यह पुस्तक किसी सिद्धांत को स्थापित करने के लिए नहीं लिखी गई है, न ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचने के आग्रह से। यह एक यात्रा का दस्तावेज़ है—एक ऐसी यात्रा, जो शब्दों से शुरू होकर मौन में समाप्त होती है। “त्रिलोकनाथ शंभू: समय से परे एक सत्य” मेरे लिए लेखन नहीं, स्मरण रहा है। स्मरण उस सत्य का, जिसे हम जानते हुए भी भूल जाते हैं।
शंभू को मैंने यहाँ किसी मूर्ति, किसी परंपरा या किसी विशेष पूजा-पद्धति के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास नहीं किया है। शंभू मेरे लिए वह चेतना हैं, जो हर मनुष्य के भीतर समान रूप से उपस्थित है—चाहे वह उसे किसी नाम से पुकारे या किसी नाम से नहीं। यह पुस्तक किसी धर्म की सीमा में नहीं बँधती; यह उस अनुभव की ओर संकेत करती है, जो धर्मों से पहले भी था और उनके बाद भी रहेगा।
इस ग्रंथ के अध्याय किसी क्रमबद्ध उपदेश की तरह नहीं रचे गए हैं। वे जीवन की तरह हैं—कभी उग्र, कभी मौन, कभी प्रश्नों से भरे, कभी उत्तरों से मुक्त। यदि कहीं आपको उत्तर मिले हों, तो उन्हें पकड़ने का आग्रह नहीं है। और यदि कहीं प्रश्न शेष रह जाएँ, तो यही इस पुस्तक की पूर्णता है। क्योंकि शंभू प्रश्नों को समाप्त नहीं करते—वे प्रश्न पूछने वाले को बदल देते हैं।
यह पुस्तक उन लोगों के लिए नहीं है, जो किसी निश्चित मार्गदर्शन की तलाश में हैं। यह उन लोगों के लिए है, जो खोज में हैं। जो टूट चुके हैं, पर फिर भी भीतर से पुकार महसूस करते हैं। जो संसार में रहते हुए भी कहीं गहरे मौन को सुनते हैं। यदि यह पुस्तक आपको शांत कर दे—तो अच्छा है। और यदि यह आपको बेचैन कर दे—तो भी अच्छा है। क्योंकि दोनों ही स्थितियाँ जागरण की ओर ले जाती हैं।
लेखन के इस क्रम में मैंने यह जानने का दावा नहीं किया कि शंभू क्या हैं। मैंने केवल यह स्वीकार किया है कि शंभू को जाना नहीं जा सकता—उन्हें जिया जा सकता है। इसीलिए इस पुस्तक में शब्दों से अधिक रिक्त स्थान हैं, और कथनों से अधिक संकेत। पाठक यदि उन रिक्त स्थानों को अपने अनुभव से भर सके, तो यही इस पुस्तक की सफलता होगी।
यदि इस पुस्तक का कोई एक भी वाक्य आपको भीतर की ओर मोड़ दे, यदि किसी पंक्ति के बाद आप कुछ क्षण मौन में ठहर जाएँ, यदि कहीं पढ़ते-पढ़ते आपकी श्वास धीमी हो जाए—तो समझिए कि शंभू वहाँ उपस्थित हैं। क्योंकि वे तभी आते हैं, जब शब्द पीछे हटते हैं।
मैं इस पुस्तक को किसी निष्कर्ष के साथ समाप्त नहीं करना चाहता। शंभू निष्कर्ष नहीं हैं; वे निरंतरता हैं। इसलिए यह लेखक की टिप्पणी भी अंत नहीं, एक द्वार है। उस द्वार से आगे पाठक स्वयं जाएगा—अपने समय में, अपनी गति से।
यदि यह पुस्तक आपको अपने भीतर कुछ कम कर दे—अहंकार, भय, अपेक्षा—तो यही इसका उद्देश्य है। और यदि यह पुस्तक आपको कुछ दे—शांति, स्पष्टता, साहस—तो वह पहले से ही आपके भीतर था।
मैं केवल स्मरण कराने आया हूँ।
शेष—
शंभू पर छोड़ता हूँ।
Chapter 1
समय के आर-पार खड़ा एक नाम : शंभू**
समय—जिसे मनुष्य ने अपनी सुविधा के लिए मापा, बाँटा और सीमित किया—वास्तव में कभी भी वैसा नहीं रहा जैसा उसे समझा गया। घड़ी की सुइयों में बँधा समय, कैलेंडर के पन्नों में सिमटा हुआ समय, जन्म और मृत्यु के बीच खिंची हुई एक पतली रेखा—ये सब मनुष्य की दृष्टि की सीमाएँ हैं, सत्य नहीं। सत्य तो वह है जो समय से पहले भी था, समय में भी है और समय के बाद भी रहेगा। उसी सत्य का एक नाम है—शंभू। त्रिलोकों के स्वामी, सृष्टि के मौन साक्षी, और चेतना के उस शिखर पर स्थित जहाँ पहुँचकर शब्द थक जाते हैं।
शंभू कोई केवल देवता नहीं हैं, कोई मूर्ति नहीं, कोई परंपरा नहीं। वे एक स्थिति (State of Being) हैं—जहाँ अहंकार गलकर शून्य हो जाता है और शून्य स्वयं प्रकाशमान हो उठता है। उन्हें समझने के लिए इतिहास नहीं, अनुभव चाहिए; उन्हें जानने के लिए तर्क नहीं, समर्पण चाहिए; और उन्हें पाने के लिए कोई यात्रा नहीं, क्योंकि वे पहले से ही भीतर उपस्थित हैं। यही कारण है कि शंभू को “त्रिलोकनाथ” कहा गया—भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक के स्वामी—पर वास्तव में वे लोकों से परे हैं, क्योंकि लोक स्वयं उन्हीं की चेतना से उत्पन्न हुए हैं।
जब सृष्टि का कोई स्वरूप नहीं था, जब न आकाश था, न पृथ्वी, न प्रकाश और न अंधकार—तब भी कुछ था। वह “कुछ” कोई वस्तु नहीं था, बल्कि एक अपरिभाषित चेतना थी। उसी चेतना ने स्वयं को जानने की इच्छा की, और वही इच्छा सृष्टि का प्रथम स्पंदन बनी। उसी स्पंदन से नाद उत्पन्न हुआ, और उसी नाद का आदिस्वर था—ॐ। उस ॐ का ही साकार और निराकार संगम हैं—शंभू। इसलिए कहा गया कि शिव आदिदेव हैं, क्योंकि वे किसी के बाद नहीं आए; सब कुछ उनके बाद आया।
मनुष्य जब शंभू को देखता है, तो उन्हें भस्म लिप्त शरीर में, जटाओं में गंगा धारण किए, ललाट पर चंद्र सजाए हुए देखता है। पर यह दृश्य केवल प्रतीक है। भस्म बताती है कि सब कुछ नश्वर है; जटाएँ बताती हैं कि विचारों को बाँधने की नहीं, साधने की आवश्यकता है; गंगा बताती है कि करुणा निरंतर बहनी चाहिए; और चंद्र बताता है कि शीतलता शक्ति से बड़ी होती है। शंभू का प्रत्येक रूप, प्रत्येक आभूषण, प्रत्येक मौन—एक गूढ़ दर्शन है।
इस संसार में अधिकतर लोग शक्ति की कामना करते हैं—सत्ता की शक्ति, धन की शक्ति, ज्ञान की शक्ति। पर शंभू उस शक्ति के प्रतीक हैं जो कुछ न चाहने से उत्पन्न होती है। वे वैराग्य के देवता हैं, पर पलायन के नहीं; वे संन्यास के प्रतीक हैं, पर जीवन से विमुख होने के नहीं। वे गृहस्थ भी हैं—पार्वती के पति, गणेश और कार्तिकेय के पिता—और फिर भी पूर्णतः आसक्ति-रहित। यही विरोधाभास शंभू को समझना कठिन और अनिवार्य बनाता है।
समय के साथ-साथ मनुष्य ने देवताओं को भी अपने जैसा बना लिया—उनसे माँगने लगा, उनसे सौदे करने लगा, उनसे डरने लगा। पर शंभू ऐसे देव हैं जो माँगने वाले से पहले देने को तैयार रहते हैं, और डरने वाले को अपने मौन से निर्भय बना देते हैं। वे “भोलेनाथ” कहलाते हैं, क्योंकि उन्हें छल समझ में नहीं आता; पर यही भोलेपन में छिपी है उनकी परम गहनता। वे विष भी पी जाते हैं, पर अमृत का ढिंढोरा नहीं पीटते।
समुद्र मंथन की कथा केवल एक पौराणिक घटना नहीं है; वह जीवन का रूपक है। जब जीवन का समुद्र मथा जाता है—संघर्षों, द्वंद्वों और पीड़ाओं से—तो सबसे पहले विष निकलता है। अधिकांश लोग उस विष को दूसरों पर डाल देते हैं, पर शंभू उसे स्वयं पी लेते हैं। वे विष को कंठ में रोक लेते हैं, जीवन में नहीं उतरने देते। इसीलिए उनका कंठ नीला है, पर उनका हृदय करुणा से भरा हुआ। यह हमें सिखाता है कि पीड़ा को आत्मा तक मत पहुँचने दो; उसे चेतना के स्तर पर रोक लो।
शंभू का नृत्य—तांडव—भी अक्सर गलत समझा गया है। लोग उसे विनाश का नृत्य मानते हैं, पर वास्तव में वह परिवर्तन का नृत्य है। जो जड़ है, जो सड़ चुका है, जो आगे बढ़ने में बाधा है—उसे तोड़ना ही पड़ेगा। तांडव विनाश नहीं, शुद्धिकरण है। उसी तांडव के बाद लास्य आता है—सृजन, सौंदर्य और संतुलन। शंभू के बिना सृष्टि स्थिर हो जाएगी, और बिना शक्ति के सृष्टि अराजक।
इस अध्याय में शंभू को किसी मंदिर की सीमा में बाँधने का प्रयास नहीं है। यहाँ शंभू को उस अनुभव के रूप में देखने का प्रयास है जो हर मनुष्य के जीवन में किसी न किसी क्षण प्रकट होता है—जब वह टूटकर भी शांत होता है, जब वह हारकर भी हल्का महसूस करता है, जब वह सब कुछ खोकर भी भीतर से पूर्ण होता है। वही क्षण शंभू का स्पर्श है।
मनुष्य बार-बार पूछता है—मैं कौन हूँ? मेरा उद्देश्य क्या है? मेरा मार्ग कौन सा है? शंभू इन प्रश्नों का उत्तर शब्दों में नहीं देते। वे उत्तर को अनुभव बना देते हैं। जब साधक ध्यान में बैठता है और विचार शिथिल होने लगते हैं, जब श्वास और प्रश्वास के बीच एक क्षण का मौन उतरता है—उसी मौन में शंभू उपस्थित होते हैं। वे कहते नहीं, दिखाते हैं।
“त्रिलोकनाथ शंभू: समय से परे एक सत्य” केवल एक पुस्तक का शीर्षक नहीं, बल्कि एक आमंत्रण है—अपने भीतर उतरने का, अपने अहंकार को भस्म करने का, और उस सत्य से मिलने का जो न जन्म लेता है, न मरता है। इस पहले अध्याय का उद्देश्य किसी निष्कर्ष पर पहुँचना नहीं है, बल्कि पाठक को उस द्वार तक ले जाना है जहाँ से यात्रा स्वयं आरंभ होती है।
क्योंकि शंभू कोई गंतव्य नहीं हैं।
वे स्वयं यात्रा हैं।
और जब यात्रा स्वयं शंभू हो,
तो समय अपने आप पीछे छूट जाता है।
Chapter 2
भस्म से चेतना तक : अहंकार का विसर्जन**
मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि वह स्वयं को वही मान लेता है जो वह दिखता है। शरीर, नाम, पद, संबंध, उपलब्धियाँ—इन सबको जोड़कर वह “मैं” बना लेता है और उसी “मैं” की रक्षा में पूरा जीवन व्यतीत कर देता है। पर शंभू के मार्ग में पहला सत्य यही है कि जो दिखता है, वही सत्य नहीं होता। सत्य वह है जो दिखने से पहले भी था और दिखना समाप्त होने के बाद भी रहेगा। इसीलिए शंभू के शरीर पर भस्म है—क्योंकि भस्म स्मरण कराती है कि अंततः सब कुछ इसी में परिवर्तित होना है।
भस्म मृत्यु का नहीं, अहंकार के अंत का प्रतीक है। शंभू मृत्यु से भयभीत नहीं करते; वे भय से मुक्त करते हैं। जब साधक पहली बार इस सत्य से साक्षात्कार करता है कि उसका शरीर नश्वर है, तो वह घबरा जाता है। पर यही घबराहट धीरे-धीरे विवेक बनती है। शंभू उस विवेक का नाम हैं, जो कहता है—जो बदल रहा है, वह तुम नहीं हो।
अहंकार केवल “मैं” कहने का भाव नहीं है; अहंकार वह गाँठ है जो चेतना को सीमित कर देती है। “मेरा”, “मेरी पहचान”, “मेरी प्रतिष्ठा”—यही वह विष है जिसे मनुष्य रोज़-रोज़ पीता है और फिर भी स्वयं को निर्दोष मानता है। शंभू का मार्ग इस विष को बाहर फेंकने का नहीं, बल्कि उसे पहचानकर उससे ऊपर उठने का मार्ग है। ठीक वैसे ही जैसे उन्होंने समुद्र मंथन में विष पिया, पर उसे हृदय तक नहीं जाने दिया।
भस्म का लेपन यह भी सिखाता है कि सजावट सत्य नहीं है। संसार चमक से प्रभावित होता है, पर शंभू सादगी में स्थित हैं। उनके पास कोई सिंहासन नहीं, कोई स्वर्ण-मुकुट नहीं, कोई ऐश्वर्य-प्रदर्शन नहीं। उनका निवास कैलाश है—जो बर्फ़ से ढका, निर्जन और मौन है। यह मौन ही उनकी भाषा है। वहाँ शब्द नहीं, केवल अनुभूति है।
शंभू के मार्ग में चलने वाला साधक धीरे-धीरे यह समझने लगता है कि जीवन का उद्देश्य संग्रह नहीं, त्याग है। जितना अधिक तुम छोड़ते हो, उतना अधिक हल्के होते हो। और जितना हल्के होते हो, उतना ही ऊपर उठते हो। यह कोई पलायन नहीं है; यह भारमुक्ति है। शंभू संसार छोड़ने को नहीं कहते, वे संसार का बोझ छोड़ने को कहते हैं।
मनुष्य अक्सर पूछता है—यदि सब कुछ छोड़ दूँ, तो मेरा क्या बचेगा? यही प्रश्न अहंकार की अंतिम चाल है। शंभू का उत्तर सीधा है—जब सब कुछ झूठा छूट जाता है, तब जो बचता है, वही सत्य है। वही आत्मा है। वही चेतना है। वही शंभू है।
ध्यान की अवस्था में, जब विचार धीरे-धीरे शांत होते हैं, जब मन की लहरें थमने लगती हैं, तब एक अजीब-सी शून्यता प्रकट होती है। अधिकतर लोग उस शून्यता से डर जाते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि वे स्वयं को खो रहे हैं। पर वास्तव में वे पहली बार स्वयं को पा रहे होते हैं। शंभू उसी शून्यता के देवता हैं—पर वह शून्यता रिक्त नहीं है, वह संभावनाओं से भरी हुई पूर्णता है।
जटाओं में बँधी गंगा केवल नदी नहीं है। वह चेतना की धारा है, जो उग्र भी है और पवित्र भी। यदि उसे खुला छोड़ दिया जाए, तो वह सब कुछ बहा ले जाए; और यदि उसे बाँध दिया जाए, तो वह जीवनदायिनी बन जाती है। शंभू ने गंगा को जटाओं में धारण कर यह सिखाया कि ऊर्जा को दबाना नहीं है, संयमित करना है। यही योग है। यही साधना है।
शंभू के त्रिनेत्र को भी अक्सर भय के रूप में देखा गया है। पर तीसरी आँख विनाश की नहीं, जागरण की आँख है। जब वह खुलती है, तब भ्रम जल जाता है। तब व्यक्ति स्वयं को केंद्र में रखकर संसार को देखना बंद कर देता है, और संसार के केंद्र में स्वयं को देखना शुरू करता है। यही दृष्टि परिवर्तन है। यही मुक्ति का द्वार है।
इस अध्याय में शंभू को उस शिक्षक के रूप में देखा जाना चाहिए, जो शब्दों से नहीं, स्थिति से सिखाते हैं। वे उपदेश नहीं देते, वे उदाहरण बनते हैं। उनका जीवन ही उनका शास्त्र है। उनका मौन ही उनका प्रवचन है।
मनुष्य अक्सर पूछता है—क्या शंभू तक पहुँचना संभव है? पर सही प्रश्न यह नहीं है। सही प्रश्न यह है—क्या मैं अपने झूठे स्वरूप को छोड़ने को तैयार हूँ? क्योंकि शंभू कहीं दूर नहीं हैं। वे उसी क्षण प्रकट हो जाते हैं, जिस क्षण तुम स्वयं होने का अभिनय छोड़ देते हो।
“त्रिलोकनाथ शंभू” इस अध्याय में किसी देवालय में विराजमान मूर्ति नहीं हैं। वे उस आंतरिक अग्नि के रूप में उपस्थित हैं, जो असत्य को जलाती है, पर सत्य को प्रकाशित करती है। वे उस भस्म के रूप में हैं, जो अंत नहीं, आरंभ का संकेत है।
और जब साधक यह समझ लेता है कि भस्म में लिपटना मृत्यु नहीं, बल्कि मुक्ति है—
तभी उसकी चेतना पहली बार वास्तव में जीवित होती है।
Chapter 3
तांडव : परिवर्तन का शाश्वत नृत्य**
मनुष्य को सबसे अधिक भय परिवर्तन से लगता है। वह जो है, जहाँ है, जैसा है—उसी को स्थायी मान लेना चाहता है। वह चाहता है कि जीवन एक सीधी रेखा की तरह चले, बिना झटकों के, बिना टूटन के, बिना प्रश्नों के। पर अस्तित्व की प्रकृति ऐसी नहीं है। अस्तित्व गतिशील है, प्रवाही है, निरंतर बदलता हुआ। और इसी परिवर्तन का सबसे सशक्त, सबसे उग्र और सबसे पवित्र प्रतीक है—तांडव।
तांडव को अक्सर विनाश का नृत्य कहा गया, पर यह अधूरा सत्य है। विनाश केवल एक चरण है, लक्ष्य नहीं। तांडव वास्तव में उस प्रक्रिया का नाम है जिसमें पुराना टूटता है, ताकि नया जन्म ले सके। यदि बीज मिट्टी में टूटे नहीं, तो अंकुर कैसे फूटेगा? यदि रात समाप्त न हो, तो सुबह कैसे आएगी? शंभू का तांडव इसी अनिवार्य टूटन का उत्सव है।
शंभू जब नृत्य करते हैं, तो उनके चरण पृथ्वी पर नहीं पड़ते—वे चेतना पर पड़ते हैं। हर एक पदचाप जड़ता को हिलाती है, हर एक घूमना समय की सीमाओं को तोड़ता है, और हर एक ठहराव उस मौन को प्रकट करता है जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि विश्राम करती है। तांडव उग्र है, क्योंकि सत्य को प्रकट करने के लिए कभी-कभी उग्र होना आवश्यक होता है। झूठ को सहलाकर हटाया नहीं जा सकता; उसे तोड़ना पड़ता है।
मनुष्य के भीतर भी एक तांडव घटित होता है। जब कोई व्यक्ति पहली बार अपने विश्वासों पर प्रश्न उठाता है, जब वह अपनी पहचानों से असहज होने लगता है, जब उसे लगने लगता है कि जो वह वर्षों से मानता आया है, वह अधूरा या असत्य है—वही भीतर का तांडव है। यह समय पीड़ादायक होता है, क्योंकि जो परिचित था, वह टूट रहा होता है। पर यही पीड़ा चेतना के विस्तार का संकेत है।
शंभू के तांडव में क्रोध नहीं है, घृणा नहीं है, प्रतिशोध नहीं है। वहाँ केवल न्यायपूर्ण परिवर्तन है। यह नृत्य किसी के विरुद्ध नहीं, बल्कि जड़ता के विरुद्ध है। जब संसार में संतुलन बिगड़ता है, जब अहंकार सत्य पर हावी होने लगता है, तब तांडव आवश्यक हो जाता है। यह ब्रह्मांड का स्व-नियमन है।
नटराज का स्वरूप इसी तांडव का साकार दर्शन है। एक हाथ में डमरू—सृजन का नाद। दूसरे हाथ में अग्नि—विनाश की ज्वाला। एक पाँव उठाया हुआ—मुक्ति का संकेत। दूसरा पाँव अपस्मार पुरुष पर रखा हुआ—अज्ञान का दमन। और मुख पर—पूर्ण शांति। यही शंभू का रहस्य है: भीतर असीम ऊर्जा, बाहर अटूट शांति।
मनुष्य अक्सर शक्ति और शांति को अलग-अलग समझता है। उसे लगता है कि जो शक्तिशाली है, वह अशांत होगा; और जो शांत है, वह निर्बल होगा। शंभू इस भ्रम को तोड़ते हैं। वे दिखाते हैं कि परम शक्ति परम शांति से ही जन्म लेती है। तांडव और मौन उनके दो अलग रूप नहीं, बल्कि एक ही सत्य के दो छोर हैं।
जीवन में जब कुछ टूटता है—रिश्ते, सपने, पहचान, विश्वास—तो मनुष्य उसे दुर्भाग्य मान लेता है। पर शंभू का तांडव कहता है: देखो, यह अंत नहीं है। यह वह क्षण है जब असत्य हट रहा है। यह वह द्वार है, जिसके पार तुम्हारा वास्तविक स्वरूप प्रतीक्षा कर रहा है। परंतु इस द्वार से वही गुजर सकता है, जो टूटने का साहस रखता है।
तांडव नियंत्रण का नहीं, समर्पण का नृत्य है। शंभू नृत्य को दिशा नहीं देते; वे स्वयं नृत्य बन जाते हैं। इसी प्रकार जीवन को नियंत्रित करने का प्रयास ही सबसे बड़ा संघर्ष है। जब मनुष्य जीवन के प्रवाह के साथ नृत्य करना सीख लेता है, तब संघर्ष समाप्त होने लगता है। तब वह पीड़ा में भी अर्थ देख पाता है, और अराजकता में भी व्यवस्था।
शंभू का तांडव यह भी सिखाता है कि स्थिरता मृत्यु है। जो रुका हुआ है, वही सड़ता है। चेतना का स्वभाव है—बहना। और जब बहाव रुकता है, तब तांडव उसे पुनः प्रवाहित करता है। इसीलिए शंभू को कालों का काल कहा गया—वे समय को नष्ट नहीं करते, वे उसे आगे बढ़ाते हैं।
मनुष्य समाज भी तांडव से गुजरता है। जब परंपराएँ बोझ बन जाती हैं, जब नियम मानवता को कुचलने लगते हैं, जब धर्म करुणा से खाली हो जाता है—तब परिवर्तन अपरिहार्य हो जाता है। उस समय तांडव घटित होता है। इतिहास के हर बड़े परिवर्तन के पीछे एक तांडव छिपा है—कभी विचारों का, कभी व्यवस्थाओं का, कभी चेतना का।
यह अध्याय यह नहीं कहता कि तांडव को बुलाया जाए। तांडव को बुलाने की आवश्यकता नहीं होती; वह स्वयं आता है। प्रश्न केवल यह है—जब वह आए, तो क्या तुम भागोगे, या उसके साथ नृत्य करोगे? क्योंकि जो भागता है, वह टूटता है; और जो नृत्य करता है, वह रूपांतरित होता है।
शंभू का तांडव अंततः हमें इस सत्य तक ले जाता है कि जीवन का उद्देश्य सुरक्षा नहीं, जागरण है। जो पूरी तरह सुरक्षित है, वह मृत है। जो जीवित है, वह परिवर्तनशील है। और जो परिवर्तनशील है, वही शंभू के निकट है।
“त्रिलोकनाथ शंभू: समय से परे एक सत्य” का यह अध्याय पाठक को उस बिंदु तक लाता है, जहाँ वह परिवर्तन को शत्रु नहीं, गुरु के रूप में देखने लगता है। जहाँ टूटन भय नहीं, प्रसाद बन जाती है। जहाँ तांडव विनाश नहीं, नव-जन्म का गीत बन जाता है।
और जब यह समझ उतर जाती है—
तब जीवन स्वयं एक तांडव बन जाता है,
और साधक—नर्तक नहीं,
नृत्य स्वयं हो जाता है।
Chapter 4
ध्यान : मौन में घटित होता शंभू**
मनुष्य बाहर बहुत कुछ खोज लेता है—ज्ञान, सफलता, संबंध, ईश्वर—पर भीतर झाँकने से वह अक्सर बचता है। भीतर उतरना सरल नहीं होता, क्योंकि वहाँ कोई सजावट नहीं होती, कोई भूमिका नहीं होती, कोई मुखौटा नहीं होता। वहाँ केवल वही बचता है, जो वास्तव में है। और इसी कारण ध्यान का मार्ग सबसे कठिन भी है और सबसे सत्य भी। शंभू का मार्ग ध्यान का मार्ग है, क्योंकि शंभू बाहर नहीं मिलते—वे भीतर घटित होते हैं।
ध्यान कोई क्रिया नहीं है, जिसे किया जाए। यह कोई तकनीक नहीं, जिसे सीखकर लागू कर लिया जाए। ध्यान एक स्थिति है—जहाँ करने वाला धीरे-धीरे लुप्त हो जाता है। शंभू उसी स्थिति का नाम हैं। जब मन शांत नहीं, बल्कि थककर रुक जाता है, जब विचार दबाए नहीं जाते, बल्कि स्वयं गिर जाते हैं—तब जो शेष रहता है, वही शंभू है।
मनुष्य जब पहली बार ध्यान में बैठता है, तो उसे शांति नहीं, अशांति मिलती है। उसे लगता है कि उसके भीतर विचारों का शोर बढ़ गया है। पर वास्तव में शोर बढ़ता नहीं—वह पहली बार दिखने लगता है। जैसे गंदे पानी को हिलाने पर तलछट ऊपर आ जाती है, वैसे ही चेतना को स्थिर करने पर अव्यवस्था प्रकट होती है। यही वह क्षण है, जहाँ अधिकांश लोग ध्यान छोड़ देते हैं। पर जो टिक जाता है, वही शंभू के द्वार तक पहुँचता है।
शंभू मौन के देवता हैं। पर यह मौन शब्दों की अनुपस्थिति नहीं है; यह अहंकार की अनुपस्थिति है। जब “मैं” कुछ नहीं कहना चाहता, कुछ पाना नहीं चाहता, कुछ साबित नहीं करना चाहता—तभी मौन उतरता है। उसी मौन में शंभू प्रकट होते हैं। वे किसी आवाज़ में नहीं बोलते; वे स्थिति बदलकर उत्तर देते हैं।
ध्यान में समय का बोध बदलने लगता है। कभी कुछ क्षण अनंत लगते हैं, और कभी लंबा समय एक पल में सिमट जाता है। यह इसलिए होता है, क्योंकि समय मन का निर्माण है। जहाँ मन नहीं, वहाँ समय भी नहीं। शंभू को “कालातीत” इसलिए कहा गया, क्योंकि वे उस अवस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं जहाँ समय का कोई अधिकार नहीं चलता।
श्वास और प्रश्वास—जो सामान्यतः अनदेखे रहते हैं—ध्यान में प्रवेश के द्वार बन जाते हैं। जब श्वास को नियंत्रित करने का प्रयास छोड़ा जाता है, और केवल उसे देखा जाता है, तब देखने वाला धीरे-धीरे देखे जाने में विलीन होने लगता है। यही ध्यान का गूढ़ रहस्य है। यहाँ साधक कुछ नहीं करता, फिर भी सब कुछ घटित होता है।
शंभू का ध्यान पलायन नहीं है। यह संसार से भागना नहीं सिखाता, बल्कि संसार को सही दूरी से देखने की क्षमता देता है। जब ध्यान गहरा होता है, तब सुख भी बाँधता नहीं और दुःख तोड़ता नहीं। दोनों आते हैं, दोनों जाते हैं। साधक बीच में स्थिर रहता है। यही शंभू की अवस्था है—स्थितप्रज्ञता।
ध्यान के मार्ग पर कई अनुभव आते हैं—प्रकाश, शून्यता, आनंद, कंपन, कभी-कभी भय भी। पर शंभू का मार्ग इन अनुभवों में उलझने का नहीं है। अनुभव आते-जाते रहते हैं; साक्षी बना रहना ही साधना है। जो अनुभवों से चिपक जाता है, वह आगे नहीं बढ़ पाता। शंभू वहाँ मिलते हैं, जहाँ अनुभव भी छूट जाते हैं।
मनुष्य अक्सर ध्यान को किसी लक्ष्य से जोड़ देता है—शांति पाने के लिए, दुख मिटाने के लिए, ईश्वर देखने के लिए। पर शंभू का ध्यान लक्ष्यहीन है। जहाँ लक्ष्य होता है, वहाँ इच्छा होती है। और जहाँ इच्छा होती है, वहाँ अशांति होती है। जब ध्यान केवल ध्यान रह जाता है, तब शंभू अपने आप प्रकट होते हैं।
कैलाश कोई भौगोलिक पर्वत नहीं है। कैलाश वह आंतरिक शिखर है, जहाँ चेतना पूर्णतः स्थिर हो जाती है। ध्यान उसी कैलाश की यात्रा है। यह यात्रा बाहर से भीतर की ओर है, शब्द से मौन की ओर है, रूप से निराकार की ओर है। और इस यात्रा में कोई साथी नहीं होता—सिवाय स्वयं के।
शंभू के साथ ध्यान का अर्थ है—अपने ही भीतर गुरु को स्वीकार करना। यहाँ कोई आदेश नहीं देता, कोई नियम नहीं थोपता। चेतना स्वयं अपना मार्ग खोजती है। यह स्वतंत्रता भयावह भी हो सकती है, क्योंकि यहाँ सहारे नहीं होते। पर यही स्वतंत्रता मुक्ति की पहली शर्त है।
इस अध्याय का उद्देश्य ध्यान को आदर्श बनाना नहीं, बल्कि उसे सहज बनाना है। ध्यान कोई विशेष लोगों के लिए नहीं है। जो साँस ले रहा है, वही ध्यान के योग्य है। जो जागरूक हो सकता है, वही शंभू के निकट है।
और जब साधक पहली बार ध्यान से उठता है—
तो वह पाता है कि संसार वही है,
पर देखने वाला बदल चुका है।
वही क्षण शंभू का स्पर्श है।
वही क्षण ध्यान का फल है।
क्योंकि शंभू कहीं और नहीं—
वे उसी मौन में हैं,
जिसे तुम अब तक सुन नहीं पा रहे थे।
Chapter 5
कैलाश : चेतना का परम शिखर**
मनुष्य शिखरों की ओर आकर्षित होता है। ऊँचाई उसे बुलाती है—कभी पहाड़ों के रूप में, कभी पद और प्रतिष्ठा के रूप में, और कभी आध्यात्मिक उपलब्धि के रूप में। पर बहुत कम लोग यह समझ पाते हैं कि वास्तविक शिखर बाहर नहीं, भीतर होता है। कैलाश उसी आंतरिक शिखर का प्रतीक है। वह कोई केवल हिमालय में स्थित पर्वत नहीं, बल्कि चेतना की वह अवस्था है, जहाँ पहुँचकर खोज समाप्त हो जाती है।
कैलाश तक कोई रास्ता नहीं जाता, क्योंकि जो पहुँचा दिया जाए, वह अंतिम नहीं हो सकता। कैलाश तक केवल उतरा जाता है—अहंकार से, इच्छाओं से, भय से, स्मृतियों से। यह उतरना ही वास्तव में चढ़ना है। यही शंभू का विरोधाभासी मार्ग है, जहाँ खोना ही पाना बन जाता है।
शंभू कैलाश पर विराजमान हैं, इसका अर्थ यह नहीं कि वे संसार से दूर हैं। इसका अर्थ यह है कि वे दृष्टा हैं, भागीदार नहीं। वे सब कुछ देखते हैं, पर किसी में उलझते नहीं। यही वह अवस्था है, जिसे साधक जीवन भर खोजता है—संसार में रहते हुए संसार से बँधना नहीं।
कैलाश पर कोई हलचल नहीं है। वहाँ न उत्सव है, न शोक। न वहाँ विजय का गर्व है, न पराजय का विषाद। वहाँ केवल स्थिति है—पूर्ण, अडिग, शांत। यह शांति निष्क्रिय नहीं है; यह वह शांति है, जिसमें संपूर्ण सृष्टि की ऊर्जा विश्राम करती है। जैसे समुद्र की सतह पर लहरें उठती रहती हैं, पर गहराई में सब स्थिर रहता है।
मनुष्य का जीवन भी लहरों से भरा है—भावनाओं की लहरें, घटनाओं की लहरें, संबंधों की लहरें। अधिकांश लोग उन्हीं लहरों में स्वयं को खो देते हैं। पर शंभू हमें गहराई में उतरना सिखाते हैं। वहाँ जहाँ सुख और दुःख दोनों अपनी धार खो देते हैं। वही गहराई कैलाश है।
कैलाश पर पहुँचने का अर्थ संसार छोड़ना नहीं है। इसका अर्थ है संसार को उसकी सही जगह पर रखना। जब संसार केंद्र बन जाता है, तब पीड़ा जन्म लेती है। जब चेतना केंद्र बन जाती है, तब संसार केवल एक अनुभव बनकर रह जाता है। शंभू इसी केंद्र-बोध के देवता हैं।
शंभू का कैलाश बर्फ़ से ढका है—शीतल, उजला, निर्विकार। यह बर्फ़ भावनाओं की ठंडक नहीं, बल्कि आसक्ति की समाप्ति का प्रतीक है। जहाँ चाह कम हो जाती है, वहाँ पीड़ा स्वयं पिघल जाती है। और जहाँ चाह समाप्त हो जाती है, वहाँ आनंद अपने आप प्रकट होता है।
कैलाश पर पार्वती का वास यह दर्शाता है कि शंभू की चेतना निर्जीव नहीं है। वहाँ करुणा है, प्रेम है, सृजन है। पर यह प्रेम अधिकार नहीं बनता, और यह करुणा दुर्बलता नहीं बनती। शिव–शक्ति का यह संतुलन ही पूर्णता है। केवल शिव शून्य हैं; केवल शक्ति अराजक। दोनों साथ हों, तभी सृष्टि संभव है।
मनुष्य अक्सर या तो भोग में डूब जाता है, या त्याग में कठोर हो जाता है। कैलाश इन दोनों के बीच का मार्ग है—जहाँ भोग बंधन नहीं बनता, और त्याग पलायन नहीं बनता। यह संतुलन साधना का चरम है।
कैलाश पर कोई भी स्थायी रूप से नहीं रहता—सिवाय शंभू के। इसका अर्थ यह है कि मनुष्य उस अवस्था को छू सकता है, अनुभव कर सकता है, पर उसे पकड़े नहीं रख सकता। जो उसे पकड़ने की कोशिश करता है, वह नीचे गिर जाता है। शंभू केवल उन्हें स्वीकार करते हैं, जो न पकड़ने का साहस रखते हैं।
कैलाश पहुँचने के बाद भी जीवन चलता रहता है। फर्क केवल इतना होता है कि अब जीवन साधक को नहीं चलाता—साधक जीवन को जीता है। प्रतिक्रियाएँ कम हो जाती हैं, और उत्तरदायित्व बढ़ जाता है। यही परिपक्वता है। यही शिवत्व है।
इस अध्याय में कैलाश किसी कल्पना का पर्वत नहीं है, बल्कि वह आंतरिक स्थिति है, जहाँ पहुँचकर प्रश्न अपने आप गिर जाते हैं। वहाँ “क्यों” नहीं रहता, केवल “है” बचता है। और जहाँ “है” बचता है, वहीं शंभू उपस्थित होते हैं।
जब साधक जीवन की भीड़ में भी भीतर से अकेला नहीं होता,
जब शोर में भी उसका मौन सुरक्षित रहता है,
जब सफलता उसे फुलाती नहीं और असफलता तोड़ती नहीं—
तब समझ लेना चाहिए कि उसने कैलाश को छू लिया है।
क्योंकि कैलाश कोई स्थान नहीं है।
वह एक स्थिति है।
और शंभू उस स्थिति का नाम हैं,
जहाँ पहुँचकर मनुष्य
स्वयं से आगे नहीं जाना चाहता।
Chapter 6
शिव–शक्ति : द्वैत में पूर्णता**
मनुष्य की समझ प्रायः विभाजन से आरंभ होती है। वह संसार को दो हिस्सों में बाँटकर देखता है—अच्छा और बुरा, प्रकाश और अंधकार, पुरुष और स्त्री, आत्मा और पदार्थ। यह विभाजन उसे चीज़ों को समझने में सुविधा देता है, पर सत्य को जानने से दूर भी ले जाता है। शंभू का मार्ग विभाजन का नहीं, समन्वय का मार्ग है। और इसी समन्वय का परम प्रतीक है—शिव–शक्ति।
शिव अकेले हों तो वे पूर्ण नहीं हैं। शक्ति अकेली हो तो वह दिशाहीन हो जाती है। शिव चेतना हैं—स्थिर, मौन, साक्षी। शक्ति ऊर्जा हैं—प्रवाही, सृजनशील, गतिमान। जब चेतना ऊर्जा से मिलती है, तभी सृष्टि घटित होती है। यही मिलन शिव–शक्ति है। यह विवाह नहीं, यह अस्तित्व का मूल सूत्र है।
मनुष्य अक्सर शिव को त्याग, वैराग्य और मौन से जोड़ता है, और शक्ति को संसार, भोग और क्रिया से। इसी गलत समझ के कारण वह या तो संसार में उलझ जाता है, या संसार से भागने लगता है। शंभू का संदेश इससे कहीं गहरा है—संसार में रहते हुए भी बँधना मत, और त्याग में रहते हुए भी जीवन से कटो मत। यही शिव–शक्ति का संतुलन है।
पार्वती केवल शंभू की अर्धांगिनी नहीं हैं; वे शंभू की अभिव्यक्ति हैं। जो शिव भीतर मौन हैं, वही शक्ति में बाहर प्रकट होते हैं। पार्वती का तप यह दर्शाता है कि ऊर्जा को चेतना से मिलने के लिए स्वयं को शुद्ध करना पड़ता है। और शंभू का स्वीकार यह बताता है कि चेतना बिना ऊर्जा के अधूरी है।
शिव–शक्ति का संबंध अधिकार का नहीं है। वहाँ कोई अधीन नहीं, कोई श्रेष्ठ नहीं। वहाँ केवल पूरकता है। यही कारण है कि अर्धनारीश्वर का स्वरूप उत्पन्न हुआ—आधा शिव, आधी शक्ति। यह रूप समाज को नहीं, चेतना को संबोधित करता है। यह कहता है कि पूर्णता किसी एक ध्रुव में नहीं, बल्कि दोनों के संतुलन में है।
मनुष्य के भीतर भी शिव और शक्ति दोनों हैं। उसकी चेतना शिव है, और उसकी इच्छाएँ, भावनाएँ, क्रियाएँ शक्ति हैं। जब शक्ति चेतना के बिना चलती है, तो मनुष्य भटकता है। और जब चेतना शक्ति के बिना रह जाती है, तो जीवन निष्क्रिय हो जाता है। साधना का अर्थ है—इन दोनों को एक लय में लाना।
भक्ति शक्ति है। ज्ञान शिव है। कर्म शक्ति है। विवेक शिव है। जब भक्ति में ज्ञान जुड़ता है, तब अंधश्रद्धा समाप्त होती है। जब ज्ञान में करुणा जुड़ती है, तब अहंकार गलता है। शंभू का मार्ग इन दोनों का संगम है—जहाँ न भक्ति अंधी है, न ज्ञान रूखा।
शक्ति सृजन चाहती है। वह नृत्य करना चाहती है, गाना चाहती है, जीवन को महसूस करना चाहती है। शिव उसे रोकते नहीं; वे उसे दिशा देते हैं। यही कारण है कि तांडव उग्र होते हुए भी अराजक नहीं है। उसमें लय है, मर्यादा है, संतुलन है। यह लय ही शिव–शक्ति का संगीत है।
मनुष्य जब अपने भीतर स्त्री और पुरुष ऊर्जा के संतुलन को समझ लेता है, तब उसके संबंध बदलने लगते हैं। तब प्रेम स्वामित्व नहीं बनता, और स्वतंत्रता दूरी नहीं बनती। तब आकर्षण केवल शरीर तक सीमित नहीं रहता, और वैराग्य कठोर नहीं होता। यह परिपक्वता शिव–शक्ति की कृपा से ही आती है।
शिव–शक्ति हमें यह भी सिखाते हैं कि संघर्ष विरोध में नहीं, असंतुलन में होता है। जब जीवन का कोई एक पक्ष अत्यधिक हावी हो जाता है—भोग या त्याग, तर्क या भावना, कर्म या ध्यान—तब पीड़ा जन्म लेती है। शंभू उस पीड़ा को दंड नहीं मानते; वे उसे संकेत मानते हैं कि संतुलन बिगड़ गया है।
इस अध्याय में शिव–शक्ति को किसी पौराणिक कथा के रूप में नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन के रूप में देखा जाना चाहिए। यह दर्शन कहता है कि पूर्णता कहीं बाहर नहीं, बल्कि भीतर के संतुलन में है। जब भीतर शिव मौन में स्थित हो, और शक्ति प्रेम से बह रही हो—तभी जीवन पूजा बन जाता है।
और जब यह समझ उतर जाती है—
तब मनुष्य न शिव को छोड़ना चाहता है,
न शक्ति से डरता है।
तब वह जीवन को स्वीकार करता है—
पूरी तीव्रता के साथ,
पूरे विवेक के साथ।
क्योंकि शिव–शक्ति कोई दो नहीं हैं।
वे एक ही सत्य के
दो स्वर हैं।
और उस सत्य का नाम है—
शंभू।
Chapter 7
मोक्ष : जीवन में ही मुक्ति**
मनुष्य मोक्ष को अक्सर मृत्यु के बाद घटित होने वाली कोई अवस्था मान लेता है। उसे लगता है कि जीवन एक परीक्षा है और मोक्ष उसका परिणाम। इसी भ्रम में वह जीवन को बोझ की तरह ढोता है—सहता है, झेलता है, काटता है। पर शंभू का दर्शन इस सोच को जड़ से उलट देता है। शंभू कहते हैं—मोक्ष मृत्यु के बाद नहीं, जीवन के भीतर घटित होता है। और जो जीवन में मुक्त नहीं हुआ, वह मृत्यु में भी बंधन से बाहर नहीं जा सकता।
मोक्ष का अर्थ संसार छोड़ना नहीं है। यह शरीर त्यागना नहीं है। यह इच्छाओं का गला घोंटना नहीं है। मोक्ष का अर्थ है—बंधन से जागरूकता। जब मनुष्य यह जान लेता है कि जो उसे बाँध रहा था, वह वास्तव में उसकी अपनी पहचान थी, तब जंजीरें अपने आप गिर जाती हैं। शंभू उसी बोध का नाम हैं।
मनुष्य का सबसे गहरा बंधन है—“मैं”।
मैं दुखी हूँ।
मैं सुखी हूँ।
मैं सफल हूँ।
मैं असफल हूँ।
यह “मैं” ही वह केंद्र है, जहाँ से पीड़ा जन्म लेती है। शंभू इस “मैं” को मिटाते नहीं, वे इसे विस्तृत कर देते हैं। जब “मैं” सीमित नहीं रहता, तब पीड़ा का आधार ही समाप्त हो जाता है। यही मोक्ष है—अपने छोटे से घेरे से बाहर आ जाना।
शंभू का मोक्ष पलायन नहीं है। वे जीवन से मुँह मोड़ने वालों के देव नहीं हैं। वे जीवन को पूरी तीव्रता से जीने वालों के साक्षी हैं—पर आसक्ति के बिना। वे कहते हैं: हँसो, पर हँसी में खो मत जाओ। रोओ, पर आँसुओं में डूब मत जाओ। प्रेम करो, पर प्रेम को कैद मत बनाओ। यही मुक्त जीवन है।
मोक्ष का पहला संकेत यह होता है कि मनुष्य प्रतिक्रिया देना बंद कर देता है और उत्तर देना सीख लेता है। प्रतिक्रिया अचेतन होती है; उत्तर चेतन। कोई अपमान करे और भीतर शांति बनी रहे—यह सहनशीलता नहीं, यह मुक्ति का संकेत है। कोई प्रशंसा करे और भीतर अहंकार न उठे—यह उदासीनता नहीं, यह शिवत्व का स्पर्श है।
शंभू का मोक्ष मौन में प्रकट होता है, पर संसार से काटता नहीं। मुक्त व्यक्ति बोलता भी है, हँसता भी है, कार्य भी करता है—पर भीतर कहीं कुछ अडिग रहता है। जैसे तूफ़ान में भी पर्वत अचल रहता है। वही अचलता शंभू हैं।
मृत्यु का भय मोक्ष के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है। पर शंभू मृत्यु से नहीं डरते, क्योंकि वे जानते हैं कि मृत्यु केवल रूप का अंत है, अस्तित्व का नहीं। जब यह समझ उतर जाती है, तब जीवन की हर घड़ी पवित्र हो जाती है। तब हर साँस उपहार बन जाती है।
मोक्ष कोई विशेष उपलब्धि नहीं है, जिसे गिना जाए। जो उसे उपलब्धि मान लेता है, वही फिर बंधन में पड़ जाता है। मोक्ष तो तब घटित होता है, जब खोज समाप्त हो जाती है। जब मनुष्य पूछना छोड़ देता है—“और क्या चाहिए?”—तब जो है, वही पर्याप्त हो जाता है।
शंभू के मार्ग में मोक्ष का अर्थ है—स्वयं से युद्ध का अंत। जब मनुष्य स्वयं को सुधारने, बदलने, आदर्श बनाने की हिंसा छोड़ देता है, तब भीतर गहरी शांति उतरती है। शंभू कहते हैं—जैसे हो, वैसे ही स्वीकार करो। यही स्वीकार धीरे-धीरे रूपांतरण बन जाता है।
मुक्त व्यक्ति संसार के बीच रहकर भी अकेला नहीं होता, और अकेले रहकर भी अधूरा नहीं होता। वह संबंधों में रहता है, पर निर्भर नहीं होता। वह जिम्मेदारियाँ निभाता है, पर उनसे दबता नहीं। यही संतुलन मोक्ष का व्यवहारिक रूप है।
इस पुस्तक के पहले अध्याय से यहाँ तक की यात्रा बाहर से भीतर की रही है—
समय से परे शंभू,
अहंकार का भस्म होना,
तांडव का परिवर्तन,
ध्यान का मौन,
कैलाश की स्थिरता,
और शिव–शक्ति का संतुलन—
ये सब मिलकर इसी एक सत्य की ओर इशारा करते हैं:
मुक्ति कहीं दूर नहीं है।
जब मनुष्य यह समझ लेता है कि उसे कहीं पहुँचना नहीं है,
कि उसे कुछ बनना नहीं है,
कि उसे केवल जागना है—
तभी मोक्ष घटित होता है।
शंभू उस जागरण का नाम हैं।
वे किसी आकाश में नहीं बैठे।
वे किसी निर्णय के बाद नहीं मिलते।
वे उसी क्षण प्रकट होते हैं,
जिस क्षण मनुष्य
अपने भीतर शांत होकर कहता है—
अब कुछ भी पाना शेष नहीं है।
और जब यह वाक्य सत्य बन जाता है,
तब जीवन स्वयं
एक मुक्त उत्सव बन जाता है।
क्योंकि मोक्ष अंत नहीं है।
मोक्ष प्रारंभ है—
शिवत्व में जीने का।
