गाँव दीपों की रोशनी से जगमगाने लगा।
हर घर के दरवाज़े पर रंगोली बनी थी।
मिट्टी के दीयों की लौ हवा में हल्के-हल्के डोल रही थी।
बिजली की रंगीन लड़ियाँ बहुत कम घरों में थीं।
लेकिन मिट्टी के छोटे-छोटे दीयों की रोशनी पूरे गाँव को रोशन कर रही थी।
दादी ने पहला दीपक तुलसी के चौरे पर रखा।
दूसरा घर के मंदिर में।
तीसरा आँगन में।
फिर उन्होंने आरव से कहा—
“बेटा, एक दीपक उस बूढ़ी अम्मा के घर भी रख आओ।”
गाँव के किनारे एक वृद्धा अकेली रहती थीं।
उनके घर में न कोई बेटा था, न कोई बेटी।
आरव अपने दोस्तों के साथ वहाँ पहुँचा।
उन्होंने चुपचाप दरवाज़े पर दीपक रख दिया।
वृद्धा बाहर आईं।
दीपक की रोशनी में बच्चों के चेहरे चमक रहे थे।
उन्होंने भावुक होकर कहा—
“आज मेरे घर भी दीपावली आ गई।”
बच्चों ने पहली बार समझा कि दीपक सिर्फ़ घर नहीं, दिल भी रोशन करते हैं।
रात को पूरे गाँव में लक्ष्मी पूजा हुई।
हर घर से घंटियों की आवाज़ आ रही थी।
अगरबत्ती की सुगंध हवा में घुली हुई थी।
पूजा के बाद बच्चे फुलझड़ियाँ जलाने लगे।
किसी के पास महँगे पटाखे नहीं थे।
कुछ फुलझड़ियाँ।
दो-चार अनार।
एक-दो चकरी।
बस इतना ही।
लेकिन खुशी किसी से कम नहीं थी।
हर फुलझड़ी के साथ बच्चों की हँसी भी आसमान तक पहुँच रही थी।
मोहित ने कहा—
“अगले साल मैं सबसे बड़ा अनार लाऊँगा।”
दीपक हँसते हुए बोला—
“और मैं सबसे लंबी फुलझड़ी।”
सब ज़ोर से हँस पड़े।
दीपावली के कुछ महीने बाद होली आई।
होली की तैयारी भी कई दिन पहले शुरू हो जाती।
गली के बच्चे मिलकर लकड़ियाँ इकट्ठी करते।
कोई सूखी टहनियाँ लाता।
कोई उपले।
कोई खेत से सूखी घास।
सब मिलकर होलिका सजाते।
होली वाले दिन सुबह-सुबह पूरा गाँव रंगों से भर जाता।
लेकिन उन रंगों में कोई बनावट नहीं होती थी।
गुलाल।
हल्दी।
टेसू के फूलों से बना रंग।
बाल्टियों में घुला पानी।
बस यही असली रंग थे।
आरव ने सबसे पहले दादी के पैर छुए।
दादी ने उसके माथे पर हल्का-सा गुलाल लगाया।
“हमेशा खुश रहो।”
फिर वह बाहर भागा।
कुछ ही देर में पूरा समूह रंगों में डूब चुका था।
कोई किसी को पहचान नहीं पा रहा था।
अमीर-गरीब का फ़र्क मिट चुका था।
छोटे-बड़े का भेद मिट चुका था।
सिर्फ़ रंग थे।
सिर्फ़ हँसी थी।
और सिर्फ़ अपनापन था।
दोपहर तक सब थककर घर लौटे।
माँ ने गरम-गरम पूरियाँ और आलू की सब्ज़ी बनाई थी।
दादी ने गुजिया परोसी।
पिताजी ने हँसते हुए पूछा—
“बताओ, आज सबसे ज़्यादा रंग किसने लगाया?”
सब अपनी-अपनी कहानी सुनाने लगे।
घर फिर हँसी से भर गया।
सिर्फ़ दीपावली और होली ही नहीं…
रक्षाबंधन पर बहनें कई दिन पहले से राखी बनाती थीं।
मकर संक्रांति पर पूरा गाँव छतों पर पतंग उड़ाता था।
जन्माष्टमी पर बच्चे कृष्ण और राधा बनते थे।
दशहरा पर पूरा गाँव रामलीला देखने जाता था।
ईद पर इमरान के घर से सेवइयाँ आती थीं।
क्रिसमस पर स्कूल में मिठाइयाँ बाँटी जाती थीं।
किसी ने कभी यह नहीं सोचा कि कौन किस धर्म का है।
त्योहार किसी एक घर के नहीं होते थे।
पूरे गाँव के होते थे।
अगर किसी घर में मिठाई बनती, तो उसकी थाली पहले पड़ोस में जाती।
अगर किसी के घर मेहमान आते, तो बच्चों की खुशी दोगुनी हो जाती।
हर त्योहार रिश्तों को और मज़बूत कर जाता।
वर्षों बाद…
जब आरव बड़ा हुआ और शहर में रहने लगा, तो उसने देखा कि त्योहार अब भी आते हैं।
घर सजते हैं।
रोशनियाँ जलती हैं।
महँगे उपहार खरीदे जाते हैं।
लेकिन बहुत-से घरों में लोग एक ही कमरे में बैठकर भी अपने-अपने मोबाइल में खोए रहते हैं।
मिठाइयाँ ऑनलाइन मँगाई जाती हैं।
शुभकामनाएँ एक संदेश भेजकर पूरी कर दी जाती हैं।
बच्चे पटाखों से ज़्यादा वीडियो बनाने में व्यस्त रहते हैं।
तस्वीरें बहुत खिंचती हैं…
लेकिन यादें कम बनती हैं।
उस रात दीपावली के दीयों को देखते हुए आरव को अपना बचपन याद आया।
उसे याद आया वह बूढ़ा कुम्हार…
वह अकेली अम्मा…
दोस्तों के साथ बाँटी हुई एक गुजिया…
मिट्टी के दीयों की लौ…
और वह पूरा गाँव, जो हर त्योहार पर एक परिवार बन जाता था।
तभी उसे दादी की एक बात फिर याद आई—
“त्योहार घर सजाने से नहीं, दिल मिलाने से बनते हैं। रोशनी दीयों से कम, अपनों के साथ से ज़्यादा होती है।”
शायद यही उन दिनों की सबसे बड़ी खूबसूरती थी।
त्योहार कैलेंडर की तारीख़ नहीं होते थे…
वे रिश्तों को फिर से जीने का सबसे सुंदर बहाना होते थे।
अध्याय 6
स्कूल के वो सुनहरे दिन
बरसात का मौसम बीत चुका था। खेतों में हरियाली लहराने लगी थी और सुबह की हवा में एक अलग ही ताज़गी घुल गई थी। गाँव के कच्चे रास्तों पर रात की ओस अभी भी चमक रही थी। सूरज धीरे-धीरे आसमान में चढ़ रहा था, लेकिन बच्चों के लिए दिन तो माँ की आवाज़ के साथ ही शुरू हो चुका था।
“आरव… जल्दी उठो, आज स्कूल नहीं जाना क्या?”
माँ की आवाज़ सुनते ही आरव ने आँखें मलते हुए करवट बदली।
“माँ… पाँच मिनट और।”
दादी मुस्कुराईं।
“ये पाँच मिनट तो हर बच्चे के सबसे प्यारे होते हैं।”
कुछ ही देर बाद माँ ने उसके पास स्कूल की साफ़-धुली हुई सफ़ेद शर्ट, नीली निक्कर और इस्त्री किया हुआ रूमाल रख दिया।
“देखना, आज फिर शर्ट पर स्याही मत गिरा देना।”
आरव हँस पड़ा।
“इस बार नहीं गिरेगी।”
माँ जानती थीं कि यह वादा शाम तक टूट ही जाएगा।
जल्दी-जल्दी नहाकर, बालों में तेल लगवाकर और कंधे पर अपना कपड़े का बस्ता टाँगकर वह बाहर निकला।
गली के मोड़ पर हमेशा की तरह मोहित उसका इंतज़ार कर रहा था।
उसके पीछे सोनू, दीपक, छोटू और इमरान भी आ गए।
स्कूल जाने का सफ़र भी अपने आप में एक कहानी हुआ करता था।
किसी बस की ज़रूरत नहीं।
कोई कार नहीं।
कोई जल्दबाज़ी नहीं।
सभी बच्चे पैदल चलते थे।
रास्ते भर हँसी-मज़ाक चलता रहता।
कभी कोई पहेली पूछता।
कभी कोई कविता सुनाता।
कभी कोई खेतों में उड़ते तोतों को गिनने लगता।
रास्ते में एक छोटा-सा तालाब पड़ता था।
हर दिन पाँच मिनट वहीं रुकना जैसे उनका नियम था।
सोनू ने पानी में झाँककर कहा—
“देखो… मेरी परछाई कितनी बड़ी लग रही है।”
दीपक हँसते हुए बोला—
“तू बड़ा नहीं हुआ… पानी गहरा है।”
सब ज़ोर से हँस पड़े।
कुछ दूर आगे एक बूढ़े बाबा अपनी बैलगाड़ी लेकर जाते थे।
हर दिन बच्चों को देखकर मुस्कुरा देते।
“आओ, थोड़ी दूर बैठ जाओ।”
सारे बच्चे बैलगाड़ी पर चढ़ जाते।
कुछ देर तक बैलों की धीमी चाल के साथ सफ़र करते और फिर स्कूल के पास उतर जाते।
“धन्यवाद बाबा!”
“अच्छे से पढ़ना…”
बाबा हर दिन यही कहते।
स्कूल कोई बहुत बड़ा भवन नहीं था।
कुछ कमरे पक्के थे।
कुछ की छत टीन की थी।
एक बड़ा मैदान था।
बीच में तिरंगा लहराता रहता।
प्रार्थना की घंटी बजते ही सारे बच्चे अपनी-अपनी लाइन में खड़े हो जाते।
“लब पे आती है दुआ…”
या
“हमको मन की शक्ति देना…”
पूरे विद्यालय की आवाज़ एक साथ गूँजती।
प्रार्थना के बाद प्रधानाचार्य जी दो मिनट बच्चों से बातें करते।
“साफ़-सफ़ाई रखो।”
“बड़ों का सम्मान करो।”
“ईमानदारी सबसे बड़ी ताक़त है।”
ये बातें छोटी लगती थीं, लेकिन धीरे-धीरे बच्चों के व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती थीं।
पहला पीरियड हिंदी का था।
शर्मा सर कक्षा में आए।
उनके हाथ में लकड़ी की लंबी पट्टी रहती थी।
बच्चे उनसे थोड़ा डरते भी थे और बहुत सम्मान भी करते थे।
“जिसने गृहकार्य नहीं किया, वह खड़ा हो जाए।”
तीन बच्चे खड़े हो गए।
आरव ने राहत की साँस ली।
उसने कल रात दादी की कहानी सुनने के बाद भी गृहकार्य पूरा कर लिया था।
शर्मा सर ने उन बच्चों को डाँटा जरूर, लेकिन फिर प्यार से समझाया—
“गलती करना बुरा नहीं है… गलती दोहराना बुरा है।”
उस समय डाँट में भी अपनापन होता था।
शिक्षक सिर्फ़ पढ़ाते नहीं थे।
वे बच्चों का भविष्य गढ़ते थे।
दूसरे पीरियड में गणित था।
गुप्ता सर ने ब्लैकबोर्ड पर सवाल लिखा।
“जो पहले हल करेगा, उसे आज मेरी तरफ़ से टॉफी मिलेगी।”
पूरा वर्ग जोश से भर गया।
आरव सबसे पहले खड़ा हुआ।
उसने सही उत्तर दिया।
गुप्ता सर ने जेब से छोटी-सी संतरे वाली टॉफी निकालकर उसके हाथ में रख दी।
इतनी-सी टॉफी उस समय किसी बड़े पुरस्कार से कम नहीं लगती थी।
अवकाश की घंटी बजते ही पूरा मैदान बच्चों से भर गया।
कोई कबड्डी खेलने लगा।
कोई रस्सी कूदने लगा।
कोई पेड़ की छाया में बैठ गया।
आरव और उसके दोस्त हमेशा की तरह एक साथ बैठकर टिफ़िन खोलने लगे।
मोहित के टिफ़िन में आलू के पराँठे थे।
दीपक के पास नींबू का अचार।
सोनू के डिब्बे में गुड़ की रोटी।
इमरान की माँ ने वेज पुलाव बनाया था।
आरव के टिफ़िन में सादी रोटी और आलू की सूखी सब्ज़ी थी।
किसी ने अपना टिफ़िन अकेले नहीं खाया।
सबके डिब्बे बीच में रख दिए गए।
जो जिसको अच्छा लगता, वह खा लेता।
आज कोई यह नहीं कहता था—
“ये मेरा है।”
सब कहते थे—
“ये हमारा है।”
तभी छोटू चुपचाप बैठा रहा।
आरव ने पूछा—
“टिफ़िन नहीं लाए?”
उसने धीरे से सिर हिला दिया।
“सुबह माँ की तबीयत ठीक नहीं थी।”
आरव ने बिना कुछ कहे अपनी दो रोटियाँ उसके हाथ में रख दीं।
मोहित ने पराँठा दे दिया।
इमरान ने पुलाव परोस दिया।
कुछ ही पलों में छोटू का टिफ़िन सबसे अच्छा बन गया।
उसकी आँखें नम हो गईं।
लेकिन किसी ने उसे एहसान का एहसास नहीं होने दिया।
यही तो दोस्ती थी।
अवकाश के बाद विज्ञान की कक्षा थी।
मिश्रा मैडम बच्चों को पेड़ों के बारे में पढ़ा रही थीं।
उन्होंने किताब बंद कर दी।
“चलो, आज बाहर चलते हैं।”
पूरी कक्षा स्कूल के बगीचे में पहुँच गई।
उन्होंने नीम का पेड़ दिखाया।
आम का पेड़।
बरगद।
पीपल।
हर पेड़ की कहानी सुनाई।
उस दिन बच्चों ने किताब से ज़्यादा प्रकृति से सीखा।
दोपहर के आख़िरी पीरियड तक सब थक चुके थे।
लेकिन जैसे ही छुट्टी की घंटी बजी…
पूरा स्कूल फिर से जीवंत हो उठा।
बच्चे ऐसे भागे, जैसे पिंजरे से पक्षी उड़ते हैं।
वापसी में फिर वही रास्ता।
वही हँसी।
वही बातें।
रास्ते में एक बूढ़ी अम्मा रोज़ बेर बेचती थीं।
पाँच पैसे में एक मुट्ठी बेर मिलते थे।
सबने अपने-अपने बचे हुए पैसे मिलाए।
एक मुट्ठी बेर खरीदे।
और फिर पाँच हिस्सों में बाँट लिए।
अचानक इमरान का पैर पत्थर से टकराया।
वह गिर पड़ा।
उसका घुटना छिल गया।
बाकी चारों दोस्त तुरंत उसके पास पहुँचे।
आरव ने अपने रूमाल से उसका घुटना साफ़ किया।
दीपक पानी ले आया।
मोहित ने उसका बस्ता उठा लिया।
सोनू ने कहा—
“चल, आज तेरा बस्ता मैं लेकर चलता हूँ।”
इमरान मुस्कुराया।
“अब दर्द नहीं हो रहा।”
शायद घाव पर दवा से पहले दोस्ती का मरहम लग चुका था।
घर पहुँचते ही माँ ने पूछा—
“आज स्कूल कैसा रहा?”
आरव ने पूरे उत्साह से दिनभर की हर बात सुनाई।
गणित की टॉफी।
मिश्रा मैडम का पेड़ों वाला पाठ।
इमरान का गिरना।
और टिफ़िन बाँटना।
पिताजी शाम को लौटे तो उन्होंने रिपोर्ट कार्ड नहीं पूछा।
उन्होंने सिर्फ़ एक सवाल पूछा—
“आज कुछ नया सीखा?”
आरव ने मुस्कुराकर कहा—
“हाँ… किताबों से भी… और दोस्तों से भी।”
पिताजी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—
“यही असली पढ़ाई है बेटा।”
रात को चारपाई पर लेटे-लेटे आरव दिनभर की बातें सोच रहा था।
उसे महसूस हुआ कि स्कूल सिर्फ़ पढ़ने की जगह नहीं था।
वह जीवन जीना सिखाने की जगह था।
वहीं दोस्ती गहरी होती थी।
वहीं बाँटना सीखा जाता था।
वहीं हारकर फिर उठना सीखा जाता था।
वहीं शिक्षक केवल पाठ नहीं पढ़ाते थे, बल्कि चरित्र गढ़ते थे।
बरसों बाद…
जब आरव अपने पुराने स्कूल के सामने खड़ा हुआ, तो बहुत कुछ बदल चुका था।
नए कमरे बन गए थे।
दीवारों पर रंगीन चित्र थे।
कंप्यूटर लैब थी।
स्मार्ट क्लास भी थी।
लेकिन उसकी नज़र उस पुराने नीम के पेड़ को ढूँढ़ रही थी, जिसके नीचे बैठकर उसने अपना टिफ़िन बाँटा था।
वह मैदान ढूँढ़ रही थी, जहाँ हारने के बाद भी सब हँसते थे।
वह घंटी ढूँढ़ रही थी, जिसकी आवाज़ सुनकर पूरा बचपन दौड़ पड़ता था।
उसे समझ आ गया—
इमारतें बदल सकती हैं…
किताबें बदल सकती हैं…
पढ़ाने के तरीके बदल सकते हैं…
लेकिन उन सुनहरे स्कूल के दिनों की सादगी, दोस्ती और मासूमियत आज भी उसकी यादों में वैसी ही सुरक्षित है, जैसी उस दिन थी जब उसने पहली बार अपनी छोटी-सी उँगली पकड़कर स्कूल की दहलीज़ पार की थी।
अध्याय 7
पहली ज़िम्मेदारियाँ, छोटे-छोटे सबक
सर्दियों की एक शांत सुबह थी। गाँव अभी पूरी तरह जागा नहीं था। चारों ओर हल्का कोहरा फैला हुआ था। दूर मंदिर की घंटी की मधुर आवाज़ हवा में घुल रही थी। खेतों से लौटती ठंडी हवा चेहरे को छूकर जैसे एक नई ऊर्जा दे रही थी। आँगन में रखे तुलसी के चौरे पर माँ ने दीपक जलाया और हाथ जोड़कर प्रार्थना की।
आरव अब पहले से थोड़ा बड़ा हो गया था। उसकी लंबाई बढ़ने लगी थी, आवाज़ में हल्का बदलाव आने लगा था और सबसे बड़ी बात—अब घर वाले उसे सिर्फ़ बच्चा नहीं, परिवार का एक ज़िम्मेदार सदस्य मानने लगे थे।
उस सुबह माँ ने उसे प्यार से जगाया।
“आरव… आज ज़रा जल्दी उठना।”
उसने आँखें मलते हुए पूछा—
“क्यों माँ?”
“आज तुम्हारे पिताजी को खेत जल्दी जाना है। तुम उनकी थोड़ी मदद कर देना।”
आरव बिना कोई सवाल किए उठ बैठा।
पहले जहाँ वह उठते ही दोस्तों के बारे में सोचता था, अब कभी-कभी घर के काम भी उसके दिन का हिस्सा बनने लगे थे।
नाश्ता करने के बाद वह पिताजी के साथ खेत की ओर चल पड़ा।
रास्ते में पिताजी चुपचाप चल रहे थे।
कुछ दूर जाने के बाद उन्होंने कहा—
“बेटा, जब मैं तुम्हारी उम्र का था, तब तक हल चलाना भी सीख गया था।”
आरव मुस्कुराया।
“मैं भी सीख जाऊँगा।”
पिताजी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
“काम सीखना ज़रूरी है, लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है काम की इज़्ज़त करना।”
यह बात आरव के मन में बैठ गई।
खेत पहुँचकर पिताजी ने उसे पानी की बाल्टी पकड़ाई।
“इन पौधों में धीरे-धीरे पानी देना।”
आरव ने पूरे मन से काम शुरू किया।
कुछ देर बाद उसके हाथ थकने लगे।
माथे पर पसीना आ गया।
लेकिन उसने शिकायत नहीं की।
काम पूरा होने पर पिताजी ने मुस्कुराकर कहा—
“देखा… मेहनत से थकान तो होती है, लेकिन मन को सुकून भी मिलता है।”
वापसी में दोनों रास्ते भर बातें करते रहे।
उस दिन पहली बार आरव को समझ आया कि खेत में उगने वाली हर फसल के पीछे कितनी मेहनत छिपी होती है।
घर पहुँचते ही दादी ने पूछा—
“आज खेत गए थे?”
“हाँ दादी।”
“कैसा लगा?”
“बहुत मेहनत करनी पड़ती है।”
दादी मुस्कुराईं।
“इसीलिए कभी खाने का एक दाना भी बर्बाद मत करना।”
उस दिन से आरव की आदत बदल गई।
अब वह अपनी थाली में उतना ही खाना लेता, जितना खा सके।
कुछ दिनों बाद माँ ने उसे एक और ज़िम्मेदारी दी।
“आज बाज़ार से राशन लाना है।”
उन्होंने उसकी हथेली पर कुछ नोट रखे और एक छोटी-सी सूची थमा दी।
“ध्यान से हिसाब करना।”
आरव पहली बार अकेले बाज़ार जा रहा था।
रास्ते भर वह बार-बार जेब टटोलता कि पैसे सुरक्षित हैं या नहीं।
दुकान पर पहुँचकर उसने सूची दुकानदार को दी।
दुकानदार ने सामान तौलकर रख दिया।
जब पैसे लौटाए, तो गलती से दस रुपये ज़्यादा दे दिए।
आरव कुछ कदम चला।
फिर अचानक रुक गया।
उसने पैसे गिने।
वह वापस दुकान पर पहुँचा।
“चाचा, आपने दस रुपये ज़्यादा दे दिए।”
दुकानदार ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा।
“तुम वापस करने आए?”
“ये मेरे नहीं हैं।”
दुकानदार मुस्कुराए।
उन्होंने कहा—
“बेटा, तुम्हारे माँ-बाप ने तुम्हें बहुत अच्छे संस्कार दिए हैं।”
घर लौटकर जब उसने यह बात बताई, तो पिताजी ने कुछ नहीं कहा।
बस उसके सिर पर हाथ रख दिया।
वह स्पर्श किसी भी इनाम से बड़ा था।
उस शाम दादी ने कहा—
“ईमानदारी की कमाई हमेशा सबसे बड़ी दौलत होती है।”
दिन बीतते गए।
अब आरव को घर के छोटे-छोटे काम सौंपे जाने लगे।
कभी घड़े में पानी भरना।
कभी गाय के लिए चारा लाना।
कभी दादी की दवाई लाना।
कभी छोटी बहन गुड़िया को स्कूल छोड़ना।
शुरुआत में उसे लगता था कि उसके खेलने का समय कम हो रहा है।
लेकिन धीरे-धीरे उसने महसूस किया कि ज़िम्मेदारियाँ इंसान को छोटा नहीं करतीं।
वे उसे बड़ा बनाती हैं।
एक दिन शाम को मोहित खेलने आया।
“चल, आज कबड्डी खेलते हैं।”
आरव ने कहा—
“दस मिनट रुक… पहले दादी की दवाई लेकर आता हूँ।”
मोहित बिना कुछ कहे उसके साथ चल पड़ा।
रास्ते में उसने कहा—
“मैं भी चलता हूँ।”
दवाई लेकर लौटे।
फिर दोनों खेलने चले गए।
उस दिन आरव को महसूस हुआ कि सच्चे दोस्त ज़िम्मेदारियों को समझते हैं।
वे कभी उन्हें बोझ नहीं बनने देते।
कुछ ही दिनों बाद स्कूल में एक घटना हुई।
अवकाश के समय एक छोटा बच्चा रो रहा था।
उसका टिफ़िन गिर गया था।
पूरा खाना मिट्टी में मिल गया।
कई बच्चे देखकर आगे बढ़ गए।
लेकिन आरव वहीं रुक गया।
उसने अपना टिफ़िन उसके सामने रख दिया।
“आओ… आज हम दोनों साथ खाएँगे।”
बच्चे ने आँसू पोंछे और मुस्कुरा दिया।
दूर खड़े प्रधानाचार्य जी यह सब देख रहे थे।
अगली सुबह प्रार्थना सभा में उन्होंने सबके सामने कहा—
“बड़ा इंसान वह नहीं होता जिसके पास सबसे ज़्यादा पैसा हो। बड़ा इंसान वह होता है, जो दूसरों की तकलीफ़ समझ सके।”
उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया।
लेकिन आरव समझ गया कि यह बात उसी के लिए कही गई है।
उस दिन उसे गर्व नहीं हुआ।
बल्कि यह एहसास हुआ कि अच्छे काम की सबसे बड़ी पहचान यह है कि उसके बदले कुछ माँगने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
सर्दियाँ बीत गईं।
गर्मी आ गई।
एक दोपहर दादी की तबीयत थोड़ी ख़राब हो गई।
माँ रसोई में थीं।
पिताजी खेत पर।
आरव तुरंत डॉक्टर को बुलाने दौड़ा।
डॉक्टर आए।
दादी को दवा दी।
शाम तक उनकी तबीयत ठीक हो गई।
दादी ने उसका हाथ पकड़कर कहा—
“आज तूने पोते का नहीं… बेटे का फ़र्ज़ निभाया है।”
आरव की आँखें भर आईं।
उसे पहली बार लगा कि बड़ा होना उम्र से नहीं, ज़िम्मेदारी निभाने से शुरू होता है।
रात को पिताजी उसके पास बैठे।
उन्होंने कहा—
“बेटा, जीवन में सफल बनने से पहले अच्छा इंसान बनना सीखो। सफलता कभी-न-कभी मिल जाएगी, लेकिन अच्छा चरित्र रोज़ कमाना पड़ता है।”
आरव देर तक यह बात सोचता रहा।
उसे याद आया—
दादी ने ईमानदारी सिखाई।
माँ ने मेहनत सिखाई।
पिताजी ने ज़िम्मेदारी सिखाई।
शिक्षकों ने अनुशासन सिखाया।
दोस्तों ने बाँटना सिखाया।
उसे समझ आने लगा कि बचपन सिर्फ़ खेलने-कूदने का नाम नहीं था।
वह जीवन की नींव रखने का समय था।
बरसों बाद…
जब आरव शहर की ऊँची इमारतों के बीच काम कर रहा था, उसने देखा कि लोग बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ लेकर भी छोटी-छोटी ज़िम्मेदारियों से बचते हैं।
कुछ लोग सफलता तो पा लेते हैं, लेकिन संवेदनशीलता खो देते हैं।
कुछ लोग बहुत कुछ कमा लेते हैं, लेकिन परिवार के लिए समय नहीं निकाल पाते।
उसे अपना गाँव याद आया।
वह छोटा-सा घर…
माँ की सीख…
पिताजी की मेहनत…
दादी की कहानियाँ…
और वे छोटी-छोटी ज़िम्मेदारियाँ, जिन्होंने बिना किसी किताब के उसे जीवन का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाया था।
उसे तब एहसास हुआ—
बचपन में सिखाए गए छोटे-छोटे संस्कार कभी छोटे नहीं होते।
वही आगे चलकर इंसान के निर्णय बनते हैं।
वही उसके व्यवहार में झलकते हैं।
वही उसके चरित्र की पहचान बनते हैं।
और शायद इसी कारण…
उस पीढ़ी के बच्चों के पास महँगे खिलौने कम थे, लेकिन ज़िम्मेदारी ज़्यादा थी।
सुविधाएँ कम थीं, लेकिन संस्कार गहरे थे।
और यही वे छोटे-छोटे सबक थे, जिन्होंने उन्हें सिर्फ़ बड़ा नहीं किया…
बल्कि एक अच्छा इंसान भी बनाया।
अध्याय 8
बदलता दौर, बदलता बचपन
समय कभी किसी के लिए नहीं रुकता। कल तक जो बच्चे नंगे पाँव गलियों में दौड़ते थे, वे अब किशोर हो चुके थे। गाँव की वही गलियाँ थीं, वही खेत थे, वही बरगद का पेड़ था, वही चौपाल थी… लेकिन हवा में कुछ बदलने लगा था। बदलाव धीरे-धीरे आया था, इसलिए किसी ने उसे आते हुए महसूस नहीं किया। पर जब उसने अपनी जगह बना ली, तब सब कुछ पहले जैसा होकर भी पहले जैसा नहीं रहा।
आरव अब पंद्रह साल का हो चुका था। उसकी पढ़ाई आगे बढ़ रही थी। मोहित, सोनू, दीपक, छोटू और इमरान भी अपने-अपने सपनों की ओर बढ़ रहे थे। पहले जहाँ उनकी सबसे बड़ी चिंता यह होती थी कि आज कौन-सा खेल खेलेंगे, अब बातें पढ़ाई, परीक्षा और भविष्य तक पहुँचने लगी थीं।
एक शाम सभी दोस्त बरगद के पेड़ के नीचे बैठे थे।
मोहित ने उत्साह से कहा—
“सुना है, शहर में अब ऐसे फ़ोन आ गए हैं जिनमें तस्वीर भी खींच सकते हैं।”
दीपक ने हैरानी से पूछा—
“सच?”
“हाँ, मेरे चाचा लेकर आए थे।”
आरव चुपचाप सुन रहा था।
उसने कभी ऐसा फ़ोन देखा नहीं था।
उस समय गाँव में किसी-किसी के घर लैंडलाइन फ़ोन भी बड़ी बात मानी जाती थी। अगर किसी के घर फ़ोन होता, तो पूरे मोहल्ले के लोग ज़रूरत पड़ने पर वहीं से बात करते।
कुछ महीने बाद गाँव के पोस्ट ऑफिस के पास एक छोटा-सा एस.टी.डी. और पी.सी.ओ. बूथ खुला।
पीले रंग का बोर्ड दूर से ही दिखाई देता था।
लोग लाइन लगाकर अपने रिश्तेदारों से बात करते।
जब किसी के घर फ़ोन आता, तो कोई बच्चा दौड़कर ख़बर देने जाता—
“चाचा, आपके लिए फ़ोन आया है!”
पूरा परिवार भागता हुआ बूथ तक पहुँचता।
तीन मिनट की बातचीत में लोग पूरा हाल-चाल पूछ लेते।
उस समय बातचीत छोटी होती थी, लेकिन रिश्ते गहरे होते थे।
फिर धीरे-धीरे कुछ लोगों के हाथों में छोटे-छोटे मोबाइल फ़ोन दिखाई देने लगे।
काले रंग के।
छोटी स्क्रीन वाले।
उनका काम सिर्फ़ बात करना था।
पूरा गाँव उन्हें देखकर हैरान होता।
“देखो… बिना तार के बात हो रही है!”
बच्चे भी उत्सुकता से मोबाइल को देखते।
लेकिन उस समय मोबाइल जेब में रहता था, हाथ में नहीं।
ज़रूरत पड़ने पर निकाला जाता था।
बाक़ी समय लोग एक-दूसरे की आँखों में देखकर बातें करते थे।
समय फिर आगे बढ़ा।
आरव की पढ़ाई के लिए उसे शहर जाना पड़ा।
गाँव छोड़ने का दिन आ गया।
सुबह-सुबह पूरा घर चुप था।
माँ उसके कपड़े तह कर रही थीं।
दादी बार-बार समझा रही थीं—
“समय पर खाना खाना।”
“बड़ों का सम्मान करना।”
“कभी झूठ मत बोलना।”
पिताजी ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा—
“जहाँ भी रहो, अपनी मिट्टी मत भूलना।”
आरव ने झुककर सबके पैर छुए।
जब वह घर से बाहर निकला, तो मोहित, सोनू, दीपक, छोटू और इमरान पहले से दरवाज़े पर खड़े थे।
कुछ पल तक कोई कुछ नहीं बोला।
फिर मोहित ने जेब से एक छोटी-सी सीटी निकाली।
“याद है?”
आरव मुस्कुराया।
यह वही सीटी थी जिससे वे बचपन में सबको खेलने के लिए बुलाते थे।
मोहित ने वह सीटी उसके हाथ में रख दी।
“जब भी इसे देखना… हमें याद कर लेना।”
आरव की आँखें भर आईं।
उसने दोस्तों को गले लगा लिया।
बस चल पड़ी।
खिड़की से पीछे छूटता गाँव धीरे-धीरे धुँधला होने लगा।
बरगद का पेड़।
स्कूल।
नहर।
चौपाल।
सब पीछे छूटते जा रहे थे।
लेकिन यादें वहीं से उसके साथ चल पड़ी थीं।
शहर की दुनिया बिल्कुल अलग थी।
ऊँची-ऊँची इमारतें।
चौड़ी सड़कें।
हर किसी को जल्दी थी।
लोग एक-दूसरे के पास से गुज़र जाते, लेकिन रुककर हाल-चाल पूछने का समय किसी के पास नहीं था।
कॉलेज में आरव के कई नए दोस्त बने।
लेकिन उसे अक्सर अपने गाँव की टोली याद आती।
वहाँ दोस्ती परिचय से नहीं, अपनापन से होती थी।
कुछ साल बाद तकनीक ने और तेज़ी से कदम बढ़ाए।
इंटरनेट आया।
कंप्यूटर आम होने लगे।
फिर स्मार्टफ़ोन भी आने लगे।
अब दुनिया सचमुच हथेली में आ गई थी।
एक दिन छुट्टियों में आरव गाँव लौटा।
वह बहुत उत्साहित था।
सोच रहा था कि शाम होते ही सब दोस्त मैदान में मिलेंगे।
लेकिन शाम को जब वह बरगद के पेड़ के पास पहुँचा, तो वहाँ सन्नाटा था।
जहाँ कभी बच्चों की हँसी गूँजती थी, वहाँ अब सिर्फ़ हवा की आवाज़ थी।
कुछ दूर चार-पाँच बच्चे बैठे थे।
हर बच्चे के हाथ में मोबाइल था।
कोई वीडियो देख रहा था।
कोई गेम खेल रहा था।
कोई ईयरफ़ोन लगाए बैठा था।
वे सब एक-दूसरे के बिल्कुल पास थे…
लेकिन किसी की नज़र किसी से नहीं मिल रही थी।
आरव कुछ देर तक उन्हें देखता रहा।
फिर उसने मुस्कुराकर पूछा—
“बेटा, खेलोगे?”
एक बच्चे ने बिना सिर उठाए कहा—
“अभी नहीं… लेवल पूरा करना है।”
दूसरे ने कहा—
“हम ऑनलाइन खेल रहे हैं।”
आरव चुप हो गया।
उसे पहली बार लगा कि खेल अब भी हैं…
लेकिन मैदान बदल गया है।
कुछ देर बाद वह अपने पुराने स्कूल पहुँचा।
मैदान पहले से छोटा लग रहा था।
शायद मैदान छोटा नहीं हुआ था…
बच्चों की मौजूदगी कम हो गई थी।
झूला अब भी था।
लेकिन उस पर धूल जमी थी।
गिल्ली-डंडा कहीं दिखाई नहीं दिया।
पिट्ठू के पत्थर नहीं थे।
कबड्डी की आवाज़ नहीं थी।
लुका-छिपी की दौड़ नहीं थी।
उसे याद आया—
कभी यही जगह शाम तक हँसी से भर जाती थी।
वह धीरे-धीरे नहर की ओर चला।
जहाँ वे कागज़ की नाव बहाया करते थे।
अब वहाँ कुछ बच्चे बैठे थे।
लेकिन पानी में नाव नहीं थी।
सबकी निगाहें मोबाइल की स्क्रीन पर थीं।
बरसात का पानी बह रहा था…
लेकिन किसी ने उसे देखने की फुर्सत नहीं थी।
घर लौटकर उसने देखा कि उसका छोटा भतीजा सोफ़े पर बैठा टैबलेट चला रहा था।
आरव उसके पास बैठ गया।
“चलो बाहर चलते हैं।”
“क्यों?”
“खेलेंगे।”
“मोबाइल में खेल लेते हैं ना।”
“नहीं… असली वाला खेल।”
बच्चा कुछ पल सोचता रहा।
“बाहर क्या करेंगे?”
यह प्रश्न सुनकर आरव के मन में एक अजीब-सी कसक उठी।
जिस उम्र में वह बिना बताए घंटों खेलता रहता था…
आज उसी उम्र का बच्चा पूछ रहा था—
“बाहर क्या करेंगे?”
उसने अलमारी खोली।
अंदर से अपनी पुरानी गिल्ली और लकड़ी का डंडा निकाला।
सालों पहले की यादें जैसे फिर से जीवित हो उठीं।
वह भतीजे को लेकर बाहर गया।
पहले तो बच्चे को कुछ समझ नहीं आया।
लेकिन धीरे-धीरे उसने गिल्ली उछालना सीखा।
पहली बार गिल्ली दूर गई तो वह खुशी से उछल पड़ा।
“फिर से…!”
कुछ ही देर में दो और बच्चे आ गए।
फिर चार।
फिर छह।
थोड़ी ही देर में वही मैदान, जो कुछ समय पहले खाली था, बच्चों की आवाज़ों से भर गया।
कोई गिल्ली उठा रहा था।
कोई दौड़ रहा था।
कोई हँस रहा था।
आरव दूर खड़ा मुस्कुरा रहा था।
तभी मोहित भी वहाँ आ गया।
उसने हँसते हुए कहा—
“लगता है… हमारा बचपन थोड़ी देर के लिए वापस आ गया।”
दोनों कुछ देर तक बच्चों को खेलते देखते रहे।
सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था।
हवा में फिर वही पुरानी मिट्टी की खुशबू थी।
आरव ने धीरे से कहा—
“तकनीक बुरी नहीं है…”
मोहित ने उसकी बात पूरी की—
“…लेकिन अगर उसके कारण बचपन खो जाए, तो नुकसान बहुत बड़ा है।”
दोनों की नज़र उन बच्चों पर थी जो अब हँसते हुए एक-दूसरे के पीछे दौड़ रहे थे।
उस क्षण आरव को समझ आया कि बदलाव को रोका नहीं जा सकता।
समय आगे बढ़ेगा।
नई तकनीक आएगी।
नई सुविधाएँ मिलेंगी।
लेकिन यह हमारे हाथ में है कि हम बच्चों को सिर्फ़ स्क्रीन की दुनिया दें…
या उन्हें मिट्टी की खुशबू, खुले आसमान, सच्ची दोस्ती और बेफ़िक्र बचपन का स्वाद भी चखाएँ।
क्योंकि मोबाइल यादें दिखा सकता है…
लेकिन यादें बना नहीं सकता।
वीडियो हँसी की आवाज़ रिकॉर्ड कर सकता है…
लेकिन दोस्तों के साथ खुलकर हँसने का एहसास नहीं दे सकता।
और शायद यही सबसे बड़ा अंतर है—
पहले बच्चे दुनिया को अपनी आँखों से देखते थे…
आज ज़्यादातर बच्चे उसी दुनिया को एक स्क्रीन के भीतर खोजने लगे हैं।
अध्याय 9
खोती हुई मुस्कानें और दूर होते रिश्ते
बरसों का समय बीत चुका था।
वह छोटा-सा गाँव, जहाँ हर सुबह बच्चों की आवाज़ से दिन शुरू होता था, अब पहले जैसा नहीं रहा था। कच्ची गलियों की जगह कई जगह पक्की सड़कें बन चुकी थीं। कुछ मिट्टी के घरों की जगह सीमेंट की ऊँची इमारतें खड़ी हो गई थीं। हर घर में बिजली थी, हर कमरे में पंखा था, कई घरों में ए.सी. भी लग चुका था।
सुविधाएँ बढ़ गई थीं…
लेकिन न जाने क्यों, अपनापन थोड़ा कम हो गया था।
आरव अब नौकरी करने लगा था। शहर की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी उसका हिस्सा बन चुकी थी। सुबह जल्दी उठना, दफ़्तर जाना, देर शाम लौटना और फिर अगले दिन की तैयारी। ज़िंदगी चल रही थी, लेकिन कई बार उसे लगता था कि वह जी कम रहा है, दौड़ ज़्यादा रहा है।
एक दिन कई महीनों बाद उसे गाँव जाने का अवसर मिला।
जैसे ही बस गाँव के बाहर रुकी, उसने खिड़की से बाहर देखा।
सब कुछ बदल गया था।
लेकिन कुछ चीज़ें अब भी वैसी ही थीं।
बरगद का वही पुराना पेड़…
मंदिर की वही घंटी…
और दूर तक फैले वही खेत।
बस से उतरते ही मिट्टी की खुशबू ने उसका स्वागत किया।
उसने गहरी साँस ली।
ऐसा लगा जैसे वर्षों बाद उसने सचमुच साँस ली हो।
घर पहुँचते ही माँ ने उसे गले लगा लिया।
“बेटा… कितना दुबला हो गया है।”
आरव मुस्कुरा दिया।
पिताजी पहले से बूढ़े लगने लगे थे।
बाल लगभग सफ़ेद हो चुके थे।
लेकिन बेटे को देखकर उनकी आँखों की चमक वैसी ही थी।
दादी अब बहुत कम बोलती थीं।
उम्र ने उनके शरीर को कमज़ोर कर दिया था।
लेकिन जैसे ही उन्होंने आरव का हाथ पकड़ा, उनके चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान लौट आई।
“आ गया मेरा शेर…”
बस इतना सुनते ही आरव की आँखें नम हो गईं।
शाम को वह पूरे गाँव में घूमने निकल पड़ा।
उसे उम्मीद थी कि चौपाल पर लोग पहले की तरह बैठे होंगे।
लेकिन चौपाल लगभग खाली थी।
दो-तीन बुज़ुर्ग बैठे आपस में बातें कर रहे थे।
बाकी जगह सन्नाटा था।
उसे याद आया…
यहीं कभी शाम ढलते ही लोगों की महफ़िल जमती थी।
कोई खेती की बात करता।
कोई मौसम की।
कोई बच्चों की शरारतें सुनाता।
और बच्चे सामने मैदान में खेलते रहते।
आज…
बातें कम थीं।
खामोशी ज़्यादा थी।
वह आगे बढ़ा।
पड़ोस के घर के बाहर एक परिवार बैठा था।
दादा एक कुर्सी पर बैठे थे।
पिता दूसरी कुर्सी पर।
माँ बरामदे में।
दो बच्चे पास ही बैठे थे।
पहली नज़र में लगा कि पूरा परिवार साथ बैठा है।
लेकिन अगले ही पल उसने देखा—
दादा के हाथ में मोबाइल था।
पिता लैपटॉप पर काम कर रहे थे।
माँ फ़ोन पर वीडियो देख रही थीं।
बच्चे टैबलेट पर गेम खेल रहे थे।
चारों एक-दूसरे के बिल्कुल पास थे…
लेकिन चारों अपनी-अपनी दुनिया में थे।
न कोई बातचीत।
न कोई हँसी।
न कोई शरारत।
बस उँगलियाँ चल रही थीं…
और समय चुपचाप निकल रहा था।
आरव कुछ देर वहीं खड़ा रहा।
उसे अपने बचपन की याद आ गई।
उसी समय तक तो वे सब खाना खाकर दादी की कहानी सुनने बैठ जाते थे।
पिताजी दिनभर की बातें सुनाते थे।
माँ हँसते-हँसते बच्चों की शिकायत करती थीं।
और पूरा घर आवाज़ों से भरा रहता था।
आज घर बड़े हो गए थे…
लेकिन बातचीत छोटी हो गई थी।
अगले दिन वह अपने पुराने दोस्त मोहित से मिलने गया।
मोहित अब गाँव में ही एक छोटी-सी दुकान चलाता था।
दोनों कई वर्षों बाद आमने-सामने बैठे।
कुछ देर तक दोनों सिर्फ़ एक-दूसरे को देखते रहे।
फिर अचानक दोनों हँस पड़े।
“याद है…”
आरव ने कहा।
“जब तेरे कारण शर्मा चाचा के आँगन में गेंद चली गई थी?”
मोहित ज़ोर से हँसा।
“और छोटू को भेज दिया था लेने।”
दोनों देर तक पुरानी बातें करते रहे।
उन्हें महसूस ही नहीं हुआ कि तीन घंटे कब बीत गए।
मोहित ने अचानक कहा—
“जानता है, अब बच्चे दुकान पर टॉफ़ी लेने भी कम आते हैं।”
“क्यों?”
“ऑनलाइन मँगवा लेते हैं।”
दोनों कुछ पल चुप रहे।
फिर मोहित ने धीमी आवाज़ में कहा—
“सुविधाएँ बढ़ गई हैं, लेकिन लोगों का मिलना कम हो गया है।”
यह बात सीधे आरव के दिल में उतर गई।
उस शाम गाँव में एक विवाह था।
आरव भी पहुँचा।
उसे लगा कि पहले की तरह पूरा गाँव मिलकर तैयारियाँ कर रहा होगा।
लेकिन दृश्य अलग था।
खाना कैटरिंग वाले बना रहे थे।
सजावट बाहर से आई थी।
लोग आते, मोबाइल से तस्वीरें खींचते, कुछ देर बैठते और चले जाते।
बच्चे भी एक कोने में बैठे वीडियो बना रहे थे।
उसे याद आया…
पहले शादी पूरे गाँव की होती थी।
महिलाएँ कई दिन पहले से पापड़ और बड़ी बनाती थीं।
पुरुष मिलकर पंडाल लगाते थे।
बच्चे कुर्सियाँ सजाते थे।
कोई मेहमान अकेला नहीं रहता था।
हर घर उसका अपना घर बन जाता था।
अब सब कुछ पहले से सुंदर था…
लेकिन उसमें लोगों का स्पर्श कम हो गया था।
रात को आरव घर लौटा।
दादी चारपाई पर बैठी थीं।
उन्होंने पूछा—
“गाँव कैसा लगा?”
आरव कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला—
“सब कुछ अच्छा है दादी… लेकिन कुछ कमी लग रही है।”
दादी मुस्कुराईं।
“क्या कमी?”
आरव ने धीरे से कहा—
“लोग साथ हैं… लेकिन साथ नहीं हैं।”
दादी ने गहरी साँस ली।
“समय बदल गया है बेटा।”
“क्या पहले वाले दिन वापस नहीं आ सकते?”
दादी ने उसकी ओर देखा।
“दिन वापस नहीं आते… लेकिन उनकी सीख वापस लाई जा सकती है।”
यह सुनकर आरव देर तक सोचता रहा।
अगली सुबह उसने एक छोटा-सा निर्णय लिया।
वह सबसे पहले मोहित के घर गया।
फिर सोनू, दीपक, छोटू और इमरान को बुलाया।
शाम को सभी अपने-अपने बच्चों के साथ बरगद के पेड़ के नीचे इकट्ठा हुए।
बच्चे पहले तो अपने मोबाइल लेकर बैठे रहे।
आरव ने मुस्कुराकर कहा—
“आज एक घंटा सिर्फ़ हमारे नाम।”
सबने अपने मोबाइल एक तरफ़ रख दिए।
आरव ने गिल्ली-डंडा निकाला।
मोहित ने कबड्डी की लाइन खींची।
दीपक सात पत्थर लेकर आया।
छोटू ने रस्सी ले आई।
इमरान ने हँसते हुए कहा—
“आज देखते हैं, किसमें कितना दम है।”
बच्चे पहले झिझक रहे थे।
फिर धीरे-धीरे खेलने लगे।
कुछ ही मिनटों में पूरा मैदान हँसी से भर गया।
जो बच्चे एक-दूसरे का नाम तक नहीं जानते थे, वे अब एक-दूसरे को पकड़कर दौड़ रहे थे।
माएँ दूर खड़ी मुस्कुरा रही थीं।
पिताजी तालियाँ बजा रहे थे।
बुज़ुर्ग चारपाई पर बैठे यह दृश्य देख रहे थे।
दादी की आँखों में चमक लौट आई।
उन्होंने धीरे से कहा—
“यही तो असली बचपन है।”
सूरज ढल गया।
लेकिन उस दिन किसी को समय का पता नहीं चला।
जब बच्चे घर लौटे, तो उनमें से एक ने अपने पिता से पूछा—
“पापा… कल फिर खेलेंगे?”
पिता मुस्कुरा दिए।
“ज़रूर।”
आरव ने आसमान की ओर देखा।
वही तारे आज भी चमक रहे थे।
उसे लगा…
शायद रिश्ते कभी पूरी तरह खोते नहीं।
वे बस समय और व्यस्तताओं की धूल के नीचे दब जाते हैं।
अगर कोई उन्हें फिर से प्यार, समय और अपनापन दे…
तो वे फिर उसी तरह चमकने लगते हैं, जैसे बरसात के बाद धुला हुआ आसमान।
उस रात सोने से पहले आरव ने अपनी डायरी में एक पंक्ति लिखी—
“दुनिया को जोड़ने वाली तकनीक बहुत आगे बढ़ गई, लेकिन दिलों को जोड़ने का रास्ता आज भी वही है—समय, संवाद और साथ।”
उसे समझ आ गया था कि मुस्कानें किसी मोबाइल में नहीं रहतीं।
वे लोगों के चेहरों पर तब लौटती हैं, जब लोग एक-दूसरे के लिए सचमुच समय निकालते हैं।
और रिश्ते…
वे संदेश भेजने से नहीं, साथ निभाने से मज़बूत होते हैं।
अध्याय 10
क्या वो बचपन फिर लौट सकता है?
बरसात की पहली फुहार अभी-अभी धरती को छूकर गुज़री थी। भीगी हुई मिट्टी की सोंधी खुशबू पूरे गाँव में फैल गई थी। बरगद के पेड़ की पत्तियों से पानी की छोटी-छोटी बूँदें टपक रही थीं। दूर खेतों में मोर अपने पंख फैलाकर नाच रहे थे। आसमान बादलों से ढका था, लेकिन वातावरण में एक अलग ही उजाला था।
आरव बरगद के उसी पुराने पेड़ के नीचे खड़ा था, जहाँ कभी उसका पूरा बचपन बीता था।
उसने चारों ओर नज़र दौड़ाई।
वहीं चौपाल…
वही नहर…
वही स्कूल…
वही पगडंडी…
लेकिन अब उन रास्तों पर उसके बचपन के कदमों की जगह नई पीढ़ी के कदम थे।
उसके हाथ में आज भी वह छोटी-सी सीटी थी, जो बरसों पहले मोहित ने उसे गाँव छोड़ते समय दी थी।
उसने उसे हथेली में कसकर पकड़ लिया।
अचानक उसे पीछे से बच्चों की हँसी सुनाई दी।
उसने मुड़कर देखा।
वही बच्चे, जो कुछ दिन पहले तक मोबाइल में खोए रहते थे, आज मैदान में कबड्डी खेल रहे थे।
कुछ बच्चे गिल्ली-डंडा खेल रहे थे।
कुछ कागज़ की नाव बनाकर बारिश के पानी में बहा रहे थे।
कुछ पेड़ की शाखा पर बँधे झूले पर झूल रहे थे।
उनकी हँसी में वही मासूमियत थी, जो कभी आरव और उसके दोस्तों की हँसी में हुआ करती थी।
आरव मुस्कुरा दिया।
इतने में मोहित उसके पास आकर खड़ा हो गया।
“क्या सोच रहा है?”
आरव ने बच्चों की ओर देखते हुए कहा—
“सोच रहा हूँ… शायद बचपन कहीं गया ही नहीं था।”
मोहित ने पूछा—
“फिर?”
“हमने ही उसे थोड़ा-सा भूल दिया था।”
दोनों कुछ देर तक बिना बोले बच्चों को खेलते देखते रहे।
उसी समय गाँव के कुछ और लोग भी वहाँ आ गए।
सोनू अपने बेटे के साथ था।
दीपक अपनी बेटी का हाथ पकड़े हुए था।
छोटू अपनी छोटी-सी बच्ची को झूला झुला रहा था।
इमरान बच्चों के साथ पिट्ठू खेल रहा था।
बरसों बाद ऐसा लग रहा था, जैसे पूरा गाँव फिर से साँस ले रहा हो।
उस शाम किसी ने एक नियम बनाया।
हर रविवार शाम पाँच बजे…
पूरा गाँव एक घंटे के लिए मोबाइल दूर रखेगा।
बच्चे मैदान में खेलेंगे।
बड़े आपस में बैठकर बातें करेंगे।
दादा-दादी बच्चों को कहानियाँ सुनाएँगे।
शुरुआत में कुछ लोगों को यह अजीब लगा।
कई बच्चों ने मुँह बनाया।
“एक घंटा बिना मोबाइल?”
लेकिन धीरे-धीरे वही एक घंटा पूरे सप्ताह का सबसे सुंदर समय बन गया।
बच्चे पूरे सप्ताह रविवार का इंतज़ार करने लगे।
कोई नई पतंग बनाता।
कोई नई गिल्ली तराशता।
कोई नई कहानी सोचकर दादी के पास पहुँच जाता।
कुछ महीनों बाद पूरे गाँव का माहौल बदलने लगा।
चौपाल फिर से आबाद होने लगी।
त्योहारों में फिर पहले जैसी रौनक लौटने लगी।
बच्चे अब सिर्फ़ ऑनलाइन दोस्त नहीं बनाते थे।
वे साथ दौड़ते थे।
साथ गिरते थे।
साथ हँसते थे।
साथ जीतते और साथ हारते थे।
एक दिन स्कूल के प्रधानाचार्य ने भी इस बदलाव को देखा।
उन्होंने घोषणा की—
“हर महीने एक दिन ‘बचपन उत्सव’ मनाया जाएगा।”
उस दिन स्कूल में कोई मोबाइल नहीं लाया जाएगा।
बच्चे सिर्फ़ पुराने भारतीय खेल खेलेंगे।
कबड्डी।
खो-खो।
गिल्ली-डंडा।
पिट्ठू।
रस्साकूद।
लंगड़ी।
और दादी-नानी की कहानियों का एक विशेष सत्र भी रखा जाएगा।
बच्चों ने पहले इसे सिर्फ़ एक कार्यक्रम समझा।
लेकिन जब उन्होंने खेलना शुरू किया, तो उन्हें एहसास हुआ कि असली खुशी जीतने में नहीं, साथ खेलने में है।
आरव यह सब देखकर भीतर ही भीतर संतोष महसूस कर रहा था।
उसे लगा कि अगर एक छोटा-सा गाँव बदल सकता है, तो शायद पूरी दुनिया भी बदल सकती है।
लेकिन तभी उसने अपने मन से एक सवाल पूछा—
“क्या सचमुच पुराना बचपन वापस आ सकता है?”
उसने खुद ही जवाब दिया—
“नहीं…”
समय कभी पीछे नहीं लौटता।
न वह पुराना घर वापस आएगा।
न वही उम्र।
न वही दिन।
न वही लोग।
जो दादी कभी रात-रात भर कहानियाँ सुनाती थीं, वे अब इस दुनिया में नहीं थीं।
पिताजी के बाल पूरी तरह सफ़ेद हो चुके थे।
माँ की चाल पहले जैसी तेज़ नहीं रही थी।
दोस्तों के चेहरे पर भी अब ज़िम्मेदारियों की लकीरें साफ़ दिखाई देती थीं।
बचपन सचमुच वापस नहीं आ सकता।
लेकिन…
उस बचपन की खुशबू वापस लाई जा सकती है।
उसकी सीख वापस लाई जा सकती है।
उसकी सादगी वापस लाई जा सकती है।
उसका अपनापन वापस लाया जा सकता है।
और सबसे बड़ी बात…
उस बचपन का अनुभव अगली पीढ़ी को दिया जा सकता है।
उसी शाम आरव घर लौटा।
दादी की पुरानी लकड़ी की संदूक अभी भी कमरे के कोने में रखी थी।
उसने धीरे से उसे खोला।
अंदर उसकी पुरानी स्लेट रखी थी।
एक छोटी-सी कंचों की थैली।
लकड़ी की गिल्ली।
पुरानी सीटी।
कुछ फीकी पड़ चुकी तस्वीरें।
और दादी की लिखावट में एक छोटा-सा कागज़।
उसने काँपते हाथों से उसे खोला।
उस पर लिखा था—
“बेटा, जीवन में चाहे जितना आगे बढ़ जाना, लेकिन इतना आगे कभी मत निकल जाना कि पीछे मुड़कर देखने पर अपना बचपन दिखाई ही न दे।”
आरव की आँखों से आँसू निकल पड़े।
उसे लगा जैसे दादी आज भी उसके पास बैठी हों।
उसने संदूक बंद किया और बाहर आँगन में आ गया।
बारिश रुक चुकी थी।
आसमान साफ़ था।
अनगिनत तारे चमक रहे थे।
बिल्कुल वैसे ही…
जैसे उसके बचपन में चमका करते थे।
उसने अपने बेटे को आवाज़ दी—
“आर्यन…”
“जी पापा?”
“चलो… आज मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ।”
बेटा मुस्कुराते हुए उसके पास आकर बैठ गया।
“कौन-सी कहानी?”
आरव ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—
“एक ऐसे बचपन की कहानी… जो स्क्रीन में नहीं, यादों में बसता था।”
बेटा ध्यान से सुनने लगा।
आरव बोलता गया।
कहानी आगे बढ़ती गई।
और उसी क्षण उसे महसूस हुआ—
बचपन कभी मरता नहीं।
वह हर उस कहानी में जीवित रहता है, जो एक पीढ़ी अगली पीढ़ी को सुनाती है।
वह हर उस खेल में ज़िंदा रहता है, जो बच्चे खुली हवा में खेलते हैं।
वह हर उस परिवार में साँस लेता है, जहाँ लोग एक-दूसरे के लिए समय निकालते हैं।
वह हर उस माँ की पुकार में बसता है, जो सुबह प्यार से अपने बच्चे को जगाती है।
वह हर उस पिता की मुस्कान में रहता है, जो अपने बच्चे की छोटी-सी सफलता पर गर्व करता है।
वह हर उस दादी की कहानी में छिपा होता है, जो बिना किसी किताब के जीवन का सबसे बड़ा ज्ञान दे जाती है।
और वह हर उस दोस्ती में धड़कता है, जहाँ स्वार्थ नहीं, सिर्फ़ साथ होता है।
तकनीक ने हमें दुनिया से जोड़ दिया है।
यह हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसका सही उपयोग हमें आगे बढ़ाता है।
लेकिन यदि हम अपने बच्चों को सिर्फ़ स्क्रीन देना सीखाएँगे और समय देना भूल जाएँगे…
तो वे जानकारी तो बहुत पाएँगे, यादें बहुत कम बना पाएँगे।
इसलिए ज़रूरत तकनीक छोड़ने की नहीं…
बल्कि रिश्तों को फिर से समय देने की है।
ज़रूरत मोबाइल बंद करने की नहीं…
बल्कि कभी-कभी उसे एक तरफ़ रखकर अपने अपनों के साथ बैठने की है।
ज़रूरत आधुनिक बनने की है…
लेकिन अपनी जड़ों को भूले बिना।
क्योंकि…
बचपन का असली पता किसी मोबाइल, किसी ऐप या किसी स्क्रीन में नहीं मिलता।
वह तो आज भी वहीं मिलता है—माँ की पुकार में, पिता की सीख में, दादी की कहानी में, दोस्तों की हँसी में, मिट्टी की खुशबू में, और उन अनमोल पलों में… जिन्हें जीते समय कभी तस्वीरों में कैद करने की ज़रूरत नहीं पड़ती, क्योंकि वे हमेशा के लिए दिल में बस जाते हैं।
समाप्त।