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HomeYogesh Saraswat

भगवान और मनुष्य


 परिचय

मनुष्य—यह शब्द जितना साधारण लगता है, उतना ही गहरा अर्थ रखता है।

इस दुनिया में हर व्यक्ति अपनी यात्रा में अकेला है, अपने अनुभवों और संघर्षों के साथ। हर दिन नई चुनौतियाँ, अनकहे सवाल और छुपी हुई पीड़ा लेकर आता है।


इस पुस्तक में हम उसी यात्रा का अनुसरण करते हैं—एक ऐसी यात्रा जहाँ ईश्वर स्वयं मनुष्य का रूप धारण करके उसकी वास्तविकताओं, संघर्षों, दुखों और संवेदनाओं को अनुभव करते हैं। यह केवल एक कहानी नहीं है; यह एक गहन अनुभव है, एक दर्पण है, जो हमें हमारे अपने जीवन, हमारी संवेदनाओं और हमारे अंदर की असहायता को देखने का अवसर देता है।


यह पुस्तक हमें यह समझाती है कि मनुष्य केवल अपनी ताकत और उपलब्धियों से नहीं, बल्कि अपनी संवेदनाओं, अपने संघर्ष और अपनी करुणा से परखा जाता है। और सबसे महत्वपूर्ण बात—किसी के दुख को समझना ही सबसे बड़ी ताकत है।


इस यात्रा के माध्यम से पाठक न केवल मनुष्य के दुख और संघर्ष को महसूस करेंगे, बल्कि यह भी जानेंगे कि करुणा, संवेदना और समझ ही असली शक्ति हैं।


यह कहानी हमें याद दिलाती है कि कभी-कभी सबसे बड़ा चमत्कार केवल साथ बैठने, सुनने और समझने में ही होता है।

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लेखक

योगेश सारस्वत एक संवेदनशील कथाकार और विचारशील लेखक हैं, जो जीवन के अदृश्य पहलुओं को शब्दों में जीवंत करते हैं। उनका लेखन मनुष्य के भाव, उसकी संवेदनाएँ, संघर्ष और करुणा को केंद्र में रखता है।


वे मानते हैं कि कहानियाँ केवल मनोरंजन का साधन नहीं होतीं; वे हमें हमारे भीतर झाँकने, हमारी भावनाओं को समझने और दूसरों के दृष्टिकोण को महसूस करने का अवसर देती हैं। उनकी रचनाएँ पाठकों को न केवल सोचने पर मजबूर करती हैं, बल्कि उनके हृदय को छू जाती हैं।


योगेश की लेखनी में सरलता और गहराई का अद्भुत मिश्रण है। वे रोज़मर्रा के जीवन की साधारण घटनाओं में भी असाधारण भावनाओं को खोज निकालते हैं और उन्हें पाठक के सामने ऐसे प्रस्तुत करते हैं कि हर व्यक्ति अपनी कहानी में खुद को पहचान सके।


इस पुस्तक के माध्यम से योगेश सारस्वत पाठकों को यह संदेश देना चाहते हैं कि मनुष्य की संवेदनाएँ, उसके संघर्ष और करुणा ही उसकी असली ताकत हैं।

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अध्याय 1 : स्वर्ग में उठा एक प्रश्न

स्वर्ग उस दिन भी उतना ही शांत था, जितना सृष्टि के आरंभ से रहा था।

न कोई शोर, न कोई व्याकुलता, न किसी प्रकार की कमी। प्रकाश वहाँ बोला नहीं करता था, बस रहता था। हवा बहती नहीं थी, केवल अनुभूति बनकर स्पर्श करती थी। समय भी वहाँ चलता नहीं था—वह बस ठहरा रहता था, जैसे किसी ने उसे साँस रोकने को कह दिया हो।


और उसी शांति के बीच, पहली बार…

एक प्रश्न उठा।


यह प्रश्न किसी वाद-विवाद से नहीं जन्मा था, न किसी असंतोष से। यह प्रश्न करुणा की कोख से पैदा हुआ था।


भगवान—जो सब जानते थे—उस क्षण कुछ समझना चाहते थे।


स्वर्ग की ऊँचाइयों से वे पृथ्वी को देख रहे थे। यह कोई नया दृश्य नहीं था। सदियों से मनुष्य जन्म लेता रहा, जीता रहा, संघर्ष करता रहा, और अंत में लौट आता रहा। सब कुछ ईश्वर की दृष्टि में था—हर जन्म, हर मृत्यु, हर प्रार्थना, हर चुप्पी।


लेकिन हाल के समय में, एक स्वर बार-बार उनके भीतर गूँज रहा था।


“मैं बहुत दुखी हूँ।”


यह स्वर किसी एक व्यक्ति का नहीं था। यह एक शहर से उठता, दूसरे गाँव में गूँजता, किसी माँ की आँखों से टपकता, किसी पिता की चुप्पी में दब जाता। कोई इसे ज़ोर से कहता था, कोई मन ही मन दोहराता था।


ईश्वर ने देखा—

मनुष्य रोटी खा रहा है, फिर भी दुखी है।

घर में रह रहा है, फिर भी दुखी है।

भीड़ में खड़ा है, फिर भी अकेला है।

प्रार्थना करता है, फिर भी शिकायत से भरा है।


भगवान ठहर गए।


वे जानते थे कि दुख क्या होता है।

उन्होंने दुख बनाया था—पर एक सीमा तक।

उन्होंने पीड़ा दी थी—पर सीख के लिए।

उन्होंने आँसू दिए थे—पर शुद्धि के लिए।


तो फिर यह असीम दुख कहाँ से आ रहा था?


स्वर्ग में देवदूत मौन थे। वे आदेश की प्रतीक्षा नहीं कर रहे थे, क्योंकि कोई आदेश नहीं था। यह एक आंतरिक क्षण था—जहाँ सृष्टिकर्ता स्वयं सृष्टि को समझने का प्रयास कर रहा था।


भगवान ने पृथ्वी की ओर देखा।


एक छोटा सा दृश्य उनकी दृष्टि में ठहर गया।


एक आदमी—लगभग चालीस वर्ष का—सड़क किनारे बैठा था। उसके पास सब कुछ था जो जीवन को “सामान्य” कहा जाता है। नौकरी थी, परिवार था, छत थी। फिर भी उसकी आँखें कहीं और देख रही थीं—खाली।


वह बुदबुदाया,

“पता नहीं क्यों… सब होते हुए भी मन नहीं भरता।”


भगवान के भीतर कुछ हिला।


वे जानते थे कि मनुष्य कभी संतुष्ट नहीं रहता।

पर यह असंतोष नहीं था।

यह थकान थी।

अदृश्य थकान।


भगवान ने स्वयं से पूछा—

“क्या मनुष्य सच में इतना परेशान है?”

“या फिर उसने दुख को आदत बना लिया है?”

“या क्या वह दुख को ढाल बनाकर जीवन से बच रहा है?”


यह प्रश्न साधारण नहीं था।

यह सृष्टि के केंद्र से उठता प्रश्न था।


स्वर्ग में कोई उत्तर नहीं मिला।


देवताओं ने ग्रंथ खोले, पर वहाँ केवल नियम थे—अनुभव नहीं।

ऋषियों की चेतना में झाँका गया, पर वे तो समाधि में थे—जीवन की कड़वाहट से दूर।


भगवान ने पहली बार स्वीकार किया—

“मैं देख रहा हूँ, पर महसूस नहीं कर पा रहा।”


और यही स्वीकार, इस कथा की शुरुआत था।


उन्होंने पृथ्वी को फिर देखा।


एक माँ अपने बच्चे को सुला रही थी। बच्चा रो रहा था, माँ थकी थी, पर मुस्कुरा रही थी। उस मुस्कान के पीछे दबा हुआ दर्द भगवान ने देखा—लेकिन वह दर्द शब्दों में नहीं था।


एक छात्र किताबों के बीच बैठा था। भविष्य का डर उसकी साँसों में घुला हुआ था। वह सफल होना चाहता था, पर खुद से हारता जा रहा था।


एक बुज़ुर्ग खिड़की से बाहर देख रहा था। किसी के आने की प्रतीक्षा नहीं थी, फिर भी प्रतीक्षा थी।


भगवान ने सोचा—

“मनुष्य के दुख का कोई एक कारण नहीं है।”

“यह तो परतों में बसा है।”

“इसे ऊपर से देखकर नहीं समझा जा सकता।”


यही वह क्षण था, जब स्वर्ग की निश्चलता टूटी।


भगवान ने निर्णय नहीं लिया—

उन्होंने अनुभव की इच्छा की।


यह कोई अवतार की घोषणा नहीं थी।

यह कोई धर्म की स्थापना नहीं थी।

यह किसी युद्ध की भूमिका नहीं थी।


यह सिर्फ़ एक प्रश्न का उत्तर खोजने की यात्रा थी।


भगवान ने कहा—

“यदि मनुष्य दुखी है, तो मैं उसे ऊपर से देखकर नहीं समझ सकता।”

“मुझे उसके भीतर उतरना होगा।”

“उसके जैसा बनना होगा।”


स्वर्ग में पहली बार सन्नाटा गहरा हुआ।


देवदूत चकित थे।

क्योंकि यह पहली बार था जब ईश्वर समझने जा रहे थे—शासन करने नहीं।


भगवान जानते थे—

मनुष्य होना आसान नहीं है।

मनुष्य होना मतलब सीमित होना।

भूख लगना।

डर लगना।

अकेला पड़ जाना।

और फिर भी जीते रहना।


उन्होंने स्वयं से पूछा—

“क्या मैं यह सब सह पाऊँगा?”


और फिर एक और प्रश्न उठा—

“क्या मनुष्य यह सब सहते हुए भी जी रहा है, या सिर्फ़ निभा रहा है?”


स्वर्ग की रोशनी मंद हुई।

यह कोई अशुभ संकेत नहीं था।

यह गहराई का संकेत था।


भगवान ने पृथ्वी को आख़िरी बार उस रूप में देखा, जिसमें वे उसे सदैव देखते आए थे—पूर्ण दृष्टि से।


अब वे उसे आँखों से नहीं, जीवन से देखने जा रहे थे।


और इसी विचार के साथ,

स्वर्ग में उठा वह प्रश्न

धीरे-धीरे

एक मौन संकल्प में बदल गया।


मनुष्य को समझने के लिए,

ईश्वर को मनुष्य बनना होगा।


_________________________________________

अध्याय 2 : मनुष्य के दुःख की पुकार


पृथ्वी पर दुख कभी एक साथ नहीं आता।

वह टुकड़ों में आता है—

कभी सुबह की थकान बनकर,

कभी रात की चुप्पी में सवाल बनकर,

और कभी बिना कारण आँखों से बहकर।


भगवान ने स्वर्ग से जो देखा था, वह दृश्य था।

पर अब जो सुनाई दे रहा था, वह पुकार थी।


यह कोई एक आवाज़ नहीं थी।

यह हज़ारों दिलों की एक साथ धड़कती हुई पीड़ा थी—

अलग-अलग शब्दों में,

पर एक ही भाव में।


किसी ने कहा,

“मैंने सब सही किया, फिर भी मेरा जीवन गलत क्यों लग रहा है?”


किसी ने चुपचाप पूछा,

“क्या मेरा होना किसी के लिए मायने रखता है?”


और कोई ऐसा भी था,

जो कुछ नहीं बोला—

पर उसका मौन ही उसकी सबसे ऊँची चीख़ था।


भगवान ने महसूस किया कि मनुष्य का दुख शोर में नहीं,

खामोशी में रहता है।


शोर तो वह करता है जो सुना जाना चाहता है,

पर दुख तो वह है

जो सुने जाने की उम्मीद भी छोड़ चुका होता है।


एक दृश्य उनके भीतर गहराई से उतर गया।


एक युवा लड़की, भीड़ भरी बस में खड़ी थी।

कंधे पर बैग था, हाथ में फोन,

और आँखों में…

थोड़ी सी थकान, थोड़ी सी उदासी,

और बहुत सारा दबा हुआ डर।


वह सोच रही थी—

“अगर मैं आज असफल हो गई, तो क्या मैं फिर भी क़ाबिल रहूँगी?”

“अगर मैं टूट गई, तो क्या कोई मुझे समेटेगा?”


भगवान ने देखा—

वह लड़की हँस रही थी।

पर वह हँसी, उसकी आत्मा तक नहीं पहुँची थी।


यही मनुष्य का दुख था—

बाहर की मुस्कान और भीतर का सूना कमरा।


एक और आवाज़ उठी।


एक पिता देर रात तक जाग रहा था।

कमरे में सब सो रहे थे।

वह अकेला बैठा था—

हाथ में पुरानी रसीदें,

और मन में आने वाले कल का बोझ।


वह भगवान से नाराज़ नहीं था।

वह किसी से शिकायत नहीं कर रहा था।

वह बस सोच रहा था—

“मैं थक गया हूँ,

पर मुझे थकने की इजाज़त नहीं है।”


भगवान ने समझा—

मनुष्य का दुख हमेशा रोता नहीं है।

कभी-कभी वह

जिम्मेदारी बनकर चुपचाप बैठ जाता है।


फिर एक बुज़ुर्ग महिला की पुकार सुनाई दी।


वह रोज़ मंदिर जाती थी।

दीपक जलाती थी।

प्रार्थना करती थी।


पर उस दिन उसने कुछ अलग कहा—

“भगवान, मुझे कुछ मत दो…

बस कोई ऐसा दे दो

जो मेरी बात सुन ले।”


यह पुकार सबसे भारी थी।


क्योंकि यह दुख किसी चीज़ की कमी का नहीं था,

यह साथ की कमी का दुख था।


भगवान ठहर गए।


उन्होंने देखा—

मनुष्य दुखी इसलिए नहीं है कि उसके पास कुछ नहीं है,

बल्कि इसलिए है

क्योंकि जो है,

उसके साथ उसे बाँटने वाला कोई नहीं है।


यह पुकार हर जगह थी।


एक छात्र की असफलता में,

एक माँ की चिंता में,

एक प्रेमी की चुप्पी में,

एक मित्र की दूरी में।


मनुष्य हर जगह बोल रहा था—

पर कोई सुन नहीं रहा था।


और जो सुन रहे थे,

वे समझ नहीं पा रहे थे।


भगवान ने सोचा—

“मैंने मनुष्य को शब्द दिए,

पर उसे सुना जाना नहीं सिखाया।”


मनुष्य एक-दूसरे से बातें करता है,

पर दिल से नहीं।


वह जवाब देता है,

पर महसूस नहीं करता।


यही कारण था कि दुख बढ़ता जा रहा था।


भगवान को पहली बार यह स्पष्ट हुआ—

मनुष्य का दुख किसी एक घटना से पैदा नहीं होता,

वह धीरे-धीरे

अनसुने रहने से पैदा होता है।


एक दृश्य ने उन्हें भीतर तक हिला दिया।


एक आदमी नदी के किनारे बैठा था।

न कोई आँसू,

न कोई गुस्सा।


वह बस पानी को देख रहा था।


उसके मन में कोई नाटकीय विचार नहीं था।

वह बस थक चुका था—

लगातार समझाते रहने से,

खुद को मजबूत दिखाने से,

और यह साबित करते रहने से

कि वह ठीक है।


भगवान ने सुना—

उसने मन ही मन कहा,

“काश कोई पूछे—

और सच में जानना चाहे।”


यही मनुष्य की सबसे गहरी पुकार थी।


उसे समाधान नहीं चाहिए था,

उसे उपदेश नहीं चाहिए था,

उसे बस

सच्चा साथ चाहिए था।


भगवान ने महसूस किया—

स्वर्ग में रहकर

इस पुकार का उत्तर नहीं दिया जा सकता।


क्योंकि स्वर्ग में दुख नहीं होता,

और जहाँ दुख नहीं होता,

वहाँ दुख की भाषा भी नहीं समझी जाती।


मनुष्य की पुकार

कोई औपचारिक प्रार्थना नहीं थी।

यह कोई मंत्र नहीं था।

यह तो जीवन के बोझ तले

दबी हुई एक साँस थी।


और उस साँस को सुनने के लिए

ईश्वर को

मनुष्य की तरह

साँस लेनी होगी।


भगवान ने पहली बार

दुख को सिर्फ़ देखा नहीं—

सुना।


और यह सुनना

उन्हें बदल रहा था।

यह पुकार

उन्हें पृथ्वी की ओर

और क़रीब खींच रही थी।


अब प्रश्न केवल यह नहीं था

कि मनुष्य दुखी क्यों है,

बल्कि यह था—


क्या कोई उसके दुख के साथ

कुछ देर बैठने को तैयार है?


और इसी प्रश्न के साथ,

अगले अध्याय की नींव

धीरे-धीरे रखी जाने लगी।

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अध्याय 3 : ईश्वर का निर्णय

कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं

जो उत्तर मिलने पर समाप्त नहीं होते,

बल्कि उत्तर माँगने वाले को ही बदल देते हैं।


मनुष्य की पुकार सुनने के बाद

भगवान अब वैसे नहीं रह गए थे

जैसे पहले थे।


स्वर्ग अभी भी शांत था,

पर वह शांति अब स्थिर नहीं थी—

उसमें एक हलचल थी,

जैसे किसी गहरे जल में

किसी ने पत्थर डाल दिया हो।


भगवान जानते थे

कि वे सब देख सकते हैं,

सब सुन सकते हैं,

पर सब समझ नहीं सकते।


समझने के लिए

दूरी नहीं,

निकटता चाहिए।


यही विचार

उनके भीतर

धीरे-धीरे

एक निर्णय बन रहा था।


यह कोई अचानक लिया गया फ़ैसला नहीं था।

यह करुणा की लंबी प्रक्रिया का परिणाम था।


स्वर्ग में पहली बार

ईश्वर मौन नहीं थे—

वे विचार कर रहे थे।


उन्होंने सृष्टि की ओर देखा—

पहाड़ वैसे ही खड़े थे,

नदियाँ वैसे ही बह रही थीं,

सूरज वैसे ही उग रहा था।


प्रकृति अपना काम कर रही थी,

बिना शिकायत के,

बिना अपेक्षा के।


फिर उन्होंने मनुष्य को देखा।


मनुष्य हर दिन

थोड़ा-थोड़ा टूट रहा था,

पर हर दिन

खुद को जोड़कर

फिर चल पड़ता था।


भगवान ने महसूस किया—

मनुष्य कमजोर नहीं है,

वह अकेला है।


और अकेलापन

सबसे भारी बोझ होता है।


भगवान ने स्वयं से पूछा—

“अगर मैं उसके साथ चलूँ,

तो क्या उसका बोझ हल्का होगा?”


यह प्रश्न सत्ता का नहीं था,

यह साथ का प्रश्न था।


स्वर्ग में देवदूत पास आए।

उनकी आँखों में जिज्ञासा थी,

पर कोई भय नहीं।


एक देवदूत ने कहा,

“प्रभु, आप सब जानते हैं।”


भगवान ने उत्तर दिया,

“जानना और जीना—

दो अलग बातें हैं।”


दूसरे देवदूत ने कहा,

“मनुष्य को नियम दिए गए हैं।”


भगवान ने कहा,

“नियम दिशा देते हैं,

पर सहारा नहीं बनते।”


तीसरे ने पूछा,

“क्या आपको मनुष्य बनना होगा?”


भगवान कुछ क्षण चुप रहे।


फिर बोले—

“अगर मनुष्य के दुख की भाषा

उसके जीवन में लिखी है,

तो मुझे उस भाषा को

उसकी ही स्याही में पढ़ना होगा।”


यह वाक्य

निर्णय बन चुका था।


भगवान जानते थे

मनुष्य होना क्या है—


मतलब सीमित होना।

मतलब भूल करना।

मतलब प्रतीक्षा करना।

मतलब किसी के न होने से

खाली हो जाना।


मनुष्य बनना

मतलब हर सवाल का

तुरंत जवाब न मिलना।


और ईश्वर के लिए

यह सबसे कठिन था।


क्योंकि वे

हमेशा उत्तर रहे थे,

कभी प्रश्न नहीं।


भगवान ने सोचा—

“क्या मैं सह पाऊँगा

असहायता?”

“क्या मैं सह पाऊँगा

असफलता?”

“क्या मैं सह पाऊँगा

अपने ही प्रश्नों का

उत्तर न होना?”


यह भय नहीं था।

यह ईमानदारी थी।


उन्होंने पृथ्वी को फिर देखा।


एक बच्चा

अपनी माँ का हाथ पकड़े

डर के बावजूद चल रहा था।


भगवान ने समझा—

मनुष्य डरता है,

पर रुकता नहीं।


एक महिला

अपने टूटे सपनों को

चुपचाप समेट रही थी,

ताकि उसके बच्चे

पूरा सपना देख सकें।


भगवान ने समझा—

मनुष्य त्याग करता है,

पर दिखाता नहीं।


एक युवा

असफल होकर भी

अगले दिन फिर खड़ा हो रहा था।


भगवान ने समझा—

मनुष्य हारता है,

पर समाप्त नहीं होता।


यही देखकर

भगवान का निर्णय

और गहरा हुआ।


उन्होंने कहा—

“अगर मनुष्य इतना सह सकता है,

तो मैं भी सहूँगा।”


यह कोई परीक्षा नहीं थी।

यह बराबरी का भाव था।


स्वर्ग में नियम लिखे गए थे—

पर उस दिन

करुणा ने

नियमों से ऊपर

स्थान ले लिया।


भगवान ने स्पष्ट देखा—

यदि वे केवल

ऊपर से दया करेंगे,

तो मनुष्य

हमेशा नीचे ही रहेगा।


पर यदि वे

नीचे आकर साथ चलेंगे,

तो मनुष्य

खुद को अकेला नहीं मानेगा।


यही निर्णय था।


न शक्ति दिखाने का,

न चमत्कार करने का।


बस

मनुष्य बनने का।


देवदूत मौन थे।

क्योंकि वे समझ गए थे—

यह कोई साधारण अवतार नहीं है।


यह दुख को समझने का अवतार है।


भगवान ने कहा—

“मैं उसे यह नहीं बताऊँगा

कि वह क्यों दुखी है।”

“मैं बस उसके साथ रहूँगा

जब वह दुखी होगा।”


यह वाक्य

स्वर्ग में गूँज नहीं बना,

वह भीतर उतर गया।


भगवान ने जाना—

मनुष्य को उपदेश नहीं चाहिए,

उसे उपस्थिति चाहिए।


और इस उपस्थिति के लिए

उन्हें

अपनी सर्वज्ञता छोड़नी होगी,

अपनी सुरक्षा छोड़नी होगी,

अपनी ऊँचाई छोड़नी होगी।


यह त्याग था—

पर किसी से बड़ा बनने का नहीं,

किसी के पास होने का।


निर्णय हो चुका था।


स्वर्ग वैसा ही था,

पर ईश्वर बदल चुके थे।


अब वे

दृष्टा नहीं रहेंगे,

अब वे

यात्री बनेंगे।


और यह यात्रा

शक्ति से नहीं,

संवेदना से शुरू होगी।

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अध्याय 4 : मनुष्य का रूप

निर्णय के बाद कोई शोर नहीं हुआ।

न आकाश बदला,

न समय रुका।


पर भीतर—

सब कुछ बदल चुका था।


ईश्वर अब केवल देखने वाले नहीं थे।

वे उस राह पर बढ़ चुके थे

जहाँ से लौटना

संभव नहीं होता।


मनुष्य का रूप

किसी वस्त्र की तरह नहीं पहना जा सकता।

यह शरीर से पहले

स्वीकार माँगता है।


स्वर्ग में कोई उत्सव नहीं था,

क्योंकि यह आगमन नहीं—

अवरोहण था।


ईश्वर जानते थे

कि मनुष्य बनना

मतलब सीमित होना।


मतलब भूख लगना

और उसका तुरंत उत्तर न मिलना।

मतलब थक जाना

और फिर भी चलना।

मतलब रोना

और अपने आँसू पोंछ लेना।


मनुष्य का रूप

केवल शरीर नहीं होता,

उसके साथ

असंख्य बोझ आते हैं।


ईश्वर ने उन बोझों को

पहले ही स्वीकार कर लिया।


उन्होंने देखा—

मनुष्य का शरीर

नाज़ुक होता है।

एक छोटी-सी चोट

पूरे दिन की दिशा बदल सकती है।


पर मनुष्य

फिर भी जीता है।


ईश्वर ने सोचा—

“मैं शक्ति छोड़ रहा हूँ,

पर अनुभव पाने जा रहा हूँ।”


यह सौदा

नुकसान का नहीं था,

यह समझ का था।


मनुष्य का रूप चुनते समय

ईश्वर ने कोई विशेषता नहीं चुनी।

न कोई राजघराना,

न कोई दिव्यता का चिन्ह।


क्योंकि वे

विशेष नहीं बनना चाहते थे।

वे साधारण बनना चाहते थे।


साधारण—

जहाँ कोई पहचान नहीं,

कोई विशेष सम्मान नहीं।


क्योंकि

दुख सबसे ज़्यादा

साधारण जीवन में ही रहता है।


ईश्वर ने देखा—

अधिकतर दुख

महलों में नहीं,

छोटे कमरों में पलता है।


अधिकतर पीड़ा

सिंहासन पर नहीं,

रोज़मर्रा की कुर्सियों पर बैठी होती है।


इसलिए

उन्होंने मनुष्य का रूप

एक आम मनुष्य का चुना।


जहाँ सुबह

काम की चिंता से होती है,

और रात

खुद से सवालों में बीतती है।


मनुष्य का शरीर

उन्हें बाँधने वाला था।

अब वे

हर जगह एक साथ नहीं होंगे।


अब उन्हें

चलकर पहुँचना होगा,

प्रतीक्षा करनी होगी,

और कई बार

देर हो जाएगी।


ईश्वर ने इसे स्वीकार किया।


क्योंकि

मनुष्य भी

अक्सर देर से ही

खुद तक पहुँच पाता है।


उन्होंने जाना—

मनुष्य का जीवन

संभावनाओं से नहीं,

सीमाओं से बनता है।


मनुष्य का रूप

उनके लिए

एक पाठ था।


भूख का पाठ।

थकान का पाठ।

अनिश्चितता का पाठ।


और सबसे कठिन—

अकेलेपन का पाठ।


क्योंकि

मनुष्य के चारों ओर लोग होते हैं,

पर भीतर

अक्सर कोई नहीं होता।


ईश्वर ने यह भी स्वीकार किया

कि उन्हें

गलत समझा जाएगा।

उन्हें

नज़रअंदाज़ किया जाएगा।

उनकी बातों को

साधारण समझ लिया जाएगा।


और शायद

उनकी चुप्पी को

कमज़ोरी माना जाएगा।


मनुष्य का रूप

उन्हें यह सब सिखाएगा।


स्वर्ग में रहते हुए

ईश्वर को

कभी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी थी।


अब

उन्हें इंतज़ार करना होगा—

बस के आने का,

किसी के जवाब का,

और कई बार

अपनी ही उम्मीदों का।


उन्होंने महसूस किया—

यही वह जगह है

जहाँ मनुष्य टूटता है।


प्रतीक्षा में।


मनुष्य का रूप

उन्हें समय से बाँध देगा।

अब हर चीज़

धीरे-धीरे होगी।


पर शायद

यही धीरेपन में

मनुष्य का सच छिपा है।


ईश्वर ने एक अंतिम बार

अपनी असीम सत्ता को देखा।


उन्होंने उसे छोड़ा नहीं—

बस पीछे रखा।


क्योंकि

यदि वे शक्ति साथ लाते,

तो समझ

कभी सामने नहीं आती।


मनुष्य का रूप

अब तैयार था।


न कोई चमक,

न कोई घोषणा।


बस

एक साधारण शुरुआत।


क्योंकि

सच में जो गहरा होता है,

वह

शोर नहीं करता।


और इसी मौन में

ईश्वर

मनुष्य बन गए।

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अध्याय 5 : पृथ्वी पर पहला कदम

जब ईश्वर ने पृथ्वी पर पहला कदम रखा,

तो धरती नहीं काँपी।

न कोई बिजली गिरी,

न कोई आकाश फटा।


क्योंकि यह आगमन

शक्ति का नहीं था,

संवेदना का था।


पाँव ज़मीन से टकराए,

और पहली बार

ईश्वर ने

ठंडक महसूस की।


यह ठंडक

स्वर्ग की शांति जैसी नहीं थी।

यह कुछ अलग थी—

कच्ची,

अनिश्चित,

और सजीव।


हवा चली।

उसमें सुगंध भी थी,

और धूल भी।


ईश्वर ने साँस ली।

यह साधारण साँस नहीं थी।

यह सीमित साँस थी।


हर साँस के साथ

एक प्रश्न जुड़ा था—

“अगर यह रुक गई, तो?”


मनुष्य इसी डर के साथ

हर दिन जीता है।


ईश्वर कुछ क्षण

खामोश खड़े रहे।

वे किसी दिशा में नहीं जा रहे थे।


क्योंकि

मनुष्य का जीवन

अक्सर ऐसे ही शुरू होता है—

बिना दिशा के।


उन्होंने चारों ओर देखा।


लोग चल रहे थे।

कोई जल्दी में था,

कोई बोझ में।


किसी के चेहरे पर मुस्कान थी,

पर आँखें

कुछ और कह रही थीं।


ईश्वर ने पहली बार

भीड़ देखी।


स्वर्ग में

भीड़ नहीं होती।

वहाँ सब

अपनी जगह पर होते हैं।


यहाँ

सब अपनी जगह

खोज रहे थे।


ईश्वर ने महसूस किया—

भीड़ में होना

और अकेला होना

एक साथ संभव है।


एक बच्चा

अपने पिता का हाथ पकड़े

चल रहा था।

पिता फोन में व्यस्त था।


बच्चे ने कुछ कहा,

पिता ने सुना नहीं।


ईश्वर ने यह दृश्य

अपने भीतर दर्ज कर लिया।


यही तो मनुष्य का दुख है—

कहा गया शब्द

सुना नहीं जाता।


भूख का पहला अनुभव

ज्यादा देर नहीं लगा।


पेट में हल्की-सी

खालीपन की अनुभूति हुई।


ईश्वर रुके।


स्वर्ग में

भूख कभी नहीं लगी थी।

ज़रूरत नहीं थी।


यहाँ

ज़रूरत ही जीवन थी।


उन्होंने एक ठेले वाले को देखा।

रोटी की खुशबू

हवा में तैर रही थी।


ईश्वर ने समझा—

भूख

सिर्फ़ शरीर की नहीं होती।

यह सम्मान की भी होती है।


रोटी माँगना

आसान नहीं था।


पहली बार

ईश्वर ने

संकोच महसूस किया।


और यही संकोच

मनुष्य को

चुप बनाता है।


उन्होंने देखा—

कुछ लोग खाते हुए भी

असंतुष्ट थे,

और कुछ लोग

बिना खाए भी

धैर्यवान थे।


ईश्वर ने जाना—

दुख मात्रा का नहीं,

तुलना का परिणाम होता है।


उन्होंने आगे बढ़ना चाहा,

पर थकान

पाँवों में उतरने लगी।


यह थकान

कुछ कदमों की नहीं थी,

यह जिम्मेदारी की थी।


मनुष्य

हर दिन इसी थकान के साथ

घर लौटता है।


ईश्वर ने सोचा—

“मनुष्य हारता नहीं,

बस थक जाता है।”


रात होने लगी।


आकाश में तारे उभरे।

पर वे

अब वैसे नहीं दिख रहे थे।


स्वर्ग से देखे तारे

सुंदर थे।

धरती से देखे तारे

दूर थे।


यही फर्क था।


धरती पर

सब कुछ

थोड़ा दूर होता है।


सपने,

शांति,

और कभी-कभी

खुद लोग भी।


ईश्वर ने एक जगह बैठकर

रात बिताने का निश्चय किया।


कोई बिस्तर नहीं था।

कोई सुविधा नहीं थी।


बस

एक कठोर ज़मीन

और

खुला आकाश।


यही

कई मनुष्यों की

रोज़ की सच्चाई थी।


पहली बार

ईश्वर ने

नींद से पहले

डर महसूस किया।


न किसी शत्रु का,

बल्कि

अगले दिन का।


मनुष्य

इसी डर के साथ

सोता है।


ईश्वर ने आँखें बंद कीं।


मन में कोई मंत्र नहीं था।

कोई शक्ति नहीं थी।


बस

एक विचार था—

“अगर मैं कल जागा,

तो क्या बेहतर होगा?”


यही प्रश्न

हर मनुष्य

हर रात

खुद से पूछता है।


और इसी प्रश्न के साथ

ईश्वर की

पहली रात

धरती पर

पूरी हुई।

_________________________________________


अध्याय 6 : आँसुओं की दुनिया

सुबह हुई।

सूरज निकला—

पर वह वैसा नहीं था

जैसा स्वर्ग से दिखता था।


धरती का सूरज

रोशनी देता है,

पर राहत नहीं।


ईश्वर ने आँखें खोलीं।

शरीर में हल्की जकड़न थी।

ज़मीन ने रात भर

अपनी कठोरता याद दिलाई थी।


यही तो मनुष्य की सुबह होती है—

नींद पूरी नहीं,

पर दिन पूरा करना होता है।


ईश्वर उठे।

पहला कदम

अब उतना हल्का नहीं था।


उन्होंने महसूस किया—

हर नया दिन

एक अवसर नहीं,

कई बार

एक परीक्षा होता है।


वे आगे बढ़े।


सड़क पर

ज़िंदगी चल रही थी।

कोई हँस रहा था,

कोई रो रहा था,

और अधिकतर

दोनों के बीच कहीं अटके हुए थे।


ईश्वर ने एक और दृश्य देखा।


एक महिला

सार्वजनिक नल के पास

पानी भर रही थी।

उसके हाथ तेज़ी से चल रहे थे,

पर आँखें

कहीं और थीं।


पानी गिरा,

हाथ काँपे,

और तभी

एक बूँद

उसकी आँख से टपकी।


वह जल्दी से

आँसू पोंछ लेती है।


किसी ने देखा नहीं।

किसी ने पूछा नहीं।


ईश्वर समझ गए—

मनुष्य रोता है,

पर दिखाता नहीं।


क्योंकि

आँसू यहाँ

कमज़ोरी माने जाते हैं।


उन्होंने एक बच्चा देखा

जो गिर गया था।

घुटना छिल गया था।


वह रोना चाहता था,

पर आस-पास के लोग

हँस रहे थे।


वह चुप हो गया।


ईश्वर ने महसूस किया—

मनुष्य को

बचपन से ही

चुप रहना सिखाया जाता है।


यही चुप्पी

बड़ी होकर

दुख बन जाती है।


ईश्वर आगे बढ़े।


एक अस्पताल के बाहर

लोग बैठे थे।


कोई डॉक्टर का इंतज़ार कर रहा था,

कोई किसी ख़बर का,

और कोई

किसी चमत्कार का।


वहाँ

कोई ज़ोर से नहीं रो रहा था।


पर हवा में

आँसू घुले हुए थे।


ईश्वर ने जाना—

सबसे भारी रोना

वह होता है

जो आवाज़ नहीं करता।


एक आदमी

दीवार से टेक लगाकर

बैठा था।


उसकी आँखें लाल थीं,

पर चेहरा

स्थिर।


ईश्वर उसके पास बैठे।


कोई बातचीत नहीं हुई।

कोई प्रश्न नहीं।


कुछ देर बाद

उस आदमी ने कहा—

“सब कहते हैं मजबूत बनो…

पर कोई यह नहीं पूछता

कि कितना मजबूत?”


ईश्वर ने

पहली बार

किसी मनुष्य के आँसू

अपने भीतर महसूस किए।


यह आँसू

गालों पर नहीं बहे थे,

यह सीधे

दिल से गिरे थे।


ईश्वर को समझ आया—

मनुष्य रोता नहीं,

वह भीगता है।


दुख उसे

धीरे-धीरे

भिगो देता है।


एक और दृश्य।


एक युवा लड़का

खिड़की के पास बैठा था।

उसके हाथ में

काग़ज़ का एक टुकड़ा था।


उस पर लिखा था—

“मैं कोशिश कर रहा हूँ।”


बस इतना ही।


ईश्वर ने जाना—

कभी-कभी

मनुष्य के पास

कहने के लिए

यही बचता है।


कोई बड़ी कहानी नहीं,

कोई शिकायत नहीं।


बस

एक स्वीकार।


ईश्वर ने स्वयं से पूछा—

“क्या मैंने मनुष्य को

इतना अकेला कर दिया?”


और उसी क्षण

उन्हें उत्तर मिला—

यह अकेलापन

उनकी बनाई सृष्टि का नहीं,

मनुष्य के

एक-दूसरे से दूर होने का परिणाम था।


मनुष्य

दुख से नहीं टूटता,

वह

अकेले दुख से टूटता है।


ईश्वर ने देखा—

आँसू

हर जगह थे।


कभी नौकरी के काग़ज़ों में,

कभी परीक्षा की कॉपी में,

कभी रिश्तों की चुप्पी में।


और सबसे ज़्यादा

रातों में।


जहाँ

कोई देखने वाला नहीं होता,

और मनुष्य

खुद से भी

नज़रें नहीं मिला पाता।


ईश्वर ने महसूस किया—

यह दुनिया

आँसुओं से बनी है,

पर उन्हें

सहेजना

किसी ने नहीं सीखा।


स्वर्ग में

आँसू नहीं होते।


इसलिए

यह पाठ

ईश्वर के लिए

सबसे कठिन था।


क्योंकि

हर आँसू

उन्हें थोड़ा-थोड़ा

मनुष्य बना रहा था।


और इसी एहसास के साथ

ईश्वर ने जाना—

अगर वे सच में

मनुष्य को समझना चाहते हैं,

तो उन्हें

इन आँसुओं से

मुँह नहीं मोड़ना होगा।


उन्हें

यहीं रुकना होगा।

यहीं बैठना होगा।

और चुपचाप

साथ देना होगा।

_________________________________________


अध्याय 7 : संघर्ष और संवेदनाएँ

संघर्ष हमेशा शोर नहीं करता।

कभी-कभी वह

सुबह की अलार्म घड़ी में छिपा होता है,

कभी अधूरी नींद में,

और कभी उस मुस्कान में

जो आदत बन चुकी होती है।


ईश्वर ने अब

दुख देख लिया था,

आँसू महसूस कर लिए थे।


अब वे

संघर्ष को

जीने वाले थे।


सुबह होते ही

लोग फिर चल पड़े।

कल की थकान

आज की ज़िम्मेदारी में बदल चुकी थी।


ईश्वर भी

उनके साथ चल रहे थे—

न कोई पहचान,

न कोई विशेष स्थान।


यही

मनुष्य की सबसे बड़ी सच्चाई थी—

सब एक जैसे चलते हैं,

पर सबका बोझ अलग होता है।


ईश्वर ने एक मज़दूर को देखा।

कंधे पर बोरी थी,

पसीना माथे से बह रहा था।


हर कदम के साथ

उसकी साँस

थोड़ी भारी हो रही थी।


कोई उसे नहीं देख रहा था।

सब उसे पार कर रहे थे।


ईश्वर ने महसूस किया—

मनुष्य का संघर्ष

अक्सर अदृश्य होता है।


जिसे दुनिया नहीं देखती,

वही सबसे ज़्यादा थकाता है।


एक महिला

दफ़्तर की सीढ़ियाँ चढ़ रही थी।

हाथ में फ़ाइलें,

दिमाग़ में घर की चिंता।


उसने सीढ़ियों पर

कुछ क्षण

दम लिया।


किसी ने नहीं पूछा—

“ठीक हो?”


क्योंकि

यहाँ हर कोई

अपने संघर्ष में

डूबा हुआ था।


ईश्वर ने समझा—

मनुष्य

दूसरे का दर्द नहीं देखता,

क्योंकि वह

खुद से ही

नज़र नहीं हटा पाता।


एक युवा

इंटरव्यू से बाहर निकला।

चेहरा शांत,

पर भीतर

टूटा हुआ।


फोन निकाला,

माँ का नंबर देखा,

फिर रख दिया।


ईश्वर ने देखा—

मनुष्य

अपनी असफलता

अपनों से भी

छुपा लेता है।


क्योंकि

वह उन्हें

दुख नहीं देना चाहता।


यही संवेदना

उसे और अकेला कर देती है।


ईश्वर अब

संघर्ष को

सिर्फ़ देख नहीं रहे थे—

वे उसे

अपने भीतर

उतार रहे थे।


थकान

अब केवल शरीर में नहीं,

मन में भी थी।


हर चेहरा

कुछ कह रहा था।


एक दुकानदार

पूरे दिन ग्राहकों से

बातें करता रहा,

पर शाम को

खुद से

कोई बात नहीं बची।


एक छात्र

किताबों में

डूबा रहा,

पर अपने सवालों से

बचता रहा।


ईश्वर ने जाना—

मनुष्य का संघर्ष

सिर्फ़ रोज़ी-रोटी का नहीं है,

यह

पहचान का भी है।


“मैं कौन हूँ?”

“क्या मैं काफ़ी हूँ?”

“क्या मेरा होना

किसी के लिए मायने रखता है?”


ये प्रश्न

हर संघर्ष के नीचे

चुपचाप बैठे रहते हैं।


ईश्वर ने पहली बार

स्वयं को

कमज़ोर महसूस किया।


यह कमज़ोरी

शक्ति की कमी नहीं थी,

यह

संवेदना की अधिकता थी।


दूसरों का दर्द

अब उन्हें

भारी लगने लगा था।


यही तो मनुष्य की दशा है—

वह

दूसरों का बोझ

अपने भीतर रख लेता है,

और फिर

खुद थक जाता है।


ईश्वर को

एक क्षण के लिए

रुकना पड़ा।


उन्होंने महसूस किया—

संघर्ष केवल सहने से नहीं,

समझने से हल्का होता है।


पर मनुष्य के पास

समझने का समय नहीं होता।


क्योंकि

उसे हर दिन

लड़ना होता है।


फिर भी

मनुष्य संवेदनशील रहता है।


एक छोटा-सा दृश्य

ईश्वर के भीतर उतर गया।


एक लड़का

अपने से छोटे भाई को

स्कूल छोड़ने आया था।

उसकी अपनी क्लास छूट रही थी।


वह मुस्कुरा रहा था।


ईश्वर ने जाना—

संघर्ष के बीच भी

मनुष्य

संवेदना नहीं छोड़ता।


यही उसे

अब तक

जीवित रखे हुए है।


ईश्वर ने समझा—

अगर संवेदना न होती,

तो संघर्ष

कब का

मनुष्य को तोड़ चुका होता।


संघर्ष और संवेदना

एक-दूसरे के

विरोधी नहीं हैं।


वे

एक-दूसरे के

सहारे हैं।


और इसी एहसास के साथ

ईश्वर ने स्वीकार किया—

मनुष्य कमजोर नहीं है,

वह

संवेदनशील है।


और यही संवेदनशीलता

उसका सबसे बड़ा संघर्ष भी है,

और

सबसे बड़ी शक्ति भी।

_________________________________________

अध्याय 8 : प्रश्न जो उत्तर बन गए


कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं

जो पूछे नहीं जाते,

बस

मन में पलते रहते हैं।


ईश्वर अब तक

मनुष्य का दुख,

उसके आँसू,

उसके संघर्ष

सब देख चुके थे।


पर सबसे गहरे

वे प्रश्न थे

जो किसी ने

कभी ज़ोर से नहीं पूछे।


ये प्रश्न

भीड़ में नहीं उठते,

ये

अकेलेपन में जन्म लेते हैं।


ईश्वर एक शाम

एक छोटे-से पार्क में बैठे थे।

सामने बच्चे खेल रहे थे,

पीछे कुछ लोग

थके क़दमों से लौट रहे थे।


सब कुछ सामान्य था।


और यही

मनुष्य के प्रश्नों की

सबसे बड़ी विशेषता है—

वे

सामान्य जीवन में ही

छिपे रहते हैं।


एक बुज़ुर्ग व्यक्ति

पास आकर बैठा।

कुछ देर चुप रहा।


फिर बोला—

“ज़िंदगी अगर इतनी मुश्किल थी,

तो क्या ज़रूरी था

कि इसे इतना लंबा बनाया जाए?”


यह प्रश्न

ईश्वर के भीतर

सीधे उतर गया।


यह शिकायत नहीं थी।

यह थकान थी।


ईश्वर के पास

कोई तैयार उत्तर नहीं था।


और पहली बार

उन्होंने

उत्तर न देना चुना।


क्योंकि

कभी-कभी

साथ बैठना

उत्तर से ज़्यादा

ज़रूरी होता है।


एक और प्रश्न

उन्हें मिला।


एक युवती

फोन पर किसी से कह रही थी—

“मैं ठीक हूँ।”


कॉल कटते ही

उसकी आँखें

भर आईं।


उसने मन में पूछा—

“अगर मैं सच कह दूँ,

तो क्या कोई रुक जाएगा?”


ईश्वर ने समझा—

मनुष्य का सबसे बड़ा प्रश्न

यह नहीं है

कि समाधान क्या है,

बल्कि यह है—

क्या कोई रहेगा?


एक छात्र

किताब बंद कर

खिड़की से बाहर देखने लगा।


उसके मन में

एक ही सवाल था—

“अगर मैं सफल नहीं हुआ,

तो क्या मैं असफल कहलाऊँगा?”


ईश्वर ने महसूस किया—

मनुष्य

खुद को

नतीजों में बाँध चुका है।


वह

अपने होने की कीमत

अंकों, पदों

और प्रशंसा में खोजता है।


यहीं से

अधिकतर दुख शुरू होता है।


ईश्वर के भीतर

प्रश्न उठने लगे।


“क्या मैंने मनुष्य को

बहुत ज़्यादा उम्मीदें दे दीं?”

“क्या मैंने उसे

कम होने की

इजाज़त नहीं दी?”


ये प्रश्न

अब केवल

मनुष्य के नहीं रहे थे।


ये

ईश्वर के अपने प्रश्न बन गए थे।


एक माँ

अपने बच्चे के लिए

खाना बनाते हुए

सोच रही थी—

“क्या मैं काफ़ी हूँ?”


ईश्वर ने देखा—

मनुष्य

दूसरों के लिए

सब कुछ बन जाता है,

पर

खुद के लिए

अक्सर

कुछ नहीं बचता।


यही प्रश्न

धीरे-धीरे

उत्तर बनने लगे।


उत्तर शब्दों में नहीं,

अनुभव में।


ईश्वर ने जाना—

मनुष्य को

हर प्रश्न का उत्तर नहीं चाहिए।


उसे यह जानना है

कि उसका प्रश्न

गलत नहीं है।


कि उसका थकना

अपराध नहीं है।

कि उसका रोना

कमज़ोरी नहीं है।


और यही स्वीकार

सबसे बड़ा उत्तर है।


ईश्वर ने महसूस किया—

जिन प्रश्नों का

कोई सीधा उत्तर नहीं,

वही

सबसे सच्चे होते हैं।


क्योंकि

वे मनुष्य को

अपने भीतर

झाँकने पर मजबूर करते हैं।


एक आदमी

अकेले बैठे-बैठे

आकाश देख रहा था।


उसने धीमे से कहा—

“अगर कोई ऊपर है,

तो क्या वह

हमारा इंतज़ार करता है?”


ईश्वर ने उस क्षण

कोई चमत्कार नहीं किया।

कोई संकेत नहीं दिया।


बस

उसके पास

थोड़ी देर

बैठे रहे।


और यही

उत्तर बन गया।


ईश्वर ने समझा—

उत्तर

ऊपर से नहीं गिरते।

वे

साथ बैठने से

जन्म लेते हैं।


अब प्रश्न

उन्हें डराने नहीं लगे थे।


क्योंकि

हर प्रश्न

उन्हें मनुष्य के

और क़रीब ला रहा था।


और इसी क़रीबी में

ईश्वर ने जाना—

मनुष्य का सच

उत्तर में नहीं,

संबंध में है।________________________________________

अध्याय 9 : करुणा का साक्षात्कार

करुणा कोई भावना नहीं है।

यह वह क्षण है

जब किसी और का दर्द

अपना लगने लगता है।


ईश्वर अब तक

मनुष्य को देख चुके थे,

सुन चुके थे,

समझ चुके थे।


पर अब

वे एक ऐसे मोड़ पर थे

जहाँ समझ

पर्याप्त नहीं थी।


यहाँ

अनुभव

पूरी तरह उतर चुका था।


एक दिन

ईश्वर एक छोटे से कमरे में पहुँचे।

कमरा साधारण था—

दीवारों पर दरारें,

एक कोने में पुरानी कुर्सी।


वहाँ एक व्यक्ति बैठा था।

न रो रहा था,

न बोल रहा था।


बस

बैठा था।


उसकी आँखों में

वह थकान थी

जो शब्दों से

परे होती है।


ईश्वर उसके सामने बैठे।

कोई परिचय नहीं,

कोई प्रश्न नहीं।


कुछ देर बाद

उस व्यक्ति ने कहा—

“मुझे समझाने की कोशिश मत करना।”


ईश्वर ने

कोई उत्तर नहीं दिया।


क्योंकि

वे अब जानते थे—

कभी-कभी

समझाना

दर्द को और गहरा कर देता है।


वह व्यक्ति बोला—

“सब कहते हैं

सब ठीक हो जाएगा…

पर कोई यह नहीं बताता

कि तब तक कैसे जिया जाए।”


यह वाक्य

ईश्वर के भीतर

स्थिर हो गया।


यही वह जगह थी

जहाँ करुणा

पूरा रूप लेती है।


करुणा

किसी को खींचकर

उठाने का नाम नहीं है।


करुणा

किसी के पास

बैठ जाने का साहस है।


ईश्वर ने महसूस किया—

मनुष्य को

मजबूत बनाने की

ज़रूरत नहीं।


उसे

कमज़ोर होने की

इजाज़त चाहिए।


एक और दृश्य

उनके सामने आया।


एक माँ

अपने बीमार बच्चे को

गोद में लिए बैठी थी।


डॉक्टर बाहर गया हुआ था।

कमरे में

बस साँसों की आवाज़ थी।


माँ की आँखों में

डर था,

पर चेहरा

शांत।


ईश्वर ने महसूस किया—

करुणा

कभी-कभी

डर के साथ

शांत रहना होती है।


माँ ने धीमे से कहा—

“भगवान,

मुझे ताक़त मत देना…

बस मुझे टूटने मत देना।”


यह प्रार्थना

ईश्वर के लिए

सबसे सच्ची थी।


क्योंकि

यह शक्ति की माँग नहीं थी,

यह साथ की माँग थी।


ईश्वर ने समझा—

करुणा का अर्थ

दर्द को खत्म करना नहीं है।


दर्द के साथ

मानव बने रहना

ही करुणा है।


एक वृद्ध

अपने जीवन के अंतिम दिनों में

अकेला बैठा था।


लोग आ चुके थे,

मिल चुके थे,

फिर चले गए थे।


अब कमरे में

बस चुप्पी थी।


ईश्वर उसके पास बैठे।


वृद्ध ने पूछा—

“क्या मैंने ठीक से जिया?”


यह प्रश्न

किसी लेखे-जोखे का नहीं था।

यह

स्वीकृति का था।


ईश्वर ने कहा—

“आपने महसूस किया,

यही काफ़ी है।”


वृद्ध की आँखें

भीग गईं।


यह

करुणा का साक्षात्कार था।


जब

एक वाक्य

किसी जीवन को

हल्का कर दे।


ईश्वर ने जाना—

करुणा

बड़ी बातों में नहीं होती।


वह

छोटे क्षणों में रहती है।


एक हाथ थामने में।

एक चुप्पी साझा करने में।

एक बिना शर्त

सुन लेने में।


अब ईश्वर

चमत्कार नहीं करना चाहते थे।


क्योंकि

करुणा

सबसे बड़ा चमत्कार है।


यह वह शक्ति है

जो बिना बदले

सब बदल देती है।


और उस दिन

ईश्वर ने महसूस किया—

वे मनुष्य को

सिखाने नहीं आए थे।


वे

उसके साथ बैठने

आए थे।


अध्याय 9 यहीं समाप्त होता है—

जहाँ ईश्वर

करुणा को

देखते नहीं,

जीते हैं।

_________________________________________________

अध्याय 10 : मनुष्य को समझने वाला ईश्वर


अब कोई प्रश्न शेष नहीं था।

कम से कम

वैसे प्रश्न नहीं,

जिनका उत्तर

शब्दों में दिया जा सके।


ईश्वर बहुत कुछ देख चुके थे।

बहुत कुछ सह चुके थे।

और सबसे महत्वपूर्ण—

बहुत कुछ महसूस कर चुके थे।


अब वे जानते थे

कि मनुष्य का दुख

किसी एक कारण से नहीं होता।

यह छोटे-छोटे क्षणों में

इकट्ठा होता है—

अनसुनी बातों में,

अधूरी उम्मीदों में,

और अकेली रातों में।


ईश्वर अब

मनुष्य को ऊपर से नहीं देख रहे थे।

वे

उसके बराबर बैठ चुके थे।


एक साधारण शाम थी।

सूरज ढल रहा था।

लोग अपने-अपने घर लौट रहे थे।


ईश्वर भी

चल रहे थे।


अब उनके कदमों में

संकोच नहीं था।

थकान थी,

पर स्वीकार भी था।


उन्होंने महसूस किया—

मनुष्य दुखी होने के बावजूद

जीवन से भागता नहीं है।


वह

हर सुबह उठता है,

हर दिन निभाता है,

और हर रात

खुद को समझाने की

एक और कोशिश करता है।


यही

उसकी सबसे बड़ी बहादुरी है।


ईश्वर ने सोचा—

“मनुष्य कमजोर नहीं है।”

“वह बस

हर दिन

अपने भीतर की लड़ाई

लड़ता है।”


एक छोटा-सा दृश्य

उनके सामने आया।


एक आदमी

दिन भर की थकान के बाद

अपने बच्चे के साथ

ज़मीन पर बैठा खेल रहा था।


उसकी हँसी

पूरी तरह सच्ची थी।


ईश्वर ने समझा—

मनुष्य

दुख में भी

खुशी निकाल लेता है।


यह कोई साधारण क्षमता नहीं है।

यह

जीवन से प्रेम है।


ईश्वर ने देखा—

लोग गिरते हैं,

टूटते हैं,

पर फिर भी

किसी न किसी तरह

एक-दूसरे का हाथ

थाम लेते हैं।


और जहाँ

हाथ थामे जाते हैं,

वहीं

जीवन चलता है।


अब ईश्वर को

कोई स्पष्टीकरण नहीं चाहिए था।


क्योंकि

उन्होंने उत्तर पा लिया था।


मनुष्य दुखी इसलिए नहीं है

कि जीवन कठिन है।

वह दुखी है

क्योंकि वह

महसूस करता है।


और जो महसूस करता है,

वही

सच में

जीवित होता है।


ईश्वर ने स्वीकार किया—

मनुष्य का दुख

कमज़ोरी नहीं है।

यह

उसकी गहराई का प्रमाण है।


यदि मनुष्य न रोता,

तो वह पत्थर होता।

यदि वह न थकता,

तो वह मशीन होता।


पर वह

मनुष्य है।


और यही

उसका सबसे बड़ा सत्य है।


ईश्वर ने जाना—

मनुष्य को बदले जाने की

ज़रूरत नहीं है।


उसे

समझे जाने की

ज़रूरत है।


और जब कोई

उसे समझ लेता है,

तो आधा दुख

वहीं समाप्त हो जाता है।


अब ईश्वर

लौटने की तैयारी में नहीं थे।

क्योंकि

वे कहीं गए ही नहीं थे।


वे

हर उस जगह थे

जहाँ कोई

बिना बोले

कुछ कह रहा था।


हर उस चुप्पी में,

हर उस आँसू में,

हर उस साँस में

जो भारी होकर भी

चल रही थी।


ईश्वर अब

सिंहासन पर नहीं थे।

वे

मनुष्य के पास थे।


और यही

इस यात्रा का

अंत नहीं,

सार्थकता थी।


ईश्वर ने

मनुष्य को समझ लिया था।


और शायद

यही

मनुष्य के लिए

पर्याप्त था।

_________________________________________


योगेश सारस्वत, जयपुर राजस्थान


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𝐒𝐦𝐚𝐥𝐥 𝐏𝐚𝐠𝐞𝐬, 𝐁𝐢𝐠 𝐓𝐡𝐨𝐮𝐠𝐡𝐭𝐬.

𝑀𝒶𝓃𝒾 𝐸-𝐵𝑜𝑜𝓀 𝒾𝓈 𝒶𝓃 𝑜𝓃𝓁𝒾𝓃𝑒 𝓅𝓁𝒶𝓉𝒻𝑜𝓇𝓂 𝒻𝑜𝓇 𝓇𝑒𝒶𝒹𝒾𝓃𝑔 𝓈𝒽𝑜𝓇𝓉, 𝓂𝑒𝒶𝓃𝒾𝓃𝓰𝒻𝓊𝓁 𝒷𝑜𝑜𝓀𝓈 𝒾𝓃 𝓉𝑒𝓍𝓉 𝒻𝑜𝓇𝓂. 𝐼𝓉 𝓈𝒽𝒶𝓇𝑒𝓈 𝓈𝒾𝓂𝓅𝓁𝑒 𝓉𝒽𝑜𝓊𝑔𝒽𝓉𝓈, 𝓈𝓉𝑜𝓇𝒾𝑒𝓈, 𝒶𝓃𝒹 𝑒𝓂𝑜𝓉𝒾𝑜𝓃𝓈 𝓌𝓇𝒾𝓉𝓉𝑒𝓃 𝒷𝓎 𝑀𝒶𝓃𝒾𝓈𝒽 𝒞𝒽𝒶𝓊𝒹𝒽𝒶𝓇𝓎 𝒶𝓃𝒹 𝒾𝓃𝒹𝑒𝓅𝑒𝓃𝒹𝑒𝓃𝓉 𝓌𝓇𝒾𝓉𝑒𝓇𝓈. 𝑅𝑒𝒶𝒹 𝑜𝓃𝓁𝓎 𝒾𝒻 𝓎𝑜𝓊 𝒻𝑒𝑒𝓁 𝓁𝒾𝓀𝑒—𝓃𝑜 𝓅𝓇𝑒𝓈𝓈𝓊𝓇𝑒, 𝒿𝓊𝓈𝓉 𝓌𝑜𝓇𝒹𝓈.

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