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बीते कल की कीमत

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Introduction

हम ज़िंदगी को अक्सर आगे की तरफ़ देखते हुए जीते हैं—अगले दिन, अगले साल, अगले लक्ष्य की तरफ़। लेकिन सच यह है कि हमारे कदम जितने आगे बढ़ते हैं, हमारी यादें उतनी ही पीछे खींचती हैं। और इन्हीं यादों के बीच कहीं हम यह समझने लगते हैं कि जो बीत गया, उसकी कीमत हमें अब चुकानी पड़ रही है।

“बीते कल की कीमत” समय की उसी खामोश चाल पर लिखी गई किताब है—जो हमें बिना रोके आगे ले जाती है, लेकिन जाते-जाते बहुत कुछ पीछे छोड़ जाती है। यह किताब रिश्तों के टूटने की नहीं, बल्कि उनके अनदेखे रह जाने की कहानी है। यह अकेलेपन की नहीं, बल्कि उस दूरी की बात करती है, जो भीड़ में रहकर भी पैदा हो जाती है।

इस किताब में कोई नायक नहीं है, कोई खलनायक नहीं है। यहाँ सिर्फ़ इंसान है—अपनी कमजोरियों, अपनी गलतियों और अपनी उम्मीदों के साथ। हर अध्याय एक भाव है, एक पड़ाव है, जहाँ पाठक खुद को पहचान सकता है।

यह किताब आपको रोकने नहीं आएगी।
यह बस इतना कहेगी—आज को जी लो, क्योंकि कल सिर्फ़ याद बनता है।


लेखक की टिप्पणी

यह किताब किसी एक कहानी का दावा नहीं करती।
यह उन अनगिनत पलों की आवाज़ है, जो अक्सर बिना बोले हमारी ज़िंदगी से गुज़र जाते हैं।

“बीते कल की कीमत” लिखते समय मेरा उद्देश्य यह नहीं था कि मैं किसी को सही या गलत ठहराऊँ। यह किताब किसी उपदेश की तरह नहीं, बल्कि एक आईने की तरह लिखी गई है—जिसमें हर पाठक अपनी ही परछाईं देख सके। हम सभी अपने जीवन में कभी न कभी ऐसे मोड़ पर पहुँचते हैं, जहाँ पीछे मुड़कर देखने की आदत बन जाती है। वहाँ खड़े होकर हम समझते हैं कि कुछ बातें समय पर कही जातीं, कुछ रिश्ते समय पर थामे जाते, तो शायद आज की चुप्पी इतनी भारी न होती।

यह किताब उस पछतावे को कोसने के लिए नहीं है, बल्कि उसे समझने के लिए है। क्योंकि पछतावा अगर समझ में बदल जाए, तो वह बोझ नहीं रहता—वह दिशा बन जाता है।

अगर इस किताब का कोई भी पन्ना आपको अपनी किसी याद के क़रीब ले जाए, अगर किसी अध्याय को पढ़ते हुए आप थोड़ी देर के लिए रुक जाएँ, या किसी रिश्ते को आज ही जी लेने का मन बनाएँ—तो समझिए, यह किताब अपने उद्देश्य में सफल हुई।

बीता हुआ कल लौटकर नहीं आता।
लेकिन उससे मिली सीख हमें आगे बढ़ना सिखा सकती है।

— मनीष चौधरी


अध्याय 1

बीते कल की कीमत**

वक़्त जब चलता है तो वह आवाज़ नहीं करता, कोई दस्तक नहीं देता, न ही पीछे मुड़कर देखता है। वह बस चलता रहता है—हमारे साथ भी और हमसे आगे भी। उस चलने में न कोई जल्दबाज़ी होती है, न कोई ठहराव। लेकिन अजीब बात यह है कि जब तक हम उसके साथ चल रहे होते हैं, तब तक हमें उसकी क़ीमत समझ नहीं आती। और जब वह हमसे आगे निकल जाता है, तब हम सिर्फ़ उसकी परछाईं पकड़ने की कोशिश करते हैं—जिसे हम याद कहते हैं।

बीता हुआ कल कभी अचानक नहीं मरता। वह धीरे-धीरे हमारी ज़िंदगी से खिसकता है। पहले वह आदतों से निकलता है, फिर बातों से, फिर तस्वीरों से, और आख़िर में हमारे दिल के किसी कोने में बैठकर खामोश हो जाता है। हम सोचते हैं कि हमने उसे भुला दिया, लेकिन सच्चाई यह है कि हमने बस उसे बोलना बंद कर दिया होता है। कल अब भी वहीं होता है—बस शब्दों से दूर।

हर इंसान के जीवन में कुछ ऐसे दिन होते हैं जिन्हें वह “सामान्य” समझकर जी लेता है। वही दिन बाद में सबसे ज़्यादा याद आते हैं। वो दिन जिनमें कुछ ख़ास नहीं हुआ था—न कोई बड़ी खुशी, न कोई बड़ा ग़म—बस लोग थे, बातें थीं, चाय की भाप थी, शाम का आसमान था, और किसी अपने की मौजूदगी थी। उस वक़्त हमें नहीं पता होता कि हम अपनी ज़िंदगी के सबसे कीमती पल जी रहे हैं, क्योंकि इंसान अक्सर उन्हीं चीज़ों की क़ीमत समझता है, जो उससे छिन चुकी होती हैं।

कल की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि वह तब तक सस्ता लगता है, जब तक वह हमारे पास होता है। आज में जीते हुए हम सोचते हैं कि “कल भी तो होगा”, लेकिन वक़्त का सबसे बड़ा झूठ यही है कि वह कभी कल की गारंटी नहीं देता। वह सिर्फ़ अभी देता है—और हम उसी अभी को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

इस किताब की शुरुआत किसी बड़े हादसे से नहीं होती, न ही किसी असाधारण घटना से। इसकी शुरुआत होती है एक साधारण-सी शाम से। एक ऐसी शाम, जो हर दिन आती थी और हर दिन चली जाती थी। लेकिन उस शाम को किसी ने आख़िरी बार होने की सूचना नहीं दी थी। न आसमान ने रंग बदला था, न हवा ने दिशा। सब कुछ वैसा ही था—बस वह दिन आख़िरी था, और किसी को इसका एहसास नहीं था।

वह व्यक्ति खिड़की के पास बैठा था। बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। सड़क पर चलते लोग जल्दी में थे—किसी को घर पहुँचना था, किसी को मंज़िल। उसे देखकर कोई नहीं कह सकता था कि उसके भीतर कुछ टूट रहा है। वह शांत था, बहुत शांत। लेकिन यह शांति उस झील जैसी थी, जिसके नीचे गहराई में तूफ़ान सोया होता है।

उसके हाथ में एक पुरानी डायरी थी। डायरी नई नहीं थी, लेकिन उसमें लिखी बातें बहुत पुरानी भी नहीं थीं। कुछ पन्नों पर तारीख़ें साफ़ थीं, कुछ पर धुंधली। जैसे समय ने कुछ शब्दों को याद रखने का फैसला किया हो और कुछ को भुलाने का। उसने एक पन्ना पलटा—वहाँ लिखा था:

“आज सब साथ थे। पता नहीं क्यों, मन अजीब-सा खुश है।”

वह मुस्कुराया, लेकिन आँखें नम हो गईं। उसे याद आया कि उस दिन उसे खुशी का कोई बड़ा कारण नहीं मिला था, फिर भी वह खुश था। आज उसके पास कारणों की कमी नहीं थी, लेकिन खुशी कहीं नहीं थी। यही तो बीते कल की कीमत होती है—जो उस वक़्त समझ नहीं आती, जब सब कुछ पास होता है।

रिश्ते भी वक़्त के साथ ही अपनी कीमत बताते हैं। जब लोग हमारे साथ होते हैं, हम उन्हें स्थायी समझ लेते हैं। हमें लगता है कि ये चेहरे, ये आवाज़ें, ये आदतें हमेशा हमारे आसपास रहेंगी। हम उनके साथ रूखे हो जाते हैं, व्यस्त हो जाते हैं, और यह सोचकर टाल देते हैं कि “बाद में बात कर लेंगे।” लेकिन वह बाद में अक्सर कभी नहीं आता।

बीता हुआ कल सिर्फ़ समय नहीं होता, वह इंसानों का भी होता है। कुछ लोग बीते कल में रह जाते हैं—हमारे नहीं, बल्कि समय के हाथों। वे लोग जो कभी हमारी सुबह का हिस्सा थे, हमारी शामों की आदत थे, आज हमारी यादों की तस्वीर बन चुके होते हैं। और सबसे दर्दनाक बात यह नहीं होती कि वे चले गए, बल्कि यह होती है कि जब वे थे, तब हमने उन्हें पूरी तरह जिया नहीं।

हर इंसान के भीतर एक अदालत चलती है, जहाँ बीता हुआ कल जज बनकर बैठता है और हमारा आज कटघरे में खड़ा होता है। वहाँ सवाल पूछे जाते हैं—
क्या तुमने उस दिन ज़्यादा ध्यान दिया होता?
क्या तुमने उस बात को टालना सही किया था?
क्या सच में तुम इतने व्यस्त थे, या बस लापरवाह?

इन सवालों के जवाब हमारे पास नहीं होते, क्योंकि वक़्त जवाब देने के लिए नहीं, सिखाने के लिए आता है।

बीते कल की कीमत हमेशा पछतावे में नहीं होती, कभी-कभी वह सीख में भी होती है। कुछ लोग टूटकर समझते हैं, कुछ समझकर संभलते हैं। लेकिन यह समझ अक्सर देर से आती है। जैसे बारिश के बाद छाता याद आता है। जैसे खोने के बाद संभालने की बात दिमाग़ में आती है।

उस व्यक्ति ने डायरी बंद की और बाहर देखा। बारिश अब तेज़ हो चुकी थी। उसे लगा जैसे आसमान भी कुछ खो चुका है, और उसे ढूँढने की कोशिश कर रहा है। उसे याद आया—कभी वह भी ऐसे ही बारिश में भीगने निकल जाता था, बिना छाते, बिना डर। तब उसे बीमार पड़ने का डर नहीं था, क्योंकि कोई था जो पूछता था—“ठंड तो नहीं लग गई?” आज वह डर था, लेकिन पूछने वाला नहीं।

यही तो वक़्त की सबसे बड़ी विडंबना है। जब हमें किसी की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है, तब हम सबसे ज़्यादा अकेले होते हैं। और जब हम अकेले नहीं होते, तब हमें किसी की ज़रूरत का एहसास ही नहीं होता।

बीते कल की कीमत सिर्फ़ आँसुओं में नहीं, खामोशी में भी होती है। वह खामोशी जो किसी भीड़ में भी अकेला कर दे। वह खामोशी जो हँसते हुए चेहरे के पीछे छुपी रहती है। वह खामोशी जो रात को सोने नहीं देती और सुबह उठने नहीं देती।

इस अध्याय की कहानी किसी एक इंसान की नहीं है। यह हर उस व्यक्ति की कहानी है, जिसने कभी कहा था—“कल कर लेंगे।” हर उस इंसान की कहानी है, जिसने सोचा था—“अभी तो वक़्त है।” और हर उस दिल की कहानी है, जिसने बहुत देर से जाना कि वक़्त कभी हमारा नहीं होता।

बीता हुआ कल हमें तोड़ने नहीं आता, वह हमें देखने आता है—यह देखने कि हमने उससे क्या सीखा। लेकिन इंसान अक्सर सीख से पहले पछतावे को पकड़ लेता है। और जब तक वह सीख तक पहुँचता है, तब तक बहुत कुछ पीछे छूट चुका होता है।

शायद इसीलिए कहा जाता है—
वक़्त गुज़र जाने के बाद याद तो आएगा, लेकिन वापस नहीं आएगा।

और यही पंक्ति इस किताब की आत्मा है।

यह अध्याय यहीं खत्म नहीं होता, क्योंकि बीता हुआ कल कभी एक अध्याय में खत्म नहीं होता। वह हर अगले पन्ने में, हर आने वाले शब्द में, हर सोच में चलता रहता है।
अगले अध्याय में हम उन रिश्तों की बात करेंगे, जो ज़िंदा रहते हुए भी अतीत बन जाते हैं—और जिनकी कीमत हम तब चुकाते हैं, जब उन्हें पकड़ने के लिए हाथ खाली होते हैं।


अध्याय 2

जो रिश्ते ज़िंदा रहते हुए भी अतीत बन गए**

कुछ रिश्ते मरते नहीं हैं।
वे बस बोलना बंद कर देते हैं।

वे हमारी ज़िंदगी से अचानक बाहर नहीं जाते, न कोई दरवाज़ा पटकते हैं, न कोई विदाई देते हैं। वे वहीं रहते हैं—हमारे आसपास, हमारी यादों में, हमारी दिनचर्या में—लेकिन धीरे-धीरे हमारी उपस्थिति से बाहर हो जाते हैं। और सबसे अजीब बात यह होती है कि हमें उनके जाने का एहसास तब होता है, जब वे बहुत पहले जा चुके होते हैं।

रिश्तों का अतीत बन जाना किसी एक दिन की घटना नहीं होती। यह एक लंबी प्रक्रिया होती है—धीमी, खामोश और बेहद चालाक। पहले बातचीत कम होती है, फिर सवाल कम होते हैं, फिर शिकायतें, और आख़िर में उम्मीदें भी। जब उम्मीदें मर जाती हैं, तब रिश्ता सिर्फ़ नाम का रह जाता है।

बीते कल की कीमत सबसे ज़्यादा रिश्तों के मामले में चुकानी पड़ती है।

उस व्यक्ति को याद आया—कैसे कभी किसी की एक मिस्ड कॉल भी बेचैन कर देती थी। कैसे देर से आया एक जवाब पूरे दिन का मूड बिगाड़ देता था। और आज? आज घंटों की चुप्पी भी सामान्य लगती है। यही सामान्य होना सबसे बड़ा खतरा होता है। जब किसी की अनुपस्थिति हमें परेशान करना बंद कर दे, तब समझ लेना चाहिए कि रिश्ता अब वर्तमान में नहीं रहा।

रिश्ते अक्सर किसी बड़ी लड़ाई से नहीं टूटते। वे टूटते हैं छोटी-छोटी अनदेखियों से। एक बार ध्यान न देना, दूसरी बार समय न निकाल पाना, तीसरी बार यह सोचना कि “वह समझ जाएगा।” लेकिन हर बार कोई न कोई बात दिल में रह जाती है। और दिल में बची बातें एक दिन दीवार बन जाती हैं—इतनी ऊँची कि दोनों तरफ़ के लोग एक-दूसरे को देख तो सकते हैं, लेकिन पहुँच नहीं सकते।

हम अक्सर सोचते हैं कि रिश्तों को समय चाहिए। सच्चाई यह है कि रिश्तों को समय नहीं, प्राथमिकता चाहिए। समय तो सबके पास बराबर होता है—फर्क बस इतना है कि हम उसे किस पर खर्च करते हैं। और जब हम किसी को बार-बार “बाद में” पर टालते हैं, तब वह धीरे-धीरे हमारे “अब” से निकल जाता है।

बीता हुआ कल तब चुभता है, जब हमें याद आता है कि रिश्ते टूटने से पहले हमें कई मौके मिले थे—सुधारने के, समझाने के, रुक जाने के। लेकिन हम हर बार यह सोचकर आगे बढ़ते रहे कि अभी तो सब ठीक है। और जब हमें लगा कि अब सब ठीक नहीं है, तब बहुत देर हो चुकी थी।

उसने एक पुरानी तस्वीर देखी। तस्वीर में कई लोग थे—हँसते हुए, एक-दूसरे के कंधों पर हाथ रखे हुए। उस वक़्त वह तस्वीर सिर्फ़ एक तस्वीर थी। आज वह एक सवाल बन चुकी थी—हम यहाँ से वहाँ कैसे पहुँच गए?
कोई जवाब नहीं था। बस एक भारी-सी खामोशी।

कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जिन्हें हम हल्के में ले लेते हैं क्योंकि वे “अपने” होते हैं। हमें लगता है कि वे कहीं नहीं जाएंगे। माँ-बाप, भाई-बहन, पुराने दोस्त—हम उन्हें स्थायी समझ लेते हैं। और यही स्थायित्व का भ्रम हमें लापरवाह बना देता है। हम सोचते हैं कि आज बात नहीं की तो क्या हुआ, कल कर लेंगे। लेकिन कल जब आता है, तब रिश्ते पहले जैसे नहीं रहते।

बीते कल की कीमत तब और बढ़ जाती है, जब सामने वाला अब शिकायत भी नहीं करता। शिकायतें इस बात का सबूत होती हैं कि रिश्ता अब भी ज़िंदा है। जब शिकायतें बंद हो जाती हैं, तब समझ लेना चाहिए कि सामने वाला लड़ना छोड़ चुका है। और जो इंसान लड़ना छोड़ दे, वह अक्सर भीतर से विदा ले चुका होता है।

रिश्तों में सबसे ज़्यादा नुकसान शब्दों से नहीं, चुप्पी से होता है। बोले गए शब्दों को माफ़ किया जा सकता है, समझाया जा सकता है। लेकिन जो कहा ही नहीं गया, जो भीतर दबा रह गया, वह धीरे-धीरे ज़हर बन जाता है। और वह ज़हर पूरे रिश्ते को खोखला कर देता है।

उस व्यक्ति को याद आया कि कभी किसी ने कहा था—
“तुम बदल गए हो।”
उसने उस वक़्त हँसकर टाल दिया था। उसे लगा था कि यह बस एक शिकायत है। आज उसे समझ आया कि वह एक चेतावनी थी। लेकिन चेतावनियाँ अक्सर तब समझ आती हैं, जब नुकसान हो चुका होता है।

कुछ रिश्ते दूरी से नहीं टूटते, वे उपेक्षा से टूटते हैं। हम साथ होते हुए भी दूर हो सकते हैं, और दूर होते हुए भी पास। फर्क सिर्फ़ इस बात का होता है कि हम एक-दूसरे को कितनी अहमियत देते हैं। जब किसी को यह महसूस होने लगे कि उसकी जगह अब किसी और चीज़ ने ले ली है, तब रिश्ता भले ही काग़ज़ पर ज़िंदा हो, दिल में मर जाता है।

बीते कल की कीमत हमें तब चुभती है, जब हम किसी से दोबारा बात करना चाहते हैं, लेकिन शब्द नहीं मिलते। जब हम माफ़ी माँगना चाहते हैं, लेकिन हालात इजाज़त नहीं देते। जब हम कहना चाहते हैं—“तुम ज़रूरी थे”—लेकिन सामने वाला अब सुनने की जगह पर नहीं होता।

हर इंसान के जीवन में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जिन्हें वह खोकर नहीं, छोड़कर खोता है। और यही सबसे बड़ा बोझ बन जाता है। क्योंकि खोया हुआ अगर मजबूरी में गया हो, तो दर्द कम होता है। लेकिन जो हमारी लापरवाही से गया हो, उसकी याद उम्र भर पीछा करती है।

बीता हुआ कल हमें यह नहीं सिखाता कि सबको पकड़कर रखना चाहिए। वह बस यह सिखाता है कि जिनका होना आज है, उन्हें आज ही जी लेना चाहिए। क्योंकि कोई भी रिश्ता भविष्य की गारंटी के साथ नहीं आता।

उसने तस्वीर वापस रख दी। कमरे में अब भी वही सन्नाटा था। लेकिन अब उस सन्नाटे में आवाज़ें थीं—बीते हुए शब्दों की, अधूरी बातों की, अनकहे जज़्बातों की। उसे एहसास हुआ कि रिश्ते सिर्फ़ लोगों से नहीं बनते, वे हमारे व्यवहार से बनते हैं। और जब व्यवहार बदल जाता है, तब रिश्ते भी बदल जाते हैं।

शायद यही कारण है कि कुछ लोग हमारे जीवन में ज़्यादा देर तक नहीं रहते, लेकिन उनकी कमी बहुत देर तक रहती है।

इस अध्याय की बात किसी एक रिश्ते तक सीमित नहीं है। यह हर उस रिश्ते की कहानी है, जिसे हमने “अपने आप चलता रहेगा” समझ लिया। हर उस इंसान की कहानी है, जिसने इंतज़ार किया कि सामने वाला समझेगा। और हर उस दिल की कहानी है, जिसने बहुत देर से जाना कि रिश्तों को बचाने के लिए सही समय वही होता है—जब वे टूटे नहीं होते।

अगले अध्याय में हम उस अकेलेपन की बात करेंगे, जो रिश्तों के जाने के बाद नहीं, बल्कि उनके रहते हुए शुरू हो जाता है—और जो इंसान को बाहर से नहीं, भीतर से तोड़ता है।


अध्याय 3

भीड़ में पनपता अकेलापन**

अकेलापन हमेशा खाली कमरों में नहीं जन्म लेता।
कभी-कभी वह सबसे ज़्यादा लोगों के बीच पनपता है।

जब आसपास आवाज़ें होती हैं, हँसी होती है, बातचीत होती है, और फिर भी भीतर कुछ ख़ाली रहता है—वही असली अकेलापन होता है। वह अकेलापन जो नज़र नहीं आता, जिसे समझाया नहीं जा सकता, और जो धीरे-धीरे इंसान को खुद से दूर कर देता है।

बीते कल की कीमत तब और भारी लगती है, जब हमें एहसास होता है कि हम अकेले तब नहीं हुए, जब लोग चले गए—हम अकेले तब हुए, जब लोग रहते हुए भी हमारे नहीं रहे।

उस व्यक्ति को याद आया कि कभी वह लोगों से घिरा रहता था। फोन लगातार बजता था, संदेश आते थे, मिलने-जुलने के बहाने बनते थे। तब उसे सुकून नहीं मिलता था, क्योंकि शोर बहुत था। आज शोर नहीं है, लेकिन सुकून भी नहीं है। फर्क सिर्फ़ इतना है कि तब वह थका हुआ था, आज वह ख़ाली है।

अकेलापन अचानक नहीं आता। वह धीरे-धीरे हमारी ज़िंदगी में जगह बनाता है। पहले वह हमें दूसरों से कम बोलने पर मजबूर करता है, फिर खुद से। एक दिन ऐसा आता है जब हम अपने ही सवालों से बचने लगते हैं, क्योंकि जवाब बहुत भारी होते हैं।

हम अक्सर सोचते हैं कि अकेलापन रिश्तों की कमी से आता है। सच्चाई यह है कि अकेलापन समझे जाने की कमी से आता है। जब हम किसी के सामने अपना मन खोलना चाहते हैं और हर बार यह महसूस करते हैं कि सामने वाला सुन तो रहा है, लेकिन समझ नहीं रहा—तब अकेलापन जन्म लेता है।

बीते कल में शायद कोई था, जो बिना कहे समझ लेता था। हमारी चुप्पी भी पढ़ लेता था। हमारी आँखों की थकान भी पहचान लेता था। आज लोग सवाल तो पूछते हैं, लेकिन जवाब सुनने का समय नहीं रखते। और जब कोई हमारे जवाबों में दिलचस्पी नहीं दिखाता, तब हम बोलना छोड़ देते हैं।

अकेलापन हमें कमजोर नहीं बनाता, वह हमें खामोश बना देता है। और खामोशी बाहर से मजबूत दिखती है। लोग कहते हैं—“यह तो बहुत शांत है, बहुत समझदार है।” कोई नहीं जानता कि यह शांति लड़ाई हारने के बाद आती है।

उस व्यक्ति को याद आया—कभी उसे अपने कमरे से डर लगता था। उसे अकेले रहना पसंद नहीं था। आज वही कमरा उसका सबसे सुरक्षित स्थान है। क्योंकि वहीं वह बिना किसी दिखावे के टूट सकता है। बाहर उसे मजबूत बनकर रहना पड़ता है।

बीते कल की कीमत यहाँ भी चुकानी पड़ती है। क्योंकि कभी हम अकेले रहना सीखते नहीं थे—हम हमेशा किसी के सहारे थे। आज सहारा नहीं है, तो अकेले रहना मजबूरी बन गया है।

अकेलापन हमें दूसरों से नहीं काटता, वह हमें खुद से जोड़ देता है—लेकिन उस रूप में, जिसमें हम खुद को पहचान नहीं पाते। हम अपने पुराने रूप को ढूँढते हैं, लेकिन वह अब अतीत का हिस्सा बन चुका होता है।

लोग अक्सर कहते हैं—“खुद से प्यार करना सीखो।”
लेकिन कोई यह नहीं बताता कि खुद से मिलने की प्रक्रिया कितनी दर्दनाक होती है। खुद से सवाल करना, अपनी गलतियाँ स्वीकार करना, अपने अधूरेपन को देखना—यह सब आसान नहीं होता।

अकेलेपन की रातें सबसे लंबी होती हैं। दिन किसी तरह बीत जाता है—काम, बातचीत, व्यस्तता के सहारे। लेकिन रातें? रातें हमें आईना दिखाती हैं। तब कोई काम नहीं होता, कोई बहाना नहीं होता। बस हम होते हैं और हमारी यादें।

बीते कल की सबसे बड़ी चोट यही होती है कि वह रातों में ज़्यादा बोलता है। वह हमें वे सारे पल याद दिलाता है, जिन्हें हमने हल्के में लिया था। वे सारे लोग, जिन्हें हमने यह सोचकर टाल दिया था कि वे तो हमेशा रहेंगे।

उस व्यक्ति ने एक रात खुद से पूछा—
“क्या मैं सच में अकेला हूँ, या मैंने खुद को अकेला कर लिया है?”
इस सवाल का जवाब आसान नहीं था। क्योंकि सच अक्सर बीच में कहीं होता है।

अकेलापन कभी-कभी हमें बेहतर इंसान भी बनाता है। वह हमें सुनना सिखाता है—दूसरों को नहीं, खुद को। वह हमें सिखाता है कि हर खालीपन को भरना ज़रूरी नहीं होता। कुछ खालीपन हमें गहराई देते हैं।

लेकिन यह गहराई तभी काम आती है, जब हम उसमें डूबें नहीं, उतरना सीखें। वरना अकेलापन हमें निगल भी सकता है।

बीते कल की कीमत यहाँ यह सिखाती है कि अगर कभी कोई हमारे साथ था, जिसने हमारे अकेलेपन को हल्का किया था, तो उसकी अहमियत को समझना चाहिए था। क्योंकि हर कोई हमारे अकेलेपन का साथी नहीं बन सकता।

उस व्यक्ति को एहसास हुआ कि वह अब भी लोगों के बीच जा सकता है, हँस सकता है, बातें कर सकता है। लेकिन वह जो खालीपन भीतर है, उसे कोई और नहीं भर सकता। उसे खुद ही उससे दोस्ती करनी होगी।

अकेलापन दुश्मन नहीं है। वह एक अवस्था है। लेकिन अगर हम उसे अपना स्थायी पता बना लें, तो वह हमें धीरे-धीरे ख़त्म कर देता है।

इस अध्याय की कहानी हर उस इंसान की है, जो बाहर से मजबूत और भीतर से थका हुआ है। हर उस चेहरे की है, जो हँसते हुए भी कुछ खो चुका है। और हर उस दिल की है, जिसने यह समझा कि अकेलापन लोगों के जाने से नहीं, जुड़ाव के टूटने से आता है।

अगले अध्याय में हम उस पछतावे की बात करेंगे, जो अकेलेपन के बाद आता है—जब इंसान यह सोचने लगता है कि अगर उस दिन थोड़ा रुक गया होता, तो आज शायद यह खामोशी न होती।


अध्याय 4

पछतावे की परछाइयाँ**

पछतावा किसी तूफ़ान की तरह नहीं आता।
वह धूप में खड़ी एक परछाईं की तरह आता है—हर वक़्त हमारे साथ, हर क़दम पर हमारे पीछे।

हम उसे देखते नहीं, लेकिन वह हमें छोड़ता भी नहीं। बीते कल की कीमत सबसे ज़्यादा इसी रूप में चुकानी पड़ती है। जब कुछ किया जा सकता था, तब हमने नहीं किया—और जब करना चाहा, तब वक़्त हमारे हाथ से निकल चुका था।

पछतावे की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह तब आता है, जब हालात बदल चुके होते हैं। जब दरवाज़े बंद हो चुके होते हैं। जब माफ़ी माँगने के लिए शब्द तो होते हैं, लेकिन सामने वाला नहीं। तब इंसान बार-बार पीछे मुड़कर देखता है—उन रास्तों को, जहाँ वह मुड़ सकता था, रुक सकता था, या बस थोड़ा सा धीमा चल सकता था।

उस व्यक्ति को अक्सर लगता था कि उसने कोई बहुत बड़ी गलती नहीं की। उसने बस कुछ बातों को टाल दिया था। कुछ कॉल्स को बाद के लिए छोड़ दिया था। कुछ मुलाक़ातों को अगली तारीख़ पर डाल दिया था। उसे नहीं पता था कि ज़िंदगी में सबसे भारी कीमत हम उन्हीं चीज़ों की चुकाते हैं, जिन्हें हम ज़रूरी नहीं समझते।

पछतावा हमेशा “गलत करने” से नहीं आता। वह अक्सर “सही न करने” से आता है। जब हमें पता होता है कि हमें क्या करना चाहिए था, लेकिन हमने सुविधा, डर या आलस्य की वजह से नहीं किया। यही अधूरापन बाद में भीतर से खोखला करता है।

बीते कल की कीमत तब और तीखी लगती है, जब हमें एहसास होता है कि हमारी चुप्पी ने किसी को चोट पहुँचाई थी। कि हमारा व्यस्त होना किसी के लिए उपेक्षा बन गया था। और हम यह सोचते रहे कि सामने वाला समझेगा, जबकि वह हर दिन थोड़ा-थोड़ा टूटता रहा।

पछतावा हमें रातों में ज़्यादा सताता है। दिन में हम किसी तरह खुद को संभाल लेते हैं—काम, बातचीत, ज़िम्मेदारियों के सहारे। लेकिन रात में? रात में कोई पर्दा नहीं होता। तब यादें बिना इजाज़त लौट आती हैं। तब हर अधूरा वाक्य, हर अधूरी मुलाक़ात हमारे सामने खड़ी हो जाती है।

उस व्यक्ति को याद आया—एक शाम, जब किसी ने कहा था,
“आज बात कर लेते हैं।”
और उसने जवाब दिया था,
“आज नहीं, बहुत थक गया हूँ।”

उसने यह नहीं सोचा था कि यह थकान कुछ घंटों की थी, और यह दूरी शायद उम्र भर की।

पछतावे की परछाइयाँ सबसे ज़्यादा उन्हीं रिश्तों पर पड़ती हैं, जिनकी हमें सबसे ज़्यादा परवाह थी। जिनसे हम उम्मीद करते थे कि वे समझेंगे। लेकिन उम्मीदें तभी तक सुरक्षित होती हैं, जब तक उन्हें संभालकर रखा जाए। लापरवाही उन्हें भी तोड़ देती है।

बीते कल की कीमत हमें यह सिखाती है कि हर “बाद में” के पीछे एक जोखिम छुपा होता है। क्योंकि वक़्त कभी यह वादा नहीं करता कि वह हमें दोबारा मौका देगा। और जब मौका चला जाता है, तब पछतावा हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि काश उस दिन हमने थोड़ा सा हिम्मत दिखाई होती।

पछतावा केवल रिश्तों से जुड़ा नहीं होता। वह हमारे सपनों से भी जुड़ा होता है। उन सपनों से, जिन्हें हमने यह सोचकर टाल दिया कि अभी सही समय नहीं है। उन इच्छाओं से, जिन्हें हमने दूसरों की उम्मीदों के नीचे दबा दिया। और जब साल बीत जाते हैं, तब हमें एहसास होता है कि हम किसी और की ज़िंदगी जीते रहे।

उस व्यक्ति ने खुद से पूछा—
“अगर मैं वापस जा पाता, तो क्या बदलता?”
और फिर खुद ही चुप हो गया। क्योंकि वापस जाना संभव नहीं था। लेकिन यह सवाल अब भी भीतर गूँज रहा था।

पछतावा हमें तोड़ सकता है, लेकिन वही पछतावा हमें दिशा भी दे सकता है। फर्क सिर्फ़ इस बात का होता है कि हम उसे बोझ बनाएँ या सबक। कुछ लोग पछतावे के नीचे दब जाते हैं। कुछ लोग उसी पछतावे को अपने आने वाले कल की नींव बना लेते हैं।

बीते कल की कीमत का सबसे बड़ा सच यही है कि वह हमें दर्द देने के लिए नहीं, जगाने के लिए होती है। वह हमें यह याद दिलाने आती है कि अभी भी जो हमारे पास है, वह भी कल बन सकता है।

उस व्यक्ति को धीरे-धीरे यह एहसास होने लगा कि पछतावे से भागने का कोई रास्ता नहीं है। लेकिन उसके साथ जीने का तरीका बदला जा सकता है। वह यह तय कर सकता है कि आगे वह किसी को “बाद में” पर नहीं छोड़ेगा। कि आगे वह अपनी भावनाओं को टालेगा नहीं।

लेकिन यह फैसला आसान नहीं था। क्योंकि आदतें बदलना उतना ही मुश्किल होता है, जितना समय को रोकना। फिर भी, हर बड़ा बदलाव एक छोटे से निर्णय से शुरू होता है।

इस अध्याय की कहानी हर उस इंसान की है, जिसने अपने जीवन में कभी कहा—
“काश मैंने उस दिन ऐसा किया होता।”

हर उस दिल की है, जिसने देर से जाना कि सबसे भारी बोझ गलतियाँ नहीं होतीं, बल्कि वे मौके होते हैं, जिन्हें हमने खो दिया।

अगले अध्याय में हम उस मोड़ की बात करेंगे, जहाँ इंसान पछतावे से आगे बढ़ने की कोशिश करता है—जहाँ वह यह तय करता है कि बीता हुआ कल उसे परिभाषित नहीं करेगा, बल्कि उसे दिशा देगा।


अध्याय 5

जब इंसान आगे बढ़ने की कोशिश करता है**

पछतावे के बाद सबसे कठिन काम होता है—आगे बढ़ना।
क्योंकि आगे बढ़ना सिर्फ़ चलना नहीं होता, वह भीतर छूटे हुए हिस्सों को समेटते हुए चलना होता है।

बीता हुआ कल हमें पकड़कर नहीं रखता, हम खुद उससे चिपके रहते हैं। हम उसके हर दृश्य को बार-बार देखते हैं, हर शब्द को दोहराते हैं, और हर उस मोड़ को गिनते हैं जहाँ हम कुछ और कर सकते थे। आगे बढ़ने की कोशिश तभी शुरू होती है, जब हम यह मान लेते हैं कि बीता हुआ कल बदला नहीं जा सकता, लेकिन आने वाला कल अब भी हमारे हाथ में है।

उस व्यक्ति ने एक दिन तय किया कि वह खुद को सज़ा देना बंद करेगा। यह निर्णय अचानक नहीं आया। यह कई रातों की बेचैनी, कई सुबहों की थकान, और कई अधूरी कोशिशों के बाद आया था। क्योंकि इंसान जब तक खुद को दोषी मानता रहता है, तब तक वह बदलाव के लिए तैयार नहीं होता।

आगे बढ़ने का मतलब यह नहीं होता कि हम भूल जाते हैं। भूलना अक्सर संभव भी नहीं होता। आगे बढ़ने का मतलब होता है—यादों के साथ जीना सीखना। उन्हें अपने वर्तमान पर हावी न होने देना। यह एक अभ्यास है, जो रोज़ करना पड़ता है।

बीते कल की कीमत यहाँ भी सामने आती है। क्योंकि आगे बढ़ते हुए हम समझते हैं कि हर गलती हमें कुछ सिखाने आई थी। अगर हम उस सीख को स्वीकार कर लें, तो पछतावा हल्का हो जाता है। लेकिन अगर हम सीख से भागते रहें, तो पछतावा बोझ बन जाता है।

उस व्यक्ति ने छोटे-छोटे बदलाव करने शुरू किए। उसने हर उस बात को तुरंत कहना शुरू किया, जो पहले वह टाल देता था। उसने हर उस इंसान को अहमियत देनी शुरू की, जो अब भी उसके साथ था। उसे एहसास हुआ कि आगे बढ़ना किसी बड़ी क्रांति से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे ईमानदार कदमों से होता है।

लेकिन आगे बढ़ने की राह सीधी नहीं होती। कई बार इंसान दो क़दम आगे बढ़ता है और एक क़दम पीछे लौट आता है। कभी कोई गाना, कोई खुशबू, कोई जगह अचानक बीते कल को सामने ले आती है। तब लगता है कि सारी मेहनत बेकार हो गई। लेकिन सच यह है कि पीछे लौटना असफलता नहीं है—वह बस इंसानी होना है।

बीते कल की कीमत हमें यह सिखाती है कि खुद को माफ़ करना भी एक कला है। हम दूसरों को माफ़ करने की कोशिश करते हैं, लेकिन खुद के लिए सबसे ज़्यादा कठोर होते हैं। आगे बढ़ने के लिए सबसे पहले खुद को माफ़ करना ज़रूरी होता है।

उस व्यक्ति ने यह भी सीखा कि हर रिश्ते को वापस नहीं लाया जा सकता। कुछ रिश्ते हमारे जीवन में एक अध्याय होते हैं, पूरी किताब नहीं। उन्हें जबरदस्ती पकड़ने की कोशिश करना, खुद को और चोट पहुँचाना होता है।

आगे बढ़ने का मतलब यह भी होता है कि हम कुछ सवालों के जवाब कभी नहीं पाएँगे। कुछ “क्यों” हमेशा अधूरे रहेंगे। और यही अधूरापन हमें यह सिखाता है कि हर चीज़ को समझना ज़रूरी नहीं, कुछ चीज़ों को स्वीकार करना ज़रूरी होता है।

बीते कल की कीमत यहाँ एक उम्मीद भी बन जाती है। क्योंकि जब इंसान यह देखता है कि वह अब भी बदल सकता है, तब उसे अपने भीतर एक नई ताक़त का एहसास होता है। वह ताक़त जो उसे बताती है कि दर्द अंत नहीं है, बल्कि एक मोड़ है।

उस व्यक्ति ने अपने दिन को नए तरीक़े से जीना शुरू किया। वह हर सुबह यह याद करता कि आज का दिन कल नहीं बने—इस डर में नहीं, बल्कि इस समझ के साथ कि आज को जीना ही सबसे बड़ा सम्मान है।

आगे बढ़ना मतलब यह नहीं कि पीछे मुड़कर देखना बंद कर दिया जाए। आगे बढ़ना मतलब यह है कि पीछे देखकर रुक न जाएँ। बीता हुआ कल हमारा हिस्सा है, लेकिन वह हमारा पूरा अस्तित्व नहीं है।

इस अध्याय की कहानी हर उस इंसान की है, जिसने टूटने के बाद उठने की कोशिश की। जिसने यह तय किया कि उसकी गलतियाँ उसकी पहचान नहीं होंगी। और जिसने यह समझा कि आगे बढ़ना कोई मंज़िल नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया है।

अगले अध्याय में हम उस उम्मीद की बात करेंगे, जो इन सबके बीच धीरे-धीरे जन्म लेती है—एक शांत, सधी हुई उम्मीद, जो शोर नहीं करती, लेकिन रास्ता दिखाती है।


अध्याय 6

जब इंसान आगे बढ़ने की कोशिश करता है**

पछतावे के बाद सबसे कठिन काम होता है—आगे बढ़ना।
क्योंकि आगे बढ़ना सिर्फ़ चलना नहीं होता, वह भीतर छूटे हुए हिस्सों को समेटते हुए चलना होता है।

बीता हुआ कल हमें पकड़कर नहीं रखता, हम खुद उससे चिपके रहते हैं। हम उसके हर दृश्य को बार-बार देखते हैं, हर शब्द को दोहराते हैं, और हर उस मोड़ को गिनते हैं जहाँ हम कुछ और कर सकते थे। आगे बढ़ने की कोशिश तभी शुरू होती है, जब हम यह मान लेते हैं कि बीता हुआ कल बदला नहीं जा सकता, लेकिन आने वाला कल अब भी हमारे हाथ में है।

उस व्यक्ति ने एक दिन तय किया कि वह खुद को सज़ा देना बंद करेगा। यह निर्णय अचानक नहीं आया। यह कई रातों की बेचैनी, कई सुबहों की थकान, और कई अधूरी कोशिशों के बाद आया था। क्योंकि इंसान जब तक खुद को दोषी मानता रहता है, तब तक वह बदलाव के लिए तैयार नहीं होता।

आगे बढ़ने का मतलब यह नहीं होता कि हम भूल जाते हैं। भूलना अक्सर संभव भी नहीं होता। आगे बढ़ने का मतलब होता है—यादों के साथ जीना सीखना। उन्हें अपने वर्तमान पर हावी न होने देना। यह एक अभ्यास है, जो रोज़ करना पड़ता है।

बीते कल की कीमत यहाँ भी सामने आती है। क्योंकि आगे बढ़ते हुए हम समझते हैं कि हर गलती हमें कुछ सिखाने आई थी। अगर हम उस सीख को स्वीकार कर लें, तो पछतावा हल्का हो जाता है। लेकिन अगर हम सीख से भागते रहें, तो पछतावा बोझ बन जाता है।

उस व्यक्ति ने छोटे-छोटे बदलाव करने शुरू किए। उसने हर उस बात को तुरंत कहना शुरू किया, जो पहले वह टाल देता था। उसने हर उस इंसान को अहमियत देनी शुरू की, जो अब भी उसके साथ था। उसे एहसास हुआ कि आगे बढ़ना किसी बड़ी क्रांति से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे ईमानदार कदमों से होता है।

लेकिन आगे बढ़ने की राह सीधी नहीं होती। कई बार इंसान दो क़दम आगे बढ़ता है और एक क़दम पीछे लौट आता है। कभी कोई गाना, कोई खुशबू, कोई जगह अचानक बीते कल को सामने ले आती है। तब लगता है कि सारी मेहनत बेकार हो गई। लेकिन सच यह है कि पीछे लौटना असफलता नहीं है—वह बस इंसानी होना है।

बीते कल की कीमत हमें यह सिखाती है कि खुद को माफ़ करना भी एक कला है। हम दूसरों को माफ़ करने की कोशिश करते हैं, लेकिन खुद के लिए सबसे ज़्यादा कठोर होते हैं। आगे बढ़ने के लिए सबसे पहले खुद को माफ़ करना ज़रूरी होता है।

उस व्यक्ति ने यह भी सीखा कि हर रिश्ते को वापस नहीं लाया जा सकता। कुछ रिश्ते हमारे जीवन में एक अध्याय होते हैं, पूरी किताब नहीं। उन्हें जबरदस्ती पकड़ने की कोशिश करना, खुद को और चोट पहुँचाना होता है।

आगे बढ़ने का मतलब यह भी होता है कि हम कुछ सवालों के जवाब कभी नहीं पाएँगे। कुछ “क्यों” हमेशा अधूरे रहेंगे। और यही अधूरापन हमें यह सिखाता है कि हर चीज़ को समझना ज़रूरी नहीं, कुछ चीज़ों को स्वीकार करना ज़रूरी होता है।

बीते कल की कीमत यहाँ एक उम्मीद भी बन जाती है। क्योंकि जब इंसान यह देखता है कि वह अब भी बदल सकता है, तब उसे अपने भीतर एक नई ताक़त का एहसास होता है। वह ताक़त जो उसे बताती है कि दर्द अंत नहीं है, बल्कि एक मोड़ है।

उस व्यक्ति ने अपने दिन को नए तरीक़े से जीना शुरू किया। वह हर सुबह यह याद करता कि आज का दिन कल नहीं बने—इस डर में नहीं, बल्कि इस समझ के साथ कि आज को जीना ही सबसे बड़ा सम्मान है।

आगे बढ़ना मतलब यह नहीं कि पीछे मुड़कर देखना बंद कर दिया जाए। आगे बढ़ना मतलब यह है कि पीछे देखकर रुक न जाएँ। बीता हुआ कल हमारा हिस्सा है, लेकिन वह हमारा पूरा अस्तित्व नहीं है।

इस अध्याय की कहानी हर उस इंसान की है, जिसने टूटने के बाद उठने की कोशिश की। जिसने यह तय किया कि उसकी गलतियाँ उसकी पहचान नहीं होंगी। और जिसने यह समझा कि आगे बढ़ना कोई मंज़िल नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया है।

अगले अध्याय में हम उस उम्मीद की बात करेंगे, जो इन सबके बीच धीरे-धीरे जन्म लेती है—एक शांत, सधी हुई उम्मीद, जो शोर नहीं करती, लेकिन रास्ता दिखाती है।


अध्याय 7

स्वीकार्यता, जहाँ शांति जन्म लेती है**

ज़िंदगी तब आसान नहीं होती, जब सब कुछ ठीक हो जाए।
ज़िंदगी तब सहज होने लगती है, जब हम यह मान लेते हैं कि सब कुछ ठीक होना ज़रूरी नहीं है।

स्वीकार्यता किसी हार का नाम नहीं है। यह थक जाने के बाद बैठ जाना नहीं है। यह वह बिंदु है, जहाँ इंसान लड़ना बंद नहीं करता, बल्कि अनावश्यक संघर्ष छोड़ देता है। बीते कल की कीमत चुकाने के बाद जब इंसान यहाँ पहुँचता है, तब उसे पहली बार भीतर एक स्थिरता का एहसास होता है।

उस व्यक्ति को अब यह साबित करने की ज़रूरत नहीं थी कि वह सही था। न ही उसे यह मनवाने की ज़रूरत थी कि उसके साथ गलत हुआ। उसने यह मान लिया था कि जीवन निष्पक्ष नहीं होता, लेकिन वह अर्थहीन भी नहीं होता। कुछ चीज़ें इसलिए होती हैं, ताकि हम वैसा इंसान बन सकें, जो हम पहले नहीं थे।

स्वीकार्यता का सबसे बड़ा रूप यही होता है कि हम बीते कल को बदलने की कोशिश छोड़ देते हैं। हम उसे मिटाने नहीं चाहते, न ही उससे भागते हैं। हम बस उसे उसकी जगह पर रहने देते हैं—एक अनुभव की तरह, एक शिक्षक की तरह।

बीते कल की कीमत अब उसे डराने नहीं लगी थी। क्योंकि उसने समझ लिया था कि हर कीमत बेकार नहीं होती। कुछ कीमतें हमें वह दृष्टि देती हैं, जिसके बिना आगे का रास्ता दिखता ही नहीं।

उस व्यक्ति को अब भी यादें आती थीं। अब भी कुछ शामें भारी हो जाती थीं। लेकिन फर्क यह था कि अब वह इन पलों से लड़ता नहीं था। वह जानता था कि भावनाएँ आना-जाना जानती हैं। उन्हें रोकने की कोशिश करना ही उन्हें ज़्यादा ताक़त देता है।

स्वीकार्यता का मतलब यह भी नहीं होता कि हम सब कुछ माफ़ कर देते हैं। कुछ ज़ख़्म माफ़ी नहीं, सीमा माँगते हैं। और जब हम अपनी सीमाएँ तय करना सीख लेते हैं, तब भीतर एक नई तरह की शांति जन्म लेती है।

बीते कल की कीमत यहाँ हमें आत्मसम्मान सिखाती है। यह बताती है कि हर रिश्ता बचाया नहीं जा सकता, और हर टूटन असफलता नहीं होती। कुछ अंत इसलिए होते हैं, ताकि हम खुद को खोने से बचा सकें।

उस व्यक्ति ने यह स्वीकार कर लिया था कि उसकी कहानी वैसी नहीं बनी, जैसी उसने सोची थी। लेकिन यह कहानी अब भी उसकी थी। और यही स्वामित्व उसे हल्का बनाता था।

स्वीकार्यता हमें वर्तमान में पूरी तरह रहने की अनुमति देती है। न पछतावे के बोझ के साथ, न भविष्य की घबराहट के साथ। बस अभी—जहाँ सांस चल रही है, दिल धड़क रहा है, और ज़िंदगी अब भी घट रही है।

बीते कल की कीमत यहाँ एक आशीर्वाद जैसी लगने लगती है। क्योंकि अगर वह दर्द न मिला होता, तो यह समझ शायद कभी न आती। अगर वह टूटन न होती, तो यह स्थिरता कभी न मिलती।

उस व्यक्ति ने अब दूसरों को भी वैसे देखना शुरू किया—कम अपेक्षाओं के साथ, ज़्यादा समझ के साथ। उसने यह जान लिया था कि हर इंसान अपनी लड़ाई लड़ रहा है। और यह जानना ही करुणा की शुरुआत होती है।

स्वीकार्यता हमें यह नहीं सिखाती कि उम्मीद छोड़ दो। वह हमें यह सिखाती है कि उम्मीद को यथार्थ से जोड़ो। ऐसे सपने देखो, जो ज़मीन पर चल सकें। ऐसे रिश्ते निभाओ, जो साँस ले सकें।

बीते कल की कीमत का अंतिम सच यही है—
वक़्त गुज़र जाने के बाद याद तो आता है,
लेकिन वापस वही नहीं आता।
और यही न लौट पाना हमें यह सिखाता है कि जो आज है, वही सबसे क़ीमती है।

इस अध्याय की कहानी किसी एक इंसान की नहीं, हर उस दिल की है, जिसने अंत में यह सीख लिया कि शांति बाहर नहीं मिलती—वह भीतर उगती है। स्वीकार करने से। समझने से। छोड़ देने से।

यहीं यह कहानी खत्म नहीं होती।
यहीं से असली जीना शुरू होता है।



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