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लाल बर्फ़ की रात

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परिचय

इस कहानी का नाम “लाल बर्फ़ की रात” है। यह किसी सामान्य क्रिसमस की दावत की कहानी नहीं है, बल्कि उस डरावनी रात की कहानी है जब हवेली की दीवारें, दरवाज़े और खिड़कियाँ अपने आप बंद हो गईं, और एक रहस्यमयी सैंटा क्लॉज़ ने उन सबको घेर लिया जो रोमियो डिसूज़ा की पार्टी में शामिल थे।


यह कहानी डर, सस्पेंस और रहस्य से भरी हुई है। इसमें न केवल रोमियो और उसके मेहमानों की कोशिशें दिखाई गई हैं, बल्कि यह भी दिखाया गया है कि कैसे हवेली अपने नियमों के अनुसार शिकार को नियंत्रित करती है। हर अध्याय आपको रोमांच और भय का मिश्रण देगा, और अंत तक आपको यह जानने की उत्कंठा बनी रहेगी कि आखिर क्या हुआ।


“लाल बर्फ़ की रात” सिर्फ़ डरावनी कहानी नहीं है—यह एक ऐसी रात की गाथा है जो आपको हिला कर रख देगी, आपकी कल्पना को चुनौती देगी और हर पल आपके दिल की धड़कन तेज़ कर देगी।


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लेखक 

एंथनी डिसूज़ा एक कहानीकार हैं जो रहस्य, सस्पेंस और डरावनी कथाओं में विशेष रुचि रखते हैं। उनकी रचनाएँ पाठकों को कल्पना की सीमाओं के परे ले जाती हैं और हर कहानी में भावनाओं और रोमांच का अनूठा मिश्रण प्रस्तुत करती हैं।


वे मानते हैं कि एक अच्छी कहानी सिर्फ़ मनोरंजन नहीं करती, बल्कि पाठक के भीतर की भावनाओं, डर और जिज्ञासा को भी जागृत करती है। “लाल बर्फ़ की रात” उनके डरावने और रहस्यमय अंदाज की एक और मिसाल है, जिसमें उन्होंने भय और सस्पेंस के तत्वों को बेहद जीवंत तरीके से पेश किया है।


एंथनी की लेखन शैली में पाठक को कहानी के हर मोड़ पर जोड़कर रखने की कला है। उनका उद्देश्य सिर्फ़ कहानी सुनाना नहीं, बल्कि पाठक को कहानी के भीतर महसूस कराना है—जहाँ हर धड़कन, हर चीख़ और हर दृश्य सीधे उनके मन पर असर डालती है।


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अध्याय 1: क्रिसमस की वह दावत, जहाँ मौत आमंत्रित थी


क्रिसमस की उस रात हवेली किसी सपने की तरह जगमगा रही थी। गोवा के समुद्र से कुछ ही दूरी पर, ऊँचे ताड़ के पेड़ों के बीच खड़ी रोमियो डिसूज़ा की पुरानी पुर्तगाली हवेली को हज़ारों पीली रोशनियों से सजाया गया था। बाहर से देखने पर वह जगह किसी उत्सव का स्वर्ग लग रही थी—लाल-सफेद झालरें, बड़े-बड़े सितारे, मोमबत्तियों की कतारें, और दरवाज़े पर खड़ा छह फुट ऊँचा सैंटा क्लॉज़, जिसकी मुस्कान कुछ ज़्यादा ही स्थिर और ठंडी लग रही थी। उस मुस्कान में गर्मजोशी नहीं थी, बस एक अजीब-सी कठोरता थी—जैसे पत्थर पर उकेरी गई हँसी।


रोमियो डिसूज़ा इस हवेली का मालिक था। शहर में उसका नाम धन, शान और रहस्यों के लिए जाना जाता था। व्यापार में तेज़, बातों में मीठा, और आँखों में एक स्थायी आत्मविश्वास—रोमियो ने अपने जीवन में सब कुछ हासिल कर लिया था। वह हर साल क्रिसमस पर एक भव्य पार्टी देता, लेकिन इस बार कुछ अलग था। इस बार उसने सिर्फ़ अपने दोस्तों या रिश्तेदारों को नहीं, बल्कि पड़ोसियों, पुराने जान-पहचान वालों, और यहाँ तक कि कुछ ऐसे चेहरों को भी बुलाया था जिन्हें उसने सालों से नहीं देखा था। आमंत्रण पत्र पर एक ही पंक्ति लिखी थी—

“क्रिसमस की रात, मेरी हवेली में—जहाँ खुशियाँ हमेशा के लिए क़ैद होंगी।”


शाम ढलते ही मेहमान आने लगे। महँगे कोट, चमकदार गाउन, शराब की खुशबू, और हँसी की आवाज़ें हवेली के बाहर जमा होने लगीं। गेट के पास खड़े सुरक्षा गार्ड मुस्कुराते हुए सबका स्वागत कर रहे थे। जैसे ही कोई भीतर प्रवेश करता, उसे लगता कि वह किसी और ही दुनिया में कदम रख रहा है—अंदर की हवा में दालचीनी और वाइन की मिली-जुली खुशबू थी, दीवारों पर टंगी पुरानी पेंटिंग्स मानो आगंतुकों को घूर रही हों, और छत से लटकते क्रिस्टल झूमर रोशनी को ऐसे तोड़-मरोड़ रहे थे जैसे हर कोने में अलग-अलग परछाइयाँ जन्म ले रही हों।


रोमियो खुद मुख्य हॉल में खड़ा था। हाथ में वाइन का गिलास, चेहरे पर मेज़बान वाली मुस्कान। वह हर आने वाले से गले मिलता, कंधे पर हाथ रखता, और कुछ शब्द कहता—शब्द जो बाहर से दोस्ताना लगते थे, लेकिन जिनके भीतर कोई अजीब-सी जल्दबाज़ी छुपी थी। मानो वह चाहता हो कि सभी जल्द से जल्द अंदर आ जाएँ।


हॉल के बीचों-बीच एक विशाल क्रिसमस ट्री खड़ा था, जिसकी ऊँचाई लगभग छत तक पहुँचती थी। उसकी शाखाओं पर लाल गेंदें, चाँदी की घंटियाँ, और छोटे-छोटे उपहार लटक रहे थे। लेकिन उन उपहारों की पैकिंग कुछ अलग थी—काग़ज़ पर अजीब-से निशान बने थे, जैसे किसी ने जानबूझकर नुकीले औज़ार से खरोंचें डाली हों। पास से देखने पर लगता कि वे सजावट नहीं, बल्कि चेतावनी हैं।


मेहमानों में हँसी-मज़ाक चल रहा था। बच्चे दौड़ रहे थे, बुज़ुर्ग कोने में बैठकर बातें कर रहे थे, और युवा शराब के गिलास टकरा रहे थे। संगीत धीमा था—पुराने क्रिसमस कैरोल्स—लेकिन उनकी मधुरता में भी एक ठंडक घुली हुई थी। किसी ने नोटिस नहीं किया कि जैसे-जैसे रात गहराती जा रही थी, हवेली के भीतर मोबाइल नेटवर्क कमज़ोर होता जा रहा था। कॉल्स ड्रॉप हो रही थीं, संदेश भेजे नहीं जा पा रहे थे, और वाई-फाई का नामोनिशान नहीं था।


एक मेहमान, जो रोमियो का दूर का रिश्तेदार था, ने मज़ाक में कहा, “लगता है यहाँ नेटवर्क भी छुट्टी पर चला गया है।”

सब हँस पड़े। कोई नहीं जानता था कि यह हँसी आख़िरी सामूहिक हँसी होगी।


करीब नौ बजे, जैसे ही सभी मेहमान अंदर आ चुके, हवेली का मुख्य दरवाज़ा अपने आप धीरे-धीरे बंद होने लगा। भारी लकड़ी का वह दरवाज़ा चरमराया, जैसे किसी ने जानबूझकर उसे बंद करने का आदेश दिया हो। किसी ने ध्यान नहीं दिया। सब पार्टी में डूबे थे। लेकिन कुछ ही सेकंड बाद, क्लिक की एक तेज़ आवाज़ आई—लॉक लगने की आवाज़।


खिड़कियाँ भी एक-एक करके बंद होने लगीं। मोटे काँच के पैनल स्लाइड होकर अपनी जगह बैठ गए, और उनके पीछे लगे लोहे के फ्रेम अपने आप खिंचकर जकड़ गए। हवा का बहाव रुक गया। मोमबत्तियों की लौ एक पल को काँपी, फिर स्थिर हो गई।


रोमियो ने मंच की ओर बढ़ते हुए गिलास उठाया।

“दोस्तों!” उसने ऊँची आवाज़ में कहा। “यह रात खुशियों की है, साथ की है। आज कोई बाहर नहीं जाएगा—क्योंकि असली जश्न अभी शुरू होना बाकी है।”


कुछ लोगों ने तालियाँ बजाईं। कुछ ने उसकी बात को हल्के मज़ाक की तरह लिया। किसी को अंदाज़ा नहीं था कि उसके शब्दों में छुपा अर्थ क्या है।


तभी बिजली की लाइट एक पल के लिए झपकी। पूरा हॉल अंधेरे में डूब गया। अगले ही पल जनरेटर की रोशनी जल उठी, लेकिन वह रोशनी पहले जैसी नहीं थी—पीली नहीं, बल्कि हल्की लाल-सी। जैसे किसी ने बल्बों पर खून की परत चढ़ा दी हो।


भीड़ में बेचैनी की हल्की-सी लहर दौड़ी। किसी बच्चे ने रोना शुरू किया। उसकी माँ ने उसे चुप कराया, यह सोचकर कि शायद वह डर गया है। संगीत फिर से बजने लगा, लेकिन उसकी धुन अब पहले से धीमी और खिंची हुई थी।


और तभी—पहली चीख़।


वह चीख़ इतनी तेज़ नहीं थी कि पूरी हवेली हिल जाए, लेकिन इतनी डरावनी थी कि जिसने सुनी, उसकी रीढ़ में ठंड उतर गई। आवाज़ ऊपर की मंज़िल से आई थी। कुछ लोग सीढ़ियों की ओर दौड़े। रोमियो ने हाथ उठाकर उन्हें रोका।

“शायद किसी ने मज़ाक किया होगा,” उसने कहा, लेकिन उसके चेहरे पर पहली बार एक हल्की-सी दरार दिखी।


सीढ़ियों के पास खड़ा वह विशाल सैंटा क्लॉज़—जो अब तक बस एक सजावट लग रहा था—धीरे-धीरे हिला। किसी ने नोटिस नहीं किया। उसकी लाल पोशाक की सिलवटें जैसे खुद-ब-खुद बदल रही थीं। उसके दस्तानों पर कुछ गीला-सा चमका, जो पहले वहाँ नहीं था।


ऊपर से किसी भारी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई। फिर सन्नाटा।


एक युवक, हिम्मत करके, सीढ़ियाँ चढ़ा। कुछ सेकंड बाद उसकी साँसों की आवाज़ नीचे तक सुनाई देने लगी—तेज़, बेतरतीब। फिर वह नीचे भागता हुआ आया। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ चुका था।

“वहाँ… वहाँ कोई है,” वह बुदबुदाया, “वह… वह सैंटा—”


उससे पहले कि वह अपनी बात पूरी कर पाता, पीछे से एक भारी कदमों की आवाज़ आई। धप… धप… हर कदम के साथ फ़र्श काँप रहा था।


लोगों ने मुड़कर देखा।


वह सैंटा अब सजावट नहीं था। वह चलता-फिरता, साँस लेता, और—मुस्कुराता हुआ—हॉल के बीच खड़ा था। उसकी आँखें असामान्य रूप से बड़ी थीं, और उनमें लालिमा तैर रही थी। उसकी दाढ़ी के नीचे से कुछ टपक रहा था—खून। उसके हाथों में एक बड़ा, चमकता हुआ ब्लेड था, जिस पर रोशनी पड़ते ही लाल छींटे चमक उठे।


एक पल के लिए सब जम गए। जैसे समय रुक गया हो।


फिर वह सैंटा हँसा।


वह हँसी किसी इंसान की नहीं थी। वह गहरी, खुरदरी, और ऐसी थी जैसे किसी बंद कमरे में दीवारों से टकराकर वापस आ रही हो। उसी हँसी के साथ उसने पहला हमला किया।


चीखें गूँज उठीं। लोग भागने लगे। कोई दरवाज़े की ओर दौड़ा, लेकिन दरवाज़ा टस से मस नहीं हुआ। किसी ने खिड़की पर मुक्का मारा—काँच नहीं टूटा। किसी ने कुर्सी उठाकर मारी—बस एक खोखली आवाज़ आई, जैसे उसने किसी ठोस चट्टान पर वार किया हो।


खून की पहली धार फ़र्श पर गिरी। लाल रंग, जो क्रिसमस की सजावट में खूबसूरत लगता था, अब ज़िंदगी को सोख रहा था।


रोमियो डिसूज़ा पीछे हटता गया। उसका गिलास हाथ से गिरकर टूट गया। शराब और खून मिलकर फ़र्श पर फैल गए। उसने अपनी हवेली को देखा—वह जगह जिसे उसने शक्ति और गर्व का प्रतीक बनाया था—अब एक क़ैदख़ाना बन चुकी थी।


सैंटा धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। हर कदम के साथ उसकी आँखें और चमकती जा रही थीं।

“क्रिसमस की शुभकामनाएँ,” उसने भारी आवाज़ में कहा।


और उसी पल रोमियो को समझ आ गया—यह कोई पार्टी नहीं थी। यह एक बुलावा था।

एक ऐसी रात के लिए, जहाँ मौत ही मेज़बान थी।


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अध्याय 2: हवेली का मुस्कुराता दरवाज़ा और बंद होती क़िस्मतें


पहली लाश ज़मीन पर गिरते ही हवेली की आत्मा बदल गई। जो जगह कुछ मिनट पहले तक हँसी, संगीत और जश्न से भरी थी, वही अब चीख़ों, दौड़ते क़दमों और मौत की गंध से भर चुकी थी। लाल कालीन पर गिरा खून किसी सजावट की तरह फैल रहा था, जैसे हवेली उसे पीकर और भूखी हो गई हो।


लोगों की भीड़ बिखर चुकी थी। कोई अपने परिवार को खोज रहा था, कोई कोनों में छिपने की कोशिश कर रहा था, तो कोई पूरी ताक़त से मुख्य दरवाज़े को धक्का दे रहा था। भारी लकड़ी का वह दरवाज़ा, जो हमेशा मेहमानों का स्वागत करता था, अब अजीब-सी मुस्कान लिए खड़ा था—निर्दयी, अडिग। उसके ऊपर उकेरी गई पुरानी नक्काशी, जो पहले सिर्फ़ कला लगती थी, अब दाँतों जैसी दिख रही थी, मानो वह सबको निगलने के लिए तैयार हो।


“खोलो इसे!”

एक आदमी ने चिल्लाते हुए दरवाज़े पर मुक्के मारे। उसकी उँगलियाँ लाल हो गईं, लेकिन दरवाज़े पर एक खरोंच तक नहीं आई। जैसे वह लकड़ी नहीं, किसी और ही दुनिया की दीवार हो।


कुछ लोग खिड़कियों की ओर भागे। मोटे काँच के पीछे बाहर की दुनिया दिख रही थी—बर्फ़ की हल्की परत, दूर जलती स्ट्रीट लाइट्स, और शांति। बस कुछ कदमों की दूरी पर आज़ादी थी, लेकिन काँच अडिग था। एक महिला ने पास पड़ी कुर्सी उठाकर पूरी ताक़त से काँच पर मारी। ठक!

आवाज़ तो आई, लेकिन काँच ने ज़रा-सी भी दरार नहीं दिखाई। उल्टा कुर्सी के टुकड़े बिखर गए।


हॉल के बीचों-बीच वह सैंटा खड़ा था। उसने हमला रोक दिया था, जैसे शिकारी अपने शिकार को डरते हुए देखने का मज़ा ले रहा हो। उसकी आँखें हर भागते इंसान को गिन रही थीं। उसकी छाती ऊपर-नीचे हो रही थी, और हर साँस के साथ दाढ़ी में फँसा खून टपक रहा था।


रोमियो डिसूज़ा एक खंभे के पीछे खड़ा यह सब देख रहा था। उसका दिमाग़ तेज़ी से काम कर रहा था, लेकिन डर हर सोच को कुचल रहा था। यह मेरी हवेली है, उसके मन में आवाज़ आई, यहाँ ऐसा कैसे हो सकता है?

उसने एक पल के लिए सोचा कि शायद यह कोई बीमार मज़ाक है, कोई डरावना खेल। लेकिन फ़र्श पर पड़ी लाशें, और हवा में तैरती लोहे जैसी गंध, हर भ्रम को तोड़ रही थीं।


अचानक, हवेली के भीतर लगे सारे दरवाज़े एक साथ बंद हो गए। धड़ाम! धड़ाम!

हर कमरे, हर गलियारे से एक ही आवाज़ आई, जैसे पूरी इमारत ने एक साथ साँस ली हो और फिर रोक ली हो। लोग जो भागकर अलग-अलग कमरों में छिपने की कोशिश कर रहे थे, वे अब और भी बुरी तरह फँस गए थे।


ऊपर की मंज़िल से फिर एक चीख़ आई—इस बार लंबी, कर्कश, और दर्द से भरी। कुछ ही सेकंड बाद वह अचानक रुक गई। सन्नाटा छा गया। वह सन्नाटा इतना भारी था कि दिल की धड़कनें कानों में गूँजने लगीं।


“कोई है… जो मदद कर सके?”

एक बूढ़े आदमी की काँपती आवाज़ हॉल में गूँजी। जवाब में बस सैंटा की धीमी हँसी आई।


सैंटा ने चलना शुरू किया। वह तेज़ नहीं था, लेकिन उसके कदमों में अजीब-सी निश्चितता थी। जैसे उसे पता हो कि कोई भी भाग नहीं सकता। उसके पीछे खून के निशान बनते जा रहे थे—लाल बर्फ़ की तरह, जो क्रिसमस की रात में नहीं, किसी अभिशाप में गिरती है।


कुछ लोग एक साथ उस पर झपट पड़े। डर ने उन्हें पागल बना दिया था। किसी ने बोतल से मारा, किसी ने लकड़ी का टुकड़ा उठाया। एक पल के लिए लगा कि शायद वे उसे रोक लेंगे। लेकिन सैंटा ने बस हाथ उठाया—और अगले ही पल दो शरीर ज़मीन पर गिरे पड़े थे। उसकी ताक़त इंसानी नहीं थी। उसकी हर हरकत में क्रूरता के साथ एक भयावह सटीकता थी।


रोमियो पीछे हटते-हटते दीवार से जा लगा। दीवार पर टंगी एक पुरानी तस्वीर उसके कंधे से टकराकर गिर पड़ी। तस्वीर में वही हवेली थी—सालों पहले की, जब वह सुनसान थी। रोमियो ने उसे खरीदा था, तब लोगों ने कहा था कि यह जगह मनहूस है। उसने हँसकर उन बातों को नज़रअंदाज़ कर दिया था।

अब वही हँसी उसे चुभ रही थी।


उसने जेब से मोबाइल निकाला। स्क्रीन जली, लेकिन नेटवर्क नहीं। उसने बार-बार कॉल मिलाने की कोशिश की—पुलिस, सुरक्षा, कोई भी। हर बार वही सन्नाटा। जैसे यह हवेली बाहरी दुनिया से पूरी तरह कट चुकी हो।


एक और हमला हुआ। इस बार सैंटा ने किसी को खींचकर अपने पास किया। उसकी चीख़ें कुछ सेकंड तक गूँजती रहीं, फिर खामोशी में डूब गईं। लोग अब चीख़ भी नहीं पा रहे थे। डर ने उनकी आवाज़ें छीन ली थीं।


हॉल की रोशनी और भी मंद हो गई। लाल रंग गहरा होता जा रहा था। छायाएँ दीवारों पर नाचने लगीं—ऐसी छायाएँ जिनका कोई स्रोत नहीं था। कुछ लोगों को लगा कि वे छायाएँ उनके पीछे चल रही हैं, उनकी नकल कर रही हैं।


रोमियो ने देखा कि सैंटा की नज़र अब उस पर टिक गई है। एक पल के लिए दोनों की आँखें मिलीं। उस नज़र में पहचान थी। जैसे वह जानता हो कि यह हवेली किसकी है।

सैंटा ने धीरे से सिर झुकाया—एक नकली, भयावह अभिवादन।


रोमियो का दिल बैठ गया।

यह मुझे छोड़ने नहीं वाला, उसने सोचा।


उसने आख़िरी बार दरवाज़े की ओर देखा। वही दरवाज़ा, जो कभी उसकी शान था, अब उसकी क़ब्र का मुँह बन चुका था। बाहर की दुनिया बस कुछ इंच दूर थी, लेकिन भीतर फँसे लोगों की क़िस्मतें एक-एक करके बंद हो रही थीं—ठीक उसी दरवाज़े की तरह।


हवेली ने एक बार फिर सन्नाटा ओढ़ लिया।

और सैंटा की हँसी उस सन्नाटे में गूँजती रही।

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अध्याय 3: जब खिड़कियाँ साँस लेना भूल गईं


हवेली के भीतर हवा अब भारी हो चुकी थी। वह सिर्फ़ डर से नहीं, बल्कि किसी अनदेखे दबाव से भरी थी—जैसे दीवारें धीरे-धीरे सिकुड़ रही हों और भीतर मौजूद हर इंसान की साँसें गिन रही हों। खिड़कियाँ बंद थीं, लेकिन उससे ज़्यादा भयानक बात यह थी कि वे ज़िंदा लगने लगी थीं। उनके काँच पर जमी बर्फ़ की पतली परत अब धुंधली नहीं, बल्कि साँसों की भाप से भीग रही थी—मानो कोई बाहर खड़ा होकर अंदर झाँक रहा हो।


हॉल में बचे लोग अब इधर-उधर भागना छोड़ चुके थे। डर ने उन्हें थका दिया था। कुछ ज़मीन पर बैठ गए थे, सिर घुटनों में छुपाए हुए। कुछ दीवारों से चिपके खड़े थे, जैसे पत्थर बन जाना ही बचने का आख़िरी तरीका हो। हर किसी की नज़र खिड़कियों पर थी—वही आख़िरी उम्मीद।


एक युवक ने धीरे-धीरे आगे बढ़कर खिड़की पर हाथ रखा। काँच ठंडा नहीं था, बल्कि अजीब तरह से गरम। उसने जैसे ही ज़ोर लगाया, उसकी हथेली फिसल गई—काँच पर पसीने जैसे निशान उभर आए।

“यह… यह साँस ले रही है,” वह फुसफुसाया।


पास खड़ी एक महिला ने उसकी बात सुनी और घबराकर पीछे हट गई। “पागल मत बनो,” उसने कहा, लेकिन उसकी आवाज़ में खुद भरोसा नहीं था। अगले ही पल उसने खुद काँच पर ध्यान दिया—और उसकी आँखें फैल गईं। काँच के भीतर, बहुत हल्के से, धुंधली-सी हलचल थी। जैसे कोई चीज़ अंदर से बाहर आने की कोशिश कर रही हो।


ऊपर की मंज़िल से कदमों की आवाज़ आई। धीमी, भारी, और जानबूझकर ली गई। लोग समझ गए—सैंटा फिर चल पड़ा है। उसकी हर चाल हवेली में गूँज रही थी, जैसे फर्श उसकी सेवा में हो। कुछ लोग एक छोटे से कमरे में घुस गए और दरवाज़ा बंद करने की कोशिश की। लेकिन दरवाज़ा बंद होते ही क्लिक की आवाज़ आई—वह भी बाहर से।


कमरे के भीतर अँधेरा था। एक छोटी-सी खिड़की थी, जिस पर मोटे पर्दे लटके थे। एक आदमी ने काँपते हाथों से पर्दा हटाया। बाहर वही दुनिया थी—सड़क, बर्फ़, लाइट। उसने राहत की साँस ली और काँच पर मुक्का मारा।

धप!

उसके हाथ में तेज़ दर्द उठा। काँच नहीं टूटा। उल्टा, काँच के भीतर से एक हल्की-सी कंपन उसके हाथ में उतर गई—जैसे किसी ने उसकी हड्डियों को छू लिया हो।


“मदद करो!”

उसने बाहर की ओर चिल्लाया। उसकी आवाज़ खिड़की से टकराकर वापस कमरे में लौट आई—बिल्कुल साफ़, बिल्कुल अकेली। बाहर कुछ नहीं गया।


हॉल में, रोमियो डिसूज़ा अब पूरी तरह अकेला महसूस कर रहा था, भले ही आसपास लोग थे। उसे लग रहा था कि हवेली उसे पहचानती है। हर दीवार, हर खिड़की, हर दरवाज़ा—सब उसके फैसलों का हिसाब माँग रहे थे। उसने फिर से मोबाइल निकाला। बैटरी थी, लेकिन स्क्रीन पर सिर्फ़ एक चीज़ दिख रही थी—उसका ही चेहरा, काँच में पड़ा हुआ डरावना प्रतिबिंब।


अचानक बिजली फिर गई। इस बार जनरेटर भी नहीं चला। पूरा भवन अंधेरे में डूब गया। चीख़ें फिर से उठीं। किसी ने किसी को धक्का दिया, कोई गिर पड़ा। अंधेरे में साँसों की आवाज़ें तेज़ हो गईं—हांफती हुई, टूटती हुई।


और उसी अंधेरे में—एक लाल चमक।


वह सैंटा की आँखें थीं। वे अंधेरे में भी साफ़ दिख रही थीं। फिर उसके दाँत चमके। एक तेज़ चीख़ के साथ उसने हमला किया। अंधेरे ने उसे और भी भयानक बना दिया था। लोग देख नहीं पा रहे थे कि वह कहाँ है, बस यह सुन पा रहे थे कि कौन मर रहा है।


कुछ ही सेकंड में रोशनी वापस आई। जो दिखा, उसने बचे हुए लोगों की हिम्मत तोड़ दी। दो और लाशें फ़र्श पर पड़ी थीं। खून दीवार तक जा पहुँचा था। किसी ने उल्टी कर दी। किसी ने आँखें बंद कर लीं, यह सोचकर कि शायद न देखने से सब ख़त्म हो जाएगा।


सैंटा फिर गायब हो गया। जैसे वह हवेली में घुल गया हो। डर और बढ़ गया। जब दुश्मन दिखता है, तो उससे लड़ने की सोच पैदा होती है। लेकिन जब वह दिखे ही नहीं—तो दिमाग़ टूटने लगता है।


खिड़कियों से अब हल्की-हल्की आवाज़ें आने लगीं। जैसे बाहर से कोई उँगलियों से काँच खुरच रहा हो। ख्र्र… ख्र्र…

कुछ लोगों ने अपने कान ढक लिए। एक बच्चा रोते-रोते बेहोश हो गया।


रोमियो ने देखा कि हवेली के पुराने घड़ीघर की सुइयाँ रुक गई हैं। समय ठहर गया था। या शायद हवेली के भीतर समय का कोई मतलब नहीं रह गया था। उसे याद आया—इस हवेली को खरीदते वक्त एक बूढ़े ने कहा था, “यह जगह साँस लेती है। अगर इसे पसंद न आए, तो यह किसी को बाहर नहीं जाने देती।”


उस वक्त उसने हँस दिया था।


अब वह हँसी उसके कानों में गूँज रही थी।


एक खिड़की पर अचानक दरार पड़ी। सबकी नज़र वहीं चली गई। किसी के मुँह से खुशी की चीख़ निकलने ही वाली थी—लेकिन दरार बाहर से अंदर की ओर नहीं थी। वह अंदर से बाहर की ओर फैल रही थी। जैसे हवेली खुद कुछ बाहर निकालना चाहती हो।


दरार के बीच से लाल-सा तरल रिसने लगा। खून नहीं—कुछ और। गाढ़ा, चिपचिपा, और धड़कता हुआ। खिड़की साँस ले रही थी।


लोग पीछे हट गए। कोई अब खिड़की के पास नहीं जाना चाहता था। वह आख़िरी उम्मीद भी डर में बदल चुकी थी।


और उसी पल, हवेली के भीतर एक आवाज़ गूँजी—धीमी, भारी, और हर दीवार से टकराती हुई।

“कोई बाहर नहीं जाएगा।”


रोमियो ने आँखें बंद कर लीं।

उसे एहसास हो गया था—यह सिर्फ़ एक हत्यारा नहीं था।

यह हवेली थी।

और वे सब उसकी क़ैद में थे।


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अध्याय 4: घंटियों की जगह आती पहली चीख़


हवेली में अब कोई संगीत नहीं था। क्रिसमस कैरोल्स, जो कभी दीवारों से टकराकर लौटते थे, पूरी तरह गायब हो चुके थे। उनकी जगह एक दूसरी ही ध्वनि ने ले ली थी—चीख़ों की। छोटी, बड़ी, टूटी हुई, दम घोंट देने वाली चीख़ें। वे हवेली की छत में अटक जातीं, दीवारों से फिसलतीं, और फिर लौटकर उन्हीं कानों में घुस जातीं जिन्होंने उन्हें जन्म दिया था।


पहली चीख़ के बाद किसी को समझ नहीं आया कि अगली आवाज़ कहाँ से आएगी। डर अब किसी एक दिशा में नहीं था; वह हर कोने में फैला हुआ था। लोग अब एक-दूसरे से नज़रें नहीं मिला रहे थे। हर चेहरा शक से भरा था—क्योंकि इस हवेली में अब हर साया दुश्मन लगने लगा था।


एक गलियारे के कोने में कुछ लोग सिमटकर बैठे थे। सामने दीवार पर टंगी एक छोटी घंटी, जो कभी नौकरों को बुलाने के लिए इस्तेमाल होती थी, अपने आप हिलने लगी। टिन… टिन…

वह आवाज़ हल्की थी, लेकिन उस सन्नाटे में किसी हथौड़े की तरह पड़ रही थी।


“इसे बंद करो,” किसी ने फुसफुसाकर कहा।

एक आदमी आगे बढ़ा और घंटी को पकड़ लिया। जैसे ही उसकी उँगलियाँ धातु से टकराईं, उसकी चीख़ निकल गई। घंटी बर्फ़ जैसी ठंडी नहीं थी—वह जल रही थी। उसकी हथेली पर छाले उभर आए। घंटी फिर भी बजती रही, मानो हवेली उसे छूने की सज़ा दे रही हो।


उसी पल ऊपर से किसी के गिरने की आवाज़ आई। भारी, सूखी—जैसे कोई बोरा सीढ़ियों से लुढ़क गया हो। कुछ लोग दौड़कर सीढ़ियों के पास पहुँचे। जो उन्होंने देखा, उसने उनके भीतर कुछ तोड़ दिया। एक शरीर सीढ़ियों के नीचे उल्टा पड़ा था। गर्दन अस्वाभाविक कोण पर मुड़ी हुई। आँखें खुली थीं, लेकिन उनमें कोई जीवन नहीं था।


एक महिला ने आगे बढ़कर उसे हिलाया।

“उठो… प्लीज़ उठो…”

उसके शब्द हवा में ही रह गए। तभी सीढ़ियों के ऊपर अंधेरे में कुछ हिला।


लाल आँखें।


सैंटा।


उसने धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरनी शुरू कीं। हर कदम के साथ लकड़ी कराह उठती। लोग पीछे हटने लगे, लेकिन पीछे भी दीवारें थीं—ठंडी, कठोर, और बेदर्द। किसी ने भागने की कोशिश की, लेकिन पैर फिसल गए। खून अब फ़र्श पर इतना फैल चुका था कि चलना मुश्किल हो गया था।


सैंटा नीचे पहुँचा। उसने कुछ नहीं कहा। बस अपने ब्लेड को हल्का-सा झटका दिया। उस पर लगा खून फ़र्श पर बिखर गया—लाल छींटों में। फिर उसने हमला किया।


चीख़ें अब और तेज़ हो गईं। किसी ने अपने मुँह पर हाथ रख लिया, लेकिन आवाज़ उँगलियों के बीच से निकल ही आई। एक आदमी गिरा, दूसरा उसे खींचने की कोशिश करता रहा, लेकिन अगले ही पल वह खुद भी खामोश हो गया।


रोमियो डिसूज़ा यह सब कुछ दूरी से देख रहा था। उसका दिमाग़ सुन्न हो चुका था। उसे लग रहा था कि यह सब किसी और के साथ हो रहा है। उसकी हवेली, उसकी पार्टी, उसका नाम—सब किसी और की कहानी बन चुके थे।

उसे याद आया कि उसने इस पार्टी के लिए हवेली की हर घंटी, हर अलार्म, हर सुरक्षा सिस्टम बंद करवा दिया था—“ताकि शांति रहे,” उसने कहा था।

अब वही शांति उन्हें मार रही थी।


एक बच्चे की आवाज़ अचानक भीड़ में उभरी। वह रो नहीं रहा था—वह चिल्ला भी नहीं रहा था। बस एक शब्द बार-बार बोल रहा था।

“मम्मी… मम्मी…”

उसकी माँ कहीं नहीं दिख रही थी।


सैंटा ने बच्चे की ओर देखा। एक पल के लिए सबको लगा कि शायद वह रुकेगा। लेकिन उसकी मुस्कान और चौड़ी हो गई। वह आगे बढ़ा। तभी किसी ने पीछे से उस पर भारी चीज़ फेंकी। सैंटा एक कदम लड़खड़ाया—बस एक।


वह पल, उम्मीद का, बहुत छोटा था।


अगले ही सेकंड उसने उस आदमी को पकड़ लिया जिसने हमला किया था। उसे ज़मीन से उठाया—जैसे वह कोई खिलौना हो—और दीवार पर दे मारा। दीवार पर लाल निशान उभर आए, जैसे किसी ने पेंट फेंक दिया हो।


घंटी फिर से बजने लगी। इस बार अपने आप।

टिन… टिन… टिन…


हर बजती आवाज़ के साथ किसी न किसी की चीख़ जुड़ती गई। ऐसा लग रहा था जैसे हवेली खुद इस संगीत को बना रही हो—घंटियाँ और चीख़ें, चीख़ें और घंटियाँ।


रोमियो को लगा कि उसके कान फट जाएँगे। उसने अपने हाथों से कान ढक लिए, लेकिन आवाज़ें उसके भीतर से आ रही थीं। उसे लगा कि दीवारें फुसफुसा रही हैं—

तुमने हमें बुलाया था।


एक पल के लिए सैंटा रुक गया। उसने चारों ओर देखा—लाशें, खून, टूटे शरीर। उसने संतोष की साँस ली, जैसे कोई कलाकार अपने अधूरे काम को देख रहा हो। फिर उसकी नज़र रोमियो पर पड़ी।


उनकी आँखें मिलीं।


रोमियो ने पहली बार महसूस किया कि यह सिर्फ़ डर नहीं था। यह एक चेतावनी थी। पहली चीख़ें सिर्फ़ शुरुआत थीं। असली रात अब शुरू हो रही थी।


और हवेली की हर घंटी, हर दीवार, हर साँस—अब उसी रात के साथ धड़क रही थी।

_________________________________________


अध्याय 5: सैंटा क्लॉज़ जो तोहफ़े नहीं, लाशें लाया


हवेली की रात अब पूरी तरह बदल चुकी थी। यह क्रिसमस की रात नहीं रही—यह शिकार की रात बन चुकी थी। जिस सैंटा क्लॉज़ को लोग बच्चों की हँसी और तोहफ़ों का प्रतीक मानते थे, वही अब मौत का दूत बनकर हवेली में घूम रहा था। उसकी लाल पोशाक अब पूरी तरह गहरी हो चुकी थी—रंग और खून में फर्क़ करना मुश्किल था।


हॉल में बचे लोग अब छोटे-छोटे समूहों में बँट चुके थे। कोई किसी पर भरोसा नहीं कर पा रहा था। हर कदम सोच-समझकर रखा जा रहा था, लेकिन डर दिमाग़ से तेज़ था। किसी ने फुसफुसाकर कहा, “अगर हम सब अलग-अलग भागें, तो शायद कुछ लोग बच जाएँ।”

लेकिन यह सुझाव हवा में ही मर गया। भागने का मतलब था—अकेले पड़ जाना। और अकेले का मतलब था—सीधे सैंटा के सामने आ जाना।


सैंटा अब दिखाई नहीं दे रहा था। यही सबसे ख़तरनाक बात थी। जब वह सामने होता था, तब कम से कम पता रहता था कि मौत किस दिशा से आ रही है। अब उसकी गैरमौजूदगी हर कोने को जानलेवा बना रही थी। लोग गलियारों में धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे, जैसे हर मोड़ के पीछे मौत खड़ी हो।


एक छोटा सा ड्रॉइंग रूम, जहाँ कभी मेहमान बैठकर हँसते थे, अब शरणस्थली बन चुका था। चार लोग वहाँ छिपे थे—एक बुज़ुर्ग दंपति, एक युवक, और एक युवती। दरवाज़ा बंद था, लेकिन किसी को यकीन नहीं था कि वह सच में सुरक्षा दे पाएगा।


युवक ने धीरे से कहा, “अगर वह आए, तो हम सब एक साथ उस पर टूट पड़ेंगे।”

बुज़ुर्ग आदमी ने कड़वी हँसी हँसी। “बेटा, वह इंसान नहीं है।”


उसके शब्द पूरे भी नहीं हुए थे कि बाहर से भारी साँसों की आवाज़ आई। हूँ… हूँ…

दरवाज़े के नीचे से एक परछाईं गुज़री। सबकी साँसें रुक गईं।


फिर—ठक… ठक… ठक…

दरवाज़े पर नाख़ूनों जैसी आवाज़। बहुत धीरे, बहुत जानबूझकर।


युवती ने मुँह पर हाथ रख लिया ताकि चीख़ न निकल जाए। युवक ने पास पड़ी एक भारी मूर्ति उठा ली। बुज़ुर्ग महिला बुदबुदाने लगी—प्रार्थना या डर, फर्क़ करना मुश्किल था।


दरवाज़ा अचानक खुल गया।


सैंटा दरवाज़े में खड़ा था। उसकी आँखों में अजीब-सी चमक थी—जैसे उसे पता हो कि भीतर कौन-कौन है। उसने सिर झुकाया, मानो बच्चों से पूछ रहा हो कि उन्होंने पूरे साल अच्छा व्यवहार किया या नहीं।


अगले ही पल, कमरा खून से भर गया।


बाहर, गलियारे में रोमियो डिसूज़ा दीवार से सटा हुआ खड़ा था। उसने यह सब नहीं देखा, लेकिन चीख़ों ने उसे सब बता दिया। वह भागा—बिना दिशा, बिना योजना। सीढ़ियाँ, गलियारे, बंद दरवाज़े—हवेली उसे घुमा रही थी, जैसे बिल्ली चूहे को थकाकर मारती है।


एक जगह उसने देखा कि क्रिसमस ट्री के नीचे रखे उपहार फटे हुए थे। उनमें खिलौने नहीं थे। उनमें चाकू, रस्सियाँ, और अजीब-से औज़ार भरे थे। रोमियो का दिल बैठ गया।

यह सब पहले से रखा गया था, उसने सोचा। यह सब योजना थी।


सैंटा फिर सामने आ गया। इस बार बहुत पास। रोमियो पीछे हटा, उसका पैर किसी चीज़ से टकराया। नीचे देखा—एक लाल टोपी पड़ी थी। सैंटा की टोपी।

उसने ऊपर देखा।


सैंटा मुस्कुरा रहा था।


उसने हमला नहीं किया। बस खड़ा रहा, जैसे खेल का मज़ा ले रहा हो। फिर उसने धीमी आवाज़ में कहा,

“तोहफ़े सबको मिलते हैं, रोमियो… बस किसी को ज़िंदगी का, किसी को मौत का।”


रोमियो चीख़ा और भागा। उसे नहीं पता था कि वह कहाँ जा रहा है। बस इतना जानता था कि अगर रुका, तो मारा जाएगा।


पीछे से भारी कदमों की आवाज़ आई। सैंटा फिर चल पड़ा था।


हवेली की दीवारों पर टंगे क्रिसमस के पोस्टर अब फटने लगे थे। बच्चों की हँसती तस्वीरें नीचे गिर रही थीं। हर गिरती तस्वीर के साथ किसी की चीख़ जुड़ रही थी। जैसे सैंटा पुराने प्रतीकों को एक-एक करके मार रहा हो।


रोमियो एक बंद कमरे में घुस गया और दरवाज़ा बंद कर लिया। उसने कुंडी लगाने की कोशिश की—लेकिन कुंडी अपने आप वापस खिसक गई।

दरवाज़े के बाहर सैंटा की हँसी गूँज उठी।


“तोहफ़ा यहीं है,” वह बोला।


रोमियो दीवार से फिसलकर ज़मीन पर बैठ गया। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। यह डर नहीं था—यह टूटना था। उसकी दुनिया, उसका अहंकार, उसकी हवेली—सब खत्म हो चुका था।


दरवाज़ा खुला।


और सैंटा अंदर आ गया—

तोहफ़ों के बजाय, मौत लेकर।


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अध्याय 6: खून में डूबा नृत्य और डर से जमे मेहमान


कमरे का दरवाज़ा खुलते ही हवा का रंग बदल गया। वह ठंडी नहीं थी, न गर्म—वह भारी थी, जैसे उसमें खून घुला हो। सैंटा अंदर आया, और उसके साथ ही कमरे की दीवारों पर टंगी लाइटें झिलमिलाने लगीं। लाल रोशनी अब स्थिर नहीं थी; वह धड़क रही थी, ठीक दिल की तरह।


रोमियो ज़मीन पर बैठा था। उसकी आँखें फटी हुई थीं, जैसे वह अभी भी उम्मीद कर रहा हो कि यह सब एक बुरा सपना निकले। लेकिन सैंटा की मौजूदगी ने हर भ्रम को कुचल दिया। उसकी बूटों से टपकता खून फ़र्श पर गोल-गोल फैल रहा था—मानो किसी ने नृत्य के लिए मंच तैयार कर दिया हो।


सैंटा ने धीरे-धीरे अपने हाथ फैलाए।

और तभी—संगीत बज उठा।


यह कोई क्रिसमस कैरोल नहीं था। यह वही संगीत था जो पार्टी की शुरुआत में बज रहा था, लेकिन अब उसकी धुन बिगड़ चुकी थी। आवाज़ें उलटी चल रही थीं, सुर टूटे हुए थे, और हर ताल के साथ किसी की चीख़ जुड़ती जा रही थी। हवेली खुद इस नृत्य को शुरू कर चुकी थी।


रोमियो घुटनों के बल पीछे सरकने लगा। “मत आना…” उसके मुँह से शब्द नहीं, बस हवा निकली।

सैंटा मुस्कुराया और एक कदम आगे बढ़ा।


अचानक कमरे के कोने से कोई और निकला। एक औरत—चेहरा खून से सना, आँखें सूनी। वह अब रो नहीं रही थी। वह चल रही थी, जैसे किसी और के इशारे पर। उसके पीछे दो और लोग थे—ज़िंदा, लेकिन अंदर से टूटे हुए। उनके कदम संगीत की ताल पर उठ रहे थे।


वे नाच रहे थे।


खून में फिसलते हुए, लाशों के बीच, डर से जमे चेहरे—सब नृत्य कर रहे थे। कोई रुक नहीं पा रहा था। जैसे हवेली ने उनके शरीर पर कब्ज़ा कर लिया हो। हर बार जब कोई गिरता, सैंटा ज़ोर से हँसता, और संगीत और तेज़ हो जाता।


रोमियो ने देखा कि दीवारों पर लगी पुरानी तस्वीरें भी हिल रही हैं। उनमें दिखते लोग मुस्कुरा रहे थे—वही मुस्कान, जो सैंटा के चेहरे पर थी। जैसे यह नृत्य पहले भी हो चुका हो। जैसे यह हवेली हर कुछ सालों में यह खेल दोहराती हो।


एक आदमी नाचते-नाचते सैंटा के पास पहुँचा। उसकी आँखों में अब डर नहीं था—बस खालीपन था। सैंटा ने उसका हाथ पकड़ा, उसे घुमाया, और अगले ही पल ब्लेड चमका। संगीत की ताल पर एक और शरीर ज़मीन पर गिर पड़ा।


रोमियो चीख़ा। वह उठा और भागने की कोशिश की। लेकिन उसके पैर भी संगीत की लय पकड़ने लगे। उसका शरीर काँप रहा था। वह रुकना चाहता था, लेकिन हवेली ने उसकी मर्ज़ी छीन ली थी।


उसने महसूस किया—यह सिर्फ़ हत्या नहीं थी। यह एक रस्म थी।

एक ऐसा नृत्य, जिसमें डर ईंधन था और खून संगीत।


सैंटा ने हाथ उठाया। सब रुक गए।

सन्नाटा छा गया।


उसने रोमियो की ओर देखा और सिर झुकाया, जैसे मंच का कलाकार दर्शक को सलाम करता है।

“हर दावत का एक आख़िरी नृत्य होता है,” उसने कहा।


रोमियो के भीतर कुछ टूट गया। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।


पीछे कहीं घंटी बजी।

और नृत्य फिर शुरू हो गया।

_______________________________________


अध्याय 7: भागते क़दम, गिरती लाशें और चुप्पी का आतंक


नृत्य अचानक टूट गया। जैसे किसी ने हवेली की नस काट दी हो। संगीत मर गया, रोशनियाँ स्थिर हो गईं, और हवा एकदम शांत—इतनी शांत कि साँस लेने की आवाज़ भी गुनाह लगने लगी। यही वह पल था जब डर ने अपना सबसे भयानक रूप लिया: चुप्पी।


रोमियो ने आँखें खोलीं। नाचते हुए शरीर अब जमे हुए थे—कुछ खड़े, कुछ झुके, कुछ फ़र्श पर आधे गिरे। उनके चेहरे भावहीन थे, जैसे आत्मा निकल चुकी हो और शरीर भूल गया हो कि आगे क्या करना है। सैंटा कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। यही बात सबसे डरावनी थी।


फिर—एक क़दम।


धप…


किसी ने भागना शुरू कर दिया।


उस एक क़दम ने जैसे बाँध तोड़ दिया। लोग हर दिशा में दौड़ पड़े—गलियारे, सीढ़ियाँ, बंद दरवाज़े—जहाँ भी रास्ता दिखा, उधर। चीख़ें नहीं थीं, बस हांफती साँसें, फिसलते जूते, और टकराते शरीर। हवेली अब भूलभुलैया बन चुकी थी। जो रास्ता पहले खुला था, अब दीवार बन गया था।


रोमियो भी भागा। उसे नहीं पता था कि कहाँ। बस यह पता था कि रुकना मतलब मरना। उसके जूते खून से फिसल रहे थे। एक मोड़ पर वह गिरते-गिरते बचा। सामने एक और आदमी गिर पड़ा—उसका सिर सीढ़ियों से टकराया, एक सूखी आवाज़ आई, और वह वहीं थम गया। रोमियो ने पलटकर नहीं देखा। देखने का मतलब था टूट जाना।


पीछे से भारी साँसों की आवाज़ आने लगी।


हूँ… हूँ…


सैंटा।


वह दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन उसकी मौजूदगी हवा में थी—जैसे सर्दी में सांस से पहले ही ठंड महसूस हो जाती है। लोग दौड़ते हुए एक-दूसरे से टकरा रहे थे। कोई दरवाज़ा खोलने की कोशिश करता, दरवाज़ा खुलता—और अंदर अंधेरा निगल लेता। कुछ ही सेकंड बाद वहाँ से कुछ नहीं लौटता।


एक संकरी सीढ़ी पर भगदड़ मच गई। एक महिला फिसली, उसके पीछे दो लोग उस पर गिर पड़े। चीख़ उठी—लेकिन तुरंत कट गई। नीचे से कुछ खींचने की आवाज़ आई, जैसे किसी ने उन्हें अंधेरे में खींच लिया हो।


रोमियो एक लंबे गलियारे में पहुँचा। दीवारों पर शीशे लगे थे। भागते हुए उसे हर तरफ़ अपना ही चेहरा दिख रहा था—डरा हुआ, पसीने से भीगा, टूटा हुआ। अचानक एक शीशे में उसे कुछ और दिखा।


पीछे—

सैंटा।


उसकी आँखें शीशे में चमकीं। रोमियो पलटा—कोई नहीं। फिर आगे देखा—शीशे में वह अब और पास था। जैसे वह आईने के रास्ते चल रहा हो।


रोमियो चीख़ा और भागा।


गलियारे के अंत में एक बड़ा हॉल था। वहाँ कुछ लोग जमा थे। सबने एक साथ दरवाज़ा धक्का देना शुरू किया। लकड़ी चरमराई—पर खुली नहीं। तभी पीछे से सैंटा प्रकट हुआ। इस बार पूरा, साफ़।


एक पल को सब जम गए।


फिर कत्लेआम शुरू हुआ।


कोई चिल्ला नहीं पाया। सैंटा की चालें तेज़ नहीं थीं, लेकिन हर वार अंतिम था। एक-एक करके लोग गिरते गए। खून फ़र्श पर फैलता गया। कुछ ने भागने की कोशिश की—लेकिन हॉल में कहीं रास्ता नहीं था।


रोमियो किसी तरह एक टूटे दरवाज़े से फिसलकर बाहर निकल गया—एक छोटा सा सर्विस कॉरिडोर। अंधेरा, बदबूदार, संकरा। वह दीवार से चिपककर खड़ा हो गया। बाहर से बस एक-एक करके गिरते शरीरों की आवाज़ें आ रही थीं।


फिर—सब शांत।


इतनी शांति कि दिल की धड़कन भी डराने लगी।


रोमियो का पूरा शरीर काँप रहा था। उसके मुँह से आवाज़ नहीं निकल रही थी। वह जानता था—यह अंत नहीं है। यह सिर्फ़ इंतज़ार है। सैंटा शिकार को दौड़ाकर थकाता है… फिर मारता है।


कहीं दूर, बहुत धीमी आवाज़ में, हँसी गूँजी।


और रोमियो समझ गया—

अब भागने की बारी भी ख़त्म होने वाली है।

_______________________________________


अध्याय 8: हवेली की दीवारें जो टूटने से इंकार कर गईं


सर्विस कॉरिडोर की चुप्पी किसी कब्र की तरह भारी थी। रोमियो दीवार से चिपका खड़ा था, जैसे अगर उसने ज़रा-सी भी हरकत की तो हवेली उसे पहचान लेगी। हवा में नमी थी, सीलन और खून की मिली-जुली गंध। दूर कहीं पाइप से टपकती पानी की बूंदें गिर रही थीं—टप… टप…—और हर बूंद उसके दिल पर हथौड़े की तरह पड़ रही थी।


उसने धीरे से आगे कदम बढ़ाया। कॉरिडोर एक छोटे स्टोर रूम में खुलता था। वहाँ पुराने फर्नीचर, टूटे फ्रेम, और धूल से ढकी पेटियाँ पड़ी थीं। रोमियो ने साँस रोककर दरवाज़ा बंद किया और कुंडी लगाने की कोशिश की। कुंडी हिली—और रुक गई। जैसे किसी ने दूसरी तरफ़ से पकड़ ली हो। रोमियो ने पूरी ताक़त लगाई, लेकिन कुंडी अपनी जगह पर जमी रही।


“नहीं…”

उसके मुँह से बमुश्किल आवाज़ निकली।


दीवार पर उसने एक भारी लोहे का रॉड देखा। उसने उसे उठाया—हाथ काँप रहे थे, लेकिन गुस्सा अब डर के ऊपर आने लगा था। यह मेरी हवेली है, उसने मन में दोहराया। यह मुझे क़ैद नहीं कर सकती।


उसने दीवार पर वार किया।


धम!

धूल उड़ी, लेकिन दीवार पर बस एक हल्की-सी रेखा बनी—जैसे किसी ने नाख़ून से खरोंच दी हो। रोमियो ने फिर मारा। धम! इस बार भी वही। दीवार ने कोई जवाब नहीं दिया। न दरार, न कंपन। बस एक ठंडी, बेपरवाह चुप्पी।


उसने पास की दूसरी दीवार पर वार किया। फिर तीसरी पर। हर बार वही नतीजा। जैसे यह ईंट-पत्थर नहीं, किसी और ही चीज़ से बनी हो—ऐसी चीज़ जो चोट को महसूस ही नहीं करती।


अचानक दीवार पर टंगी एक पुरानी घड़ी चलने लगी। उसकी सुइयाँ उल्टी दिशा में घूम रही थीं। टिक… टिक…

रोमियो ने घड़ी की ओर देखा। उसे याद आया—इस घड़ी को उसने कभी ठीक नहीं करवाया था। यह सालों से बंद थी।


“समय भी तुम्हारे साथ है, है न?”

आवाज़ उसके पीछे से आई।


रोमियो पलटा।


सैंटा दरवाज़े के पास खड़ा था। बिना हाँफे, बिना थके। उसकी आँखों में वही लाल चमक थी, लेकिन अब उसमें अधीरता नहीं थी—बस यक़ीन था। उसने हाथ दीवार पर रखा। जहाँ उसकी उँगलियाँ लगीं, वहाँ पत्थर पर हल्की-सी धड़कन उभरी।


“तुम सोचते हो, ये दीवारें मुझे रोकेंगी?” सैंटा ने कहा।

“ये दीवारें मुझसे बनी हैं।”


रोमियो पीछे हटते-हटते स्टोर रूम के आख़िरी कोने में जा पहुँचा। उसने आख़िरी कोशिश की—रॉड उठाकर सैंटा की ओर झपटा। रॉड हवा में थमी—मानो किसी अदृश्य हाथ ने पकड़ ली हो। अगले ही पल रॉड उसके हाथ से छूट गया और दूर जा गिरा।


सैंटा ने एक कदम आगे बढ़ाया। फर्श ने कराहकर उसका स्वागत किया।


“मैंने तुम्हें बुलाया नहीं,” रोमियो चिल्लाया। “यह सब मैंने नहीं चाहा!”

सैंटा मुस्कुराया। “हवेलियाँ इच्छाओं से नहीं, आमंत्रणों से जागती हैं।”


दीवारों से सरसराहट की आवाज़ आने लगी। ईंटों के बीच से धुंध-सी निकलने लगी, जो कमरे में भरती चली गई। धुंध में चेहरे उभरने लगे—वही चेहरे जो पार्टी में थे। उनकी आँखें खाली थीं, और होंठ हिले—लेकिन कोई आवाज़ नहीं।


रोमियो ने दीवार पर आख़िरी बार हाथ मारा—निहत्था। उसकी हथेली छिल गई, खून बहने लगा। दीवार ने खून को सोख लिया। जैसे उसे उसी का इंतज़ार था।


सैंटा रुका। उसने दीवार की ओर देखा—और सिर हिलाया।

“अभी नहीं,” उसने कहा। “यह दीवारें गिरने के लिए नहीं बनीं। ये याद रखने के लिए बनी हैं।”


धुंध अचानक छँट गई। कमरे की एक दीवार सरकने लगी—धीरे, बहुत धीरे—और एक नया गलियारा खुल गया। अंधेरा, गहरा, और नीचे की ओर जाता हुआ।


सैंटा ने इशारा किया।

“जाओ,” उसने कहा। “हर मालिक को अपनी हवेली का आख़िरी हिस्सा देखना चाहिए।”


रोमियो के पास कोई रास्ता नहीं था। उसने उस गलियारे में कदम रखा। उसके पीछे दीवारें फिर से अपनी जगह पर बैठ गईं—बिल्कुल सही, बिना किसी निशान के।


हवेली ने एक बार फिर साँस ली।

और दीवारें—अब भी—टूटने से इंकार कर रही थीं।

_________________________________________


अध्याय 9: रोमियो डिसूज़ा की आख़िरी उम्मीद


गलियारा नीचे उतरता चला गया। हर क़दम के साथ हवा और ठंडी होती गई, और अँधेरा गाढ़ा। रोमियो को लग रहा था जैसे वह हवेली के पेट में उतर रहा हो—उस जगह, जहाँ उसकी कोई याद, कोई आवाज़, कोई इज़्ज़त काम नहीं आएगी। दीवारें अब ईंट की नहीं लग रही थीं; वे धड़क रही थीं, जैसे किसी जीव की पसलियाँ हों।


उसने पीछे मुड़कर देखा। रास्ता गायब हो चुका था। बस एक सपाट दीवार—बिल्कुल वैसी ही, जैसी ऊपर थीं।

“यह अंत नहीं हो सकता,” उसने खुद से कहा। उसकी आवाज़ कमजोर थी, लेकिन भीतर कहीं एक चिंगारी अभी भी जल रही थी।

मैं इसका मालिक हूँ, उसने मन में दोहराया। कुछ तो होगा… कोई तो रास्ता…


गलियारा एक बड़े लोहे के दरवाज़े पर खत्म हुआ। यह दरवाज़ा अलग था—पुराना, जंग लगा, लेकिन मज़बूत। उसके बीचों-बीच एक गोल पहिया लगा था, जैसे किसी जहाज़ का स्टीयरिंग। दरवाज़े के ऊपर उकेरा हुआ था—

EXIT


रोमियो की आँखों में आँसू आ गए। यह पहला शब्द था जिसने उसे उम्मीद दी। उसने दौड़कर पहिया पकड़ा। ठंडा लोहा उसकी हथेलियों में चुभा, लेकिन उसने परवाह नहीं की। उसने पूरी ताक़त से घुमाया।


पहिया हिला।

बस थोड़ा-सा।


उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई। “खुल रहा है… खुल रहा है…” वह बुदबुदाया। उसने फिर ज़ोर लगाया। इस बार पहिया और घूमा। दरवाज़े के भीतर से एक भारी आवाज़ आई—क्लांक…


बाहर से हवा का झोंका आया। ताज़ी हवा। आज़ादी की गंध।


रोमियो हँस पड़ा। वह हँसी टूटी हुई थी, पागल-सी, लेकिन असली थी। “मैं बच जाऊँगा,” उसने कहा। “मैं बाहर निकल जाऊँगा।”


पीछे से धीमे क़दमों की आवाज़ आई।


रोमियो रुका।

वह पलटा नहीं।


“हर किसी को यही लगता है,” सैंटा की आवाज़ आई—शांत, गहरी, पास। “आख़िरी दरवाज़ा हमेशा सबसे ज़्यादा उम्मीद देता है।”


रोमियो ने पहिया छोड़ दिया और पलट गया। सैंटा गलियारे के मुहाने पर खड़ा था। लाल आँखें अब और तेज़ थीं, लेकिन उसकी चाल में कोई जल्दबाज़ी नहीं थी। जैसे खेल अपने आख़िरी दौर में पहुँच चुका हो।


“यह दरवाज़ा…” रोमियो हकलाया, “यह बाहर जाता है।”

सैंटा मुस्कुराया। “हाँ। बाहर। लेकिन सवाल यह है—किसके बाहर?”


रोमियो ने फिर पहिया पकड़ा। उसने पूरी ताक़त झोंक दी। दरवाज़ा चरमराया और थोड़ा खुल गया। दरार के उस पार उसने देखा—बर्फ़। खुला आसमान। रात।

वह चीख़ा, खुशी से।

और उसी पल—


फर्श हिल गया।


दरवाज़ा अचानक उल्टी दिशा में खिंचने लगा। रोमियो का संतुलन बिगड़ा। उसने लोहे को पकड़ने की कोशिश की, लेकिन फर्श फिसलन भरा हो चुका था—खून और नमी से। दरवाज़ा अब खुल नहीं रहा था; वह उसे खींच रहा था।


सैंटा आगे बढ़ा। “यह हवेली किसी को बाहर नहीं जाने देती,” उसने कहा। “यह बस यह तय करती है कि कब।”


रोमियो ज़मीन पर गिर पड़ा। उसने सैंटा की ओर देखा—आँखों में गुस्सा, डर, और एक आख़िरी सवाल।

“तुम… हो कौन?”


सैंटा रुका। पहली बार।

“मैं वही हूँ,” उसने कहा, “जो हर उस जगह आता है जहाँ दावत में बहुत ज़्यादा बुलाया जाता है… और बहुत ज़्यादा लिया जाता है।”


दरवाज़े के ऊपर लिखा EXIT धीरे-धीरे बदलने लगा। अक्षर पिघलकर एक नया शब्द बना रहे थे—

ENTRY


रोमियो की आख़िरी उम्मीद टूट गई।


उसने चीख़ मारी—पूरी ताक़त से।

हवेली ने वह चीख़ पी ली।

और गलियारे की लाइट बुझ गई।

_________________________________________


अध्याय 10: लाल बर्फ़ की अंतिम रात


रोमियो डिसूज़ा अब पूरी तरह अकेला था। हवेली की गलियारों ने उसे घेर रखा था। अब कोई संगीत, कोई घंटी, कोई नृत्य—कुछ भी नहीं था। सिर्फ़ अँधेरा, और खून से सना फर्श। हर कदम पर ज़मीन पर पड़े शरीर उसे उसकी हार की याद दिला रहे थे।


उसने अपने चारों ओर देखा। हवेली का दिल—हॉल, गलियारे, कमरे—सब उसके और बाकी लोगों के खून में डूब चुके थे। दीवारों पर पुराने चित्र अब झूल नहीं रहे थे, बल्कि उनमें उभरती हुई लाल आँखें उसकी हर हरकत पर निगरानी रख रही थीं। वह समझ गया—यह सिर्फ़ कोई हत्यारा नहीं था। यह हवेली थी, और सैंटा उसका अवतार, उसका हाथ, उसकी चेतावनी।


रोमियो ने आख़िरी बार दरवाज़ों और खिड़कियों को देखा। सभी बंद थे। वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा। “कोई बाहर है! मदद करो!”


लेकिन आवाज़ वापस उसकी कानों में गूँज कर लौट रही थी—बाहर नहीं जा रही थी। हवेली ने उसे अंदर फंसा रखा था।


फिर पीछे से भारी क़दमों की आवाज़ आई।


थड़ाक… थड़ाक… थड़ाक…


सैंटा क्लॉज़ धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ रहा था। लाल पोशाक अब गहरे रक्त से रंगी हुई थी। उसके दाँत बड़े और खून से सने हुए थे। उसकी आँखें चमक रही थीं—जैसे उस रात की पूरी हवेली का रौशनी स्रोत वही हों।


रोमियो ने दौड़ने की कोशिश की। उसने दरवाज़ा तोड़ने की कोशिश की। लकड़ी चूर हो गई, लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला। खिड़कियाँ—जितनी बार उसने उन्हें तोड़ने की कोशिश की—टूटने का नाम ही नहीं ले रही थीं।


सैंटा पास आ गया। हर कदम के साथ रोमियो की उम्मीदें कम होती जा रही थीं। हवा में खून की गंध अब इतनी तेज़ थी कि उसे साँस लेने में तकलीफ़ हो रही थी।


“अब समय है, रोमियो,” सैंटा ने धीमी, भयानक आवाज़ में कहा। “समय खत्म हो गया है।”


रोमियो ने पीछे मुड़कर देखा। हवेली की दीवारें अब जमे हुए खून से ढकी हुई थीं, और उसी खून में बड़ी बड़ी लाल आँखें झिलमिला रही थीं। वहाँ से किसी ने उसकी ओर देखा—और वह कोई इंसान नहीं था। वह सैंटा की दुनिया थी।


सैंटा ने हमला किया। रोमियो ने हर कोशिश की, लेकिन वह थक चुका था। उसका शरीर, दिमाग़ और दिल—सब हवेली की जकड़न में फंसे हुए थे।


अंत में, रोमियो का शरीर फ़र्श पर गिरा। उसकी आँखें खुली थीं, लेकिन उसमें जीवन नहीं था। हवेली ने उसे निगल लिया।


सैंटा क्लॉज़ ने उसकी लाश के पास झुककर देखा। लाल आँखों से मुस्कुराया।

“हर क्रिसमस पर, हर दावत में, कोई न कोई यही भूलता है कि हवेली हमेशा अपनी सुरक्षा करती है।”


जैसे ही वह उठा, हवेली ने एक बार गहरी साँस ली। बाहर बर्फ़ गिर रही थी, लेकिन अब वह लाल थी—खून की तरह, हवेली की जीत की निशानी।


फर्श पर पड़े खून से सना, हवेली ने चुपचाप इंतज़ार करना शुरू कर दिया। यह रात खत्म नहीं हुई थी। यह केवल पहली क्रिसमस थी, जिसने अपनी कहानी पूरी कर दी थी।


और हवेली… अब और अधिक भयानक बन चुकी थी।


अंत…

_________________________________________


एथंनी डिसूज़ा, आगरा उत्तर प्रदेश











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  • Category: Emotional / Romance
  • Author: Neelam Singh
  • Published: 21 January

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𝐒𝐦𝐚𝐥𝐥 𝐏𝐚𝐠𝐞𝐬, 𝐁𝐢𝐠 𝐓𝐡𝐨𝐮𝐠𝐡𝐭𝐬.

𝑀𝒶𝓃𝒾 𝐸-𝐵𝑜𝑜𝓀 𝒾𝓈 𝒶𝓃 𝑜𝓃𝓁𝒾𝓃𝑒 𝓅𝓁𝒶𝓉𝒻𝑜𝓇𝓂 𝒻𝑜𝓇 𝓇𝑒𝒶𝒹𝒾𝓃𝑔 𝓈𝒽𝑜𝓇𝓉, 𝓂𝑒𝒶𝓃𝒾𝓃𝓰𝒻𝓊𝓁 𝒷𝑜𝑜𝓀𝓈 𝒾𝓃 𝓉𝑒𝓍𝓉 𝒻𝑜𝓇𝓂. 𝐼𝓉 𝓈𝒽𝒶𝓇𝑒𝓈 𝓈𝒾𝓂𝓅𝓁𝑒 𝓉𝒽𝑜𝓊𝑔𝒽𝓉𝓈, 𝓈𝓉𝑜𝓇𝒾𝑒𝓈, 𝒶𝓃𝒹 𝑒𝓂𝑜𝓉𝒾𝑜𝓃𝓈 𝓌𝓇𝒾𝓉𝓉𝑒𝓃 𝒷𝓎 𝑀𝒶𝓃𝒾𝓈𝒽 𝒞𝒽𝒶𝓊𝒹𝒽𝒶𝓇𝓎 𝒶𝓃𝒹 𝒾𝓃𝒹𝑒𝓅𝑒𝓃𝒹𝑒𝓃𝓉 𝓌𝓇𝒾𝓉𝑒𝓇𝓈. 𝑅𝑒𝒶𝒹 𝑜𝓃𝓁𝓎 𝒾𝒻 𝓎𝑜𝓊 𝒻𝑒𝑒𝓁 𝓁𝒾𝓀𝑒—𝓃𝑜 𝓅𝓇𝑒𝓈𝓈𝓊𝓇𝑒, 𝒿𝓊𝓈𝓉 𝓌𝑜𝓇𝒹𝓈.

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